नुरेम्बर्ग के अब्र-ए-सियाह: 2024 आम चुनाव आज़ादी के बाद के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव साबित होने वाले हैं!

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भारतीय गणराज्य के सफ़र में कुछ राष्ट्रीय चुनाव मील के पत्थर साबित हुए हैं। आज़ाद भारत के 1951-52 के पहले चुनावों ने व्यापक तौर पर संशयी दुनिया के सामने भारतीय जनता की चुनावी लोकतन्त्र के प्रति प्रतिबद्धता और क्षमता को स्थापित किया। 1977 में भारत की जनता ने संवैधानिक आज़ादी को बहाल करने के लिए भारी संख्या में मतदान कर 18 महीने के पूर्वकालिक आपातकाल को मुअत्तल कर दिया।

फिर भी, 2024 के राष्ट्रीय चुनाव विवादास्पद रूप से आज़ादी के बाद के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव साबित होने वाले हैं। इसके नतीजे यह तय करेंगे की भारत एक धर्मनिरपेक्ष जनतन्त्र रहेगा या नहीं।

भारत के संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के कई मायने थे। राज्य का कोई धर्म नहीं होगा। वह ईमानदारी से सभी धर्मों से बराबर दूरी बनाये रखेगा। सभी धर्मों के अनुयायियों को, चाहे वे बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक, न केवल अपने धर्म के पालन करने का बल्कि अपने धार्मिक विचारों के प्रचार-प्रसार की भी पूरी आज़ादी होगी। धार्मिक कार्य के संवैधानिक नैतिकता के उलंघन की स्थिति में राज्य को न केवल हस्तक्षेप करने का हक़ होगा, बल्कि यह उसका फर्ज़ और सभी अल्पसंख्यकों को, बहुसंख्यकों की ही भांति, पूर्ण नागरिकता अधिकार मिलना सुनिश्चित किया जाएगा। इन अधिकारों की हिफाज़त करना और यह सुनिश्चित करना कि राज्य खुद किसी भी तरह से मज़हब के आधार पर पक्षपात नहीं कर रहा, राज्य का फर्ज़ होगा। 

भारतीय गणराज्य के निर्माण में धर्मनिरपेक्षता का पालन कभी सालिम नहीं रहा। लेकिन प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व का एक दशक इतने भयंकर हमलों और आक्रमण का साक्षी रहा है कि कई लोगों को भय है की भारत अमल में अब एक धार्मिक राज्य, हिन्दू राष्ट्र बन चुका है, जबकि संविधान की प्रस्तावना में अब भी धर्मनिरपेक्षता (और समाजवादी) जनतन्त्र जैसे अर्थ बरक़रार हैं। 

नात्सी जर्मनी में 1935 में एडोल्फ़ हिटलर ने नुरेम्बर्ग कानून के नाम से दो क़ानूनों की घोषणा की। ये यहूदी जर्मनीवासियों से नागरिकता का अधिकार छीनते थे और अन्तर-धार्मिक विवाह या सम्बन्ध को गैर-क़ानूनी घोषित करते थे। इन दो क़ानूनों ने जर्मन यहूदियों को गैर-नागरिक बना दिया और यहूदियों और जर्मनों के बीच विवाह और यौन सम्बन्धों को अपराध घोषित कर दिया।

मोदी राज में भी ऐसे क़ानून पारित किये गये हैं जो मुसलमानों के समान नागरिकता के सिद्धान्त पर हमला करते हैं; और अन्तर-धार्मिक विवाह के लिए धर्म-परिवर्तन को अपराध घोषित करते हैं। मोदी राज के इन क़ानूनों में क्या नुरेम्बर्ग क़ानूनों की गूंज सुनायी देती है?

2019 का नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) सीधे तौर पर मुसलमानों के नागरिकता के अधिकारों को नहीं छीनता। यह सबसे पहले धार्मिक पहचान को एक व्यक्ति के भारतीय नागरिकता की अहम कसौटी बनाता है; और भारत के अन्य धर्म के अनुयायियों के लिए गढ़ी गयी इस धारणा से अनिर्दिष्ट मुसलमानों को दरकिनार रखती है कि वे भारत के पड़ोसी मुस्लिम बहुसंख्यक मुल्कों के उत्पीड़ित अल्पसंख्यक हैं।

सीएए का औचित्य यह कहकर सिद्ध किया जाता है कि यह मानवतावादी शरणार्थी क़ानून है जिससे पड़ोसी मुल्कों के सताये हुए अल्पसंख्यकों को मदद और शरण मिलेगी। लेकिन उत्पीड़न शब्द का इस क़ानून और उसके नियमों में कोई ज़िक्र नहीं है। और साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्यों यह संशोधन तीन मुस्लिम बहुसंख्यक देशों – पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले अनिर्दिष्ट गैर-मुसलमानों को ही फ़ास्ट ट्रैक आवेदन देने का प्रावधान देता है।

भारत के लगभग सभी पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न एक कुरूप सच्चाई है – पाकिस्तान में हिन्दुओं, ईसाइयों और अहमदिया; अफ़गानिस्तान में हिन्दुओं, सिखों और हज़ाराओं, चीन में उइगुर मुसलमानों और तिब्बतियों, म्यांमार में रोहींग्या मुसलमानों, श्रीलंका में तमिल और मुसलमानों और बांग्लादेश में हिन्दुओं का। अगर यह क़ानून मानवीय सोच से ही प्रेरित था, तो भारत के दरवाज़े दुनिया में सबसे ज़्यादा उत्पीड़ित लोगों के लिए – म्यांमार के रोहींग्या, पाकिस्तान के अहमदिया और चीन के उइगुरों के लिए क्यों नहीं खोले गये? क्या इसलिए कि ये सभी मुस्लिम सम्प्रदाय से हैं सिवाय श्रीलंका के तमिल हिन्दुओं के?

क्या यह अंदाज़ा लगाना यथोचित है कि इस क़ानून के पीछे की मंशा मानवतावादी नहीं विचारधारात्मक है। जैसे इज़राइल दुनियाभर के यहूदियों का प्राकृतिक निवास स्थान है वैसे ही 2019 के सीएए के पीछे की विचारधारा के अनुसार भारत दुनियाभर के हिन्दुओं का प्राकृतिक निवास स्थान है। लेकिन यह मत भारत के संविधान में दर्ज़ धर्मनिरपेक्षता के उसूलों से, इस सिद्धान्त से कि भारत गैर-हिन्दू नागरिकों के लिए भी बराबर है, विमुख है।

प्रधानमन्त्री और केन्द्रीय गृह मन्त्री की ओर से मुसलमानों पर समय-समय पर भाषणों में “घुसपैठिया” का ठप्पा लगाने से इस क़ानून के ज़रिये भारतीय मुसलमानों में नागरिकता के अधिकार से वंचित किये जाने की सम्भावना के खौफ़ को और बल मिलता है। केन्द्रीय गृह मन्त्री के “क्रोनोलोजी” में निहितार्थ इस आशंका को और प्रबल करता है; कि उनकी सरकार पहले सीएए लेकर आयी और अब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर लेकर आएगी।

असम राज्य में लागू होने वाली एनआरसी के कारण लाखों निवासियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि इसने निर्दोष होने के सबूत और धारणा के भार को पलट दिया। सभी नागरिकों को पुराने दस्तावेजों के आधार पर यह साबित करना था कि वे नागरिक थे, और ऐसा न कर पाने की स्थिति में, राज्य आपको गैर क़ानूनी प्रवासी (या घुसपैठिया) मानेगा, आपको गैर नागरिक घोषित करेगा और सम्भवतः डिटेन्शन कैम्प में कैद कर देगा। 

लेकिन यदि आप अनिर्दिष्ट हिन्दू थे, तब आपको चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि सीएए के क़ानून के अनुसार आपको बांग्लादेश में उत्पीड़न का शिकार हिन्दू समझा जाएगा, और आपको फ़ास्ट-ट्रैक नागरिकता दी जाएगी। जबकि मुस्लिम होने पर आपको को इस संभावना के क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा।

जो मोदी राज के एक दशक में भाजपा शासित अलग-अलग राज्यों में कुकुरमुत्ते की तरह सिर उठा रहे अनौपचारिक तौर पर “लव जिहाद” कहे जाने वाले क़ानून भी भारतीय मुसलमानों के लिए उतने ही खौफ़ का सबब है हैं। ध्यान रहे, ये सीधे तौर पर नुरेम्बर्ग क़ानून की तरह मुस्लिम पुरुषों और हिन्दू स्त्रियों के बीच सम्बन्धों को समाप्त और अपराध घोषित नहीं करते। लेकिन इन क़ानूनों को पुलिस और कई मामलों में अदालतों द्वारा जिस तरह व्याख्यायित किया जा रहा है, हक़ीक़त में ये क़ानून इसी लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।

भारत लम्बे समय से उन लोगों के लिए ख़तरनाक जगह रहा है जो दूसरे मज़हब या “नीची” जाति के व्यक्ति से शादी करना या साथ रहना चुनते हैं। “ऑनर किलिंग” के नाम पर ख़ुद परिवार के सदस्य इन सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने वाले स्त्रियों और पुरुषों की हत्या करते हैं। ऐसी शंकाएं संघ के विषैले “लव जिहाद” के मिथक के प्रसार से कई गुना बढ़ गयी हैं, कि मुस्लिम पुरुषों को हिन्दू औरतों को प्यार और यौन सम्बन्ध के जाल में फंसाने का प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि उन औरतों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बनाया जा सके और मुस्लिम आबादी को बढ़ाने की साजिश को अंजाम दिया जा सके। लेकिन इन तथाकथित “लव जिहाद” के क़ानूनों ने अन्तर-धार्मिक जोड़ों के लिए ख़तरों को कई गुना बढ़ा दिया है।

आम तौर पर “लव जिहाद” क़ानून के नाम से प्रचलित क़ानून असल में धर्मांतरण क़ानूनों में किये गये संशोधन हैं जो विवाह के मक़सद से किये जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाते हैं। मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान भाजपा शासित सात राज्यों में हुए इन संशोधनों के तहत अब अन्तर-धार्मिक शादी की ख़्वाहिश रखने वाले जोड़ों के लिए सरकारी अधिकारियों को आवेदन देना और विवाह के इच्छा की सार्वजनिक घोषणा करना ज़रूरी बना दिया गया है। ये ऐसे विवाहित जोड़ों को प्रभावी ढंग से जेल की सलाखों, विवाह के अमान्य घोषित किये जाने और साथ ही चौकसी गिरोहों के खौफ़ और हिंसा के ख़तरों को प्रति उजागर करते हैं। अविवाहित साथ रह रहे जोड़ों के लिए ये विभिन्न जोख़िमों को कई गुना बढ़ा देते हैं।

भाजपा शासित राज्यों में इन क़ानूनों का पुलिस अधिकारियों (कभी कभी अदालतों), अन्तर-धार्मिक वैवाहिक जोड़ों के परिवारों और चौकसी गिरोहों द्वारा व्यापक तौर पर व्याख्यायित और हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर ऐसे विवाह को जबरन रोका और रद्द किया जाता है। इन सबसे ज़बरदस्त तरीक़े से धार्मिक स्वतन्त्रता और वयस्कों के साथ, सेक्स, रोमांस और विवाह के लिए अलग धर्म के जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर हमला किया जा रहा है। यह भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्र के संकल्प पर ग्रहण के समान है।

नात्सी जर्मनी में यहूदियों, रोमा और सिन्टी लोगों, काले जर्मनों को नागरिकता से वंचित करने का आधिकारिक संकल्प स्पष्ट और ज़ाहिर था। और यहूदियों और जर्मनों के बीच वैवाहिक और यौन सम्बन्धों को दण्डनीय अपराध बनाने का आधिकारिक नियत भी स्पष्ट था।

मोदी के भारत में यह महत्वाकांक्षा और यहाँ तक कि सार्वजनिक भाषण भी नात्सियों के ज़माने से अलग नहीं हैं। लेकिन देश के मुस्लिम नागरिकों का क़ानून और राज्य के कार्रवाइयों द्वारा बहिष्कार और अवैधिकरण, नागरिकता और अन्तर धार्मिक विवाह सम्बन्धी क़ानूनों की आड़ में छुपे हुए हैं, जैसा कि हमने देखा, और जर्मन यहूदियों के खिलाफ़ लाये गये नुरेम्बर्ग क़ानून की तरह भारतीय मुसलमानों का बहिष्करण ज़ाहिर नहीं है। फिर भी, इनके सूत्रीकरण और साथ ही इससे जुड़े सार्वजनिक संवाद और इसके कार्यान्वन से मुसलमानों के नागरिकता अधिकारों और उनके सहमतिपरक अन्तरधार्मिक विवाहों को ख़तरा चिंताजनक है और संविधान के अर्थ और आत्मा, दोनों का अतिक्रमण करता है। 

1935 के नुरेम्बर्ग के सियाह बादल आज भारत के आसमान पर अपशकुन की तरह छा चुके हैं।

( हर्ष मंदर रिटायर्ड आईएएस अफसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।)

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