सबसे पहले तो हमें पैलेट गन के बारे में एक महत्वपूर्ण तथ्य जान लेना चाहिए कि दुनिया में इस वक्त किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक देश या समाज में इस तरह के घातक हथियार का इस्तेमाल अपने ही नागरिकों के विरूद्ध नहीं हो रहा है! ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि भारत जैसा एक लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था वाला देश अपने ही नागरिकों के विरूद्ध ‘पैलेट गन’ जैसे खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल क्यों कर रहा है?
समाज और मीडिया के एक हिस्से से उठकर यह सवाल अब देश के सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। गुरुवार को न्यायालय की तीन सदस्यों की पीठ ने इसकी पहली सुनवाई की और सरकार को कुछ निर्देश भी जारी किये। इसमें एक निर्देश ये भी है कि राष्ट्रीय राजधानी की सरकार पैलेट गन से घायल लोगों का इलाज स्वयं अपनी पहल से कराये और उनका पूरा ख्याल रखे! निश्चय ही कोर्ट की यह एक अच्छी मानवीय पहल है। इसे प्रतिबंधित होना चाहिए या नहीं, कोर्ट ने इस पर विचार नहीं किया।
उसने फिलहाल पैलेट गन के इस्तेमाल से सम्बंधित सभी जरूरी तथ्यों-एस ओ पी आदि के दस्तावेजों को कोर्ट के समक्ष पेश करने की सरकार को हिदायत दी है। सुनवाई के अगले चरणों में पैलेट गन इस्तेमाल पर किसी फैसले की संभावना बन सकती है।
हाल के ज्ञात सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक अपने देश में पैलेट गन का बड़े स्तर पर पहला इस्तेमाल सन् 2010 में कश्मीर में किया गया। उसमें 100 से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों अपंग हुए! इसके बाद फिर 2016 में भी कश्मीर के अंदर पैलेट गनों का इस्तेमाल हुआ। जुलाई 2016 से फरवरी, 2017 के बीच कश्मीर में काफी अशांति रही और भीड़-नियंत्रण के नाम पर इसका इस्तेमाल किया जाता रहा। इसमें 17 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई। लेकिन घायलों की संख्या 6000 से कुछ अधिक थी।
महीनों-सालों तक लोग श्रीनगर से दिल्ली के अस्पतालों में भर्ती कराये जाते रहे! इन भर्ती लोगों में कब कितने स्वस्थ हुए और कितने जान गंवा बैठे; इसके ठोस और आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। हां, एक आंकड़ा जरूर प्रकाश में आया कि इस दरम्यान 728 लोगों की आंखें खराब हो गयीं! किसान आंदोलन के दौरान भी हरियाणा-पंजाब सीमा के पास भीड़ नियंत्रण के लिए पैलेट गन चलने की खबर आई थी! 2023 में मणिपुर में भी इसके इस्तेमाल की खबर आई।
अब 2026 के जुलाई में जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान पैलेट गन के सात राउंड चलाये जाने की खबर है! बताते हैं कि 7 में 5 राउंड ही “प्रभावी” रहे। इसमें तीन से चार लोगों के घायल होने की खबर आई। लेकिन अभी तक तीन घायल ही सामने आये हैं, जिनमें एक साहिल नामक 19 वर्षीय युवक को घायलावस्था में ही विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पेश किया।
इस तरह पूरी दुनिया के सामने पैलेट गन के खतरनाक ज़ख्मों का सच भी आ गया! पुलिस में भर्ती की परीक्षा में हुए पेपर-लीक से नाराज साहिल ने जंतर-मंतर आकर प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया और 20 जुलाई को पैलेट गन के छर्रेदार हमले का शिकार हो गया! उसकी जान तो सुरक्षित है लेकिन एक आंख के पूरी तरह खत्म होने का ख़तरा बरकरार है।
वैसे तो पैलेट गन का आविष्कार 1886 में या उससे कुछ पहले हुआ बताया जाता है! किसी यूरोपीय देश में ही इसका आविष्कार हुआ था! पर यूरोपीय देश अब इसका कहीं इस्तेमाल नहीं करते! इंग्लैंड ने आखिरी बार इसका इस्तेमाल 1970 के दशक में उत्तरी आयरलैंड में किया था। अपनी क्रूरता के लिए वैश्विक स्तर पर कुख्यात इजरायल ने 1987 से 1993 के बीच कई बार इस तरह के घातक हथियारों का इस्तेमाल इंतिफादा को नियंत्रित करने के नाम पर किया।
इस वक्त इजिप्ट, बहरीन और ट्यूनीशिया के साथ भारत जैसे कुछ देश ही फिलवक्त इसका इस्तेमाल करते आ रहे हैं!
संयुक्त राष्ट्र संघ ने ऐसे हर क्रूर कदम पर हमेशा आपत्ति जताई। भारत सरकार की सुरक्षा एजेंसियों ने जब कुछ साल पहले जम्मू-कश्मीर के कुछ हलकों में इसका इस्तेमाल किया तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर आपत्ति जताते हुए अपनी एक टीम को प्रभावित इलाके में जाने की अनुमति देने का “दिल्ली” से अनुरोध किया था। लेकिन सरकार ने संयुक्तराष्ट्र को इसकी अनुमति नहीं दी।
संयुक्तराष्ट्र के मानवाधिकार आयोगने इस बारे में भारत सरकार को समय-समय पर लिखा और पैलेट गनों के इस्तेमाल से बाज आने की सलाह दी। पर सिलसिला कहां थमा! अगर थमा होता तो 20 जुलाई, 2026 में तीन युवाओं के साथ ऐसा दर्दनाक वाकया कैसे घटता!
चौंकाने वाली बात है कि मौजूदा सरकार ने ही पैलेट गन के इस्तेमाल पर देश और वैश्विक स्तर पर उठते सवालों के मद्देनजर 2018 में एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई थी। गृह मंत्रालय के एक तत्कालीन संयुक्त सचिव की अगुवाई में सात सदस्यों की उक्त कमेटी ने भी पैलेट गन की जगह कम घातक या कम नुकसान करने वाले हथियारों या उपकरणों के इजाद और उपयोग की जरूरत पर बल दिया था! पर कुछ खास नहीं हुआ।
अगर सिफारिश की रोशनी में कुछ हुआ होता तो इतने बरस बाद देश की राजधानी दिल्ली में पैलेट गनें कैसे निकल आतीं?
20 से 22 जुलाई के बीच सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने इस सच्चाई से इंकार करना चाहा। पर ठोस तथ्य जब उजागर होने लगे तो सरकारी स्तर पर भी मान लिया गया कि इनका इस्तेमाल जंतर-मंतर प्रोटेस्ट के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स की तरफ से किया गया था! स्टैन्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर के तहत इसके लिए डीसीपी स्तर के एक अधिकारी से इस गन के इस्तेमाल की अनुमति ले ली गई थी!
अनुमति डीसीपी से ली गयी हो या नॉर्थ ब्लॉक से; इन घातक हथियारों की ध्वंसात्मक क्षमता के असर पर भला क्या फर्क पडने वाला था!
सुप्रीम कोर्ट में जो याचिकाएं दायर हुई हैं, उनमें एक याचिका देश के प्रतिष्ठित सेवानिवृत्त पुलिस उच्चाधिकारी यशोवर्धन आजाद की है। शेष दो याचिकाएं उन भुक्तभोगी युवाओं की तरफ से हैं जो इन गनों के भयानक घाव का दंश झेल रहे हैं! इस बीच, यशोवर्धन आजाद से भी इस मुद्दे पर कल हमने चर्चा की थी। वह भारत के केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के विशेष निदेशक रह चुके हैं। सरकार के उच्च सुरक्षा बंदोबस्त मामलों के शीर्ष पदों पर रहे हैं!
सुरक्षा सिस्टम चलाने का अनुभव रखने वाले उन जैसे पूर्व उच्चाधिकारी ने इन पंक्तियों के लेखक से चर्चा में साफ शब्दों में कहा: “किसी संवैधानिक डेमोक्रेसी में पैलेट गन का इस्तेमाल अपने ही नागरिकों के विरूद्ध कैसे हो सकता है? यह बिल्कुल गलत है।” देखिये, माननीय सर्वोच्च न्यायालय क्या कहता है!
(उर्मिलेश प्रिंट और टीवी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं और यूट्यूब चैनल UrmileshOfficial भी चलाते हैं।)