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Categories: बीच बहस

ऋषिगंगा आपदा: लूट पर टिके तथाकथित विकास की अनिवार्य परिणति

उत्तराखंड में किसी भी आपदा के समय कुछ दिनों तक वहां पर हो रहे तथाकथित विकास के मॉडल पर  बात होने लगती है। ऋषिगंगा में ग्लेशियर टूटने और उसके परिणामस्वरूप आई बाढ़ से हुई जान-माल की तबाही के चलते इस राज्य में विकास के मॉडल पर बात होनी चाहिए। भाजपा की डबल इंजन सरकार या पूर्ववर्ती सरकारों के विकास मॉडल में पहाड़ में इस तरह की तबाहियां,  दैवीय आपदा से ज्यादा कुछ नहीं है।

यह भी सच है कि अपनी भौगोलिक संरचना  और लगातार अनिश्चित जलवायु, बादल फटने से हो रही भारी बारिश से पहाड़ भी टूटेंगे, ग्लेशियर भी दरकेंगे और नदियां भी जलप्लावित होती रहेंगी। अभी राज्य में विकास का मतलब भारी बांधों का निर्माण, जरूरत से ज्यादा लंबी- चौड़ी सड़कों के लिए पहाड़ों को जेसीबी से खोद डालना, पर्यटन विकास के नाम पर शहरों-कस्बों-नदियों के किनारों पर भारी-भरकम अवैध निर्माण, नागरिकों को उसकी जमीनों -चरागाहों – जंगलों से बेदखल कर उन्हें  रिजर्व नेशनल पार्कों, वन्य–जीव अभ्यारण्यों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की विरासत सूची (नंदा देवी बायोस्फीयर/फूलों की घाटी)  बना देना जहां से आम आदमी तो एक लकड़ी घास या पत्थर तक नहीं उठा सकता लेकिन आलीशान रिजॉर्ट, ऋषिगंगा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट जैसे प्रोजेक्ट बनाए जा सकते हैं। कई दूरस्थ गांव अभी भी सीधे सड़क मार्गों से कटे या फिर सड़कें बुरी तरह टूटी हैं। लेकिन विकास का चक्का इस ओर नहीं घूमता वह बड़े बड़े पहाड़ों को काटकर लंबी चौड़ी सड़कें बना रहा है।

जब पहाड़ के साथ यह सब हो रहा है तो एक छोटा साधन संपन्न हिस्सा इस सबको विकास के चमकदार रूप में देखता है। यह वह हिस्सा है जो राज्य के बाहर नौकरी कर रहा है या फिर पहाड़ में अपेक्षाकृत सुविधायुक्त शहरों – देहरादून – हरिद्वार -ऋषिकेश – रूद्रपुर-हल्द्वानी – नैनीताल में रहता है और कुछ दिनों के लिए अपने गांव या फिर तफरीह के लिए निकलता है । पहाड़ की छाती पर बिछी लंबी चौड़ी हाटमिक्स सड़कों पर बिना धक्कों के फर्राटा भरते सवारी करना या फिर लंबी यात्रा के बाद पंचसितारा सुविधाओं से लैस आरामगाहों में आराम करना किसे अच्छा नहीं लगता। पहाड़ों में उपलब्ध इन खुशनुमा सुविधाओं को हम पहाड़ के विकास का मानक मान बैठे हैं और कभी भी इसका विश्लेषण करने की जहमत ही नहीं उठाते हैं कि हमने इस सब को प्रकृति से किस कीमत पर  बनवाया है।

दरअसल आधुनिकता के विचार में ठहर कर किसी प्रश्न पर सोचने या विचार करने की जगह ही नहीं है। जो भी ठहरकर सोचने या विचार करने की कोशिश करता है उसे विकास विरोधी बताकर किसी न किसी रूप में मुख्यधारा से बाहर कर दिया जाता है। इसलिए सबसे सुविधाजनक यही है कि बिना सोचे-समझे लाभ के तालाब में डुबकी लगाते रहा जाय। लेकिन प्रकृति तो यह नहीं सोचती। अपने पूंजीपरस्त लालच के लिए सत्ता जितना उसका दोहन करेगी उसका आक्रमण उतना ही तीखा होगा।यह विश्व के स्तर पर होते हुए हम देख रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से लेकर कोविड तक इसके अलग अलग रूप हैं। ग्लेशियरों का टूटना , नदियों में आकस्मिक बाढ़, सूखा, जानवरों का खेती पर हमला उसे तहस नहस करने जैसे विभिन्न  रूप वही हैं।

तब यह स्वाभाविक तर्क आता है कि इस सब भय के कारण विकास के सारे उपाय – सड़क – बिजली – पानी आदि – आदि ऐसे ही छोड़ दिए जाएं। उत्तर है कतई नहीं, बेहतर से और बेहतर की ओर जाना मानव की स्वाभाविक प्रकृति है। वह जाएगा, लेकिन बेहतर से और बेहतर का रास्ता  किस कीमत पर और किसके लिए होना चाहिए। इस तबाही के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का बयान है कि इस आपदा को विकास के खिलाफ प्रोपेगंडा का कारण ना बनाएं।

मुख्यमंत्री यह कहते हुए राज्य में किस विकास की बात कह रहे हैं? वास्तव में आम जन के हिस्से का विकास जिसमें रोजी-रोटी- रोजगार से लेकर सहकारी खेती – बागवानी – स्वास्थ्य – बिजली – पानी  को लेकर जनपक्षीय नीति और उसके क्रियान्वयन का इंतजार ही कर रहा है और इस इंतजार में उसका अपना परंपरागत सुविधाएं – जैविक खेती – बीज -घराट – परंपरागत जंगल जिन्हें और परिष्कृत और विकसित करने की जरूरत थी उसे खत्म कर दिया गया। एक अध्ययन के मुताबिक पहाड़ों में झरनों तथा नालों से चलने वाले आटा पीसने की चक्कियों (पनचक्कियों) के साथ अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके इनसे 200 से 500 आबादी वाले एक पूरे गांव के लिए बिजली का उत्पादन किया जा सकता है, मगर निजी क्षेत्र के लिए लालची मुनाफे का करोबार और सरकारी उपेक्षा तथा अत्याधुनिकता की चकाचौंध में पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक पनघटों का अस्तित्व मिट सा गया है।

इसकी जगह यह जरूर हुआ कि विकास के लिए निजी घरानों को राज्य के सारे संसाधन – जंगल – नदियों – जमीनों को  बड़े बांध – हाइड्रो प्रोजेक्ट के हवाले कर दिया गया और पर्यटन विकास के नाम पर बड़े ऐशगाहों के रूप में जमीनों – बगीचों – नदियों के किनारे के बड़े – बड़े हिस्से सौंप दिए गए हैं। यही विकास है जो प्रकृति के साथ – साथ आम आदमी को लील रहा है और सेठों की तिजोरी भर रहा है। लगातार एक अंतराल में हो रही दुर्घटनाओं और उससे हो रहे जान-माल के नुक़सान को दैवीय आपदा के चश्मे से देखने की सबसे बड़ी सुविधा शासकों के लिए यह है कि वह पूरे मामले में अपनी जिम्मेदारी से बच निकलता है और उसके संरक्षण में जल-जंगल-जमीन की लूट का खुला खेल जारी रहता है जिसके परिणामस्वरूप राज्य के किसी हिस्से में फिर से तबाही की पृष्ठभूमि तैयार होती है।

ऋषिगंगा में आई बाढ़ क्या आकस्मिक थी, यदि थी भी तो क्या उससे बचा जा सकता था या भविष्य में इस तरह की आपदाओं से  बचने के उपाय किए जा सकते हैं। मैं जानता हूं तथाकथित देवभूमि में भक्तों का बड़ा हिस्सा इससे इंकार करेगा। पहाड़ के पारिस्थितिकीय तंत्र के जानकार इस बात को मानते हैं कि ग्लेशियरों का खिसकना या टूटना एक सतत प्रक्रिया है लेकिन ऋषिगंगा में उसके साथ आई भयावह बाढ़ सिर्फ ग्लेशियर के टूटने भर से नहीं आई  होगी, संभवतः टूटने के कुछ समय तक पानी अवरूद्ध रहा और फिर उसके बढ़ते जलजमाव  ने इसे तोड़ा जो एक बड़े जलप्लावन के रूप में बदल गया।खैर सच्चाई जो भी हो कुछ समय के बाद अध्ययन से सामने आ जाएगी। लेकिन आज के दौर में उपग्रहों के माध्यम से जमीन के चप्पे-चप्पे पर नज़र रखने के लिए तकनीक मौजूद है। हम किसी भी संवेदनशील निर्माण से पहले उससे उत्पन्न खतरों को कम करने की योजना क्यों नहीं बना पाते?

क्या ऐसा करके हम अपने नागरिकों को किसी भी संभावित आपदा से बेहतर सुरक्षा नहीं दे सकते? हां यह अवश्य है कि इसमें पूंजी और सतत सतर्कता की जरूरत होगी, जो आम आदमियों के नाम पर बनी खास लोगों के लिए काम करने वाली सरकारों का एजेंडा कभी नहीं बनेगा। इसीलिए पहाड़ में बन रही किसी भी योजना में नागरिकों या पारिस्थितिकीय तंत्र की सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाता है न ही उस अनुरूप योजनाएं बनती हैं। क्या यह सच्चाई नहीं है कि उत्तराखंड के भीतर बन रही पंचेश्वर जैसी बड़ी छोटी सैंकड़ों परियोजनाओं और चार – धाम यात्रा मार्गों के निर्माण जैसी तथाकथित विकास योजनाओं को लगभग सभी वैज्ञानिक रिपोर्टों ने पहाड़ के लिए प्रतिकूल ही माना है, बावजूद इसके जब धड़ल्ले से ये योजनाएं बनती हैं तो इसकी जवाबदेही किस पर आयद होती है। वैज्ञानिक रिपोर्ट क्षेत्र की विशेष नाजुक पारिस्थितिकीय स्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपनी असहमति व्यक्त करती आई हैं और सरकारें  अपने लूट पर टिके तंत्र के लिए सारी बाधाओं को धता बताते हुए लूटने की खुली छूट दे देती हैं। इसके बाद परिणाम सामने होता है।

(गिरिजा पाठक ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय संयोजक हैं और उत्तराखंड से जुड़े हुए हैं।)

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This post was last modified on February 10, 2021 10:03 pm

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