बढ़ती जनसंख्या का डर: असलियत और फसाना

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आधा ज्ञान या आधी जानकारी हमेशा ही खतरनाक साबित होती है। 2021 की जनगणना तक करने में फिसड्डी साबित हो चुकी मोदी सरकार की इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की तरफ से चुनावों  के ऐन बीच जारी आंकड़े शायद यही कहानी कहते हैं। इस रिपोर्ट के जरिए 1951 से 2021 के कालखंड के दौरान विभिन्न समुदायों की आबादी में हुए परिवर्तनों के आंकड़े पेश किए गए, जिसमें हिन्दुओं, जैनियों तथा अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी मे कुल गिरावट देखने को मिली है, जबकि मुसलमानों की आबादी बढ़ी है। और इस रिपोर्ट को लेकर सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ताओं ने तथा मुख्यधारा के गोदी चैनलों ने जनसंख्या का हौवा दिखाते हुए बहस भी छेड़ने की कोशिश की थी।

पीटीआई की तरफ से जारी यह आंकड़े इस प्रकार थे:

वर्ष 1951 से 2015 के बीच जहां हिन्दुओं की आबादी में 7.8 फीसदी की घटोत्तरी हुई वहीं मुसलमानों की आबादी 43.1 फीसदी बढ़ी। अगर हम आंकड़ों का ब्रेकअप करें तो 1950 में जहां आबादी में हिन्दुओं की तादाद 84.68 फीसदी थी तो वह 2015 में 78.06 फीसदी तक पहुंची थी , जबकि मुसलमानों की आबादी जहां 1950 में कुल आबादी का 9.84 फीसदी थी तो 2015 में वह 14.09 फीसदी तक पहुंची। भारत के जैन समुदाय के बारे में भी बताया गया कि उनकी आबादी देश की कुल आबादी के 0.45 फीसदी से लेकर 0.36 फीसदी तक कम हुई है।

पुराने आंकड़े-नया रंगरोगन ?

सबसे पहली बात यह है कि इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की तरफ से जारी इन आंकड़ों  में नया कुछ नहीं है। 2011 तक जो जनगणना का सिलसिला विधिवत चला है, उसके बाद यह आंकड़े पहले से ही चर्चा में रहे हैं। उदाहरण के लिए अगर हम हाल में ही प्रकाशित किताब ‘लव जिहाद एण्ड अदर फिक्शन्स: सिम्पल फैक्टस टू काउंटर वायरल फाॅल्सहुडस’ को पलटें  जिसके लेखक अग्रणी पत्राकार श्रीनिवास जैन, मरियम अलवी तथा सुप्रिया शर्मा रहे हैं, तो उसमें यह आंकड़े आप को मिल जाएंगे।

कहने का अर्थ यह है कि कि ऐन चुनावों  के ऐन बीच-जबकि खुद प्रधानमंत्राी मोदी मुसलमानों को लेकर जगह जगह दिए गए अपने विवादास्पद बयानों के लिए सुर्खियों में है, विपक्षी पार्टियों ने इसे लेकर चुनाव आयोग से शिकायत भी की है, तथा अदालतों की भी शरण ली है, उस समय इन पुराने आंकड़ों को जारी करना एक खास माहौल बनाने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है।
राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने ठीक कहा है कि जो सरकार 2021 की जनगणना तक नहीं कर सकी, उसकी एक सलाहकार समिति द्वारा ऐसे आंकड़ों को जारी करना, एक गैरजिम्मेदारी का काम है।

पाॅपुलेशन फाउण्डेशन आफ इंडिया-जो विगत आधी सदी से अधिक समय से जनसंख्या के स्वास्थ्य और विकास रणनीतियों की बात करता रहा है, उसकी तरफ से यही कहा गया कि इनके आधार पर खास समुदायों के खिलाफ डर और भेदभाव की स्थिति पैदा करना निहायत गलत है। (https://www.telegraphindia.com/elections/lok-sabha-election-2024/a-myth-stalking-muslims-busted-questions-over-pm-panel-data-on-minority-population/cid/2018764)

इस मसले पर रोशनी डालते हुए उसने दो अहम पहलुओं  की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की:

एक, प्रजनन दर / फर्टिलिटी रेट ; दो, जनगणना के आंकड़ों से साबित होता सत्य

फाउंडेशन का कहना था कि प्रजनन दर हमेशा ही शिक्षा और आय के स्तर से बेहद करीबी से जुड़ी होती है, न कि धर्म से। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य जहां शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक आर्थिक विकास सुगम है वहां पर सभी धार्मिक समूहों में कुल प्रजनन दर कम दिखती है। जनगणना के आंकड़ों को उद्धृत करते हुए उसकी तरफ से यह कहा गया कि मुसलमानों की आबादी 1981 से 1991 के दरमियान जहां 32.9 फीसदी से बढ़ी है वहीं 2001 और 2011 के दरमियान यह प्रतिशत 24.6 फीसदी रहा है। और हिन्दुओं में यही आंकड़े 22.7 फीसदी से 16.8 फीसदी रहे हैं। कहने का तात्पर्य अध्ययन और सांख्यिकी के आंकड़ें यही प्रमाणित करते हैं कि जनसंख्या विज्ञान धर्म से तटस्थ होता है, जबकि संकीर्णमना ताकतें उसे अपने पक्ष में करने की कोशिश में रहती हैं। तय बात है कि 2021 की जनगणना के आंकड़े सामने आते तो ऐसे शरारतीपूर्ण ढंग से हौवा बनाने की कोशिश असंभव थी।

प्रजनन क्षमता- धर्म का कोई स्थान नहीं ! 

ध्यान देने योग्य बात है कि ऐसी शरारतपूर्ण कोशिश बार बार सामने आती रहती है। याद कर सकते हैं कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जो इसके पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर पदासीन थे, उन्होंने भी अपने उस कार्यकाल में जनसंख्या को लेकर इस भ्रांति को खूब हवा दी थी। एक तरफ उन्होंने जहां शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर पीड़ित मुस्लिम समुदाय का मज़ाक उड़ाया था कि किस तरह उन्होंने इन शिविरों को ‘बच्चा पैदा करने की फैक्टरियों’ में तब्दील किया है। /2002/ उन्हीं दिनों उनके खिलाफ उन्माद पैदा करने के लिए ‘हम दो हमारे दो ; वह पांच, उनके पचीस’ जैसा भड़काऊ नारा भी खूब उछला था।

दिलचस्प है कि मोदी सरकार के केन्द्र में सत्तारोहण /2014/ के पहले राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा इस मसले को अलग ढंग से उठाया गया था, जिसमें इसी तरह हिन्दुओं की घटती आबादी की बात करते हुए कहा गया था कि उन्हें चाहिए कि वह अधिक बच्चे पैदा करें और परिवार-नियोजन की नीतियो से तौबा करे। उन दिनों देश के एक अग्रणी अख़बार (डीएनए) ने इस मसले पर तमाम विशेषज्ञों से बात की थी। उनका कहना था कि ‘भले ही मुसलमानों का वृद्धि दर हिन्दुओं की तुलना में थोड़ा अधिक है, हकीकत यही है कि विगत कुछ वर्षों में उसमें गिरावट देखी जा सकती है। संघ ने इस मामले में अतिशयोक्ति  का परिचय दिया है और ‘जनसंख्या असन्तुलन’ को लेकर गैरवाजिब चिन्ता प्रगट की है।

जनसंख्या विज्ञान की अन्तरराष्ट्रीय इन्स्टिटयूट के प्रोफेसर अरोकियास्वामी के मुताबिक मुसलमानों में प्रजनन क्षमता की अधिक दर को हम उनके धार्मिक विश्वासों तक सीमित नहीं कर सकते , इस सन्दर्भ में सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों की भी भूमिका होती है, अधिकतर मुस्लिम महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक साधन सुलभ नहीं होते, जैसे कि वह अन्य समुदायों की वंचित महिलाओं के लिए सुगम नहीं होते। केरल एवं जम्मू कश्मीर के मुसलमानों की वृद्धि दर का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह वह हिन्दू समुदाय की औसत वृद्धि दर से कम है जिसे हम उनकी बेहतर शिक्षा एवं बेहतर सामाजिक आर्थिक स्थिति से जोड़ सकते हैं और उन्हीं कारणों से यूपी एवं बिहार जैसे कम विकसित राज्यों में हिन्दुओं की प्रजनन क्षमता अन्यों की तुलना में अधिक है।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के पापुलेशन फण्ड के वरिष्ठ अधिकारी ने एक अलग पहलू को रेखांकित किया: ‘ धर्म से परे ग्रामीण, जनजातीय और गरीब परिवारों में हमेशा ही जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होती है और सभी समुदायों के सम्पन्नों की कम सन्तानें होती हैं।’’

इतिहास के सफे : डर पैदा करने की कोशिश !

वैसे इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस बात को बार बार देखा जा सकता है। बहुत कम लोगों को याद होगा कि बीसवीं सदी की शुरूआत में किन्हीं यूएन मुखर्जी द्वारा लिखित एक किताब आयी थी ‘हिन्दू: ए डाईंग रेस अर्थात एक मरणासन्न कौम’। यह वहीं मुखर्जी थे जिन्होंने बाद में पंजाब हिन्दू महासभा का गठन भी किया। यह किताब इस मामले में क्लासिक कही जा सकती है कि उसने बाद की तमाम किताबों को प्रभावित किया, जिनकी रचना हिन्दू महासभा ने की थी। मोहन राव ‘हिमाल’ पत्रिका के अपने आलेख में बताते हैं कि ‘इस किताब की उन दिनों जबरदस्त मांग रही, जिसे कई बार पुनमुद्रित करना पड़ा था, जिसने हिन्दू साम्प्रदायिकता को निर्मित करने में एवं मजबूती देने में अहम भूमिका निभायी थी।

इस किताब का उच्च जाति के हिन्दू सम्प्रदायवादियों पर विशेष प्रभाव था जो मुसलमानों एवं दलितों में उठ रही अलग प्रतिनिधित्व की मांग के बरअक्स एक एकाश्म/मोनोलिथिक हिन्दू समुदाय को गढ़ना चाह रहे थे। मुसलमानों को लेकर अनापशनाप बातों को उछालने से विविध जातियों में बंटे हिन्दूओं को- जिनमें से कइयों के आपस में दुश्मनाना सम्बन्ध थे – एक मंच पर लाना आसान था।’ /मर्डरस आइडेंटीटीज एण्ड पापुलेशन पेरोनोइया, हिमाल, सितम्बर 2008)

अपने लेख में उन्होंने  बहुपत्नी प्रथा के बारे में भी तथ्य पेश किए थे :

‘‘अन्य तमाम बातों के अलावा इसके जरिए यही कहा जा रहा है कि सिविल कानून के तहत जबकि  हिन्दू एक से अधिक शादी नहीं कर सकते हैं जबकि मुस्लिम चार शादी कर सकते हैं। यह इस बात को उजागर नहीं करता कि आंकड़े यही बताते हैं कि गैरकानूनी दो शादियां या कई शादियों का प्रचलन मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं में ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जिसे बहुपत्नीक शादी कहा जा सकता है उसका प्रतिशत हिन्दुओं में 5.8 है जबकि मुसलमानों में 5.73 है।..इसमें इस बात की भी अनदेखी की जाती है कि हिन्दुओं की तरह मुसलमान भी मोनोलिथ,समरूप समुदाय नहीं हैं, उनमें भी तरह तरह की विभिन्नताएं हैं। केरल और तमिलनाडु के मुसलमान या यूं कहें कि दक्षिण भारत के मुसलमानों के परिवारों की सदस्य संख्या उत्तर भारत के बिहार एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के हिन्दू परिवारों के सदस्य संख्या की तुलना में कम पायी जाती है। स्पष्ट है कि इसमें धर्म की कोई भूमिका नहीं है।’

एक बात ध्यान में रखनी होगी कि सीमित जानकारी एवं अन्तरसामुदायिक अन्तक्र्रिया के कम होते अवसर के चलते जो धारणाएं बनती हैं, उन्हें वास्तविक तथ्यों के जरिए प्रश्नांकित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर ऐसे लोग जो समुदाय विशेष की अधिक प्रजनन क्षमता की बात करते हैं उन्हें मुस्लिम बहुसंख्यक मुल्कों से जुड़े कुछ तथ्य बताए जा सकते हैं: इकोनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली के एक आलेख में आरबी भगत ने लिखा था (फेक्ट एण्ड फिक्शन आन हिन्दुत्व क्लेम्स, सितम्बर 25, 2004)

“लोकप्रिय स्तर पर लोगों के लिए इस हकीकत पर गौर करना या उसे जज्ब़ करना मुश्किल जान पड़ता है जब उन्हें बताया जाता है कि बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया की प्रजनन क्षमता (कुल प्रजनन क्षमता दर 2.6) की दर बहुसंख्यक हिन्दू आबादी वाले भारत की तुलना में (कुल प्रजनन क्षमता दर 3.2) कम है। दरअसल इंडोनेशिया में प्रजनन क्षमता में कमी को परिवार नियोजन पर कारगर अमल, जो मुल्क की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हैं, से जोड़ा जा सकता है। हाल के समयों में बांगलादेश में भी परिवार नियोजन के बढ़ते स्तर ने वहां की प्रजनन क्षमता को में काफी तेजी से कमी दिखाई दी।’’

वैसे अगर हम यहूदी, ईसाई, इस्लामिक या सिंहला मूलवादी/बुनियादपरस्त जनसंख्या विमर्शों को देखें तो उनमें भी हिन्दुत्व के जनसंख्या विमर्श के तत्व मिल सकते हैं। मिस्त्र का मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा संगठन गर्भनिरोधक साधनों का विरोध करता है क्योंकि उसका मानना है कि इससे ‘अनियंत्रित स्त्री यौनिकता’ को बढ़ावा मिलेगा जो इस्लामिक समाज के नैतिक ताने बाने को कमजोर कर देगा। अन्य इस्लामिक बुनियादपरस्त ताकतें भी परिवार नियोजन का विरोध करती हैं, जिनका यह कहना होता है कि मुस्लिम दुनिया को कुन्द करने की यह यहूदियों-ईसाइयों की चाल है।

क्या मुमकिन है जनसंख्या के आंकड़ों पर अलग बहस खड़ा करने की संभावना ?                                                                                                                                                                                
2024 के आम चुनावों के ऐन बीच प्रधानमंत्राी के इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल की तरफ जारी- पहले से मालूम – इन आंकड़ों के जरिए  की जा रही यह गैरजिम्मेदारीपूर्ण कोशिश, याद दिला सकती है वर्ष 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों के ऐन मौकों पर जनगणना के धार्मिक आंकड़ों को इसी तरह पेश करने की ताकि उसके आंशिक निष्कर्षों को सामने लाकर अल्पसंख्यकों की ‘बढ़ती आबादी’ के नाम पर बहुसंख्यकों का ध्रुवीकरण किया जा सके। विडम्बना है कि जनगणना के जाति सम्बन्धी आंकड़ों पर उस वक्त भी चुप्पी बरती गयी थी जिसकी लम्बे समय से मांग हो रही है।

और मीडिया जिसे ‘लोकतंत्र का प्रहरीे’ कहा जाता है उसने भी- चन्द अपवादों को छोड़ दें तो- एक तरह से इसी सुर में सुर मिला लिया था। हालांकि ‘राजस्थान पत्रिका’ के गुजरात संस्करण जैसे चन्द अपवाद भी थे जिन्होंने आबादी में प्रमुख धर्मो के मौजूदा प्रतिशत को बताते हुए इस बात को रेखांकित किया कि ‘मुस्लिमों की बढ़ोत्तरी दर पिछले दशक के मुकाबले घटी’ तो ‘द टेलिग्राफ’ की रिपोर्ट थी ‘सेन्सस नेल्स प्रमोटर्स आफ पैरोनेइया’ अर्थात ‘जनगणना के आंकड़ों ने फर्जी आतंक पैदा करनेवालों पर नकेल डाली’।

उस वक्त एक सार्थक हस्तक्षेप के रूप में 2011 के जनगणना के इन आंकड़ों को देखने की भी कोशिश हुई थी।

1. इस बात को रेखांकित किया गया था कि 2001 की तुलना में 2011 की जनगणना में भारत के छह सबसे बड़े धार्मिक समुदायों में लिंगानुपात की स्थिति बेहतर हुई है, जिसमें सबसे बेहतर सुधार मुसलमानों में / 936 से 951 तक/ जबकि सबसे कम सुधार हिन्दुओं में /931 से 939 तक/ दिखाई देता है।

2. विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिंगानुपात में काफी फरक दिखता है जिसमें सबसे खराब स्थिति सिखों की है जहां एक हजार पुरूषों की तुलना में महज 903 महिलाएं हैं, जबकि ईसाइयों में यह आंकड़ा 1,023 है, अब जहां तक हिन्दुओं की बात है उत्तरपूर्व के कई राज्यों में यह आंकड़ा 900 से कम है।

3. सबसे दिलचस्प आंकड़ा उन लोगों के बारे में है जिन्होंने किसी धर्म के साथ अपने आप को जोड़ने से इन्कार किया है। इसमें नास्तिक हो सकते हैं, तर्कशील हो सकते हैं या किसी संगठित धर्म से दूरी रखनेवाले लोग शामिल हो सकते हैं। यह भी नोट करनेलायक है कि 2001 की जनगणना की तुलना में 2011 की जनगणना में ऐसे कहनेवालों की तादाद में 294 फीसदी बढ़ोत्तरी देखी गयी है। निश्चित ही इन आंकड़ों पर समूचे समाज में एक अच्छी खासी बहस खड़ी हो सकती थी।

उदाहरण के तौर पर हिन्दुओं के लिए यह गहरे आत्मपरीक्षण का विषय हो सकता था कि लिंगानुपात को लेकर सबसे कम सुधार उन्हीं के यहां क्यों दिखता है, या यह भी पूछा जा सकता है कि लिंगानुपात के मामले में ईसाई समुदाय का रेकार्ड बाकी समुदायों की तुलना में बेहतर क्यों है?  समाज में उच्च साक्षरता दर किस तरह इन अल्पसंख्यक समुदायों में आबादी की बढ़ोत्तरी को प्रभावित करता है, यह हम जैन लोगों पर गौर करके देख सकते हैं, जो इस दशक में महज 5.4 फीसदी की दर से बढ़े हैं। एक दशक पहले उनकी साक्षरता दर 90 फीसदी से अधिक नोट की गयी थी।

जाहिर है, जनगणना के आंकड़े एक गतिशील समाज के तेजी से बदलते परिदृश्य को उद्घाटित करते रहते हैं। आंकड़ों का यह समुच्चय नीति-निर्धारकों को ही नहीं समाज-विज्ञानियों, राजनीतिक विश्लेषकों या सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक खजाने के तौर पर उपस्थित होता है, जिसका विश्लेषण करके वह अपनी समझदारी तय करते हैं या अपने हस्तक्षेप की रूपरेखा बनाते हैं। मगर यह भी जाहिर है कि आधे-अधूरे आंकड़ों के जरिए समाज में अधिक विघटन और तनाव भी पैदा किया जा सकता है। 

(सुभाष गाताडे लेखक, अनुवादक, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसआई) से संबद्ध वामपंथी कार्यकर्ता हैं।)

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