विश्व में डंका और महाकुम्भ का दम्भ

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हमारा प्यारा भारत देश इन दिनों वृहत्तर परेशानियों से घिरता जा रहा है। कहां 2014 से लेकर 2023 तक कथित तौर पर देश का डंका विदेशों में बजता बताया जाता रहा आज उसकी सारी हकीकत सामने आती जा रही है।

मोदीजी के पिछले दो चुनावों की जीत और तीसरे चुनाव में मात्र 240 सीट पर जीतना ही सारी स्थिति उजागर कर रहा है। तीनों चुनाव में विदेशी धन का बारहा इस्तेमाल हुआ। फर्जी वोटिंग की पोल पट्टी खुल गई है। इस सबके बावजूद दो बैसाखियों पर टिकी सरकार यह तो स्पष्ट कर रही है कि मोदी निश्चित डूबते जा रहे हैं।

कितने ही भ्रमजाल फैलाए जाएं लेकिन इसे अमेरिका सहित तमाम देश भली-भांति समझ गए हैं इसका दिग्दर्शन फ्रांस और अमेरिका की ताज़ा यात्राओं की अपमानजनक घटनाओं से सामने आ चुका है। इससे पहले देश प्रमुख की ऐसी तौहीन कभी नहीं हुई थी। उल्टे इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में नौवें जहाजी बेड़ा की अमरीका से धमकी मिलने पर सोवियत रुस से 25 वर्षीय मैत्री संधि कर उसे दिन में तारे दिखा दिए थे।

आज भारत अकेला खड़ा है पड़ोसी देश भी भारत से ख़फ़ा हैं। अपनी शताधिक विदेश यात्राओं जिसमें प्रत्येक देश के साथ मोदीजी अपना नाता जोड़ते रहे, वे सब धराशाई हो गए हैं। आशा की किरण सिर्फ दक्षिण पश्चिम एशिया के मुस्लिम देशों में खोजी जा रही है। यदि सच कहा जाए तो मोदीजी की तमाम ताबड़तोड़ विदेश यात्राओं के पीछे सिर्फ अपने यार अडानी को फायदा दिलाना ही मुख्य लक्ष्य रहा है। आज अमेरिका के शिकंजे में जिस तरह अडानी और मोदीजी फंस गए हैं उसे देखते हुए अब अडानी का कारोबार बहुतेरे देश हटाने में जुटे हुए हैं। कहने का आशय यह है कि विश्व डंके का ढोल बुरी तरह फट गया है। इसलिए संघ को नए अध्यक्ष और प्रधानमंत्री  की तलब लग चुकी है।

सूत्र बताते हैं कि महाकुम्भ को 144 साल बाद आने का जो व्यापक प्रचार किया गया उसके पीछे संघ का मज़बूत इरादा था। वे योगी आदित्यनाथ की सरपरस्ती में एक अति भव्य महाकुम्भ का आयोजन करना चाहते थे जिसमें देश की बड़ी आबादी शरीक हो जिससे योगी जी की लोकप्रियता राष्ट्रीय स्तर पर बढ़े जिससे उन्हें प्रधानमंत्री बनाया जा सके।

निश्चित तौर आयोजन की भव्य तैयारियां की गई किंतु आमंत्रित जनसैलाब के कारण मौनी अमावस्या के दिन तीन जगह भगदड़ में हुई मौतों ने संघ के अरमान पर पानी फेर दिया। योगी ने मौतों को छिपाने की जो अमानवीय हरकत की उससे संपूर्ण राष्ट्र में उनकी छवि धूमिल हो गई है। उनका ताज़ा बयान कि लाशें गिद्धों को ही दिखती हैं तथा सुअरों को गंदगी नज़र आती है ,ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। मीडिया और कांग्रेस उनके इस व्यवहार से ख़फ़ा हैं।

मीडिया सिर्फ भारत का नहीं बल्कि मौजूदा विदेशी मीडिया भी नाराज़ हुआ है। हालांकि योगी जी के बहुत से ऐसे बयान हैं जो उनकी बदज़ुबानी दर्शाते हैं। मुसलमानों के प्रति उनकी नफ़रत का कोई आर-पार नहीं है। महाकुम्भ से जो उनकी योगी स्वरूप, सनातनी धार्मिकता की पुष्ट छवि बनाने की चाल संघ ने रची थी वह बुरी तरह फ्लॉप हो चुकी है।

इस समय सांसत में है संघ। मोदी योगी दोनों महाकुम्भ नहाने के बाद अनैतिकताओं से बुरी तरह घिर चुके हैं। हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली में चुनावी जीत का भांडा भी फूट चुका है। मददगार अमेरिका आंखें दिखा रहा है।  पर संघ इस दोस्ती को हर कीमत पर बनाने की अंदरूनी कोशिश के तहत सन् 1994 की तरह अपने नए रंग-रूट वहां भेज सकता है। क्योंकि ऐसी मुश्किल घड़ी में स्वाभिमान आत्मसम्मान गिरवी रखना उन्हें भली-भांति आता है। देखना ये होगा कि वे कितने सफल होते हैं। जबकि अमेरिका सरकार गिराने की जुगत भी कर सकता है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

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