मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी और नोएडा डीएम मेधा रूपम से जुड़े मामले की सुप्रीम कोर्ट में ‘आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग’ को लेकर लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने आपत्ति जताई है। संगठन ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को एक खुला पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि मामले को जिस तरह विशेष ट्रीटमेंट देकर आउट-ऑफ-टर्न तरीके से सूचीबद्ध किया गया उससे न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल पैदा होते हैं।
संगठन ने यह भी कहा कि मामले की सुनवाई एक विशेष बेंच के सामने जिस तरह हुई और सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट किया गया उससे न्यायिक प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक भरोसे पर सवाल खड़े होते हैं।
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले से जुड़ा है जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत हिरासत रद्द कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने हिरासत के तौर-तरीके पर गंभीर टिप्पणियां करते हुए आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था। यह रकम मेधा रूपम और मामले से जुड़े अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया गया था। मेधा रूपम ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को हाईकोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर रोक लगाई थी। हालाँकि, 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश को साफ़ करते हुए कहा कि आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत रद्द करने वाले हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है। रोक हाईकोर्ट की मेधा रूपम के खिलाफ टिप्पणियों और 5 लाख रुपये मुआवजे से जुड़े निर्देश पर है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी।
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने अपने खुले पत्र में कहा कि मामले को जिस तरह सूचीबद्ध किया गया वह गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय है। संगठन का कहना है कि मामले की विशेष रूप से एक खास बेंच के सामने लिस्टिंग ने न्यायिक प्रक्रिया में भरोसा बढ़ाने के बजाय कानूनी समुदाय के बीच सवाल पैदा किए हैं।
पत्र में कहा गया कि यह मामला एनएसए के तहत एक छात्रा की हिरासत से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा रोस्टर व्यवस्था को देखते हुए यह मामला उस बेंच के सामने सामान्य तौर पर नहीं आता। संगठन के अनुसार ऐसा लगता है कि इसे विशेष रूप से एक खास बेंच को सौंपा गया। संगठन ने यह भी कहा कि मामले की याचिकाकर्ता एक सरकारी अधिकारी हैं और वह भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी भी हैं।
लॉयर्स एसोसिएशन ने मेधा रूपम के सीईसी की बेटी होने के तथ्य को मामले की विशेष लिस्टिंग के संदर्भ में अहम बताया है। पत्र में कहा गया कि किसी मामले की आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग और विशेष व्यवहार गलत मिसाल कायम कर सकता है।
मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील की। 23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मामले पर सुनवाई की। उस दिन सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा को म्यूट किए जाने और मीडिया की पहुंच सीमित होने की खबरें भी सामने आईं।
वकीलों के संगठन ने अपने खुले पत्र में सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट किए जाने पर भी सवाल उठाया। संगठन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई सार्वजनिक होती है और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा के जरिए वकील, पत्रकार और पक्षकार आम तौर पर कार्यवाही देख सकते हैं। संगठन के अनुसार, ऐसे में जिस मामले का संबंध एनएसए के तहत एक छात्रा की हिरासत और मजदूरों के समर्थन में हुए प्रदर्शन से है, उसमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा को बंद या म्यूट किए जाने से पारदर्शिता को लेकर चिंता पैदा हुई।
वकीलों के संगठन ने अपने पत्र में मेधा रूपम के पिता के रूप में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का उल्लेख किया है। संगठन का तर्क है कि किसी सरकारी अधिकारी से जुड़े मामले में अगर सामान्य रोस्टर से अलग जाकर मामला किसी विशेष बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाता है तो पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। संगठन ने खास तौर पर कहा कि यहां याचिकाकर्ता का मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी होना मामले की सार्वजनिक संवेदनशीलता को और बढ़ाता है।
पूरा विवाद नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़ा है। मजदूरों के प्रदर्शन में बेहतर मजदूरी समेत कई मांगें उठाई गई थीं। इसी सिलसिले में कई कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा-एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए लगाया। एक्टिविस्ट-पत्रकार सत्याम वर्मा के खिलाफ भी एनएसए की कार्रवाई की गई थी। बाद में आकृति की हिरासत को लेकर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने 2 सितंबर को आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि हिरासत का आदेश और उसके आधार पर्याप्त सामग्री पर आधारित नहीं थे और आदेश जारी करते समय ठीक से दिमाग नहीं लगाया गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नोएडा के जिलाधिकारी के तौर पर मेधा रूपम द्वारा जारी हिरासत आदेश की प्रक्रिया की कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने कहा था कि आकृति चौधरी के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट में पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। अदालत के मुताबिक, जिलाधिकारी से उम्मीद की जाती है कि वह एनएसए जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल करने से पहले रिकॉर्ड की पूरी तरह जांच करें। हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आकृति एक छात्र एक्टिविस्ट थीं, उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता था कि उन्होंने हिंसा के लिए लोगों को उकसाया था। अदालत ने उनकी हिरासत को संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन माना था।
अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस को लेकर भी बेहद कड़ी टिप्पणियां की थीं और कहा था कि अगर नौकरशाही की ऐसी कार्रवाई पर रोक नहीं लगी तो राज्य व्यवस्था ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ यानी नरक जैसी स्थिति की ओर जा सकती है।
आकृति चौधरी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सिर्फ एनएसए हिरासत रद्द करने तक सीमित नहीं था। अदालत ने यह भी कहा था कि संविधान के तहत अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल सरकार के प्रति नहीं बल्कि संविधान के प्रति है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया था कि प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी संविधान की शपथ लेते हैं और उन्हें अपने वैधानिक दायित्वों के तहत काम करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया है। उस समय अदालत हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की चुनौतियों पर आगे सुनवाई करेगी।7 अक्टूबर को ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में पत्रकार सत्यम वर्मा की याचिका पर जस्टिस श्रीधरन की बेंच में सुनवाई है।
वकीलों के संगठन द्वारा उठाए गए लिस्टिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े सवालों का जवाब अब न्यायिक प्रशासन के स्तर पर सामने आना बाकी है। यही वजह है कि यह मामला अब केवल आकृति चौधरी की एनएसए हिरासत और मेधा रूपम की प्रशासनिक जवाबदेही तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट में मामलों की सूची बनाने, बेंच आवंटन और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी बहस का विषय बन गया है।
(जनचौक ब्यूरो)