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Tuesday, September 28, 2021

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हमें प्रगतिशील भारत चाहिए या अंधविश्वासी भारत ? एक निष्पृह व निर्भीक समीक्षा

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आज वास्तव में इस देश में रहकर यह विश्वास करना कठिन होता जा रहा है कि हम भारत के लोग क्या वास्तव में इक्कीसवीं सदी के ज्ञान-विज्ञान के अंतरिक्ष युग में जी रहे हैं या हम आज से दस-बीस हजार साल पूर्व के बर्बर, आदिम प्रस्तर युग और कबीलाई समाज में जी रहे हैं ? इस देश में हर जगह जाहिलों, मूर्खों, मूढ़ों, अंधभक्तों और अंधविश्वासियों का वर्चस्व होता जा रहा है। भारतीय समाज आज इतना जाहिल, दब्बू और डरपोंक हो गया है कि यहाँ सार्वजनिक तौर पर सच को सच कहने को कोई राजी नहीं है। भारतीय समाज के प्रोफेसर्स और डॉक्टर्स तथा एस.एम.कलबुर्गी, गौरी लंकेश, नरेन्द्र दाभोलकर और गोविंद पानसारे जैसे प्रगतिशील और अंधविश्वास के खिलाफ सच बोलने और लिखने वाले इस देश के सपूतों को दिनदहाड़े दक्षिणपंथी अंधविश्वास समर्थक गुंडों द्वारा वर्तमान समय के सत्ता के अत्यंत क्रूर, निर्दयी, जालिम, फॉसिस्ट, अलोकतांत्रिक और तानाशाही प्रवृत्ति के सत्ता के कर्णधारों के गुप्त इशारे पर मौत के घाट उतार कर इस देश के प्रगतिशील और जागरूक लोगों को धमकाने और भयभीत करने की जोरदार लगातार कोशिशें हो रही हैं, इसके अतिरिक्त इन हत्या करने वाले हत्यारों की आलोचना करने वालों को भी आजकल उन्हें सत्ताधारी वर्ग के बड़े नेताओं द्वारा एक नई गाली अर्बन नक्सली कहकर उन्हें अपमानित किया जाता रहा है।

आज इस देश की वास्तविकता और कटु सच्चाई यह है कि आज इस देश को कुछ गिने-चुने दंगा फैलाने व करवा कर हत्या करने वाले सत्ता के उच्च शिखर पर पहुंच कर इस देश की अधिकतर मिडिया, यहाँ के समाचार पत्रों, पुलिस तंत्र, चुनाव आयोग, मिलिट्री के कुछ उच्च अधिकारियों, न्यायपालिका के कुछ जजों, फिल्म जगत के कुछ नामचीन हस्तियों आदि को डरा-धमकाकर, खरीद कर, प्रलोभन देकर सच पर पर्दा डालने के लिए पाल रखे हैं। एक तरह से पूरा देश ही इनका बंधक बनकर रह गया है। कुछ लोगों या उनके संगठनों द्वारा इस देश की हक़ीक़त या सच्चाई बताने की हिम्मत किया जाता है तो उक्त तरह के सरकार के पालतू लोगों और सत्तारूढ़ सरकार के कर्णधारों द्वारा गठित आईटीसेल के अशिष्ट गुँडों द्वारा उन लोगों पर जबर्दस्त अभद्र, अमर्यादित, अश्लील और गाली-गलौज की भाषा में निर्मम तरीके से आक्रमण कर दिया जाता है, जिसमें सत्ता पक्ष का भरपूर समर्थन रहता है। उदारणार्थ अभी पिछले दिनों मॉब लिंचिंग मामले में देश के प्रधानमंत्री जी को संयुक्त रूप से एक चिट्ठी लिखने पर कुछ बुद्धिजीवियों के एक समूह की खूब छीछालेदर की चुकी है।

पिछले दिनों मॉब लिंचिंग के तहत कथित गो-रक्षक बने गुंडों द्वारा पालतू और दुधारू पशुओं के गरीब व्यापारियों की जिस प्रकार सुनियोजित ढंग से सरेआम दिन में भीड़ भरी सड़कों पर हत्याएं की जा रहीं हैं, वे भी इसी सोची-समझी, कुटिल रणनीति का ही एक हिस्सा है कि समाज में एक संदेश जाए कि हम किसी की, कहीं भी, हत्या कर सकते हैं, तथा राजस्थान में पहलू खां की निर्मम हत्या और भारतीय पुलिसिया तंत्र के भ्रष्ट जांच अधिकारी के कुकृत्यों को सारा देश देख चुका है और झारखण्ड तथा अन्य अनेक जगहों पर जय श्रीराम बोलने को बाध्य करके बजरंग दल के गुंडों द्वारा अल्पसंख्यकों की जा रही बर्बर और जघन्य हत्याएं भी इस देश के वासियों को डराने-धमकाने की रणनीति का ही एक हिस्सा है।

प्रश्न है कि ये कथित गो-रक्षक और उनके आका अगर वास्तव में गायों के प्राणों की रक्षा करना चाहते हैं तो पिछले दिनों इन्हीं के संगठनों द्वारा संचालित गौशालाओं में कुव्यवस्था से हजारों की संख्या में गायें भूखी-प्यासी क्यों मर गईं ? उन पर इनको तरस क्यों नहीं आई ? अगर मान भी लिया जाए कि मुसलमान गोमांस खाते हैं और वे उस हेतु गायों की हत्या करते हैं तो गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों में जिस बड़ी संख्या में गायों को बीफ के लिए उनकी हत्याएं की जातीं हैं, इसके अतिरिक्त भारत आज दुनिया के सबसे बड़े मांस निर्यातक देश के रूप में ब्राजील को पीछे छोड़कर प्रथम स्थान पर विराजमान कराने में श्रीमान् मोदी को ही श्रेय जाता है, जो ये उपलब्धि वे अपने प्रथम शासनकाल में भारत को दिलवा चुके हैं, उन पशु वधशालाओं में एक-दो, आठ-दस नहीं एक ही दिन में हजारों निरीह गायों की निर्ममता से हत्या करने वाले भारत के सबसे बड़े चारों वधस्थल या स्लॉटर हाउस हिन्दूओं के ही हैं।

इन गोरक्षकों को वहां जाकर गायों की इतनी बड़ी संख्या में हो रही हत्या से उन्हें बचाया जाना चाहिए। सबसे पहले तो उन गायों के सबसे बड़े हत्यारों की निरपराध पहलू खां की तरह सड़क पर घसीट-घसीट कर, पीट-पीटकर हत्या करनी चाहिए, वहां इनकी गायों के प्रति करूणा, दया और गोमाता प्रेम कहाँ चला जाता है ? हक़ीक़त यह है कि इन्हें गाय से प्रेम नहीं है, वह तो एक बहाना है इनका मुख्य उद्देश्य है समाज में एक धार्मिक वैमनस्यता पैदाकर धर्मांध हिन्दुओं के वोट की फसल काटनी है। वास्तविकता यह है कि सत्ताधारियों के लिए गोरक्षा करना इनका एक स्टंट मात्र है वे अपने पालतू बजरंग दल के गुंडों से अल्पसंख्यकों को एक दहशत में रखने की सुनियोजित चाल मात्र है।

ये वर्तमान सरकार इस समाज में अशिक्षा, धर्मांधता, कूपमंडूकता और गरीबी की बैशाखी का प्रयोग कर भारतीय समाज को पुनः जाति आधारित, ऊंच-नीच, भेदभावपूर्ण, दकियानूसी और अंधविश्वासी प्राचीन काल के मनुवादी संस्कृति में बदलना चाह रहे हैं, ताकि जन्म आधारित कथित उच्च जातियों को बगैर किसी प्रतिभा और मेहनत के इस समाज में, इस सरकार में प्रतिष्ठा, पद और पैसा आदि-आदि सब कुछ आसानी से सुलभ होता रहे, मोदी की सरकार ने इस दिशा में कार्य करना भी शुरू कर दिया है यथा बड़ी नौकरियों जैसे आईएएस, सुप्रीमकोर्ट में जजों आदि में कथित बड़ी जातियां पहले से ही कब्जा जमाए बैठीं हैं, अब सचिव स्तर के अधिकारियों की नियुक्ति बगैर किसी परीक्षा और इंटरव्यू के रखने का सिलसिला भी मोदी राज में शुरू हो चुका है, उसमें निर्विवाद रूप से उन्हीं लोगों के मित्रों, परिजनों और रिश्तेदारों का चयन होगा जो सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं।

कितनी आश्चर्यजनक बात है कि भारत का प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से जानबूझकर अतार्किक और अंधविश्वास पूर्ण बातें मसलन हमारे देश में प्लास्टिक सर्जरी लाखों साल पहले से होती आई है। मानव बच्चे के सिर कटी गर्दन पर हाथी के बच्चे का सिर जोड़ देने मतलब गणेश की परिकल्पित कल्पना का उदाहरण देना, बादलों के पीछे रॉडार का काम न करना आदि-आदि। हाईकोर्ट के एक जज का यह मूर्खतापूर्ण कथन कि मोर के आँसुओं से मोरनी गर्भवती हो जाती है, जालंधर विज्ञान कांग्रेस में एक चमचा वैज्ञानिक का यह कथन कि रावण की सेना में कई आधुनिकतम विमानों के स्क्वाड्रन थे आदि-आदि ये बयान अनजाने में नहीं इस समाज को मूर्ख बनाने के लिए जानबूझकर दिए जा रहे हैं। आज देशहित में भारत के बेरोजगार नवयुवकों को रोजगार देना देश और इस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से काँवड़ यात्रा के नाम पर भारत के धर्मभीरु नवयुवकों को गुमराह करने की जोरदार और सुनियोजित ढंग से इस सरकार और उनके कुछ शातिर बुद्धिजीवियों की तरफ से भरपूर प्रयास करके इस देश को उलटी दिशा में भ्रमित कर सफलतापूर्वक घुमाया जा रहा है।

आज यह हम सभी प्रबुद्ध भारतीयों को यह जबरदस्ती घूँट पिलाया जा रहा है कि प्राचीनकाल के लिखे वेदों, उपनिषदों, पुराणों आदि में बहुत वैज्ञानिक बातें लिखी हुईं हैं। कहा यह भी जा रहा है कि आज की वैज्ञानिक प्रगति हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा अविष्कृत उपकरणों से कतई बेहतर नहीं हैं। अभी एक विडिओ वाइरल हुई है जिसमें कुछ गुंड़े तत्व नारे लगा रहे हैं कि भारतीय संविधान हमारे अधिकार छीनने का काम किया है, इसलिए इस भारतीय संविधान को जला दो। भारतीय संविधान को नष्ट कर दो और माचिस से भारतीय संविधान को जलाते हुए वे गुंड़े दिख भी रहे हैं।

सबसे बड़ी हतप्रभ और दुःख की बात यह है कि मोदी एंड कंपनी सरकार को कुछ गुँडों के समूह द्वारा किए जा रहे इस जघन्यतम अपराधिक और देशद्रोही कुकृत्य में कहीं कुछ गलत नहीं दिख रहा है। यह ऑकस्मिक नहीं हो रहा है यह जानबूझकर किया जा रहा है, ताकि जाति आधारित कथित मनुस्मृति संविधान को स्थापित कर इस देश में जातिगत ऊंच-नीच, अस्पृश्यता, छूआ-छूत को लागू करने का घृणित व्यवस्था लागू हो सके, क्योंकि हिन्दू धर्म जातिगत वैमनस्यता, छुआछूत, भेदभाव के दुराग्रह से ही अपनी सांस लेता है। हमें अब सोचना ही होगा कि हमें भविष्य का कैसा भारत चाहिए, वैज्ञानिक सोच सम्पन्न प्रगतिशील भारत या अंधविश्वास और अधम और दुष्ट मनु के बनाए कथित मनुस्मृति के अनुसार जाति आधारित पाखण्डी भारत।

(निर्मल कुमार शर्मा पर्यावरणविद हैं और आजकल गाजियाबाद में रहते हैं।)

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