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अयोध्या भूमि पूजनः मोदी का नया हिंदुत्व

अयोध्या में पांच अगस्त को राम जन्मभूमि पूजन का कार्यक्रम बिना किसी राजनीतिक विरोध के संपन्न हो गया और भारत का लोकतंत्र, जो पिछले छह सालों से लड़खड़ा कर चल रहा था, थक कर बैठ गया। हिंदू राष्ट्र का एजेंडा कागज से उतर कर जमीन पर आ चुका है और साकार रूप ले रहा है।

यह महज संयोग नहीं है कि धारा 370 को समाप्त करने और कश्मीर में नागरिक अधिकारों को खत्म होने का एक साल इसी दिन पूरा हुआ। यह भी कि नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों को जेल भेजने का काम अभी हाल में ही हुआ है। राम मंदिर के श्लिान्यास को लोकतंत्र के इन टूटते खंभों की कहानी से अलग नहीं देखा जा सकता है। न्यायपालिका से लेकर मीडिया तक के खंभों के कमजोर होने के कारण ही संविधान का इस तरह का सीधा उल्लंघन संभव हुआ है।

कई लोगों को यह लग सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषण संयत थे और सर्वसमावेशी भी। वे अगर गौर से देखेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि प्रधानमंत्री का भाषण किसी ऐसे व्यक्ति का है जो आराम से आपको किस्से सुनाता रहता है और अंत में आपको बताता है कि उसके इरादे क्या हैं। हो सकता है कि वह साफ-साफ ना भी बताए।

भगवान राम के सर्वसमावेशी होने, दुखियों का कष्ट हरने या शांति, करूणा और प्रेम का प्रतीक होने तथा तुलसी, कबीर, नानक से लेकर गांधी के प्रेरणा स्रोत में कुछ नई बात नहीं कही गई है। यह तो देश का निरक्षर आदमी भी जानता है। असली संदेश ‘‘भय बिन प्रीति नहीं होने’’ वाली चैपाई और ‘राम समय के साथ चलते थे’ के कथन में है। यह संदेश राम मंदिर के संदेश को विश्व भर में फैलाने की उस कार्यक्रम की घोषणा में है जो आगे संघ परिवार चलाने वाला है।

अब एक अहंकार से पूर्ण राजनीति की शुरूआत में होगी, जिसमें सब कुछ हंसते हुए किया जाएगा। कुछ लोग इसी से प्रफुल्लित हैं कि प्रधानमंत्री ने देश के धर्म स्थलों के नाम लिए, उसमें जैन, बौद्ध, सिख धर्मस्थलों से लेकर मुसलमानों का अजमेर शरीफ भी शामिल था। प्रधानमंत्री के भाषण को इस भोलेपन से नहीं देखा जा सकता है।

प्रधानमंत्री के भाषण पर भारत को देखने की संघ की दृष्टि की पूरी छाप है। इसमें इतिहास से लेकर वर्तमान की रजनीति शामिल है। राम जन्मस्थली में इमारतों के बार-बार टूटने यानि मंदिर तोड़ने से लेकर जन्मभूमि के मुक्त होने, क्या उस आरोप से भिन्न है जिसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए आरोप बनाया गया?

उनके भाषण में हिंदुओं के हर वर्ग को संतुष्ट करने का मसाला है। इसमें यह भी कहा गया कि न्यायापलिका के फैसले का भी हमने शांति से पालन किया और अभी भी ऐसा ही कर रहे हैं। इसके क्या अर्थ हैं? यह किस आस्था की अभिव्यक्ति है?

इन भाषणों में हिंदुत्व के आंदोलन के नए दौर में प्रवेश के संकेत हैं, जिसमें यह विकास, आधुनिकता की बात करेगा। भाजपा नेता विनय सहस्त्रबुद्धे ने एक लेख में इसका खाका भी बता दिया है कि किस तरह हिंदुओं की व्यापक एकता पर काम किया जाएगा। इसमें यह हिंदुओं की एकता और जातिगत-विद्वेष की बात करेगा। हिंदुत्व के इस नए दौर में स्त्री-पुरूष समानता की बात भी की जाएगी।

यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने ‘जय श्रीराम’ की जगह ‘सियावर राम’ का नाम लिया। कुछ लोगों को लगा कि यह एक शुभ संकेत हैं, लेकिन उन्हें हिंदुत्व के इस फरेब को समझना चाहिए। उनका राम और गांधी के राम एक नहीं हैं और उनका राम राज्य भी गांधी का राम राज्य नहीं है। यह गांधी का समता और सत्य-अहिंसा पर आधारित धर्म नहीं है, जहां सभी धर्मों के मिलने का दर्शन है।

गांधी और कबीर के भगवान राम तथा मोदी के राम का अंतर देखना हो तो मोदी तथा भागवत के इस उद्घोष पर मत जाइए कि राम सबके हैं और सबके दिल में बसे हैं। आपको इसके लिए कोरोना काल में सैंकड़ों लोगों को संक्रमण के खतरे में डाल कर भूमिपूजन और मंत्रों का जाप करते और शुद्ध हिंदू रीति से पूजा करते मोदी, योगी और भागवत को देखना चाहिए। इसकी तुलना क्या गांधी की सर्वधर्म वाली प्रार्थना से की जा सकती है?

यह राम हिदुत्व के राम हैं और जिनका उपयोग धार्मिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। यह आक्रामक राम जन्मभूमि आंदोलन के विजय के बाद का चरण है। कई दंगों तथा हिंसक संघर्षों को जन्म देने वाले इस आंदोलन के खामोश तथा स्थिर हो जाने की कल्पना करना तथ्यों से मुंह मोड़ना होगा।

इसमें राम का उपयेाग सिर्फ बाकी धर्मों के ऊपर हिंदू धर्म को स्थान देने के लिए नहीं किया जा रहा है, बल्कि यह हिंदुओं के बाकी पंथों-शैवों और शाक्तों से लेकर अनेक पंथों की विविधता को खत्म करने का प्रयास है। यह आक्रामक हिदुत्व है जो उस वैष्णव धर्म के भी विपरीत है, जिसके अराध्य पुरुष विष्णु के अवतार राम तथा कृष्ण थे, जिसने भक्ति काल के कबीर, सूरदास तथा तुलसी जैसे श्रेष्ठ कवियों को जन्म दिया तथा उत्तर तथा दक्षिण में लेगों को जोड़ा।

यह रामायण-महाभारत काल के बाद देश में हुए उन धार्मिक बदलावों को नकारने वाला है, जिसने बुद्ध, महावीर से लेकर शंकराचार्य के दर्शन को जन्म दिया। यही नहीं, यह हिदू धर्म में पिछली दो सदियों में हुए दार्शनिक तथा सामाजिक सुधारों के विरोध में है, जिसने एक ओर स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंदो के दार्शनिक चिंतन और दूसरी ओर राममोहन राय से लेकर फुले-पेरियार, आंबेडकर विकृति से मुक्त समाज बनाने के प्रयासों को नकारने वाला है।

हिंदुत्व के इस आयोजन का विरोध इतना कमजोर क्यों हो गया? सेकुलर पार्टियों का बड़ा हिस्सा इसका विरोध करने के बदले रामनाम का जाप क्यों करने लगीं? इसकी वजह तलाशना मुश्किल नहीं है। अगर आप गौर करें तो राम मंदिर के खिलाफ खड़ी होने वाली तमाम पार्टियां आर्थिक नीति के मामले में भाजपा के साथ हैं। वे वैश्वीकरण और उदार आर्थिक नीतियों में यकीन करती हैं। ये पार्टियां कोई भी जनांदोलन खड़ा करने में सक्षम नहीं हैं। इन पार्टियों में सामाजिक न्याय की सारी पार्टियां शामिल हैं।

इस मामले में वामपंथी पार्टियों और दूसरे संगठनों की राय का मीडिया में पूरा ब्लैकआउट किया गया। सीतराम येचुरी, दीपंकर भट्टाचार्य और योगेंद्र यादव से लेकर अनेक नेताओं के बयान से पता चलता है कि भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष खत्म नहीं हुआ है। इन नेताओं ने इस आयोजन का जमकर विरोध किया है। योगेंद्र यादव ने तो इसे विपक्ष का ‘‘राम नाम सत्य’’ यानि मौत तक कह दिया है।

अगर हम गौर करेंगे तो पाएंगे कि अस्सी के दशक में हिंदुत्व को रोकने का काम वामपंथी और सामाजिक न्याय की ताकतों ने ही किया था। उनके कमजोर हेाते ही इसकी लहर चल निकली है। सामाजिक न्याय की पार्टियों ने अवसरवाद को गले लगा लिया है। उनमें एक नए नेतृत्व के उभरने की जरूरत है जो जाति-विनाश की राजनीति करे और एक वैज्ञानिक चिंतन पर आधारित हो। इसे नई आर्थिक पुनर्रचना की चिंता हो।

इसी तरह वामपंथ को अपने को नए सिरे से बदलना होगा। उसे बीसवीं सदी के साम्यवाद का पूंजीवाद के सामने घुटने टेकने का विश्लेषण करना होगा। वे अपनी राजनीति बदल कर ही नई चुनौतियों का मुकाबला कर पाएंगे।

मुसलमानों की निराशा को व्यक्त करने का काम ओवैसी तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने किया है, लेकिन बोर्ड का बयान भड़काने वाला है। बोर्ड उस कट्टरपंथी धारा से अपने को जोड़ना चाहता है जो भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों का पहले ही काफी नुकसान पहुंचा चुकी है।

वे बाबरी मस्जिद आंदोलन के लिए जरूरी समर्थन हासिल नहीं कर सके थे और अब इन बयानों के जरिए अपनी हताशा को दिखाते हैं। हिंदुत्व के खिलाफ एक व्यापक प्रगतिशील राजनीतिक मोर्चा बनाने की जरूरत है, किसी धार्मिक मोर्चा की नहीं। हिंदुत्व सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं पूरे लोकतंत्र के लिए चुनौती है।

(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on August 6, 2020 3:05 pm

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