भारतीय लोकतंत्र एक सर्कस हो गया है। कोई सिर के बल खड़ा है तो कोई उल्टे पांव चल रहा है, कोई कुलाटियां मार रहा है तो कोई इस झूले से उस झूले पर जंप कर रहा है। अब इस सर्कस के तमाशबीनों में भारतीय जनता ही नहीं विश्वजनमत भी शामिल हो गया है। लोग सोचने लगे हैं कि विश्व गुरु को अचानक क्या हो गया है। जो हम सबको लोकतंत्र सिखाने का दावा करता था वह खुद ही पतित हो गया है। मदर आफ डेमोक्रेसी भीड़तंत्र की मां बन चुकी है, पुलिस राज की मां बन चुकी है और एक विशिष्ट वर्ग (ओलीगार्की) के शासन में बदल चुकी है।
लोकतंत्र की परिभाषा यही बनी थी और यही भारत के लोगों ने समझी थी कि जनता अपने शासक स्वयं चुनती है और जब उससे ऊब जाती है तो उसे बदल देती है। लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है। सरकार अपनी जनता स्वयं चुन रही है। वह ऐसी जनता भी चुन रही है जिनका इस देश में कोई अस्तित्व नहीं है और उन्हें मतदाता सूची से बाहर कर रही है जो इस देश में पीढ़ियों से रह रहे हैं। इसे कहते हैं लोकतंत्र की उल्टी गंगा बहाना।
इसी बारे में मशहूर जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त ने 1953 में ‘समाधान’ शीर्षक से एक कविता लिखी। कविता आज की परिस्थितियों पर एकदम सटीक बैठती हैः—
सत्रह जून के विप्लव के बाद लेखक संघ के मंत्री ने
स्तालिनाली शहर में पर्चे बांटे
कि जनता सरकार का विश्वास खो चुकी है
और अब दोबारा पा सकती है
यदि दोगुनी मेहनत करे
ऐसे मौके पर क्या यह आसान नहीं होगा
सरकार जनता के हित में
कि वह जनता को भंग कर कोई दूसरी चुन ले
ब्रेख्त ने जो व्यंग्य में बात कही थी भारत की सरकार अब वही कर रही है। भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) ने 25 जून 2025 को बिहार से विशेष गहन पुनरीक्षण की जो प्रक्रिया शुरू की वह अब पूरे देश में फैल चुकी है और उसके तहत 13 करोड़ से अधिक लोग मतदाता सूची से बाहर किए जा चुके हैं। जिन लोगों का नाम मतदाता सूची से बाहर किया गया वे सिर्फ वोट के अधिकार से वंचित नहीं किए गए हैं बल्कि उनको मिलने वाली राशन, चिकित्सा, शिक्षा, नौकरी, स्कालरशिप, पासपोर्ट आदि तमाम सुविधाएं छीनी जा रही हैं।
दिक्कत यह है कि इस प्रक्रिया के प्रभाव के बारे में राजनीतिक दलों, नागरिक समाज के संगठनों के जागरण अभियान और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे के बाद भी भाषाई अखबार उन्हें ठीक से रिपोर्ट नहीं कर रहे हैं। जनता उनकी बारीकियों से तो अवगत है ही नहीं वह उसके उन मोटे प्रभावों से भी अवगत नहीं है जो उसके जीवन पर पड़ रहा है। बिहार और पश्चिम बंगाल में एसआईआर से वोट काटकर अवैध तरीके से चुनाव जीते गए यह बात तो अब सीसे की तरह साफ है। लेकिन जिनके नाम मतदाता सूची से काटे गए उन्हें तमाम परीक्षाएं पास करने के बाद भी नौकरी नहीं मिल पा रही है।
इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनाए गए ट्रिब्यूनल भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि किसी को मतदाता सूची में मंजूरी इंटरनेट पर एक सिस्टम से माध्यम से अपलोड की जाती है और वह प्रक्रिया मनमानी हो चली है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि एसआईआर के तहत मतदाता सूची में संशोधन और बड़े पैमाने पर नाम काटने के फैसले कब और कैसे लिए गए इसकी जनता को जानकारी देने के लिए चुनाव आयोग तैयार नहीं है।
सूचना अधिकार की कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने 25 जून के बाद आयोग के पास एक आरटीआई डाली और पूछा कि यह फैसला किसने लिया कि पूरे देश में एसआईआर कराया जाना है। चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि यह फैसला उसने नहीं लिया और इससे अधिक उसके पास कोई सूचना नहीं है। यानी वह यह नहीं जानता या फिर बताना नहीं चाहता कि यह फैसला कहां से लिया गया। इस बीच आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि एसआईआर एक स्वतंत्र समीक्षा की प्रक्रिया है। इस पर अंजलि ने आगे बढ़कर उससे स्वतंत्र समीक्षा के निर्णय की कापी मांगी तो आयोग ने कहा कि उसके पास ऐसी कोई सामग्री नहीं है।
यानी तेरह करोड़ मतदाताओं को सूची से बाहर करके नई जनता को चुनने का जो अभियान चल रहा है उसका निर्णय किसने लिया यह जनता को नहीं बताया जाएगा। साथ में यह भी कहा जा रहा है कि यह प्रक्रिया घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने और मृत लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने के लिए है। आम आदमी को समझा दिया गया है कि देश में लोग या तो अपने मूल स्थान को छोड़कर कहीं और चले गए हैं, या फिर लोग मर गए हैं या बांग्लादेशी बहुत आ गए हैं।
इसलिए मतदाता सूची को शुद्ध करने की प्रक्रिया चल रही है लेकिन उसका निर्णय कैसे और किसके द्वारा लिया गया यह बताना जरूरी नहीं है। बीच में सुप्रीम कोर्ट की भी मदद ले ली गई है ताकि उसकी आड़ में खड़े होकर कहा जा सके कि सब कुछ न्यायोचित और संविधान सम्मत है।
अब जब जनता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग लेकर आगे आई है तो सरकार ने पहले तो दमन चक्र चलाया और फिर जंतर मंतर को प्रदर्शनस्थली के तौर पर प्रतिबंधित कर दिया। अब तो तिरंगा फहराने पर भी रोक लगाई जा रही है। लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश और फिर अपने ही नागरिकों, युवाओं युवतियों को गरिमाविहीन तरीके से यातना देने वाली सरकार ने अब ‘रिजीम चेंज’ का बम फोड़ दिया है। वैसे तो यह सरकार अंग्रेजी के सेक्यूलर और सोशलिज्म जैसे शब्दों से परहेज करते हुए उसका भारतीयकरण करने पर जोर देती है।
लेकिन इस बार अंग्रेजी के उस शब्द को उठा लिया है जिसके मायने हैं कि बल प्रयोग द्वारा एक सरकार को हटाकर दूसरी सरकार को स्थापित करना। इसमें तख्तापलट, क्रांति और गृहयुद्ध की स्थिति में सरकार का पुनर्निर्माण शामिल है। रिजीम चेंज वास्तव में दो प्रकार का होता है। एक तो देशी असंतोष के माध्यम से होता है और दूसरा विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप के माध्यम से। वेनेजुएला में अमेरिका ने रिजीम चेंज किया और ईरान में इजराइल के साथ मिलकर करना चाह रहा था लेकिन कर नहीं सका। जबकि नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में देशी कारणों से रिजीम चेंज हुआ था।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहना शुरू कर दिया है कि नेपाल और बांग्लादेश जैसा माहौल देश में बनाया जा रहा है। हालांकि भारत ने न तो वेनेजुएला में रिजीम चेंज का खुलकर विरोध किया और न ही ईरान में अमेरिका और इजराइल की कोशिशों की निंदा की।
यह सही है कि सरकार के दमन से गुस्से में झुँझलाए प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण ने रिजीम चेंज की बात को जनता का अधिकार बता दिया और आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने बांग्लादेश की सोशलिस्ट युवा संगठन से प्रेरणा लेने की बात कह डाली, लेकिन किसी भी जिम्मेदार राजनीतिक दल के नेता ने अंग्रेजी के उस शब्द का प्रयोग नहीं किया है। लेकिन अवैध, अन्यायी और दमनकारी सरकार को चुनाव के माध्यम से बदलने और बीच बीच में राज्यों में होने वाले चुनाव में शासक दल को हराने के लिए जनता का मन बदलने की बात कहां से ‘रिजीम चेंज’ की परिभाषा में आ गयी।
वास्तव में लोकतंत्र राजनीतिक दलों की ऐसी प्रतिस्पर्धा का नाम है जिसमें जनता का हृदय परिवर्तन करते हुए सत्ता परिवर्तन किया जाता है और इसी के माध्यम से कई बार व्यवस्था परिवर्तन भी किया जाता है। इस बीच में आंदोलन भी होते हैं और उसमें नारे भी लगते हैं कि—‘रोजी रोटी दे न सके वह सरकार निकम्मी है/ जो सरकार निकम्मी है/ वह सरकार बदलनी है।‘
लेकिन उसमें अपनी संप्रभुता का आदर किया जाता है और न तो हिंसा का सहारा लिया जाता है और न ही विदेशी शक्तियों की मदद ली जाती है। विचार और दर्शन के स्तर पर किसी देश या विचारक से प्रेरणा लेना हिंसक रिजीम चेंज की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है जब तक हिंसा का सहारा न लिया जाए। क्योंकि दुनिया प्राचीन काल से एक दूसरे से जुड़ी हुई है और आज तो कुछ अधिक जुड़ गई है।
अगर हम पूरी दुनिया में गांधी के विचारों से प्रति बढ़ते आदर से खुश होते हैं तो अपने देश में मार्टिन लूथर किंग और मंडेला के विचारों या मार्क्स के विचारों को स्थान मिलने से दुखी क्यों हों। दिक्कत तब होती है जब धन और सैन्य बल का सहारा लेकर किसी देश में हिंसा के माध्यम से रिजीम चेंज किया जाता है।
भारत इस समय मौजूदा सरकार को बदलने के आंदोलन और सरकार द्वारा मतदाता को ही बदल कर हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज रहने के अभियान के बीच उलझा हुआ है। लोकतंत्र में तो चुनाव के पारदर्शी नियमों के माध्यम से सरकारें ही बदली जाती हैं, लेकिन हमारे देश में चल रहे नए सर्कस में संदेहास्पद और मनमाने तरीके से मतदाता बदले जा रहे हैं। मौजूदा खींचतान जारी रहने वाली है। यह लड़ाई न्यायालय में निपट जाती तो बेहतर होता। लेकिन न्यायालय में नहीं निपट पाने के कारण सड़क पर आ गई है। देखते हैं इसका क्या परिणाम निकलता है।
(फोटो प्रतीकात्मक : तिरंगा लहराओ मार्च की)
(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)