सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को केंद्र की उस अर्जी पर सुनवाई कर सकता है जिसमें जुलाई में नीट का कथित पेपर लीक होने के विरोध में जंतर मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले रद्द करने की मांग की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “ठीक है, आप अर्जी दाखिल करें। अगर पक्ष समझौता कर रहे हैं… तो हमें कोई दिक्कत नहीं है।” सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना वाली बेंच के सामने यह अनुरोध रखा था।
मेहता ने बेंच के उठने से ठीक पहले मुख्य न्यायाधीश के सामने इस मामले का ज़िक्र किया और कल ही इस पर सुनवाई की मांग की। जब मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि अर्जी किस बारे में है, तो उन्होंने कहा, “यह उस विरोध प्रदर्शन के बारे में है… एफआईआर रद्द करने के लिए…।”
उल्लेखनीय है कि यह कदम ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ द्वारा 5 सितंबर को दिल्ली में घोषित विरोध मार्च से पहले उठाया गया है। यह मार्च इस आरोप को लेकर है कि केंद्र ने देश भर में परीक्षा पेपर लीक मुद्दे पर जुलाई में हुए विरोध प्रदर्शनों में शामिल प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामले वापस लेने के अपने वादे को पूरा नहीं किया है। मामले वापस लेना उन शर्तों में से एक था जो सीजेपी ने 25 जुलाई को छात्र विरोध प्रदर्शन खत्म करने के लिए रखी थीं।
दरअसल छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान 18 अगस्त को, सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एफआईआर रद्द करने की इच्छा जताई थी। ऐसा तब हुआ जब कोर्ट को बताया गया कि एफआईआर वापस लेने में कानूनी दिक्कतें हैं, क्योंकि एक बार दर्ज होने के बाद उन्हें केवल क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करके ही बंद किया जा सकता है, जिसे संबंधित मजिस्ट्रेट खारिज भी कर सकते हैं।
पिछली सुनवाई के दौरान, एसजी ने कहा था कि 2873 लोगों को छोड़कर – जिन पर हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे गंभीर अपराधों के मामले हैं – बाकी लोगों के खिलाफ मामले रद्द किए जा सकते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की जानी चाहिए। यह कैसे किया जाए, इसका फैसला माननीय अदालत कर सकती है। जो असामाजिक तत्व इसमें शामिल हो गए थे, उनकी जांच होनी चाहिए।”
इसके पहले चीफ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस जे. मोहना की पीठ ने सीजेपी की ओर से 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित विरोध मार्च पर रोक लगाने या उसे टालने का आदेश देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि फिलहाल ऐसी कोई बाध्यकारी परिस्थिति नहीं है, जिसके आधार पर यह मान लिया जाए कि मार्च के दौरान कोई अप्रिय घटना होगी। हालांकि, कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन पर डाल दी है।
कोर्ट ने मामले को 10 सितंबर के लिए सूचीबद्ध किया है, जहां इसे छात्र प्रदर्शनों से जुड़े अन्य मामलों के साथ सुना जाएगा। याचिकाकर्ता की ओर से मामले की सुनवाई 3 सितंबर को कराने की मांग की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित मार्च से पहले सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
यह याचिका दिल्ली पुलिस के एक सेवानिवृत्त अधिकारी राजेंद्र सिंह ने दायर की थी। उन्होंने मांग की थी कि राष्ट्रीय राजधानी के संवेदनशील इलाकों में बड़े प्रदर्शन या मार्च बिना जरूरी अनुमति के नहीं होने दिए जाएं। याचिकाकर्ता के वकील डॉ. रिजान अहमद ने अदालत को बताया कि उनकी जानकारी के मुताबिक सीजेपी ने अब तक मार्च के लिए पुलिस से औपचारिक अनुमति नहीं मांगी है।
वकील ने यह भी कहा कि दिल्ली में अगले दिनों में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होना है और 12-13 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल राजधानी में मौजूद रहेंगे। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मीडिया की मौजूदगी के बीच मार्च से कानून-व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी समस्या पैदा होने की आशंका है। उन्होंने मार्च को 15 सितंबर के बाद करने का सुझाव दिया।
इन दलीलों पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत के पास फिलहाल ऐसी कोई वजह नहीं है, जिसके आधार पर पहले से यह मान लिया जाए कि कुछ अप्रिय घटना होगी। पीठ ने कहा कि अभी यह मानकर चलना होगा कि सभी लोग शांतिपूर्ण तरीके से व्यवहार करेंगे और इस समय किसी अप्रिय घटना की आशंका मानने के लिए कोई बाध्यकारी परिस्थिति नहीं है।
याचिकाकर्ता के वकील ने इसके जवाब में कहा कि यह धारणा पिछले अनुभवों के आधार पर बननी चाहिए। उन्होंने 20 जुलाई को संसद मार्च का हवाला देते हुए दावा किया कि उस दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। उन्होंने कहा कि इस बार भी किसी शरारती तत्व की वजह से कोई अप्रिय घटना हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी चिंताएं केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के सामने रखनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि अदालत के सामने फिलहाल कोई ऐसा विशिष्ट संगठन पक्षकार के रूप में मौजूद नहीं है, जिसके खिलाफ सीधे आदेश दिया जा सके। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि केंद्र और दिल्ली प्रशासन को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और क़ानूनी मामलों के जानकार हैं।)