Wednesday, June 29, 2022

  अमृत काल के अग्निपथ पर अग्नि वर्षा

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संघ की मोदी सरकार का घोषित अमृत काल तेज गति से आगे बढ़ रहा है। अमृत काल में हमें कैसे-कैसे नजारे देखने को मिलेंगे यह सामान्य नागरिकों की कल्पना से परे है। जब तक भारतीय जनगण अमृत की एक बूंद का रसास्वादन कर पाते तब तक नई बौछारें शुरू हो जा रही हैं।

अभी नेशनल एजुकेशन पालिसी (नीप) के अमृत का कलश छात्रों के सर पर पटका ही गया था (जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार विमर्श और बहस जारी थी और छात्र उसका रसपान करने ही वाले थे) कि युवाओं को अग्निपथ पर अग्निवीर बना कर उतार दिया गया। इसके समानांतर अनेकों प्रयोग सफलता पूर्वक किए जा चुके हैं। इस्लाम विरोधी अस्त्र शस्त्र तो अनेकों कठिन दौरों में संघ भाजपा के लिए संकटमोचक बन चुके। उनका ब्रह्मास्त्र की तरह प्रयोग होता रहता है।

पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ अपशब्दों की बौछार के बाद मुल्क राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उलझा था। विरोध-प्रदर्शनों पर बर्बर दमन बुलडोजरों का प्रयोग और अल्पसंख्यकों का विरोध के दौरान बर्बर दमन चल ही रहा था कि मोदी सरकार ने अग्निपथ पर देश प्रदेश के युवाओं और छात्रों को धकेल दिया है।

घुटन

मुल्क के 10 करोड़ शिक्षित बेरोजगार युवा घुटन तनाव और भविष्य की दुष्चिंता में घिरे हुए थे। बरसों से विभिन्न सरकारी नौकरियों के लिए कष्ट साध्य परिश्रम से गुजरते हुए नौजवान सरकार की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे थे कि शायद उनके लिए नौकरी बहाली और सुरक्षित सम्मानजनक रोजगार का कोई मुकम्मल प्रोजेक्ट लेकर मोदी सरकार सामने आएगी।

लेकिन संघ की मोदी सरकार अतीत के अपने धूर्तता और षड्यंत्रकारी चरित्र के अनुकूल अपने मालिकों के हितों की रक्षा के लिए छात्रों के भविष्य पर इतिहास का सबसे क्रूर और निर्मम आक्रमण कर दिया।

स्वाभाविक है कि 8 वर्षों से पल रहे विक्षोभ और हताशा जन्य आक्रोश को फूट पड़ना ही था। मोदी सरकार की लफ्फाजी से पैदा हुआ अविश्वास और आक्रोश अनियंत्रित होकर भारत के बहुत बड़े भूभाग में ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। धूर्तता और पाखंड की भी कोई सीमा तो होती ही होगी।

विरोध की प्रकृति पर बहसें हो सकती हैं और होनी भी चाहिए। लेकिन मोदी सरकार का झांसा बाज चेहरा जिन नागरिकों ने देखा और भोगा है उनके लिए छात्रों का यह आक्रोश बिल्कुल सामान्य सी प्रवृत्ति का लाक्षणिक प्रस्फुटन है।

पाखंड की पृष्ठभूमि

मोदी जनकल्याण के नाम पर शुरू की जाने वाली योजनाओं को सड़क छाप ओझाओं-सोखाओं और जादूगरों की तरह सामान्य नागरिक को चमत्कृत करने और भव्यता के द्वारा इवेंट बना देने के लिए जाने जाते हैं।

पिछले 8 वर्षों में आधा दर्जन से ज्यादा रोजगार परियोजनाओं का जोर-शोर से ढिंढोरा पीट कर शुरुआत की गई। जिसमें कौशल विकास, मुद्रा लोन, जनधन योजना, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसे न जाने कितने रोजगार और विकास के नाम पर इवेंट क्रिएट किए गए। देश के पैसे की कितनी बर्बादी हुई इसकी बात छोड़ दिया जाय तो भी इन योजनाओं का परिणाम सिफर ही रहा है।

जितना ही विकास और रोजगार का दावा किया गया परिणाम उसके उलट आते गए। बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई। संगठित क्षेत्र में रोजगार सिकुड़ गए। निजी क्षेत्र रोजगार देने में अक्षम हो चुके हैं। लघु और मध्यम उद्योग डूबते जा रहे हैं।

इस नकारात्मक वातावरण में करोड़ों युवा प्रतिवर्ष रोजगार बाजार में उतर रहे हैं।

भाजपा राज में सरकारी भर्ती योजनाएं भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और परिणाम शून्यता का शिकार होती चली गई हैं। इस कारण करोड़ों नौजवानों के लिए भविष्य में कोई विकल्प बचा ही नहीं हैं। ऐसी स्थिति में आमतौर पर शिक्षित नौजवान कुंठा से ग्रस्त होते गए हैं। परिणाम स्वरुप उच्च शिक्षण संस्थानों के युवाओं और छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आत्ममुग्ध मोदी सरकार और उसके गूंगे बहरे गुलाम कारिंदों को नौजवानों की कराह सुनाई नहीं दे रही है।

नागरिकों की लाशों पर राजनीति का व्यापार करने वाला कोई राजनीतिक विचार नौजवानों की पीड़ा को समझने में सक्षम हो ही नहीं सकता। जिसका स्वाभाविक परिणाम आज अग्निपथ पर आक्रोश में दिख रहा है।

मोदी सरकार का यथार्थ

कुछ विश्लेषक अग्निपथ योजना को लेकर विभ्रम में हैं। उनके समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी सरकार ऐसी भर्ती योजना कोर सेक्टर में क्यों लागू कर रही है। बारीकी से अगर आप अध्ययन करें और इस योजना के सभी पहलुओं पर विचार करें तो स्पष्ट हो जायेगा सेना के लिए जवान तैयार करने का इस योजना से कोई संबंध नहीं है। योजना को तीनों सेना अध्यक्षों और रक्षा मंत्री की उपस्थिति में घोषित करना सिर्फ आवरण देने का चालाकी भरा प्रयास था।

इसके 1 दिन पहले ही कोर सेक्टर में प्रधानमंत्री मोदी ने निजी पूंजी के प्रवेश के लिए हैदराबाद में गाजे-बाजे के साथ ऐलान किया था। अघोषित तौर पर बहुत पहले ही भारत के सैन्य क्षेत्र ‘रक्षा सामग्री के उत्पादन से लेकर नीति निर्धारण तक’ में निजी क्षेत्र को घुसा देने का छुपा खुला प्रयास हो चुका था।

मोदी सरकार का बुनियादी चरित्र ही यही है। जनता का नाम लेकर जनता पर सघन हमला करना, लोकतंत्र संविधान के सामने सर झुका कर उसे धीरे-धीरे मौत की ओर ले जाना राष्ट्र और सैन्य बलों का गुणगान करते हुए अंततोगत्वा दोनों को निजी पूंजी के हवाले कर देना।

यही इस सरकार की बुनियादी फितरत है। अगर संघ भाजपा की बुनियादी फितरत को कोई नहीं समझ पायेगा तो मोदी सरकार के कामों के प्रति वह सही नजरिया निर्धारित नहीं कर सकता।

राष्ट्रभक्ति को सैन्यभक्ति के समकक्ष उन्नत कर देने का उद्देश्य

विगत 8 वर्षों में संघ और भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के कंठ से जो भी स्वर फूटा होगा उसमें सेना का गौरव गान अवश्य रहा होगा। सेना को पवित्रता प्रदान करते हुए उसे उच्चतम लोकतंत्रिक मूल्यों संस्थाओं परंपराओं संविधान और नागरिक अधिकारों के खिलाफ खड़ा करते हुए सैन्य क्षेत्र को प्रश्नातीत बना दिया है।

दिन-रात सैन्य भक्ति का कीर्तन चलता रहा। सैनिकों की शहादत के नाम पर वोट मांगे गये। उनकी शहादत और कठिन सेवाओं का गुणगान करते-करते अंत में “मोदी की सेना” जैसे जुमले उछाले गए।

प्रधानमंत्री बार-बार सैनिक ठिकानों पर जाकर अपनी देशभक्ति का इजहार करते हुए सैनिकों के पराक्रम सामर्थ्य शक्ति का गुणगान करने में पीछे नहीं रहे। भाजपा, बजरंग दल, विहिप, विद्यार्थी परिषद सहित कुकुरमुत्तों की तरह उग आए  हजारों संघी संगठन और संस्थाएं अनवरत सैनिकों के पराक्रम राष्ट्र सेवा और बलिदान से खुद को जोड़ती रहीं।

विरोधी विचारों वाले लोगों को सैनिकों और सेना के अपमान का दोषी ठहराया गया। सेना को प्रश्नों और सवालों के ऊपर घोषित करने की होड़ लगी रही। सेना की किसी कमजोरी पर सवाल उठाने वालों को राष्ट्र द्रोही और पाकिस्तानी घोषित किया जाता रहा।

शिक्षण संस्थानों के सैन्यीकरण का अभियान

यहां तक कि विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपति नियुक्त किए जाने लगे जो शिक्षण संस्थानों में टैंक और तोप रखने के सुझाव देने लगे। जिससे राष्ट्रभक्ति से भटके हुए छात्रों नौजवानों के अंदर राष्ट्र प्रेम को ठूंसा जा सके। जिन संस्थानों के छात्रों ने सरकार के इन प्रयासों का विरोध किया उन्हें टुकड़े-टुकड़े गैंग, देशद्रोही और देश का आंतरिक दुश्मन घोषित किया गया। राष्ट्रद्रोह के मुकदमों की बाढ़ आ गई।

पुलवामा के शहीदों की लाशों का चुनाव के लिए जिस तरह से प्रयोग हुआ उसे संपूर्ण राष्ट्र ने अपनी आंखों के सामने देखा है और इस सैन्य राष्ट्रवाद की आड़ में सेना के साथ किए जा रहे षड्यंत्र गैर जिम्मेदाराना व्यवहार और सरकार की आपराधिक लापरवाही को छुपा लिया गया।

सेना के अंदर से छन छन कर खबरें आती रहीं। सैनिकों के रहन-सहन भोजन वस्त्र आवास और वेतन संबंधी सवाल उठते रहे। लेकिन सैन्य राष्ट्रवाद की आड़ में उसे दबा दिया गया। जबकि भोजन, वस्त्र, दवा और भत्ते तक पर खर्चा घटा दिया गया है।

“कहावत है चोर की निगाह गठरी पर” लेकिन यथार्थ तो कुछ और ही था। मन में छिपी कुटिल योजनाएं अंततोगत्वा बाहर आ ही गईं। 8 वर्ष आते-आते मोदी सरकार की कॉरपोरेट परस्ती नंगी हो गई है।

अर्थव्यवस्था सहित सामाजिक-सामरिक जीवन के हर एक क्षेत्र में मोदी अपने मित्र पूंजीपतियों को घुसा देना चाहते हैं। यही नहीं वे शीघ्रातिशीघ्र सरकारी संस्थानों को कारपोरेट घरानों के हाथ में सौंप देने के लिए तत्पर हैं। अभी तक जितनी भी योजनाएं अस्तित्व में आई हैं सब ने कारपोरेट पूंजी के पक्ष में ही अपना वास्तविक फैसला सुनाया।

नोटबंदी जीएसटी कोविड-19 महामारी और तालाबंदी सभी का विश्लेषण कर लीजिए और आप देखेंगे की मोदी के मित्र पूंजीपतियों की पूंजी राष्ट्रीय संकट के कठिन समय में किस वेग से बढ़ती रही।

सैन्य क्षेत्र की संपदा-भारत में रेलवे और सेना क्षेत्र के पास अकूत भूसंपदा और संसाधन है। भारतीय रेल और भारतीय सेना के पास भूखंड के रूप में इतनी बड़ी संपदा है जिसे बेचकर दुनिया के कई देशों जितनी पूंजी इकट्ठा की जा सकती है।

मोदी सरकार शुरुआत से ही रेलवे से लेकर सभी सरकारी संस्थानों के निजीकरण तेज गति से करने में लगी है। सेना के कैंटोंमेंट क्षेत्र में खरबों की भूमि को मोदी सरकार पहले ही निजी घरानों को लीज पर देने का फैसला ले ही चुकी है।

अब यह दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो गया है कि संघ और मोदी की सेना भक्ति केवल सेना की संपदा यानि भूमि के साथ-साथ मानव संसाधन जो सामान्य सैनिक के रूप में इस देश में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। उसके निजीकरण तक जा कर दम तोड़ देती है। अभी तक की सभी सैन्य भक्ति का पाखंड अंततोगत्वा कारपोरेट हितार्थ और सेवार्थ ही रहा है।

राज खुल ही गया

फिक्की सहित औद्योगिक संस्थानों के सभी प्रतिनिधि संगठनों ने मोदी सरकार के अग्निपथ योजना के कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए हैं। इन संगठनों ने अपनी मंशा और प्रसन्नता को छुपाया नहीं और जोर देकर कहा कि अब उद्योग जगत के लिए अनुशासित प्रशिक्षित और समर्पित श्रम शक्ति उपलब्ध होगी। जो भारत के विकास मे महत्वपूर्ण योगदान देगी।

इससे स्पष्ट हो गया है कि मोदी सरकार की अग्निपथ योजना उद्योगपतियों के लिए जनता के पैसे से प्रशिक्षित मजदूर और सुरक्षाकर्मी मुहैया कराने के अलावा और कुछ नहीं है।

अग्निपथ योजना की घोषणा के बाद मोदी सरकार को धन्यवाद देना ही चाहिए कि उसने राष्ट्रहित के खोल को उतार फेका है और कारपोरेट भक्ति की अपनी प्रतिबद्धता को सर्वोपरि रखा है। कहावत है खाएंगे तो गाएंगे ही।

संघ और भाजपा का असली चेहरा

खैर जो भी हो मोदी और संघ के असली चरित्र का भंडाफोड़ हो ही गया जो अभी तक राष्ट्रप्रेम के आड़ में छुपाए बैठी थी। कारपोरेट मीडिया और पूंजी के बल पर गढ़ी गई राष्ट्र भक्ति राष्ट्र के प्रति समर्पण और राष्ट्रीय चिंता की सभी पाखंडी परियोजनाएं अंततोगत्वा धराशाई हो गई हैं।

जब यह कहा जाता था कि देश की आजादी के साथ जिन्होंने विश्वासघात किया और अंग्रेजों के प्रति राज भक्ति दिखाई है। जिन संगठनों ने आजादी की लड़ाई में एक बूंद पसीना भी नहीं बहाया है वो राष्ट्र भक्त हो ही नहीं सकते। तो आज के दौर में लोग इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते थे। लेकिन अब बातें साफ-साफ खुलकर सामने आ गई हैं। संघ का एकमात्र धर्म उद्योगपतियों राजे रजवाड़ों और बड़े पैसे वालों की सेवा करना ही है।

युवा विक्षोभ

ये वही नौजवान हैं जिन्हें अभी तक मोदी सरकार ने अपने राष्ट्र प्रेम विकास सैन्य भक्ति महाशक्ति विश्व गुरु जैसे धूर्तता भरे नारों के द्वारा उलझाए हुए थी। वह युवा डेमोगागी का इस्तेमाल सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने फर्जी खबरें प्रसारित करने, विरोधियों को लांक्षित करने, यहां तक कि समय-समय पर दंगे और आराजकता फैलाने में प्रयोग करती रही है। आज जब रोजगार और जिंदगी का संकट भावनात्मक सवालों से ज्यादा प्रभावशाली हो गया तो यही युवा विछोभ के रास्ते पर आगे बढ़ चुका है।

झूठ के पांव नहीं होते लेकिन उम्र ढाई दिन

बचपन में सुना करता था की असत्य का समय ढाई दिन ही होता है और अंततोगत्वा सत्य और यथार्थ के सामने उसे लहूलुहान होना ही पड़ता है। आज भारत में मोदी सरकार को वही दिन देखने पड़ रहे हैं। अभी तक प्रचार माध्यमों के द्वारा गढ़े गए पाखंड महाशक्ति का भ्रामक सपना मोदी के नेतृत्व में देश विश्व की अगुवाई करने वाली महा शक्ति बन रहा है जैसे पाखंड अब अपना प्रभाव खो चुके हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था ‘उभरती हुई महाशक्ति है’ का बुलबुला फूट चुका है

अब देश के नौजवानों-किसानों-छात्रों के धैर्य टूटने लगे हैं। इस योजना ने सरकार के गड़े हुए पाखंड को तार-तार कर दिया है। इसलिए फौरी तौर पर “भाजपा सरकार बनाम आम जनता” का अंतर्विरोध प्रधान भूमिका में आ चुका है। जो छात्रों नौजवानों के आक्रोश के रूप में सड़कों पर दिख रहा है।

अवांतर कथाएं

राजनीतिक विश्लेषकों रक्षा विशेषज्ञों के बीच कई तरह के सवाल हैं जो फासीवादी विश्व के ऐतिहासिक घटनाक्रमों को दृष्टिगत रखते हुए आज बहस में उठ रहे हैं। इतिहास गवाह है कि हिटलर ने राजकीय पैसे पर किस तरह से अपने समानांतर हत्यारे दस्तों को खड़ा किया था। जो आगे चलकर देश में यहूदियों, मार्क्सवादियों, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी पार्टियों सहित नाजी पार्टी के दमन में मुख्य भूमिका निभाई। यही नहीं नाजी पार्टी में हिटलर के प्रतिद्वंदियों का सफाया भी षड्यंत्र पूर्वक किया गया था। जिसे “लंबे छुरों की रात नाम से दुनिया जानती है”।

आशंकाएं इस कारण व्यक्त की जा रही हैं। क्योंकि सरकार ने सैनिक विद्यालय निजी क्षेत्र में खोलने की इजाजत दे दी है। अभी भोंसले मिलिटरी एकेडमी नामक संघी एक संस्थान पुणे में काम कर रहा था। जिस संस्थान से प्रशिक्षित होकर निकले कर्नल पुरोहित भारत में कई बम विस्फोटों के मास्टरमाइंड बताए गए थे। जो लंबे समय तक जेलों में रह चुके हैं। जिन्हें मोदी सरकार आने के बाद प्रज्ञा ठाकुर के साथ सम्मान बहाल कर दिया गया है।

अग्निपथ योजना के अग्नि वीरों की 4 साल की सेवा के बाद 75% को बाहर करने की योजना के पीछे लोगों की शंकाएं बहुत गहरी हैं।

ऐसा अनुमान किया जा रहा है कि जो 25 प्रतिशत अग्निवीर सेना में लिए जाएंगे वह संभवत संघ की शाखाओं से प्रशिक्षित और निजी सैन्य विद्यालयों में ट्रेंड दिमागी रूप से सांप्रदायिक विद्वेष से भरे हुए अग्निवीर होंगे। जो भारतीय सेना के बुनियादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र को ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। 

पैरा मिलिट्री फोर्सेज पर इसके पूर्व कई बार सांप्रदायिक विद्वेष से काम करने का आरोप लग चुका है जो गृह मंत्रालय के सीधे अधीन आते हैं। अगर सेना के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी तटस्थ चारित्र’ जिसके लिए अभी तक भारतीय सेना दुनिया में विख्यात रही है’ बदल गया तो भारत के तबाह होने की संभावनाएं बहुत ज्यादा बढ़ जायेगी।

किसान आंदोलन

किसान आंदोलन का न्यूक्लियस दिल्ली के इर्द-गिर्द के बड़े भूभाग में था। इसके समर्थन में उत्तर प्रदेश, बिहार तक व्यापक हवा बह रही थी। भूतपूर्व सैनिक “जो पंजाब हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में बहुत बड़ी तादाद में रहते हैं “अगर उन्होंने किसान आंदोलन को अपना खुला समर्थन न दिया होता तो किसान आंदोलन की यह मजबूती ना दिखाई देती।

विश्लेषकों का यह मानना है कि मोदी सरकार अपने विरोधियों के प्रति कभी भी सहिष्णु नहीं रही। मोदी और उनकी टीम प्रतिशोध की आग में हर समय चलती रही है। इसलिए विरोधियों को भौतिक रूप से लेकर चारित्रिक स्तर पर तबाह और बदनाम करने की रणनीति रही है।

किसान आंदोलन के इलाके के व्यापक किसान परिवारों घरों के युवा सेना में जाते हैं। उन्हें दंडित करने और इस क्षेत्र के कृषि से के इतर सैन्य इकॉनामी को बर्बाद करने की मनसा अग्निपथ योजना में छिपी हुई है।

क्वाड और भारत

इस बार क्वाड में भारत के जाने को बहुत महत्वपूर्ण ढंग से प्रचारित किया गया। जो वाइडन द्वारा मोदी की व्यक्तिगत उपेक्षा के बावजूद भारतीय मीडिया अपने चीन विरोधी चरित्र के कारण इसे इवेंट के रूप में प्रचारित करती रही।

कर्नाड की बैठक के पहले अमेरिका ने इंडो पेसिफिक इकोनामिक फोरम की घोषणा की थी । जिसमें अमेरिकी महाशक्ति की आर्थिक और सामरिक दूरगामी रणनीति छिपी हुई है।

क्वाड के देशों में जापान, ऑस्ट्रेलिया सहित प्रशांत सागर के तटीय राज्य में देशों दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, फिलीपींस, न्यूजीलैंड, ताइवान सहित कई देश पूर्णतया अमेरिकी सैन्य शक्ति पर आश्रित हैं। जिनमें से कई तो अर्ध स्वतंत्र देशों की श्रेणी में ही रखे जा सकते हैं।

बांग्लादेश विजय के बाद से ही विश्व बैंक और आईएमएफ तथा अमेरिकी विशेषज्ञों की तरफ से भारत के सैनिकों पर खर्चा को घटाने का दबाव बना हुआ था। संभवतः कर्नाड में छिपे हुए किसी समझौते के परिणाम स्वरुप ही भारतीय सेना की आर्टिलरी सहित सभी सैनिक को बंधुआ और ठेका मजदूर में बदलने का निर्णय लिया गया रहा होगा। जिससे दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर प्रशांत सागर के क्षेत्र में भारत का सैन्य दबदबा कमजोर कर उसे अमेरिकी उंगली पर नाचने के लिए मजबूर किया जा सके।

आमतौर पर दूरगामी दृष्टि रखने वाले विश्लेषक इस बात को लेकर चिंतित हैं। यह कोई हवाई परिकल्पना नहीं है। संघ भाजपा के चरित्र को जो लोग जानते हैं वह इस बात से पूरी तरह से अवगत होंगे कि पिछले 8 वर्षों के शासनकाल में देश के सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को किस तरह से खामोश कर उनके प्रोफेशनलिज्म को तबाह कर दिया गया है।

उदारीकरण और सेना

लंबे समय से भारत के आर्थिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक जीवन में उदारीकरण के प्रभाव गहराई से महसूस किए जाने लगे थे। लगभग सभी संस्थान एलपीजी के दौर में बुनियादी रूप से बदले जा चुके हैं। राजकीय क्षेत्र के उद्योग स्वास्थ्य शिक्षा जैसी संस्थाएं निजी पूंजी और बाजार के हवाले की जा चुकी हैं। तो सेना को हम कितने दिन तक पवित्र गाय समझकर सुरक्षित रख पाएंगे।

राष्ट्रीय एकता-अखंडता का पर्दा

भारतीय सेना एक ऐसा प्रतिष्ठान है जिसमें राष्ट्र की सुरक्षा की आड़ में किसी भी तरह के बदलाव को न ही सार्वजनिक किया जा सकता है ना पब्लिक बहस में लाया जा सकता है ।

मोदी सरकार आने के बाद सीडीएस के पद के सृजन के बाद से ही कयास लगाया जा रहा था की सेना में कुछ बुनियादी बदलाव होंगे। अब यह बदलाव सामने आ गए हैं।

सैनिक भर्ती की प्रक्रिया को बदल कर भारतीय सेना के समर्पण, त्याग और बलिदान के अब तक के इतिहास को ही पलट देने की कोशिश की गई है। जिस कारण से आज भारत के नौजवानों के साथ देश के नागरिक और आमजन दुश्चिंता से भर गए। जो सड़कों पर युवा आक्रोश के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जिसे भाजपा विपक्षी दलों की साजिश बताकर खारिज करने की हताश कोशिश कर रही है।

आशंकाएं और यथार्थ

जैसी की आशंका थी कि भाजपा देश का सैन्यीकरण करना चाहती है। उसके पितामह सावरकर का नारा था ” हिंदुओं का सैन्यीकरण और राजनीति का हिंदू करण करो।”

भारत की संप्रभुता के रक्षा की सबसे सशक्त कस्टोडियन सेना के जवानों के भर्ती में नीतिगत बदलाव के लिए संसद को दरकिनार कर मोदी सरकार ने सेना के तीनों अध्यक्षों और रक्षा मंत्री का उपयोग किया। जिनके द्वारा सैनिकों की भर्ती के लिए नीतिगत घोषणा की गई।

बात स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं यानी संसद की भूमिका और अधिकार को नकारते हुए सैन्य संस्थाओं को सर्वोपरि बनाने का प्रयास। इस बिंदु को निश्चित ही गंभीरता से नोट किया जाना चाहिए। यह 1975 के आपातकाल से भी खतरनाक राजनीतिक संकेत है।

आज जब सरकार की खतरनाक नीति के खिलाफ युवा आक्रोश सड़कों पर भड़क उठा है तो तीनों सेनाध्यक्ष को आगे किया गया है।

19 जून की तारीख भारत के लोकतंत्र के लिए काला दिन कहा जायेगा। जब सेनाओं के अधिकारियों द्वारा नीतिगत फैसलों की घोषणा करते हुए भारत के युवाओं को धमकाने की कोशिश की गई।

जनरल पूरी द्वारा कहा गया कि तुम किसी तरह के आंदोलन प्रदर्शन में भाग लोगे तो तुम्हें सेना में अवसर से वंचित कर दिया जाएगा। पुलिस तुम्हारी जांच करेगी और उसके वेरीफिकेशन के द्वारा तुम्हें सर्टिफिकेट लेनी होगी। इस घोषणा के जरिये सेना का भारत के लोकतांत्रिक राजनीति में प्रवेश सुनिश्चित कर दिया गया है। अभी तक इस तरह के फैसले राजनीतिक संस्थाओं द्वारा लिए जाते थे और उनकी घोषणाएं की जाती रही हैं।

पहली बार संघ भाजपा के सरकार ने सैन्य अध्यक्षों को आगे कर भारत में राजनीतिक फैसला करने की नई परिपाटी शुरू की है। ‘स्पष्ट है कि हम पाकिस्तान के करीब पहुंच गये हैं’। जो भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे खतरे की घड़ी का संकेत है। जो कभी आशंकाएं थीं वह अब यथार्थ हो गया है। संघ और भाजपा ने कभी ईमानदारी से लोकतंत्र को स्वीकार नहीं किया था। सैनिक तानाशाही और सामाजिक गैर बराबरी उनके चिंतन का मूल केंद्रीय बिंदु रहा है।

1 अप्रैल 2022 से शुरू हुआ घटनाक्रम 19 जून 2022 तक पहुंचते-पहुंचते अपना एक चरण पूरा कर चुका है।

उम्मीद की किरण

लेकिन नवरात्रि के विध्वंसक सप्ताह के विपरीत आज वही छात्र नौजवान मोदी सरकार के खिलाफ सबसे बड़े लोकतांत्रिक प्रतिरोध की ताकत बनकर सड़कों पर उतरे हैं। जरूरत है उन्हें संयम और आत्म अनुशासन वद्ध होकर लोकतांत्रिक प्रतिरोध की अभेद्य दीवार के रूप में बदल जाने की।

अपनी मांगों रोटी-रोजगार और लोकतंत्र के लिए गंभीर होने की। भाजपा संघ की राजनीति के बुनियादी चरित्र को समझते हुए आंदोलन को लोकतांत्रिक प्रतिरोध के उच्चतम मूल्यों के साथ समायोजित करते हुए टिकाऊ जन आंदोलन विकसित करने की।

लगता है अप्रैल और मई का अंधकार भरा दौर समाप्त हो रहा है। भारतीय युवा भारत के लोकतांत्रिक जन गण के साथ एकता बद्ध होते हुए लोकतंत्र का परचम उठाये संघी फासिस्ट तानाशाही के खिलाफ प्रतिरोध की नई इबारत लिखेंगे।

उम्मीद है भारतीय इतिहास के नाजुक मोड़ पर छात्रों-युवाओं का सड़कों का संघर्ष संसद के संघर्ष तक उन्नत होते हुए भाजपा के फासीवादी निजाम के खतरनाक मंसूबों को नाकाम करेगा और भारतीय धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के परचम को और ऊंचाई तक बुलंद करने में कामयाब होगा।

(जयप्रकाश नारायण राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और आजकल आजमगढ़ में रहते हैं।)

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