ब्रह्मांड के अनंत आकाश में विलीन हो गया बौद्धिक जगत का एक नक्षत्र

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देवी प्रसाद त्रिपाठी।

नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद देवी प्रसाद त्रिपाठी का राजधानी दिल्ली में निधन हो गया है। उन्होंने बृहस्पतिवार की सुबह 10 बजे आखिरी सांस ली। वह अपनी मेधा और सारगर्भित भाषणों के लिए जाने जाते थे। त्रिपाठी 70 साल के हो गए थे। वह एनसीपी की तरफ से 2012 से लेकर 2016 तक राज्यसभा के सदस्य रहे।

त्रिपाठी पिछले तीन वर्षों से कैंसर की बीमारी से ग्रस्त थे। अपने मित्रों के बीच डीपीटी के नाम से जाने जाने वाले त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में पैदा हुए थे। उनका पालन पोषण हावड़ा में हुआ तथा उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जेएनयू से उच्च शिक्षा हासिल की। जून 1975 से जनवरी 1977 के दौरान जब देश में आपातकाल लगा हुआ था तब वह जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे। और आपातकाल का विरोध करते हुए जेल गए थे। उसी दौरान उनकी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब के विपक्ष के नेता जार्ज फर्नांडिस से मित्रता हुई। बौद्धिक जगत में त्रिपाठी का बहुत ऊंचा नाम था।

शुरुआती दिनों में सीपीएम से जुड़ने के साथ ही वह वामपंथी आंदोलन के सर्वप्रमुख कार्यकर्ताओं में शुमार हो गए। लेकिन छात्र आंदोलन के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक कैरियर की दूसरी पारी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ शुरू की। जब वह उनके राजनीतिक सलाहरकार बने। बताया जाता है कि 1983 के दौरान कांग्रेस पार्टी का महासचिव रहते राजीव गांधी ने उन्हें जेएनयू में एक छात्र आंदोलन को हल करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। और यह काम उन्होंने बखूबी किया। उसके बाद 1991 से राजीव गांधी के निधन तक वह उनके साथ रहे।

लेकिन बाद में उन्होंने 1999 में शरद पवार और पीए संगमा के साथ मिलकर कांग्रेस से अपना रास्ता जुदा कर लिया। और कांग्रेस से अलग हुए इन नेताओं ने मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया। भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने नेपाल में राजशाही के खिलाफ चले लोकतांत्रिक आंदोलन को न केवल मदद की बल्कि उसके नेताओं को हर तरीके की सुविधा मुहैया करायी। इसी का नतीजा था कि वहां के मौजूदा पीएम केपी शर्मा ओली और पूर्व प्रधानमंत्री माधव नेपाल समेत तमाम वामपंथी नेताओं से उनके निजी और गहरे रिश्ते रहे।

राज्यसभा का सदस्य रहने के दौरान वह विदेश मंत्रालय की तमाम कमेटियों के सदस्य रहे। इसके साथ ही विदेश जाने वाले तमाम प्रतिनिधिमंडलों की उन्होंने अगुवाई की। वह अपने पीछे पत्नी और तीन बेटों को छोड़ कर गए हैं।

डीपीटी एक ऐसी शख्सियत के मालिक थे जो किसी एक दल तक सीमित नहीं थे। तमाम दलों में उनके मित्र थे। उनकी बौद्धिक मेधा का कोई सानी नहीं था। लिहाजा राजधानी दिल्ली के बौद्धिक जगत से लेकर अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक शख्सियतों से उनके नजदीकी रिश्ते थे।

एनसीपी मुखिया शरद पवार ने ट्वीट कर कहा कि “अपने महासचिव डीपी त्रिपाठी के निधन की खबर सुनकर दुखी हूं। वह स्कॉलर होने के साथ ही राजनीति में बौद्धिकता और लगन के संश्रय के बेहतरीन उदाहरण थे। एक दृढ़ आवाज एक फर्म स्टैंड जो मेरी पार्टी के प्रवक्ता और महासचिव के तौर पर वह लिया करते थे।…..उनका निधन मेरे लिए एक व्यक्तिगत क्षति है। उनकी आत्मा को शांति मिले।”

सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने भी उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। येचुरी न केवल एक दौर में उनके राजनीतिक साथी थे बल्कि दोनों ने ही जेएनयू में शिक्षा हासिल की थी। और दोनों ही वहां के छात्र संघ के अध्यक्ष रहे। उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि में कहा कि डीपी त्रिपाठी: कामरेड, छात्र साथी, सह यात्री और भी बहुत कुछ। विश्वविद्यालय के दिनों से लेकर आखिरी दिनों तक हम बात करते रहे, बहस किए, असहमति रही और एक साथ मिलकर बहुत कुछ सीखा। तुम्हारी कमी हमेशा खलेगी मेरे दोस्त। दिल की गहराइयों से श्रद्धांजलि।

समाजवादी नेता शरद यादव ने भी त्रिपाठी के निधन पर शोक जाहिर किया है। अपनी श्रद्धांजलि में उन्होंने कहा कि डीपी त्रिपाठी के असमय निधन से बहुत दुखी हूं। वह बुद्धिजीवी होने के साथ ही बेहद अच्छे इंसान थे। हमने न केवल अपना मित्र खोया है बल्कि देश ने एक बेहतरीन पार्लिमेंटेरियन और एक ऐसा बौद्धिक शख्स खो दिया है जो आल राउंडर था।

आप नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भी उनको श्रद्धांजलि दी है।

एनसीपी से लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने उनके निधन पर अपनी श्रद्धांजलि जाहिर करते हुए कहा कि “डीपी त्रिपाठी जी के निधन की खबर सुनकर बेहद गहरा दुख पहुंचा है। वह हम लोगों के लिए एक गाइड और मेंटर थे। हम लोग उनकी बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह और गाइडेंस की कमी महसूस करेंगे जिसे एनसीपी की स्थापना के समय से वह हम लोगों को दिया करते थे।”

इसके अलावा फेसबुक से लेकर ट्विटर समेत सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्मों पर उन्हें अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलियां दी गयी हैं। उनमें से कुछ नीचे दी जा रही हैं-

त्रिपाठी जी (डीपी त्रिपाठी), शासक वर्ग की राजनीति में होने के बावजूद वे एक बहुत ही संवेदनशील, बेहतर इंसान थे तथा समाजवाद से उनका मोह बरकरार रहा। सीपाएम से कांग्रेस में संक्रमण काल के पहले, दौरान तथा राजीव गांधी से उनकी निकटता के दौर में मैंने बहुत भला-बुरा कहा, किंतु उनका स्नेह बना रहा। पिछले 10 सालों में तो यदा-कदा अचानक फोन करके कैंपस में घर आ जाते और कई बार गाड़ी में ‘लाद कर’ फिरोज शाह रोड या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर चल देते। गरीबी के दिनों में भी उनकी दरियादिली में कमी नहीं होती। मुझसे कई बार गंभीर कहा-सुनी हुई है। मार्क्सवाद में मेरा संक्रमण प्रमुखतः पुस्तकों के माध्यम से हुआ, जिन एकाध व्यक्तियों का योगदान है उनमें त्रिपाठी जी (इलाहाबाद के दिनों में वियोगी जी) का योगदान है। इलाहाबाद में एक प्रगतिशील साहित्यिक ग्रुप था जो गोष्ठियों के अलावा एक अनिश्चितकालीन पत्रिका, ‘परिवेश’ निकालता था उनमें वियोगी जी भी थे। उन दिनों और जेएनयू के शुरुआती दिनों में भी कुछ बहुत अच्छी कविताएं लिखा। ‘… क्या सोच कर तुम मेरा कलम तोड़ रहे हो, इस तरह तो कुछ और निखर जाएगी आवाज…….’ विनम्र श्रद्धांजलि।

ईश मिश्रा, रिटायर्ड अध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय

अलविदा साथी डीपीटी

देवी प्रसाद त्रिपाठी नहीं रहे । लोग उन्हें डीपीटी के नाम से ही जानते थे । एक समय वे जेएनयू छात्र यूनियन के अध्यक्ष रहे ।

मध्यम वर्गीय किसान परिवार से आए डीपीटी में हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत, बांग्ला सहित कई भाषाओं में श्रोताओं को बांध लेने की अनोखी वाग्मिता शक्ति थी । वे आँख से कम देखते थे, लेकिन उनकी ग़ज़ब की स्मरण शक्ति थी । छात्र राजनीति के बाद काफ़ी दिनों तक वे उत्तर प्रदेश में सीपीआई(एम) के नेता रहे । बाद में वे कांग्रेस से भी जुड़े । लेकिन अंत में शरद पवार के एनसीपी के एक प्रमुख पदाधिकारी हो गये । वे राज्यसभा के भी सदस्य हुए । सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के साथ उनके काफ़ी स्नेहिल संबंध थे ।

राजनीति से परे डीपीटी की एक प्रखर बुद्धिजीवी की पहचान कम महत्वपूर्ण नहीं थी। हिंदी और अंग्रेज़ी के बौद्धिक जगत और पत्रकारों के बीच उनकी साख के हम सब गवाह रहे हैं । अंत के काफ़ी सालों तक वे Think India शीर्षक से अंग्रेज़ी में एक त्रैमासिक बौद्धिक पत्रिका का संपादन किया करते थे ।

डीपीटी से ‘70 के जगत से ही हमारा गहरा परिचय था । कोलकाता में हमने कई दिन साथ बिताए थे और शायद ही ऐसे कोई विषय होंगे, जिन पर उनसे चर्चा न हुई हो । वे एक गहरे अध्येता, गंभीर श्रोता और विश्लेषक भी थे ।

पिछले कई साल से वे गंभीर रूप से बीमार रहा करते थे , लेकिन अपने जीवट के बल वे हमेशा सक्रिय बने रहे । हमारी उनसे आख़िरी मुलाक़ात दिल्ली में पिछले जून महीने में हुई थी । लंबे अंतरालों पर मिलने के बावजूद हमने कभी उन्हें अपने से दूर नहीं पाया ।

आज उनका न रहना हमारी एक निजी क्षति भी है । भारत के बौद्धिक समाज और मुख्यधारा की राजनीति के बीच वे अपने ही प्रकार के एक अनोखे संपर्क सूत्र थे । उनके न रहने से राजनीति और विपन्न हुई है और बौद्धिकों ने अपने एक भरोसेमंद दोस्त को खोया है ।

हम उनकी स्मृति में उन्हें आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके सभी परिजनों के प्रति संवेदना प्रेषित करते हैं ।

अरुण माहेश्वरी, वरिष्ठ लेखक और चिंतक

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