Thursday, February 22, 2024

इतनी सी बातः ताकि कुछ शेष ‘न’ रहे

जिंदगी दोबारा नहीं मिलती। जो करना हो, इसी जीवन में करना पड़ता है। कुछ लोग जीवन भर एक ही काम करते रहते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो एक ही जीवन में बहुत कुछ कर जाते हैं। ऐसा करते हैं मानो कुछ शेष ‘न’ रहे।

शेषन, यही नाम था उनका, टीएन शेषन। ग्रामीण विकास संबंधी प्रारंभिक पद से सेवा प्रारंभ करके उन्होंने जिला प्रशासन और फिर राज्य तथा केंद्र सरकार में बड़े ओहदे संभाले। मद्रास में परिवहन निदेशक के तौर पर उनके शानदार काम के भी अनोखे किस्से हैं। किसी बस ड्राइवर ने ललकार दिया कि आपको बस चलाने की परेशानियां नहीं मालूम। एक दिन बस ड्राइवरों की हड़ताल थी तो शेषन खुद बस चलाकर 80 किलोमीटर ले गए।

ऐसे किस्सों में अतिरेक भी होता है, लेकिन चुनाव आयोग को स्वायत्तता और निष्पक्षता दिलाने में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा। किसी नौकरशाह ने अपने बूते किसी संस्थान को ऐसी ताकत और गरिमा नहीं दी। उनसे पहले चुनाव आयोग वैसा ही लिजलिजा, सिद्धान्तहीन और व्यक्तित्वहीन था, जैसा अब है। अब तो केंद्रीय चुनाव आयोग को व्यंग्य में ‘केंचुआ’ कहा जाने लगा है।

वर्तमान चुनाव आयोग को इतनी आलोचना नहीं झेलनी पड़ती, यदि शेषन ने इसकी उच्च गरिमा न बनाई होती। उस स्तर से नीचे गिरता साफ दिखना अखरेगा ही।

यह जानना दिलचस्प होगा कि शेषन ने चुनाव आयोग को यह हैसियत कैसे दिलाई। अगस्त 1993 में उन्होंने एक आदेश पर साफ लिख दिया कि चुनाव आयोग को संवैधानिक शक्तियों को मान्यता मिलने तक कोई चुनाव नहीं होगा। इसके कारण पश्चिम बंगाल में राज्यसभा चुनाव रोकना पड़ा, केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी को पद छोड़ना पड़ा।

तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने नाराज होकर इसे प्रजातंत्र का ‘लॉकआउट’ कह डाला, लेकिन शेषन नहीं झुके और चुनाव आयोग को एक स्वायत्त संस्था बनाकर ही दम लिया।

शेषन की कार्यशैली का एक किस्सा। चुनाव के दौरान पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। बोले, ‘पहले जब मैं सरकार के एक अन्य विभाग में था…’ फिर चुप हुए, और पत्रकारों से कहा, ‘मैंने अभी एक गलत बात कही, आपने गौर नहीं किया…’

सब उनका मुंह ताकने लगे। तब शेषन बोले, ‘मैंने कहा कि जब मैं सरकार के एक अन्य विभाग में था, यानी अब भी मैं सरकार के किसी विभाग में हूं, लेकिन नहीं। अब मैं चुनाव आयोग में हूं। यह सरकार का विभाग नहीं है, स्वतंत्र है।’

ऐसा जज्बा रखने वाले टीएन शेषन को श्रद्धांजलि। जीवन तो हर कोई जीता है। कुछ ही होते हैं, जो ऐसा करते हैं, मानो कुछ शेष ‘न’ रह जाए।

(विष्णु राजगढ़िया वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल भोपाल स्थित माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर अध्यापन का काम कर रहे हैं।)

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