Monday, October 18, 2021

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गुजरात से भी आगे का प्रयोग है दिल्ली

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कल लोकसभा में दिल्ली दंगों पर हुई बहस के दौरान गृहमंत्री अमित शाह का दिया गया भाषण एक सफेद झूठ को सच साबित करने का ज़िंदा सबूत है। यह गुजरात मॉडल से इस रूप में आगे बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ पीड़ितों को ही आरोपी के तौर पर पेश कर देने की कोशिश की गयी है। दरअसल इसकी एक ज़रूरत भी है क्योंकि यहां कोई गोधरा नहीं हुआ है और न ही अल्पसंख्यकों ने कोई हमलावर रुख़ अपनाया है।

लिहाज़ा न तो क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम यहां काम आएगा। और न ही अल्पसंख्यकों पर सीधा इसका दोष मढ़ा जा सकता है। लिहाज़ा यहां एक दूसरा रास्ता निकाला गया है। ख़ुद हमले करके दोष दूसरे के सिर मढ़ देना। यही इसकी प्रमुख मोडस आपरेंडी है। अमित शाह की पूरी स्पीच कल इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही। शाह ने उस सच को भरे सदन में स्वीकार कर लिया जिसकी चर्चा अभी तक हवाओं में थी। उन्होंने कहा कि 300 लोग बाहर यूपी से आए थे। और पूरा मामला पूर्व नियोजित था। लेकिन शाह की यह बात आधी सच है। 

इस बात में कोई शक नहीं कि हमला पूर्व नियोजित था और लोग बाहर से भी आए थे। लेकिन शाह जिसकी तरफ़ इशारा कर रहे हैं वह सच नहीं है। सच्चाई यह है कि यह दंगा नहीं बल्कि पूर्व नियोजित कार्यक्रम था जिसे संघ और बीजेपी सरकार ने मिलकर संचालित किया। नहीं तो ढाई हज़ार से ऊपर गिरफ़्तारियाँ करने वाली दिल्ली पुलिस को ज़रूर यह बताना चाहिए कि जब दंगाई क़ब्ज़ा कर सड़कों को रौंद रहे थे तब उनके जवान क्या कर रहे थे?

एक नहीं ऐसे हज़ार वीडियो मिल जाएंगे जिनमें पुलिस या तो मूक दर्शक बनी हुई थी या फिर दंगाइयों का खुलकर साथ दे रही थी। और कई जगहों पर ऐसा हुआ कि दंगाइयों को अल्पसंख्यक बहुल बस्तियों के अंदर भेजने या उनको सुरक्षित निकालने में पुलिस ने अहम भूमिका निभायी। दसियों ऐसी रिपोर्टें आयी हैं जिनमें मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को यह कहते सुना गया है कि पुलिस ने किस तरह से छुपे स्थान से बाहर निकालकर उन्हें दंगाइयों के हवाले किया। या फिर पुलिस ने सीधे निशाना बनाकर उन पर गोलियाँ दागीं।

किसी भी दंगे का सच यही है कि अगर पुलिस चाह ले तो वह एक दिन से आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन यहाँ अगर लगातार 36 घंटे पूरा इलाका दंगाइयों के क़ब्ज़े में रहा तो ऐसा बग़ैर पुलिस की मिलीभगत के संभव नहीं था।

एक प्रोग्राम को पहले दंगा कहा गया और अब उसे अल्पसंख्यकों के मत्थे मढ़ने की साज़िश शुरू हो गयी है। यह सब कुछ सरकार और उसकी पालतू मीडिया के जरिये संभव कराया जा रहा है। ढाई हज़ार से ऊपर हुई गिरफ़्तारियों में 99 फ़ीसदी के आस-पास मुसलमानों का होना इसी बात की गवाही है। यह कुछ ऐसा ही कहने जैसा है कि मुस्लिमों ने षड्यंत्र रचा और उन लोगों ने ख़ुद ही हमला करके अपने घरों और दुकानों को जला लिया और छह बड़ी मस्जिदों को आग के हवाले कर उन्हें तहत नहस कर दिया।

अमित शाह को ज़रूर इस बात का जवाब देना चाहिए कि अगर हमलावर अल्पसंख्यक समुदाय से थे तो सबसे ज्यादा मौतें मुस्लिमों की ही क्यों हुईं। दुकानें और मकान उन्हीं के क्यों जले? इबादतगाहें उनकी ही क्यों नष्ट हुईं? ‘दंगा ग्रस्त’ इलाक़े में एक भी हिंदू का मकान या फिर उसकी दुकान जली नहीं पायी गयी। एक भी मंदिर को क्षति नहीं पहुंची। अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में रहने वाले न केवल सारे हिंदू बल्कि उनके मंदिर भी पूरी तरह से सुरक्षित रहे। जगह-जगह ऐसी जगहों पर अल्पसंख्यकों द्वारा मंदिरों की रक्षा के लिए रात-रात भर पहरे दिए जाने की रिपोर्टें आयी हैं।

आज ही इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट है मुस्लिम बहुल मुस्तफाबाद के भीतर 10 हिंदू परिवारों और उनके मंदिर की रात-रात भर जग कर रक्षा करने वाले 45 वर्षीय उस्मान सैफी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इलाक़े के हिंदू परिवारों और मंदिर के पुजारी ने उनको रिहा करने के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट में अर्ज़ी दी है। या तो यह मान लिया जाए कि अपनी संपत्तियों का ख़ुद मुस्लिम समुदाय ने ही नुकसान कर लिया है। या फिर उनको भूत ने जला और तहस-नहस कर डाला। अगर ऐसा नहीं है तो फिर गिरफ़्तारियां 99 फ़ीसदी मुसलमानों की ही क्यों हो रही हैं? 

शाह किस स्तर पर पूरे मामले को लेकर पक्षपाती हैं इसका एक दूसरा उदाहरण भी दिखा जब उन्होंने दंगे की जिम्मेदारी उसके पहले होने वाले वारिस पठान और उमर ख़ालिद तथा विपक्षी नेताओं के भाषणों के मत्थे मढ़ दी। लेकिन इस पूरी क़वायद में वह कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा का नाम भूल गए। उनके मुताबिक़ वारिस पठान महाराष्ट्र से दंगों को प्रभावित कर लिए लेकिन दिल्ली में चुनाव से ठीक पहले दिए गए बीजेपी नेताओं के जहरीले भाषण किसी भी रूप में उसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं।

जहां तक वारिस पठान के भाषण की बात है तो शाह को ज़रूर यह बात बतानी चाहिए कि शरजील इमाम के ख़िलाफ़ छह-छह राज्यों में एफआईआर दर्ज कर उसकी गिरफ़्तारी करने वाली पुलिस ने वारिस पठान को क्यों खुला छोड़ दिया। इसका जवाब पूरे देश को पता है। क्योंकि वह मोदी एंड शाह कंपनी के इशारे पर काम करता है। क्योंकि उसे अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ चलाया जा सकता है। क्योंकि उसे देश में हिंदू-मुस्लिम विभाजन को तेज़ करने के लिए ही पाला-पोसा गया है। लिहाज़ा अपने आदमी को भला कैसे सज़ा दी जा सकती है?

अमित शाह ने कहा कि वह लगातार नॉर्थ ब्लॉक में बैठकें कर रहे थे। लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिए कि उसका नतीजा क्या निकला। गृहमंत्रालय की नाकामी किसी एक स्तर पर नहीं हुई है। साज़िश थी तो इंटेलिजेंस क्या कर रही थी? जब वहां ईंट-पत्थर और कतलियाँ ढोई जा रही थीं तो पुलिस क्या कर रही थी? दंगे शुरू होने के बाद कर्फ़्यू लगाने में देरी क्यों हुई? और अगर मामला दिल्ली पुलिस से संभल नहीं रहा था तो उसे सेना के हवाले क्यों नहीं किया गया? लेकिन दरअसल ऐसा कुछ करना ही नहीं था। क्योंकि इस दंगे का नियोजन लुटियन की बिल्डिंग में ही किया गया था। और इस काम को अंजाम पूरी बीजेपी और आरएसएस की मिलीभगत से दिया गया था। नहीं तो अमित शाह को ज़रूर इस बात को बताना चाहिए कि सबसे ज्यादा तमंचे हिंदू बहुल इलाक़ों में ही क्यों दिख रहे थे। 

हर पाँचवें दंगाई के पास तमंचा था। दंगाई तत्वों के हमले के शिकार हुए जनचौक के पत्रकार सुशील मानव इसके साक्षात गवाह हैं। उन्होंने बताया कि मौजपुर के हिंदू बहुल इलाक़ों में कैसे उन पर हमला करने वाले छह से ज़्यादा तत्वों के हाथों में तमंचे थे। आख़िरकार ये तमंचे कहां से आए? आम तौर पर दंगों में अब तक तलवारें दिखती रही हैं। यह पहला दंगा है जिसमें तमंचों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। अमित शाह को अपनी पुलिस से ज़रूर पूछना चाहिए कि इलाक़े के मुख्य मार्ग पर क़ब्ज़ा किए दंगाइयों पर उसने कितनी गोलियाँ चलायीं। सैकड़ों ऐसे वीडियो सामने आ चुके हैं जिनमें दंगाइयों के साथ पुलिस के जवानों ने गलबहियां कर रखी हैं।

और अब यह पूरा मामला एक दूसरे चरण में पहुंच गया है। यह जमात अब हिटलर के नाजी प्रयोग को भारत में दोहरा रही है। जिसमें नाजियों द्वारा किए गए दंगों की भरपाई यहूदियों से वसूली के ज़रिये की जाती थी। नाजियों द्वारा जलायी गयी दुकानों और मकानों का जुर्माना यहूदियों पर ही ठोक दिया जाता था।

इसी प्रयोग को अब यूपी में योगी सरकार लागू कर रही है और कल संसद में अमित शाह ने राजधानी दिल्ली में इसको लागू करने की घोषणा की है। लिहाज़ा यह किसी योगी और अमित शाह की नहीं बल्कि आरएसएस की योजना का हिस्सा है। जिसे लागू करने के लिए योगी और शाह को निर्देशित किया गया है।

यह पहला मौक़ा होगा जब संसद का इस्तेमाल किसी झूठ को स्थापित करने के लिए किया जाएगा। अभी तक कम से कम सरकारें तथ्य, तर्क और प्रमाणों के ज़रिये नतीजों पर पहुँचती रही हैं। लेकिन अब इन सारी चीजों का इस्तेमाल झूठ को गढ़ने और उन्हें स्थापित करने के लिए किया जाएगा। और ऐसा हो भी क्यों नहीं जो लोग साज़िशों के सूत्रधार रहे हैं अगर हम उन्हीं से न्याय की उम्मीद करें तो इससे बेमानी बात कोई दूसरी नहीं हो सकती है। यह उनसे कुछ इसी तरह की अपेक्षा होगी कि सत्ता का सारा निज़ाम छोड़कर वह ख़ुद को फाँसी पर चढ़ा लें।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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