चोर के मुंह से चांद का वर्णन

मनुष्य के अंतरमन के आध्यात्मिक विस्तार को धर्म कहा जा सकता है। इस तरह से धर्म व्यक्ति संस्कृति के अंतःकरण का मामला है। अंतःकरण के आयतन का जितना विस्तार धर्म में उतनी ही उदारता के लिए जगह बनती है। संकुचित अंतःकरण के आयतन में कट्टरता पलती है। जितना संकुचित अंतःकरण का आयतन उतनी जबरदस्त कट्टरता। संकुचित अंतःकरण के लोग जब वसुधैव कुटुंबकम कहते हैं तो कान खड़े हो जाते हैं। यह कोई वोट-वटुरुवा राजनीति का चुनावी नारा नहीं है।

जब आरएसएस और भाजपा की संसदीय औकात दो कौड़ी की नहीं थी, और न उन के संदेहास्पद बौद्धिकों और फरेबी व्याख्याकारों की ही औकात दो कौड़ी की हुई थी तब हमारे पुरखों ने अपने संसद भवन के प्रवेश कक्ष में यह अंकित किया । वोट-वटुरुवा राजनीति और उसकी बुद्धिमत्ता के फरेब को समझने के लिए मूल रूप से महाउपनिषद का यह श्लोक यह श्लोक बाद में हितोपदेश और ‎पंचतंत्र में ‎भी उद्धृत है। तो वसुधैव कुटुंबकम का पूरा संदर्भ देखा जाना चाहिए — 

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

अपने-पराये और तेरीमेरी करने में रात-दिन लगे लोग भी वसुधैव कुटुंबकम कहते हैं। संदेहास्पद बौद्धिक और फरेबी व्याख्याकार सत्ता का कील-कवच धारण कर अपनी किर्तनिया चर्या में लग जाते हैं। सत्ताधारी दल लोगों को ऐसा लगता है कि संदेहास्पद बौद्धिकों और फरेबी व्याख्याकारों की किर्तनिया चर्या के बल पर वसुधैव कुटुंबकम को वोट-वटुरुवा राजनीति के चुनावी नारों में बदल सकेंगे तो यह उन की सब से बड़ी भूल साबित होगी।

2014 के बाद दुनिया बहुत बदली है, भारत की राजनीतिक दुनिया तो सब से ज्यादा पिछले 60 दिन में बदल गई! राग-द्वेष, जन्म-मृत्यु और सभी तरह की आसक्तियों से मुक्त होने की कोशिश में लगे श्रेष्ठ चरित्र वालों के लिए ही पृथ्वी परिवार बनती है। कथनी और करनी में अंतर के बल पर ही जिन की भावधारा जिंदा रही है वे वसुधैव कुटुंबकम का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे लोग काल्पनिक संस्कृति खड़ी करके असली संस्कृति के साथ भीतरघात, फरेब और धोखेबाजी करते हैं। इन से दोस्ती से भी सावधान, रहना जरूरी है।

रिपब्लिकनों का एकपक्षवाद तो फिर भी अपनी चिर-स्थाई रुझान में अमेरिका के राष्ट्र-हित में काम करता है। लेकिन जिंदगी भर अदरनेस की राजनीति करनेवाले अमेरिका जाकर वननेस ‎की बात करनेवाले हैं! विडंबना ही है। अदरनेस के कई आधार होते हैं। प्रमुख दो हैं — ‎राष्ट्र और धर्म (भारत में जाति और अन्यत्र रंग, नस्ल)। राष्ट्रीय ‎स्वयंसेवक संघ की वैचारिकी में, राजनीतिक संगठन के संदेहास्पद बौद्धिक आधार में तो राष्ट्र और ‎धर्म दोनों का मिलावट रहा है! यह खतरनाक मिलावट है।

इस खतरनाक मिलावट से सांप्रदायिकता जहर तैयार होता है — सिर्फ धर्म-आधारित सांप्रदायिकता नहीं, वर्ण-जाति आधारित आधारित सांप्रदायिकता, और गरीबों के प्रति हिकारत के स्थाई भाव का भी प्रवाह निरंतर  जारी रहता आया है। राष्ट्र और धर्म के मिलावट से तैयार सभी तरह के सांप्रदायिक रसायन का खतरनाक और आपराधिक ‎इस्तेमाल भारत के नागरिकों पर किया है।

पश्चिम बंगाल में ठीक ऐन चुनाव के पहले गलत तरीके से इतने सारे नागरिकों के नाम मतदाता सूची से निकल दिये गये तो, इसे नागरिकों पर सांप्रदायिक रसायन के खतरनाक और आपराधिक ‎इस्तेमाल का मामला क्यों नहीं मानना चाहिए! 

जिंदगी भर अदरनेस की राजनीति करनेवाले अमेरिका जाकर वननेस ‎की बात करेंगे! विडंबना है। एकपक्षीय ‎लोग हैं, दूसरे या अन्य पक्ष का नकार ही इन का वननेस है — गाल बजाने से कोई स्वामी विवेकानंद नहीं हो जाता है।  

भक्ति केंद्र में एकत्र लोगों को यह पता है कि नहीं! भक्ति धर्म का विस्तार नहीं विकल्प है। बाहरी आडंबरों पंडा-पुरोहितवाद के खिलाफ से निकली थी भक्ति! सीधे सरल और सुनिश्चित रूप से बात समझ में न आये तो यह कि धार्मिक आधार पर की जानेवाली वर्ण-‎निषेधी वंचनाओं से उत्पन्न सामाजिक ‎भेदभाव तथा विषमताओं के खिलाफ मानवाधिकार की परवाह करनेवाला पंडा-पुरोहितवादी धर्म के समानांतर आध्यात्मिक विस्फोट थी भक्ति चेतना। 

गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस को आधार बनाकर पहले विश्व हिंदू परिषद और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी आदि ने भारत के लोकतंत्र में कोहराम मचा दिया। उस गोस्वामी तुलसीदास ने कहा था — 

कहा कहो छवि आज की, भले बने हो नाथ।

तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण लो हाथ॥

यह भी कहा —

मुरली मुकुट दुराय कै, धरयो धनुष सर नाथ।

तुलसी लखि रुचि दास की, कृष्ण भए रघुनाथ॥

हमारे लिए अर्थात जो धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों के राजनीतिक इस्तेमाल के पक्ष में कभी नहीं रहे उन के लिए राम और कृष्ण एक ही हैं। राम और कृष्ण एक हैं, लेकिन उनके नाम की भक्ति चेतना की सामाजिक अभिव्यक्ति एक नहीं रही है। उन के पसीनेदार और मालदार भक्तों की सामाजिक चेतनाएं भी एक ही नहीं रही है।  

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इस्कॉन का रिश्ता क्या है? रिश्ता है। 

खुशी की बात है कि आरएसएस और इस्कॉन के बीच का पवित्र रिश्ता ‎हरिया रहा है। इनका कोई औपचारिक संस्थागत संबंध या रिश्ता तो ‎नहीं रहा है लेकिन जो है से हरिया रहा है। ‎

न्यूयॉर्क में 1966 में इस्कॉन की स्थापना हुई। इस्कॉन की स्थापना ‎एसी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने की थी। यह गौड़ीय वैष्णव परंपरा ‎पर आधारित है। मुख्य रूप से कृष्ण चेतना, भगवद्गीता और ‎श्रीमद्भागवत के प्रचार पर केंद्रित है। इसका स्वरूप अंतरराष्ट्रीय और ‎भक्ति प्रधान है। ‎

प्रभुपाद कृष्ण चेतना को सामान्य “हिंदू धर्म” से अलग बताते थे। ‎आरएसएस हिंदू पहचान को व्यापक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय रूप में देखता ‎है। लेकिन दोनों के बीच रिश्ता पवित्र है। इस के अपने कारण भी हैं। ‎ब्राह्मण अपने को सामान्य हिंदू नहीं मानते थे! थे यानी यह पहले की ‎बात है। तो फिर! फिर क्या पवित्र रिश्ता है। ‎

पहले की बात तो आई-गई हो गई। वर्तमान में क्या है? हाल में दोनों ‎तरफ से संपर्क बढ़ाव में है। अगस्त 2026 में आरएसएस प्रमुख मोहन ‎भागवत ने न्यूयॉर्क के उस मंदिर का दौरा किया जहां इस्कॉन की ‎शुरुआत हुई थी। मोहन भागवत ने प्रभुपाद की मूर्ति पर माल्यार्पण ‎किया और भोजन वितरण कार्यक्रम में भाग लिया। दोनों पक्षों ने विश्व ‎शांति और कृष्ण चेतना को बढ़ावा देने के लिए सहयोग की बात की। ‎यहां अयोध्या में प्रभुओं के प्रभु राम देखते ही रह गये और वहां प्रभुपाद ‎सब-कुछ हो गये!‎

हां, हो गये! सब-कुछ होंगे क्यों नहीं! अभी पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ‎की पवित्र सरकार आई। पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील योजना को लेकर ‎इस्कॉन और राज्य सरकार के बीच 2026 में रिश्ता का एक रेशा बना। ‎

जून 2026 में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के पहले ‎बजट में घोषणा हुई कि कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के करीब 1800 ‎सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील पकाने और बांटने की जिम्मेदारी ‎पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इस्कॉन के अन्नमित्र फाउंडेशन को दी ‎जायेगी। ‎

इस्कॉन सात्विक शाकाहारी भोजन बनाता है। इसमें अंडा, प्याज और ‎लहसुन नहीं होता। खाने में पनीर, सोयाबीन, राजमा. दाल आदि ‎शामिल करने की बात कही गई। प्रति छात्र आवंटन 6.78 रुपये से ‎बढ़ाकर 10 रुपये कर दिया गया। 

तृणमूल कांग्रेस और कुछ शिक्षाविदों ‎ने बच्चों की थाली से अंडा हटाये जाने पर बवाल काटा!  अंडा सस्ता ‎और अच्छा प्रोटीन स्रोत है।

इसे शाकाहार थोपने की कोशिश और पश्चिम बंगाल की खान-पान की ‎आदतों के खिलाफ बताया गया। तृणमूल कांग्रेस के जमाने में स्थानीय ‎स्वयं सहायता समूह स्कूलों में खाना बनाते थे, उनके रोजगार के ‎अवसर के उजड़ने का खतरा सिर पर चढ़ गया! ‎

सरकार और इस्कॉन का पक्ष था कि खाना ज्यादा स्वच्छ और पौष्टिक ‎होगा। कई शहरों में इस्कॉन पहले से मिड-डे मील चला रहा है। विवाद ‎के शांत नहीं होने पर जुलाई 2026 के अंत में मुख्यमंत्री शुभेंदु ‎अधिकारी ने स्पष्ट किया कि 1 अगस्त 2026 से इस्कॉन कोलकाता के ‎स्कूलों में शाकाहारी सात्विक भोजन देगा। अंडे अलग से स्वयं सहायता ‎समूहों के जरिए दिए जाएंगे (हफ्ते में एक-दो बार)। इस तरह से सांप ‎अपने रास्ते और लाठी अपने कंधे! यह मॉडल ओडिशा जैसा है।

प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं — पूरी दुनिया कृष्ण है, और हमें उनकी चेतना को जागृत करना होगा। हम सभी एक हैं! है न कमाल का वननेस!  वननेस यानी अधिकार नहीं केवल और केवल कर्तव्य! पेपरलीक आदि पर अधिकार-अधिकार की चहचहाट और त्राहि-त्राहि नहीं केवल कर्तव्य निभाओ! पहचानो कि सब कुछ दिव्य है! 

यह सोचना तो होगा ही कि भूखे पेट भजन नहीं होता है तो जो पेट भर दे उसी का भजन अनंत काल तक नहीं चलता रहेगा! 

हां प्रमुख, जब तक सत्ता है सामूहिक रूप से हम सब दिव्य सेवा में संलग्न हैं! सत्ता और सनातन का रिश्ता बना रहनेवाला है! क्यों भाई, पंगु! सही कहा न! 

(प्रफुल्ल कोलख्यान लेखक, आलोचक, सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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