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इब्राहीम अल्काजीः रंगमंच के शिल्पकार और एक सहयोगी गुरू

इब्राहीम अल्काजी दिल के दौरे की वजह नहीं रहे।

मैं गांधी की शूटिंग से कुछ दिन पहले ही दिल्ली आ गई थी कि चरखा कातने की भूमिका के लिए खुद को तैयार कर सकूं, अंग्रेजी ठीक से बोल सकूं और वक्तृत्व कला सीख लूं। जैसे-जैसे शूटिंग का पहला दिन करीब आ रहा था, मैं अपने गुरू इब्राहीम अल्काजी से मिल लेना और उनका आशिर्वाद लेना चाहती थी। मैं जानती थी कि पैर छूना पसंद नहीं करते थे। मेरे वक्तृत्व कला अध्यापक कुसुम हैदर जो उनके छात्र रह चुके थे, से पता चल गया था कि त्रिवेणी आर्ट गैलरी जाने वाले हैं। मैं वहां पहुंच गई और वह एक चमकती मुस्कान के साथ मुझसे मिले।

जब मैं उनके सामने थी तब समझ में ही नहीं आया कि क्या कहूं। मुझे लगता है कि उन्होंने मेरी सोच को पकड़ लिया और जान लिया कि हमेशा की तरह मैं शब्दों से जूझ रही हूं। जब मैं वहां से निकल रही थी वह चलकर कार तक आये और एक अच्छे इंसान की तरह दरवाजा खोल दिया। इस तरह के अनुभव आपके साथ हमेशा बने रहते हैं।

यह मैं हूं और जो भी हूं उनकी वजह से। मैंने पहली बार अल्काजी के बारे में अपने पिता से सुना था। उन्होंने उन्हें मंच पर देखा था। जब मैंने कला रूप का अध्ययन करने के लिए केंद्रीय सरकार की स्काॅलरशिप के लिए आवेदन किया था, तब उसमें संस्थान का नाम और गुरू का नाम लिखने की जगह थी जहां से और जिनसे अध्ययन करना था। गायन, नृत्य और लोकगीत के लिए आप एक गुरू का नाम ले सकते हैं। लेकिन रंगमंच में हम क्या कर सकते हैं? मेरे पिता ने कहा, ‘‘संस्थान की जगह में एनएसडी और गुरू वाली जगह में इब्राहिम अल्काजी लिख दो’’ अल्काजी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के निदेशक थे और साक्षात्कार पैनल में भी थे।

एक अध्यापक के बतौर वह कई चीजें दिखाना चाहते थे। वह पश्चिमी नाटक पढ़ाते थे। शेक्सपियर से जाॅन ऑसबार्न और टेन्निसी विलियम्स। वह कक्षा में दिये गये काम को स्पष्ट रहते थे। यदि आपने अपना काम नहीं किया हुआ है तो वह कक्षा के सामने ही खिंचाई कर देते थे। उन्होंने हमें सभी तरह के कला का अनुभव कराया। वह खुद भी एक पेंटर हैं। एक बार वह हम लोगों को लेकर राष्ट्रीय पेंटिंग प्रदर्शनी में लेकर गये और पेंटिंग देखने के नजरिये को व्याख्यायित किया। एक बार उन्होंने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा और गुप्त काल की कला और शिल्प के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।

मेरा पहला साल था। मैं एक नाटक पर काम कर रही थी। पात्र के चरित्र को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति थी। एनएसडी के लाइब्रेरियन ने बताया कि अल्काजी साहब ओपेन एयर थियेटर मेघदूत जाते हैं। वहीं बैठते और काम करते हैं। इसलिए आप वहां लंच के समय जाओ और अपने पात्र के बारे पूछ लो। इस तरह मैंने अल्काजी की सूक्ष्म दृष्टि देखी। वह एक छोटी सी मेज पर स्क्रिप्ट के साथ बैठे हुए थे। उन्होंने तराशी गई तीन-चार पेंसिल रखी हुई थी, चार अलग-अलग रंगों की पेन और एक रूल और मिटौना था।

मैंने साहस बटोरा और उनके पास गई। वह मुस्कराये और कहा कि मैं एक पेंसिल उठा लूं और जिस तरह से निर्देशित किया है उस हिसाब से चिन्ह लगा लें। मैंने अपनी पेंसिल निकाली। देखा, यह भोथरी और लिखने लायक नहीं थी। सर ने कहा, ‘‘रोहिणी, तुम्हारा दिमाग पेंसिल की तरह ही भोथरा है …इसे तेज करो!’’ यह मेरे जीवन भर के लिए पाठ था। आपको सावधान, चौकस और सारतत्व पकड़ने वाला होना ही होगा।

उन्हें नाटक निर्देशित करते देखना मजेदार होता था। उनकी मुखर टिप्पणी, मंच पर कलाकारों का संचालन निर्देशन और गहमा-गहमी के दृश्य संभालना, भव्य साज और सज्जा को देखना मजेदार होता था। हमने खुले मंच पर और साथ ही साथ पुराना किला जैसे स्मारक पर मंचन किया।

एक अध्यापक के बतौर वह मिली-जुली प्रकृति के थे। वह गलतियों पर झिड़कियां दे सकते थे या इसे खिलंदड़े तरीके से भी कह सकते थे। मैं रजिया सुल्तान की भूमिका निभा रही थी और जब भी मुझे घूमना होता तो पहले कलाई चटखाने की आदत थी। एक दिन पूरे स्कूल के सामने उन्होंने मेरी नकल मारी। मैं बेहद शर्मशार हुई और तुरंत ही खुद को ठीक कर लिया। दूसरी ओर, वह एकदम ख्याल रखने वाले इंसान थे।

मैं रतन थियम के साथ तलवारबाजी का अभ्यास कर रही थी और कुछ था जो बन नहीं पा रहा था। तलवार से मेरे जबड़े पर चोट आ गई। हालांकि ज्यादा कटा नहीं था लेकिन खून आ गया था। हम इस बात को दरकिनार कर एक बार फिर अभ्यास में लग गये। अल्काजी ने जो घटा था देख लिया था। वह चिल्लाये, ‘‘रुको’’। उन्होंने मेरी चोट को देखा और एक आदमी को बुलाकर कहा, ‘‘इसे डॉक्टर के पास ले जाओ और टिटेनस इंजेक्शन लगवाओ।’’

सर, मैंने हमेशा चाहा कि एनएसडी छोड़ देने के बाद आप आते और कम से कम मेरा एक नाटक देखते। मैं चाहती थी कि आप देखें कि आपके शिष्य अच्छा काम कर रहे हैं और उन रास्तों पर चल रहे हैं जिस रास्ते को आपने दिखाया और निर्देशित किया। लेकिन मैं मुतमईन हूं कि आप अपने हरेक छात्र से वाकिफ थे और यह भी कि वे क्या कर रहे हैं। मेरी जिंदगी में आने के लिए आपको धन्यवाद। एक सच्चा गुरू होने के लिए आपको धन्यवाद।

(अभिनेत्री रोहिणी हटिंगड़ी का यह लेख मूल रूप से इंडियन एक्सप्रेस और द प्रिंट के अंग्रेजी पोर्टल में ‘एक स्नातक की ओर से सर के लिए’ 6 अगस्त, 2020 को छपा था। अनुवाद लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता अंजनी कुमार ने किया है।)

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This post was last modified on August 10, 2020 1:25 pm

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