अचानक पुरानी हिंदी फिल्मों के गाने याद आने लगे। 1954 में ‘जागृति’ फिल्म आई थी। उसका एक गाना लोगों की जुबान पर लंबे समय तक चढ़ा रहा और आज भी पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी के मौके पर कहीं न कहीं जरूर बजाया जाता है। रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी उर्फ प्रदीप के लिखे और मोहम्मद रफी द्वारा गाए गए उस गीत के उस बोल कुछ इस तरह हैः-
हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
तुम ही भविष्य हो भारत विशाल के
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के
इसी तरह 1961 में ‘गंगा जमुना’ फिल्म आई। उसका भी शकील बदायुंनी का लिखा हेमंत कुमार का गाया और स्कूल में फिल्माया जाने वाला गीत उतना ही लोकप्रिय हुआ। उसके बोल थेः—
इंसाफ की डगर पे बच्चों दिखाओ चल के
यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के
दुनिया के रंज सहना और कुछ न मुंह से कहना
सच्चाइयों के बल पे आगे को बढ़ते रहना
रख दोगे एक दिन तुम संसार को बदल के
यह दोनों गीत युवाओं के भीतर एक भारतीय नागरिक के दायित्वों का बोध पैदा करते हैं। उसे बेबी बूमर(62 से 80 वर्ष) वाली, जेन एक्स(46-61 वर्ष)वाली और मिलेनियल(30 से 45 वर्ष) वाली पीढ़ियां भूल गई थीं, नई पीढ़ी ने उसे फिर से याद दिला दिया है। जब संघ परिवार और उसकी सरकारों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को डुबोने के पूरे इंतजाम कर रखे हों, तब भारत की युवा पीढ़ी ने जंतर मंतर से शुरू करके पूरे देश में जो आंदोलन किया उसे महज ‘डूबते को तिनके का सहारा’ वाले मुहावरे से नवाजना अन्याय होगा।
वह डूबती जम्हूरियत के लिए खंभा, जंजीर और नौका के सहारे के रूप में प्रकट हुई है। अशोक के कलिंग विजय की तरह पश्चिम बंगाल चुनाव जीतने के बाद मौजूदा सरकार ने अपने अश्वमेध का घोड़ा छोड़ रखा था, उसे युवाओं ने पकड़ कर बांध लिया है। चीन के थियेनआनमन चौक की तरह अभिमन्यु के फिर से मारे जाने की भविष्यवाणी गलत निकली। इस बार अभिमन्यु जीत गया है और इंडिया अलायंस के पांडवों के परोक्ष समर्थन के बावजूद उनकी सीधी भागीदारी के बिना जीता है।
25 जुलाई को उसे जो जीत हासिल हुई है और उसे लेकर जिस तरह उत्साह का प्रदर्शन हुआ है उससे तानाशाही और नफरती इरादों के हौसले पस्त होते दिखे हैं। हालांकि तानाशाहों के हौसले तो 20 जुलाई को ही पस्त हो गए थे। भले सत्ताधारियों ने करंट लगे डंडे, कील लगी लाठियां और पैलेट गनों से युवाओं का दमन किया लेकिन उसके बाद मधुमक्खियों की तरह से युवाओं और उनके समर्थकों ने सत्ताधारियों को घेर लिया।
अचानक 12 वर्षों के अन्याय के विरुद्ध संचित आक्रोश फूट पड़ा। इस पीढ़ी ने यह भी जता दिया कि उसे मंदिर-मस्जिद, हिंदू मुस्लिम और प्राचीन भारत के गौरव के नाम पर लंबे समय तक बहकाया और बरगलाया नहीं जा सकता। उसे चैनलों और अखबारों के नफ़रती कार्यक्रम लंबे समय तक घृणा और हिंसा नहीं सिखा सकते। उसे अपना भविष्य सुरक्षित चाहिए न कि आश्वासन और लंबे लंबे भाषण।
उसकी निगाह में नरेंद्र मोदी विष्णु भगवान के अवतार नहीं हैं और न ही राहुल गांधी पप्पू हैं। न ही कमजोर पड़ चुकी कम्युनिस्ट पार्टियां अर्बन नक्सली हैं। उसने सीपीआई और सीपीएम ही नहीं भूमिगत आंदोलन से निकली और लोकतांत्रिक मुख्यधारा में आ चुकी सीपीआई(एमएल) और उसके संगठन आइसा के बारे में कोई पूर्वाग्रह नहीं पाला है।
बल्कि अगर यह कहा जाए कि काकरोच जनता पार्टी नामक विलोम प्रहसन की छतरी के नीचे मार्क्सवादी दलों और आंबेडकरवादी दलों के विचारों का नवीकरण हुआ है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
ऐसा शायद इसलिए भी हो पाया क्योंकि एनसीईआरटी के पाठ्यक्रमों के भगवा एजेंडे और विश्वविद्यालयों में संघ परिवार के शिक्षकों की नियुक्तियों के बावजूद यह पीढ़ी अमेरिकी क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, चीनी क्रांति, ईरान की इस्लामी क्रांति, अपनी आजादी की लड़ाई और दुनिया में आजकल होने वाले परिवर्तनों के बारे में जानती है। वह उस पर चर्चा करती है और आजादी उसे पसंद है।
वह भगत सिंह और भीमराव आंबेडकर को पढ़ती है। संविधान सभा की बहसों को पढ़ती है और यह भी जानती है कि तानाशाही के सामने गांधी का तरीका कारगर है। इसलिए उनके असहयोग, सविनय अवज्ञा और अनशन के सत्याग्रही हथियारों का इस्तेमाल करती है। हालांकि संघ परिवार के विद्यालय और उनकी संस्थाओं ने सरकार पर शिक्षा को बदल डालने का जो दबाव बना रखा है उसे देखते हुए नहीं लगता कि इसके बाद वाली पीढ़ी इतना खुलकर सोच पाएगी।
क्योंकि जिस पीढ़ी ने यह आंदोलन किया उसने शायद एनसीईआरटी की वे किताबें पढ़ी थीं जिसका पूरी तरह भगवाकरण नहीं किया गया था।
पर असली सवाल यह है कि युवाओं को यह जीत हासिल कैसे हुई? चूंकि भारत में बुद्धिजीवियों की कमी नहीं है, हालांकि उसमें कायरों की संख्या अधिक है। फिर भी भांति भांति के मतों के नाते यहां लोकतंत्र का एक भ्रम तो पैदा ही होता रहता है। वैसे तो भारत में मुंडे मुंडे मतर्भिन्ना की स्थिति है लेकिन जिन दो मतों का यहां उल्लेख आवश्यक है उनमें एक है संघर्ष का सिद्धांत और दूसरा है साजिश का सिद्धांत।
इन दोनों सिद्धांतों की अपनी अपनी तर्कप्रणाली है और उसके लिए उनके पास अपने अपने परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं। संघर्ष के सिद्धांत वालों का कहना है कि युवाओं ने संघर्ष किया तो उन्हें जीत हासिल हुई। उन्होंने अपने आंदोलन को अहिंसक रखा, उसमें तोड़फोड़ वाले तत्वों का प्रवेश नहीं होने दिया, आंदोलन पूरे देश में फैल गया और 20 जुलाई की सरकारी हिंसा के बावजूद उसने धैर्य नहीं खोया।
धीरे धीरे किसानों, मजदूरों और समाज की वरिष्ठ पीढ़ी और विपक्ष के साथ-साथ भाजपा के भीतर उनके प्रति सहानुभूति और समर्थन बढ़ने लगा था। इसलिए सरकार को झुकना पड़ा। इस आंदोलन को सोनम वांगचुक के 26 दिन तक चले आमरण अनशन से बल मिला और जब उनका अनशन समाप्त हुआ तब भी काकरोच जनता पार्टी ने तय किया कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लिए बिना यह आंदोलन समाप्त नहीं होगा।
यह भी लगा कि अगर सोनम बांगचुक की तरह सरकार के दबाव में काकरोचों ने आंदोलन वापस भी ले लिया तो भी दिल्ली के फुटपाथों पर सो रहे युवा उसे वापस नहीं लेंगे।
लेकिन संघर्ष के सिद्धांत के समांतर साजिश का सिद्धांत भी काफी जोरशोर से उछाला गया है। संयोग से इस मायने में भाजपा और कांग्रेस के लोग एक ही जगह जाकर खड़े होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्वगुरु और भगवान विष्णु का अवतार मानने वाले पहले भाजपाई तो आंदोलन को विदेशी शक्तियों द्वारा प्रेरित और सोनम वांगचुक को चीन और पाकिस्तान का एजेंट बता रहे थे। और बार बार कह रहे थे कि विदेशी धन से चलने वाले आंदोलन के आगे धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नहीं होगा।
लेकिन अब कह रहे हैं कि इस देश के तमाम लोगों को मोदी से राजनीति की दीक्षा लेनी चाहिए। देखो कैसे गुब्बारा फुलाकर उसकी हवा निकाल देते हैं। जैसे किसान आंदोलन की हवा निकाली, वैसे ही काकरोच आंदोलन को फुस्स कर दिया। कान थोड़ा घुमाकर पकड़ने वाले कांग्रेसी भी इसी निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि लद्दाख के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने सोनम वांगचुक को तैयार किया अनशन करने के लिए। काकरोच जनता पार्टी की भी सरकार से मिलीभगत थी।
वे देख रहे थे कि कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी नीट के पेपरलीक से पैदा हुए आंदोलन को गरमा रहे थे और वह बढ़ रहा था। सरकार चाहती थी कि युवा राहुल के समर्थन में न उतरें और फिर उसे भटकाने और राहुल के नेतृत्व को छोटा करने के लिए सोनम वांगचुक को खड़ा कर दिया। सरकार को लगा था कि वे लोग थोड़े दिन अनशन करके चले जाएंगे। लेकिन जब पानी सर से ऊपर निकलने लगा तो हस्तक्षेप करना पड़ा और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ।
इतिहास में साजिशें होती हैं। सरकारों के हाथ बहुत लंबे होते हैं और वे लीलाएं भी करती हैं। इसके बावजूद संघर्ष करने वाले लोग उनको दरकिनार करके अपने कर्म पर यकीन करते हैं। शायद गांधी ने यही किया। साजिश का सिद्धांत कुछ नियतिवाद के सिद्धांत जैसा लगता है।
तुलसी दास ने एक जगह कहा है कि ‘उमा दारु जोशित की नाईं। सबहिं नचावत राम गुसाईं।’ यानी आप ‘होइहिं सोई जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावैं साखा।’ में यकीन कीजिए। अपने कर्म पर भरोसा मत कीजिए। यह मानिए कि कोई बड़ी शक्ति हम सब को नचा रही है। यह सिद्धांत एक तरह से आप को अर्मण्य बनाता है। आइए सरकार की दैवीय शक्तियों में यकीन करना छोड़कर जनता की शक्ति और उसके संघर्ष के सिद्धांत में यकीन करें और मानें कि जेन-जी में लोकतंत्र जिंदा है।
(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)