संत लेखिका थीं मन्नू भंडारी

हिंदी में प्रभामण्डल वाले चमकदारऔर हाई प्रोफाइल लेखक तो बहुत हुए हैं पर ऐसे लेखक बहुत कम हुए हैं जो मंच पर नहीं नजर आते थे बल्कि हमेशा नेपथ्य में रहना पसंद करते हैं। मन्नू जी इसी परम्परा की एक जेनुइन लेखक थीं। साहित्य की निर्मम चालाक तथा तिकड़मी दुनिया में विनम्र, ईमानदार और पारदर्शी लेखकों की सूची में उनका नाम सबसे ऊपर रहेगा। आजादी के बाद हिंदी की जिन दो लेखिकाओं ने अपनी बड़ी राष्ट्रीय पहचान बनायी और स्त्री स्वर को व्यापक बनाया ,उनमें कृष्णा सोबती के बाद मन्नू भंडारी ही थीं लेकिन उन्हें नई कहानी आंदोलन में वह श्रेय नहीं मिला जो उनके पति राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की तिकड़ी को मिला।

मन्नू जी इन सबसे अधिक प्रतिभाशाली थीं पर उन्होंने अपना आत्म प्रदर्शन नहीं किया। अपना बखान नहीं किया और साहित्य के सत्ता विमर्श से हमेशा दूर रहीं। वह एक संत लेखिका थीं। साहित्य की गहमा गहमी और कोलाहल से दूर एकांत साधना में यकीन करने वाली। उन्होंने न तो अपनी प्रतिबद्धता और न ही अपने स्त्री विमर्श की ढपली बजाई क्योंकि वह हमेशा अपनी रचनाओं की ताकत पर यकीन करती रहीं और उसकी बदौलत जिंदा रहीं। 90 वर्ष की अवस्था में जब वो आज नहीं रहीं तो हिंदी साहित्य में एक सन्नाटा छा गया। लोगों को उनके बारे में लिखते हुए हांथ कांप रहे। कुछेक साल पहले ही तो कृष्णा जी नहीं रहीं।

राजेन्द्र यादव के नहीं रहने पर मन्नू जी और अकेली रह गईं थीं। वैसे वह वर्षों से एकाकी जीवन व्यतीत कर रही थीं। उनकी आत्मकथा जिन लोगों ने पढ़ी होगी उन्हें मन्नू जी की बेबाकी और साहस का पता होगा। उन्होंने अपने पति को भी नहीं बख्शा लेकिन राजेन्द्र जी की स्मृति में आयोजित स्मृति सभा में वह आईं थीं। वह उनकी शायद अंतिम सार्वजनिक उपस्थिति थी। वर्षों से अस्वस्थ होने और स्मृति लोप के कारण वह हिंदी की दुनिया से कट गईं थीं

लेकिन पाठकों की स्मृति में हमेशा बनी रहीं। जिन लोगों ने “आपका बंटी” उपन्यास धर्मयुग में धारावाहिक पढ़ा होगा वह मन्नू जी को कभी भूल नहीं सकता। जिन लोगों ने उनकी कहानी “यही सच है” पर अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा की फ़िल्म “रजनी गन्धा” देखी होगी वे भी मन्नू जी को नहीं भूल सकते लेकिन वह केवल भारतीय निम्न मध्यवर्ग की प्रतिनिधि कथाकार ही नहीं थीं बल्कि भारतीय राजनीति की पतन गाथा की पहली कथाकार भी थीं। जब भारतीय राजनीति में धन बल का बोलबाला बढ़ता गया और चुनावी राजनीति के दांव पेंच और गहरे हो गए तो मन्नू जी ने” महाभोज” में उसे पर्दाफ़ाश कर दिया। उस पर नाटक खेला गया और वह नाटक इतना लोकप्रिय हुआ कि देश के विभिन्न भागों में वह आज भी खेला जाता है।” महाभोज ” की मन्नू भंडारी “आपका बंटी “की मन्नू भंडारी से अलग हैं। उनकी राजनीतिक चेतना प्रखर थी। उनकी एक और कहानी त्रिशंकु भी काफी लोकप्रिय हुई और उसका मंचन हुआ पर फ़िल्म भी बनी लेकिन जब ‘आपका बंटी’ पर फ़िल्म बनी तो मन्नू जी निर्माता निर्देशकों से इस बात पर नाराज हो गईं कि उनकी कहानी में छेड़छाड़ किया गया।

जैसा कि ऊपर कहा गया मन्नू जी समझौते करने वाली लेखिका नहीं थीं। इसलिए जब उस पर फ़िल्म बनी तो उन्होंने देखा कि कहानी को तोड़ा मरोड़ा गया तो उन्होंने कॉपी राइट कानून के तहत निर्माता पर मुकदमा कर दिया और निर्माता-निर्देशक को अदालत के बाहर मनु जी से समझौता करना पड़ा। मन्नू जी अपने स्वभाव से भले ही विनम्र और सरल थीं लेकिन भीतर से वह बहुत आत्मस्वाभिमानी तथा सिद्धांतवादी थीं और इसलिए उनके जीवन में किसी तरह का कोई विचलन दिखाई नहीं देता और न कोई पाखंड या अंतर्विरोध। उनका कोई वैचारिक विचलन भी नहीं हुआ और न ही सत्ता को लेकर किसी तरह का कोई आकर्षण उनके मन में था। शायद यही कारण है कि उन्होंने संस्थानों और प्रतिष्ठानों की सीढ़ियों पर चढ़ने में रुचि नहीं दिखाई जबकि उनके बाद की पीढ़ी की कई लेखिकाओं को उसके ऊपर चढ़ते उतरते देखा गया।

शायद यही कारण है कि मन्नू जी न केवल साहित्य अकादमी पुरस्कार से वंचित रहीं बल्कि वह साहित्य अकादमी की फेलो भी नहीं बनाई गईं जबकि वह इसकी हकदार थीं और उनकी जगह एक दोयम दर्जे के कवि और आलोचक को साहित्य अकादमी का फेलो बनाया गया जबकि वह अध्यक्ष पद से हटे ही थे। दरअसल मन्नू जी एक सच्ची रचनाकार थीं और उन्होंने भारतीय निम्न मध्यवर्ग की मार्मिक कहानी लिखने में अपना जीवन गुजार दिया ।

अगर 60 और 70 के दशक के बीच में भारतीय निम्न मध्यवर्ग के इतिहास को जानना हो तो मन्नू भंडारी की कहानियों को पढ़े बिना उस इतिहास, उस संघर्ष उस मनोभाव को नहीं पकड़ा जा सकता है। सबसे बड़ी बात है कि मन्नू भंडारी की कथा साहित्य में शिल्प कोई बहुत आडंबर नहीं था और ना ही भाषा की चमक का सहारा था। उनका कथ्य ही इतना मजबूत था कि वह पाठकों पर हावी था और आज भी उनके पाठक उन्हें याद करते हैं हिंदी पट्टी में शिवानी के बाद वह दूसरी लेखिका थीं जो घर-घर में जानी जाती थीं तथा आम गृहणियों के बीच लोकप्रिय थीं। असल में उन्होंने कस्बों और छोटे शहरों की स्त्रियों का दुख दर्द करीब से जिया और भोगा था। मन्नू जी का जाना भारतीय भाषा के साहित्य की अपूरणीय क्षति है जिसकी भरपाई मुश्किल लगती है।

(विमल कुमार वरिष्ठ पत्रकार और कवि हैं।)

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