धर्म बनाम लोकाचार: “बुनियादी वैचारिकी पर टिके रहकर सामाजिक रिश्तों का निर्वहन ही एकमात्र रास्ता”

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मुझे लगता है, इस विषय पर एक सामूहिक और सही समझ जरूरी है। और वो चर्चा व बहस से ही उभरेगी! अतीत के सबक और अनुभव की रोशनी में हम एक सही बोध विकसित कर सकते हैं। इस बारे में मैं अपनी राय यहां दे रहा हूं:

असल में जो मित्र किसी के पैर छूने या टीका लगाने भर को सामंतवादी या धार्मिक-कर्मकांडी हो जाने की संज्ञा दे रहे हैं या तोहमत लगा रहे हैं, वे सामंतवाद-कर्मकांड आदि और मार्क्सवाद, दोनों की अतिसरलीकृत व्याख्या और समझ का प्रदर्शन कर रहे हैं! भारत के ‘शहरी मध्यवर्गीय वामपंथी’ दशकों से इस तरह की अतिसरलीकृत और यांत्रिक व्याख्याओं के लिए ‘ख्यात’ रहे हैं!

निजी तौर पर मैं किसी का पैर नहीं छूता, मेरे परिवार में भी एक को छोड़कर आमतौर पर कोई किसी के पैर नहीं छूता। टीका भी नहीं लगाते! हाथों में लाल धागा भी नहीं बांधते! पर हाल की यात्रा में एक विख्यात मंदिर देखने जरूर गये थे! पहले भी अनेक मंदिर, गिरजाघर आदि देखे हैं! मेरे परिवार में कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं होता। पर हम दीवाली, होली, ईद, क्रिसमस, बैसाखी सहित कई त्योहार यूं ही मना लेते हैं! कम से कम उस दिन खास सुस्वादु (पेट को अपेक्षाकृत नुकसान पहुंचाने वाला) भोजन पका लेते हैं! क्या इसे कर्मकांडी या दकियानूसी कहेंगे? क्या इन त्योहारों को पूरी तरह नज़रंदाज़ कर देने भर से हम या आप सच्चे वामपंथी या प्रगतिशील माने जायेंगे?

हममें कई लोग किसी दल या विचार पद्धति से जुड़े होंगे और कई मेरी तरह भी होंगे, जिनका किसी दल या विचार-पद्धति से सांगठनिक रिश्ता नहीं है! किसी दल या संगठन से जुड़े वामपंथी या प्रगतिशील लोगों‌ के मुकाबले हमारे जैसे लेखक या पत्रकार को अपने ढंग से जीने और आचरण करने की शायद ज्यादा स्वतंत्रता है!

जिन लोगों का किसी राजनीतिक दल या संगठन से रिश्ता है, उनके लिए तो और भी जरूरी है कि वो अपनी बुनियादी वैचारिकी पर टिके रहकर मौजूदा सामाजिकता और रिश्तों की औपचारिकता व परंपरा का गरिमापूर्ण ढंग से निर्वहन भी करें! बंगाल में दशहरा के पांडाल हों या केरल के स्थानीय परंपरागत सामाजिक आयोजन, इन सबमें गरिमा के साथ ऐसे लोगों की भागीदारी जरुरी होती है! इसका यह भी मतलब नहीं कि ऐसी जगहों या ऐसे आयोजनों में प्रगतिशील विचारधारा के लोगों को ‘कीर्तनिया पार्टी’ में तब्दील हो जाना चाहिए! बिल्कुल नहीं, पर आप ऐसे आयोजनों से तब तक अपने को पूरी तरह काट नहीं सकते, जब तक समाज बदलने का महान लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता! लेकिन यह भी सच है कि वर्जनाओं, अंधविश्वासों, कुरीतियों और सामंती मूल्यों के खिलाफ जनजागरण के बगैर समाज में बदलाव नहीं आयेगा। यानी दोनों प्रक्रियाओं में एक जटिल द्वन्द्ववात्मक रिश्ता है!

समाज हमारी-आपकी इच्छा और कैलेंडर की तयशुदा तारीख से नहीं बदलता! परिस्थितियों की अनुकूलता के अलावा इसके लिए ठोस प्रयास भी करने होते हैं!

हमारा मानना है कि किसी कंजरवेटिव या पिछड़े माहौल में पहुंचा अगर कोई वामपंथी, मार्क्सवादी या प्रगतिशील व्यक्ति किसी बुजुर्ग परिजन या समाज के आदरणीय व्यक्ति का पैर छू लेता है तो इसे कत्तई सामंतवाद या चाटुकारिता की संज्ञा देने की मूर्खता नहीं की जानी चाहिए! आज भी अनेक इलाके हैं, जहां गले लगना या पैर छूना एक सामाजिक व्यवहार है! वहां आप ‘लाल सलाम’ या ‘नीला सलाम’ कहकर लोगों या उस क्षेत्र को ‘लाल’ या ‘नीला’ नहीं कर सकते! समाज बदलने के लिए लंबी और व्यवस्थित कोशिश करनी होगी! समाज बदलेगा तो ये व्यवहार भी बदल जायेगा!

पर समाज बदले बगैर आप अपने लिए एक ‘स्वप्निल क्रांति द्वीप’ बनायेंगे तो कभी न कभी उसका ध्वस्त होना अवश्यंभावी है! सिर्फ अपने समझदार या प्रगतिशील या वर्जनाओं से उन्मुक्त होने से क्या होगा, आम लोगों को संप्रदायवाद, उग्र धर्मांधता, वर्जनाओं और कर्मकांडों से दूर करना लक्ष्य होना चाहिए।

अतीत की गलतियों से सबक लीजिए और समझने की कोशिश कीजिए। समझिए कि आप भारत (या नेपाल, बांग्लादेश या पाकिस्तान) के वामपंथी, प्रगतिशील या बहुजनवादी हैं, यूरोप के नहीं!

(उर्मिलेश राज्य सभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं। और मौजूदा समय में पत्रकारिता और बौद्धिक जगत के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं।)

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