भारत-चीन सीमा झड़प: सरहदी गर्मी के बीच जारी है आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर

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भारत-चीन सीमा से आने वाली ख़बरें काफी डरावनी हैं। सीमा पर युद्ध जैसी स्थिति के दरमियान आरोप-प्रत्यारोप का खेल जारी है। किसने दोनों देशों के बीच मान्य सीमा का उल्लंघन किया? किस देश के कितने सैनिक हताहत हुए? कौन उनकी मौत के लिए ज़िम्मेदार है? इन सब सवालों पर एक राय नहीं है। 

 बात जवानों के हताहत से शुरू करते हैं। भारतीय सेना के एक आधिकारिक बयान के अनुसार, 15/16 जून की रात को लद्दाख के गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़प में 17 भारतीय सैनिक मारे गए। इसके पहले एक अफसर समेत तीन सैनिकों की मौत हुई थी। इस लिहाज से यह संख्या 20 हो जाती है। विदेश मंत्रालय ने भी इस घटना की पुष्टि की है और पड़ोसी देश चीन पर एकतरफा रूप से “यथास्थिति” बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। मगर विदेश मंत्रालय ने क्षति के बारे में कोई आंकड़ा नहीं दिया।

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि भारत किसी के उकसावे में नहीं आता मगर वह अपनी संप्रभुता और अखंडता के लिए कोई समझौता नहीं करेगा। दैनिक हिंदुस्तान ने प्रधानमंत्री के बयान को इन शब्दों में बयान किया है:“पीएम मोदी ने कहा कि हम किसी को कभी उकसाते नहीं हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता और अखंडता से भी कोई समझौता नहीं करते हैं। 

झड़प में मारे गए एक भारतीय सैनिक के शव को अस्पताल में ले जाते सैनिक।

उन्होंने कहा कि जब भी समय आया है, हमने देश की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने में अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है, अपनी क्षमताओं को साबित किया है। उन्होंने कहा कि मैं देश को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। हमारे लिए भारत की अखंडता और संप्रभुता सर्वोच्च है और इसकी रक्षा करने से हमें कोई रोक नहीं सकता। इस बारे में किसी भी जरा भी संदेह नहीं होना चाहिए”।

दूसरी ओर, चीन का पक्ष यह है कि भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) का उल्लंघन किया है। एक चीनी सैन्य प्रवक्ता ने मंगलवार को भारतीय सेना पर अवैध गतिविधियों को अंजाम देने के लिए एलएसी पार करने का आरोप लगाया है। भारत पर जानबूझकर हमलों को भड़काने का भी आरोप लगाया गया है। हालांकि चीन ने अपने सैनिकों के हताहत होने की सूचना नहीं दी है। 

मगर “राष्ट्रवादी” मीडिया का एक बड़ा वर्ग बदला लेने के जुनून में मुबतिला नज़र आता है। मिसाल के तौर पर यह दावा किया जा रहा है कि 20 भारतीय सैनिकों के जवाब में, 43 चीनी सैनिकों को ‘ढेर’ कर दिया गया है। हालांकि इस खबर को मीडिया ने “सूत्रों” के हवाले से खूब चलाया। मगर एक ‘फैक्ट चेक’ करने वाले वेब पोर्टल के मुताबिक यह खबर हकीकत के बजाय अटकलों पर टिकी हुई नज़र आती है।

गलवान घाटी इलाका का सैटेलाइट चित्र।
गलवान घाटी इलाके का सैटेलाइट फोटो।

इस बीच, विपक्षी दल कांग्रेस ने जवानों की मौत पर जहाँ शोक ज़ाहिर किया है, वहीं मोदी सरकार पर जानकारी न देने का इलज़ाम लगाया है। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने एक वीडियो ट्वीट पर शेयर किया और सरकार से यह सवाल किया है कि भारतीय सैनिकों को बिना हथियार खतरे की तरफ किस ने भेजा था। 

विपक्ष के सवाल का जवाब देने के बजाय सत्ताधारी भाजपा ज़िम्मेदारी का ठीकरा इतिहास पर फोड़ रही है। भाजापा के प्रवक्ता संबित महापात्र ने राहुल पर हमला करते हुए कहा कि ‘अगर आप पढ़े लिखे नहीं है, जानकारी नहीं है। घर में बैठकर लॉकडाउन का इस्तेमाल करते हुए कुछ किताबें पढ़नी चाहिए थी। चीन के साथ कांग्रेस के शासन काल में क्या-क्या समझौते हुए थे, यह आपको पढ़ लेना चाहिए था।’   

इस बीच, अन्तरराष्ट्रीय और सुरक्षा मामलों के जानकर सी राजा मोहन ने एक लेख लिख कर यह दलील दी है कि चीन की भारत के खिलाफ बढ़ती आक्रामकता की वजह चीन की बढ़ती हुई सैन्य शक्ति है, जो भारत के मुकाबले में काफी ज्यादा है। “चीन की लद्दाख के पास एलएसी को कुतरने (हड़पने) की कोशिश बढ़ेगी, क्योंकि सैन्य संतुलन भारत के मुकाबले में पीआईएल (चीनी सेना) की तरफ बढ़ रहा है”। राजा मोहन ने चीन की इस दलील को भी ख़ारिज कर दिया है कि जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद चीन कश्मीर के मामले में कूदने के लिए बाध्य हुआ है। राजामोहन ने कहा है कि कश्मीर का ‘स्पेशल स्टेटस’ का मामला घरेलू और इसका चीन से कोई संबंध नहीं है। 

राजामोहन की इस दलील की अपनी सीमायें भी हैं। पहला यह कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मामले एक दूसरे से तेल और पानी की तरह जुदा नहीं होते। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत ने धारा 370 हटा कर एक बड़ी अन्तरराष्ट्रीय बिरादरी को नाराज़ किया है। 

लद्दाख में चीनी सीमा के पास ड्यूटी देते भारतीय सेना के जवान।

दूसरा यह कि चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कहीं ज्यादा बड़ी है। भारत चाह कर भी चीन के बराबर ‘मिलिट्री’ खर्च नहीं बढ़ा सकता, जैसे पाकिस्तान भारत के बराबर खर्च नहीं कर सकता है। भारत के लिए बेहतर विकल्प डिप्लोमैटिक रास्ते हैं जिस पर राजा मोहन ज्यादा कुछ नहीं कहते।         

राष्ट्रवाद के नाम पर, भारतीय मीडिया का एक बड़ा समूह भड़काऊ बातें फैला रहा है। उदाहरण के लिए, बुधवार (जून 17) के रोज़ प्रकाशित एक हिंदी दैनिक के शीर्षक पर विचार कीजिए। “बात भी…और, घात भी।” एक अन्य हिंदी दैनिक ने आठ स्तंभों में कुछ यूं सुर्खी लगाई है: ‘चीन का दुस्साहस: झड़प में भारत के 20  जवान शहीद, 43 चीनी सैनिक भी ढेर’। 

एक तथाकथिक “राष्ट्रभक्त” हिंदी समाचार चैनल के ‘पॉपुलर’ एंकर ने चीन को चेतावनी देते हुए कहा कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं है। कल तक यही एंकर भारत के खिलाफ लड़ने की चीनी सैनिकों की क्षमता पर सवाल उठा रहे थे और यह कुतर्क दे रहे थे कि अधिकांश चीनी सैनिक अपने माता-पिता की एकमात्र संतान हैं, इसलिए अगर वे युद्ध करने जाते हैं तो देश से पहले वे अपने परिवार के बारे में सोचेंगे!

ऐसी बे सिर पैर की बात करके, यह न्यूज़ एंकर कोई देशभक्ति का काम नहीं कर रहे हैं, क्योंकि लोगों को सही जानकारी नहीं बताना और उन्हें गुमराह करना किसी भी तरह से देशभक्ति का कार्य है। असली देशभक्त वह है जो युद्ध के बजाय शांति की बात करता है। 

जो लोग युद्ध का बिगुल फूंक रहे हैं, वे इस तथ्य पर खामोश हैं कि चीन और भारत दो परमाणु शक्तियां हैं। अगर उनके बीच युद्ध छिड़ जाता है, तो यह न केवल भारत और चीन के लिए, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों के लिए भी घातक होगा। मनुष्य ही क्या पेड़, पौधे, पक्षी, पशु, नदियाँ, पानी, जंगल, शहर, गाँव सभी इसकी चपेट में आने से बच नहीं पाएंगे।

(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं। आप अपनी राय इन्हें [email protected] पर भेज सकते हैं।)  

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