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कानून के शासन और लोकतंत्र के लिए मजबूत, निडर और स्वतंत्र न्यायपालिका जरूरी

हाल के दिनों में न्यायपालिका से जिस तरह के निर्णय आये हैं और न्यायपालिका संविधान और कानून के शासन की अवधारणा को किनारे करके सत्ता के सही गलत को राष्ट्रहित में अपरोक्ष रूप से सही ठहराने की कवायद कर रही है उससे पूरे देश में सवाल उठ रहा है कि क्या हमारी न्यायपालिका एक मजबूत, निडर और स्वतंत्र न्यायपालिका है? इस चिंता पर जस्टिस दीपक गुप्ता ने एक मामले में दिए गये अपने निर्णय में यह कहकर मुहर लगायी है कि जब तक एक मजबूत, निडर और स्वतंत्र न्यायपालिका नहीं होगी तब तक कानून का शासन, लोकतंत्र नहीं हो सकता। इस स्वतंत्रता और निर्भयता की अपेक्षा न केवल सुपीरियर कोर्ट से की जाती है बल्कि जिला न्यायपालिका से भी ।

जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कृष्ण प्रसाद वर्मा बनाम बिहार सिविल अपील संख्या 8958/2011में फैसला सुनाते हुए कहा है कि अधिकांश मुकदमेबाज केवल जिला न्यायपालिका के संपर्क में आते हैं। वे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट आने की क्षमता नहीं रखते। उनके लिए मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायाधीश का शब्द अंतिम होता है। इसलिए यदि अधिक महत्वपूर्ण नहीं तो भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है कि जिला और तालुका स्तर पर न्यायपालिका बिल्कुल ईमानदार, निडर और किसी भी दबाव से मुक्त हो और मामलों को फ़ाइल पर तथ्यों के आधार पर फैसला करे तथा किसी भी या किसी तरह के दबाव में न आये।

आदेश में कहा गया है कि ग़लती करना मानव का स्वभाव है, और हम में से एक भी, जो न्यायिक अधिकारी के पद पर रहे हैं, यह दावा नहीं कर सकते कि हमने कभी एक भी ग़लत आदेश नहीं दिया”। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई सिर्फ़ इसलिए नहीं शुरू की जानी चाहिए क्योंकि उसने ग़लत फ़ैसला दिया है या पास किया गया न्यायिक आदेश ग़लत था।

पीठ  ने कहा कि न्यायिक अधिकारी के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई तब तक नहीं की जानी चाहिए जब तक कि इस बात का साक्ष्य नहीं हो कि ग़लत आदेश किसी बाहरी कारण से दिया गया था न कि उस कारण से जिसका फ़ाइल में ज़िक्र किया गया है। लापरवाही को दुर्व्यवहार नहीं माना जा सकता।

कृष्ण प्रसाद वर्मा के ख़िलाफ़ एक आरोप यह था कि उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश पर ध्यान नहीं दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने एक आरोपी की ज़मानत याचिका को ख़ारिज कर दिया था। संगत तथ्यों की पड़ताल करते हुए पीठ ने कहा कि अधिकारी इस अर्थ में लापरवाही का दोषी हो सकता है कि वह केस की फ़ाइल को ठीक से नहीं देखा और उस फ़ाइल में हाईकोर्ट के आदेश पर ग़ौर नहीं किया। इस लापरवाही को दुर्व्यवहार नहीं माना जा सकता। यह बताना ज़रूरी होगा कि जाँच अधिकारी को इस बात का पता नहीं चला है कि ज़मानत देने के पीछे कोई बाहरी कारण मौजूद है।

पीठ ने कहा कि जज ने बाद में हाईकोर्ट के आदेश को देखते हुए ज़मानत रद्द कर दी। पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी के ख़िलाफ़ एक अन्य आरोप यह था कि एनडीपीएस मामले में उन्होंने अभियोजन को 10 गवाहों की पेशी के लिए 18 स्थगन दिए। पीठ ने कहा कि इस तरह के न्यायिक अधिकार इधर खाई और उधर कुआँ वाली स्थिति में होते हैं। अगर वह स्थगन देता रहता है तो हाईकोर्ट उसके ख़िलाफ़ इस आधार पर कार्रवाई करता है कि वह सक्षमता से मामलों को नहीं निपटाता और अगर वह साक्ष्य को बंद कर दे तो हाईकोर्ट उसे दोषी को छोड़ देने के आधार पर उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करता है।

संविधान के अनुच्छेद 235 का उद्देश्य यह नहीं है। यही कारण है कि हम दोबारा इस बात को कह रहे हैं कि प्रशासनिक क्षेत्र में हाईकोर्ट का एक दायित्व यह है कि ज़िला न्यायालय की आज़ादी को बरक़रार रखा जाए और हाईकोर्ट उसके अभिभावक के रूप में पेश आए। सिर्फ़ इस आधार पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई न हो कि न्यायिक आदेश ग़लत है।

अपील स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा कि हम यह स्पष्ट करना चाहेंगे कि हम किसी भी तरीक़े से यह संकेत नहीं दे रहे हैं कि अगर कोई न्यायिक अधिकारी ग़लत आदेश देता है तो उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जाए। अगर कोई न्यायिक अधिकारी ऐसा आदेश देता है जो स्थापित न्यायिक नियमों के ख़िलाफ़ है पर इस फ़ैसले के पीछे किसी बाहरी प्रभाव का कोई आरोप नहीं है तो हाईकोर्ट को चाहिए कि वह प्रशासनिक पक्ष के लिए इस तरह के साक्ष्यों को संबंधित न्यायिक अधिकारी के सर्विस रिकार्ड  में रखे।

संबंधित जज की प्रोन्नति के समय में उसके सर्विस रिकार्ड के रूप में इस तरह की बातों पर ग़ौर किया जा सकता है। एक बार जब ग़लत फ़ैसले पर ग़ौर कर लिया जाता है और वह सर्विस रिकार्ड का हिस्सा बन जाता है तो संबंधित अधिकारी को सिलेक्शन ग्रेड, प्रमोशन आदि नहीं देने में इसका प्रयोग किया जा सकता है और अगर इस तरह की ग़लतियाँ लगातार हो रही हैं तो ऐसे अधिकारी को नियमानुसार अनिवार्य रूप से रिटायर कर देना उचित कार्रवाई होगी।
उच्चतम न्यायालय का उक्त निर्णय बहुत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव का है तथा ऐसे समय पर आया जब कमोबेश इसी तरह के आरोपों से मद्रास हाईकोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश चीफ जस्टिस गोगोई ने दिया है।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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