Tuesday, October 19, 2021

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शाहूजी महाराज; एक राजा, जिसने रखी देश में लोकतंत्र और सामाजिक बराबरी की नींव

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छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जुलाई, 1874 ई. को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। उनके बचपन का नाम यशवंत राव घाटगे था। उनके पिता का नाम जयसिंह राव घाटगे तथा माता का नाम राधाबाई साहेब था। कोल्हापुर महाराज की कोई संतान जीवित न रहने पर महारानी आनंदीबाई ने 11 मार्च, 1884 को यशवंत राव घाटगे को गोद लिया। उनका दूसरा नाम शाहूजी महाराज रखा गया। शाहूजी का राज्याभिषेक 02 अप्रैल, 1884 को कोल्हापुर के शासक के रूप में हुआ।

राज्याभिषेक के समय कोल्हापुर ब्रिटिश शासन के अधीन राज्यों में से एक था। शाहूजी महाराज कुनबी जाति के थे जो वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत शूद्र वर्ण में रखी गयी है। राजा होने के बावजूद वर्ण व्यवस्था के निचले स्तर शूद्र वर्ण में पैदा होने का दंश शाहूजी महाराज को बचपन से ही झेलना पड़ा था। परम्परा के अनुसार राजा के नदी में स्नान करते समय शाही पुजारी को वेदमन्त्रों का उच्चारण करना होता था लेकिन शाहूजी महाराज के स्नान के समय शाही पुजारी वेद मंत्रों के स्थान पर पौराणिक मंत्रों का उच्चारण करता था।

जब यह बात शाहूजी महाराज के संज्ञान में आयी तो उन्होंने शाही पुजारी को फटकार लगायी और सभी अनुष्ठान वेदमन्त्रों के अनुसार कराने का आदेश दिया। इस पर शाही पुजारी ने उत्तर दिया कि आप जन्म से शूद्र हैं, इसलिए परम्परा के अनुसार आप पौराणिक मन्त्रों के ही योग्य हैं, आप और आपका परिवार क्षत्रिय नहीं है, इसलिए आप वेदमंत्रों के योग्य नहीं हैं। इस उत्तर से शाहूजी महाराज क्रुद्ध हो गए तथा उन्होंने आदेश दिया कि सभी अनुष्ठान वैदिक मंत्रों की परम्परा के अनुसार ही पूरे किए जायें परन्तु सभी पुजारियों ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया। राजाज्ञा की अवहेलना करने पर शाहूजी महाराज ने समस्त पुजारियों सहित शाही पुजारी को भी नौकरी से निकाल दिया। इस कार्य का पूना के ब्राह्मणों ने विरोध किया तथा शाहूजी महाराज को गद्दी से हटाकर कोल्हापुर राज्य को ब्रिटिश अधिक्षेत्र में मिलाने की माँग की।

इस विवाद ने शाहूजी महाराज की आँखें खोल दी, उन्होंने महसूस किया कि जब इस राज्य के शासक के साथ ऐसी घटना हो सकती है तो इस राज्य के निम्न वर्गों की, ब्राह्मणवादी व्यवस्था के सामने क्या दशा होगी। इसके पश्चात शाहूजी ने अपने शासन-प्रशासन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए जो आगे चलकर भारत में सामाजिक परिवर्तन के आधार बने।

1902 में शाहूजी महाराज के द्वारा सरकारी नौकरी में पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत तक आरक्षण लागू किया गया। 1911 में शाहूजी महाराज ने महात्मा फुले द्वारा स्थापित ‘सत्यशोधक समाज’ को पुनर्गठित कर उसका संचालन प्रारम्भ किया। 1915 में अस्पृश्यता को समाप्त करने का आदेश दिया। 1918 में ‘वतनदारी प्रथा’ को समाप्त कर दिया। इस प्रथा को ‘महार वतन’ नाम से भी जाना जाता था। इस प्रथा के अन्तर्गत महार जाति के लोग उच्च वर्णीय लोगों के यहाँ बेगारी करते थे। 1917 में विधवा विवाह अधिनियम पारित कर अन्तर्जातीय विवाह अधिनियम को भी अपने राज्य में लागू किया।

शाहूजी महाराज ने अपने राज्य में भूमिहीनों को भूमि बांटकर तथा किसानों को बिना ब्याज ऋण देकर सहायता प्रदान की। सिंचाई की सुविधा प्रदान करने के लिए उन्होंने लक्ष्मी सागर बाँध का निर्माण किया। लघु उद्योगों, कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आसान किश्तों पर उद्यमियों को आर्थिक सहायता तथा कच्चा माल उपलब्ध करवाया। सामाजिक एकरूपता लाने के एक और प्रयास में शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर में एक सर्वजाति भोज का आयोजन किया, जिसमें अपने कर्मचारियों, अधिकारियों सहित अस्पृश्य लोगों के साथ एक ही पंगत में बैठकर भोजन किया।

1917 में कोल्हापुर के नगरपालिका अध्यक्ष दंतोबा पवार ने शाहूजी महाराज का परिचय बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर से कराया। 1920 में शाहूजी ने हुबली में समस्त गैर ब्राह्मणों के सम्मेलन की अध्यक्षता की, तथा डॉ. अम्बेडकर द्वारा निकाले जा रहे पत्र ‘मूकनायक’ को आर्थिक सहायता प्रदान कर डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन में सहायता प्रदान की। डॉ. अंम्बेडकर ‘मूकनायक’ के माध्यम से लोगों में वैचारिक चेतना उत्पन्न करने में सफल रहे तथा लोग शाहूजी तथा डॉ. अम्बेडकर के द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन में सक्रिय तौर पर भाग लेने लगे। 1922 में दलित संघ के विशाल सम्मेलन में उन्होंने दलितों को सलाह दी कि डॉ. अम्बेडकर को अपना नेता मानें। 06 मई, 1922 को छत्रपति शाहूजी महाराज का देहान्त हो गया।

छत्रपति शाहूजी महाराज के समतावादी कार्यों को देखते हुए मई 1900 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने उन्हें ‘महाराजा’ की पदवी से विभूषित किया। लार्ड हैरिस ने ‘छत्रपति कोल्हापुर’ की उपाधि से सम्मानित किया। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में अखिल भरतीय कुर्मी सम्मेलन में ‘राजर्षि’ की पदवी प्रदान की गयी। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने ‘डाक्टर ऑफ लाॅज’ की मानद उपाधि प्रदान की। इस तरह शाहूजी को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एल-एल.डी. की मानद उपाधि प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय का गौरव प्राप्त है।

छत्रपति शाहूजी महाराज का प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ था जब महाराष्ट्र में परम्परावादी, रुढ़िवादी, विभेदकारी सामाजिक व्यवस्था पर चोट पड़नी प्रारम्भ हो गयी थी लेकिन जकड़न इतनी सशक्त थी कि समाज में कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ रहा था। आर्थिक रूप से सम्पन्न होने के बावजूद भी शूद्र जातियां सामाजिक रूप से चितपावन ब्राह्मणों के अधीन थीं। पश्चिमी देशों की समता, स्वतंत्रता एवं वैज्ञानिकता की हवा भारत में प्रवेश कर चुकी थी। समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग, जिसे पिछड़े एवं दलित की संज्ञा दी गयी थी, समझने लगा था कि सामाजिक दासता राजनीतिक दासता से अधिक कष्टकर है।

शिक्षा के प्रचार-प्रसार से ही मानसिक गुलामी दूर की जा सकती है। महात्मा फुले अछूतों एवं बालिकाओं के लिए विद्यालयों की स्थापना कर वर्णव्यवस्था द्वारा स्थापित रूढ़ियों के विरूद्ध संघर्ष प्रारम्भ कर चुके थे। ‘सत्यशोधक समाज’ शूद्रों-अतिशूद्रों को मानसिक गुलामी से मुक्त करने का वैचारिक अभियान चला रहा था। ईसाई मिशनरियां शिक्षा को सर्वजन सुलभ बनाने की दिशा में अग्रसर हो चुकी थीं। ब्रिटिश काल में शिक्षा राज्य के दायित्व का रूप लेने लगी थी।

छत्रपति शाहूजी महाराज वर्ण व्यवस्था के नियमों से स्वयं अपमानित तथा प्रताड़ित हो चुके थे। उनको तथा उनके वंश को महाराष्ट्र के ब्राह्मणों ने शूद्र घोषित कर दिया था। वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र का कार्य अपने से उच्च वर्णों की सेवा करना निर्धारित है न कि शासन करना। इसलिए ब्राह्मणों ने छत्रपति शाहूजी का विरोध किया तथा उनके राज्य को ब्रिटिश आधिपत्य में लेने की माँग की। शाहूजी महाराज ने विचार व्यक्त किया कि ‘‘दलित तथा पिछड़ी जातियों की अवनति के पीछे समाज में जातिभेद तथा विषमता एक बड़ा कारण रहा है- एक वर्ग का मान-सम्मान हो तथा दूसरे का अपमान।’’

वर्णव्यवस्था में स्थापित मूल्यों के कारण ही ब्राह्मणों का स्थान पृथ्वी पर ईश्वर से भी बड़ा है तथा शूद्रों-अतिशूद्रों का स्थान पशुओं से भी हीन है। वर्ण व्यवस्था मानसिक गुलामी की जड़ है। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह पर रोक, अंतर्जातीय विवाह पर रोक जैसी प्रथाओं से पूरे समाज में सड़न पैदा हो रही है। शाहूजी महाराज ने वर्ण व्यवस्था द्वारा स्थापित मूल्यों को खारिज किया एवं लोक कल्याणकारी मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया।

छत्रपति शाहूजी महाराज ने जातिभेद समाप्त करने का विचार व्यक्त किया। कुछ लोगों का विचार था कि जातिभेद बुरा नहीं है, जाति द्वेष बुरा है, इस पर छत्रपति शाहूजी महाराज ने कहा कि, ‘‘जातिभेद का कार्य ही जाति द्वेष पैदा करना है। इसलिए जातिभेद सबसे पहले समाप्त होना चाहिए।’’

छत्रपति शाहूजी महाराज अवसर की समानता के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि कमजोर वर्गों को उनके उत्थान के लिए विशेष सुविधा प्रदान करना अतिआवश्यक है तथा यह राज्य का दायित्व है।

दलितों के उत्थान के लिए छत्रपति शाहूजी महाराज वर्ण व्यवस्था द्वारा स्थापित मानसिक गुलामी को समाप्त करना आवश्यक समझते हैं। उनका मानना था कि शूद्र और अतिशूद्र वर्णव्यवस्था द्वारा पीड़ित एवं अपमानित हैं, इसलिए इन दोनों वर्गों को वर्णव्यवस्था के विरुद्ध उठ खड़ा होना चाहिए। इसके साथ ही उनका मानना था कि शूद्रों की स्थिति अतिशूद्रों से अच्छी है लेकिन वे वर्ण व्यवस्था के मूल्यों से प्रभावित होकर अतिशूद्रों (अस्पृश्यों) को हीनभावना से देखते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, शूद्रों को अतिशूद्रों के साथ भ्रातृत्व का व्यवहार करना चाहिए तथा दलितों के आन्दोलनों को सहयोग देना चाहिए।

उन्होंने सर्वजातीय सहभोज किया, जिसमें अपने अधिकारियों सहित पंगत में बैठकर अस्पृश्यों के साथ भोजन किया। 1920 में डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में होने वाले सम्मेलन में उन्होंने कहा था, ‘‘भाइयों, आज आपको डॉ. अम्बेडकर के रूप में अपना रक्षक नेता मिला। मुझे पूर्ण विश्वास है कि डॉ. अम्बेडकर आपकी गुलामी की बेड़ियां तोड़ देंगे। समय आएगा और डॉ. अम्बेडकर अखिल भारत के प्रथम श्रेणी के नेता के रूप में चमक उठेंगे।’’ इस प्रकार उन्होंने दलितों-पिछड़ों की एकता स्थापित करने का विचार व्यक्त किया। छत्रपति शाहूजी महाराज सच्चे अर्थों में लोकतान्त्रिक मूल्यों के रक्षक राजा थे।

(डॉ. अलख निरंजन गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग से पी-एचडी हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन करते हैं। इनकी दो महत्वपूर्ण किताबें- ‘नई राह के खोज में समकालीन दलित चिंतक’ और ‘समकालीन भारत में दलित: विरासत, विमर्श विद्रोह’ प्रकाशित हैं।) 

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