नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के होने वाले चुनाव से पहले आइसा के उम्मीदवारों ने मंगलवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस के जरिये अपना चुनावी मैनिफेस्टो जारी किया। इस मौके पर आइसा उम्मीदवारों ने चुनाव के दौरान उठाए जा रहे उन मुद्दों को भी रखा जिसे जीतने पर लागू करेंगे। एफवाईयूपी छात्रों के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इसको लेकर आइसा के उम्मीदवारों ने कहा कि सरकार के द्वारा यूजीसी को हटाकर फोर ईयर ग्रेजुएट प्रोग्राम (एफवाईयूपी) को जबरदस्ती थोपना गलत फैसला है। क्योंकि कल तक जो स्नातक की डिग्री तीन साल में पूरी हो जाती थी, अब उसके लिए छात्रों को चार साल देना पड़ेगा। इसके साथ ही उनका कहना था कि कल तक जिस डिग्री को 3 साल में पूरा करने पर एक तय रकम खर्च होती थी, कोर्स के चार साल का हो जाने पर खर्चा बेवजह बढ़ जाएगा। और इसकी सबसे ज्यादा मार गरीब छात्रों और उनके परिवारों को झेलनी पड़ेगी।
आइसा ने अध्यक्ष पद के लिए आयशा अहमद खान, उपाध्यक्ष के लिए अनुष्का चौधरी, सचिव पद पर आदित्य प्रताप सिंह और संयुक्त सचिव पद पर अंजली कुमारी को अपना उम्मीदवार बनाया है।

आइसा के उम्मीदवारों ने एफवाईयूपी के अलावा, कॉलेज फी में वृद्धि के खिलाफ आवाज उठाना, छात्रों के लिए मेट्रो पास, विश्वविद्यालय के आसपास आवासीय स्थानों पर किराये प्रबंधन को लेकर कानून, कॉलेज में हरेक विषय के लिए विशेषज्ञ प्रोफेसरों की आपूर्ति और हर छात्र को हॉस्टल सुविधा प्रदान करने जैसी मांगों को सामने रखा है। उम्मीदवारों का कहना था कि विश्वविद्यालय में हरेक तबके के लोग पढ़ने आते हैं, और विश्वविद्यालय की तरफ से कुछ चुनिंदा छात्रों के वर्ग को हॉस्टल आवंटित होता है। नतीजतन किराये पर पीजी या फिर फ्लैट छात्रों के लिए बेहद महंगा पड़ता है और उनसे किराया भी मनमानी तरीके वसूला जाता है। इसी चीज को ध्यान में रखते हुए आइसा ने कॉलेज के आसपास के आवासीय इलाकों में किराया प्रबंधन का कानून बनाने की मांग सामने रखी है।
उम्मीदवारों ने एफवाईयूपी को बोझ करार देते हुए कहा कि सरकार ने इसे लागू तो कर दिया लेकिन इससे कोई फायदा तो नहीं हुआ। एफवाईयूपी के तहत किसी भी विषय को छात्र पढ़ सकता है लेकिन कॉलेज में उस व्यक्तिगत विषय का प्रोफेसर भी तो होना चाहिए। आलम यह है कि अगर संस्थान से कहा जाए कि हमें संस्कृत विषय पढ़ना है तो उसका प्रोफेसर नहीं होता है। ऐसे में उस विषय को लेने का क्या मतलब होगा जिसका अध्यापक ही संस्था में मौजूद न हो। इसके अलावा एफवाईयूपी में स्वच्छ भारत अभियान, फिट इंडिया अभियान जैसी चीजों को पढ़ाया जा रहा है, जो साफ तौर पर ये बताने के लिए काफी है कि सरकार जबदस्ती अपनी विचारधारा को छात्रों पर थोप रही है।
सरकार द्वारा विश्वविद्यालय पर जबरन थोपी गई योजनाओं के खिलाफ आइसा ने आवाज उठाने का आह्वान करते हुए कहा कि पहले भी हमने जिस तरह से लड़कर जीत हासिल की है। चाहे वो एसी बस के पास का मामला हो, विश्वविद्यालय द्वारा फी बढ़ाने का हो। उसी तरह से इस बार भी हम मेट्रो पास, हॉस्टल अलॉटमेंट जैसे मुद्दों पर खुलकर लड़ेंगे। इसके साथ ही संगठन ने सरकार के विश्वविद्यालय में फाइनेंसिंग मॉडल के खिलाफ, छात्रों के कोर्स के डायल्यूशन के खिलाफ, विश्वविद्यालय में आई न्यू इंटरनल स्कीम के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया है। इसके साथ ही संगठन ने विश्वविद्यालय में क्वालिटी और ऐक्सेसबल एजुकेशन को सुनिश्चित करने की मांग की है।

सरकार द्वारा पेश की गयी नई अध्ययन प्रणाली को लेकर पूछे गए सवाल पर, दिल्ली आइसा के राज्य अध्यक्ष अभिज्ञान ने कहा कि अगर सरकार के प्रस्तावित नए अध्ययन के दस्तावेज को पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि उस पूरे दस्तावेज में आरक्षण का जिक्र तक नहीं है, सोशल जस्टिस का कोई जिक्र नहीं है। करीब 80 बार डिजिटल एजुकेशन का जिक्र है, उतनी ही बार ऑनलाइन का जिक्र है, ई-हायफन का जिक्र है। इस अध्ययन प्रणाली को किस्तों में विश्वविद्यालय में लाया गया है।
सबसे पहले लॉकडाउन के दौरान यूजीसी का नोटिफिकेशन आया था जिसमें कहा गया था कि 40 प्रतिशत क्लासेस ऑनलाइन होंगी। सरकार की ओर से विश्वविद्यालय को दिया गया 950 करोड़ रुपये का एक किस्त है, यह नयी इंटरनल स्कीम एक्जाम से दो दिन पहले आई थी। तो ये किस्तें इस तरह से आ रही हैं कि ना तो छात्रों को समझ में आ रहा है और न प्रशासन को समझ में आ रहा है।
सरकार पर आरोप लगाते हुए अभिज्ञान आगे कहते हैं कि सरकार का उद्देश्य पूरी तरह से साफ था कि शिक्षा को बेचना है। दिल्ली विश्वविद्यालय को ऐमिटी और गलगोटिया जैसी यूनिवर्सिटी बनाना है।

एंट्रेस एक्जाम और कॉलेज में फीस का बढ़ना, शिक्षा का महंगा होने को कैसे नियंत्रित करेंगे के सवाल पर संगठन के राज्य अध्यक्ष ने कहा कि ये मुद्दा हमारे मैनिफेस्टो में भी शामिल है और कुछ कॉलेज मसलन श्यामलाल और सत्यवती का नाम लेते हुए उन्होंने बताया कि पिछले सेशन के दौरान इन कॉलेजों ने 100 प्रतिशत फीस बढ़ाया था। जिसके बाद आइसा ने इसका विरोध किया और फीस बढ़ोतरी को प्रशासन को वापस लेना पड़ा। तो हम लगातार इसके खिलाफ काम कर रहे हैं लेकिन एक चीज साफ है कि कॉलेजों को अब फाइनेंशियल मॉडल के तौर पर बनाया जा रहा है।
अन्य संगठनों के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव न लड़ने के फैसले को लेकर पूछे गए सवाल पर अभिज्ञान ने कहा कि आइसा शुरू से ही पूरे देश भर में साफ कॉल दिया है कि जिस तरह से आज भाजपा सरकार और भाजपा समर्थित एबीवीपी द्वारा देश भर में एक जबर्दस्त कम्युनल, कॉरपोरेट और गुंडागर्दी वाली राजनीति की जा रही है। ऐसे में किसी का समर्थन लेना और गठबंधन करके चुनाव में उतरना किसी भी तरह से जायज नहीं है।
(जनचौक से राहुल कुमार की रिपोर्ट।)
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