Sunday, October 17, 2021

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केंद्र पर भारी पड़ता जा रहा है जनता का यह आंदोलन

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धार्मिक या राजनीतिक रूप से प्रताड़ित विदेशी नागरिक पहले भी भारत में नागरिकता लेते रहे हैं। हजारों की संख्या में पाकिस्तान के सिन्धियों को तथा बांग्लादेशी हिन्दुओं को भारत की नागरिकता दी गयी है। फिर नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) जैसा विभाजनकारी कानून बना कर हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई एवं पारसी विदेशी नागरिकों को आमंत्रित करना तथा स्वदेशी मुस्लिमों को नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (NRC) के जरिये नागरिकता से वंचित करना एक सोची-समझी साजिश है। आम मुस्लिम ही नहीं उदार एवं प्रगतिशील हिन्दू भी सरकार की इस साजिश से वाकिफ़ हैं। इसलिये देश भर में चल रहे स्वतःस्फूर्त आंदोलन और धरनों को सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरुद्ध 60 से अधिक याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत की गई हैं। जिनमें केरल सरकार का संविधान की धारा 31 के तहत प्रस्तुत मूल वाद भी शामिल है। केरल और पंजाब विधानसभाओं ने नागरिकता संशोधन कानून वापस लेने के लिये प्रस्ताव भी पारित किये हैं। अब तो भाजपा के सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (SAD) एवं जनता दल एकीकृत (JDU) भी इस विधेयक के विरोध में आ गए हैं। अकाली दल ने जहां इस विधेयक में मुस्लिम शरणार्थियों को भी शामिल करने की मांग की है, वहीं जेडीयू ने इस विधेयक पर पुनर्विचार की मांग की है।

जेडीयू के दो बड़े नेता प्रशांत किशोर और पवन वर्मा खुल कर इस कानून के विरोध में आ गए हैं। जबकि बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार अपने स्वभाव के अनुरूप इस विधेयक की आड़ में भाजपा के साथ सौदेबाजी करने में लगे हुए हैं। वे इस विधेयक का खुल कर विरोध न करते हुए इस पर सिर्फ पुनः चर्चा की ही बात कर रहे हैं। इस तरह वे भाजपा पर दबाव बना कर अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी को अक्षुण्य रखना चाहते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में 22 जनवरी से सभी 60 याचिकाओं और केरल सरकार के मूल वाद पर सुनवाई आरम्भ हो गयी है। बहुत अधिक संभावना इस बात की है कि सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान बेंच इन याचिकाओं को संविधान पीठ को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव कर सकती है और अंततः ये सभी याचिकाएं संविधान पीठ को सौंप दी जाएंगी। 22 जनवरी की पहली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को याचिकाओं पर जवाब प्रस्तुत करने के लिये एक माह का समय दे दिया है तथा इस कानून के अमल पर स्टे देने से इंकार कर दिया है।

नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन को देखते हुए तथा कानून-व्यवस्था के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट यदि इन याचिकाओं का निराकरण होने तक इस कानून के अमल पर रोक (STAY) लगा देता तो उचित रहता। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम निर्णय से आंदोलनकारियों को न सिर्फ बड़ी राहत मिलती बल्कि देश व्यापी आंदोलन के कारण कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब होने की आशंका भी टल जाती तथा आंदोलन भी फिलहाल स्थगित हो जाता।

आंदोलनकारियों ने 29 जनवरी को भारत बन्द का आह्वान किया है। उस दिन आंदोलन के समर्थक बाजार, व्यवसाय इत्यादि को बन्द कराने के साथ ही विभिन्न स्थानों पर चक्का जाम भी करेंगे। दूसरी ओर भाजपा कार्यकर्ता व्यवसाय स्थलों को खुलवाने की कोशिश करेंगे। पुलिस भी यदि आंदोलनकारियों के विरुद्ध बलप्रयोग करती है तो इससे न सिर्फ कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ेगी बल्कि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक सम्पत्ति को भी क्षति पहुँच सकती है।

उत्तरप्रदेश में नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन के चलते 23 से अधिक प्रदर्शनकारी पुलिस की गोली से मारे गए हैं और कई अभी भी लापता हैं। जिनके बारे में यह शंका है कि पुलिस उन्हें उठा कर किसी अज्ञात स्थान पर ले गयी है। सम्भवतः उनमें से भी कुछ मारे जा चुके हों! उत्तरप्रदेश की पुलिस फेक एनकाउंटर के लिये कुख्यात हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट भी अभी तक उत्तरप्रदेश पुलिस की इस कुख्यात हो चुकी कार्रवाईयों पर प्रभावशाली अंकुश नहीं लगा पाया है। यह हमारी न्यायिक प्रणाली की कमजोरी या असफलता का ही एक प्रमाण है।

दिल्ली के शाहीन बाग में हजारों की संख्या में घरेलू महिलाएं इस कुख्यात हो चुके कानून के विरोध में पिछले 40 दिनों से धरने पर बैठी हुई हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल के साथ महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल की चर्चा का भी कोई नतीजा नहीं निकला है। दिल्ली हाईकोर्ट धरना स्थल को खाली कराने का आदेश पहले ही दे चुका है। जामिया मिलिया और जेएनयू के छात्रों के साथ दिल्ली पुलिस की ज्यादती से उसकी छवि को जो नुकसान पहुँचा है उसके कारण पुलिस ने अभी तक शाहीन बाग की महिलाओं के विरुद्ध बलप्रयोग न करते हुए संयम का परिचय दिया है। लेकिन आज नहीं तो कल पुलिस धरना स्थल को खाली कराने के लिये बलप्रयोग कर सकती है।

इसके विपरीत उत्तरप्रदेश पुलिस अपनी कुख्यात मनोवृत्ति तथा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की अलोकतांत्रिक कार्यशैली के चलते लखनऊ के घण्टाघर पर नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में कड़ाके की सर्दी में अपने मासूम बच्चों के साथ धरने बैठी महिलाओं के साथ ज्यादती करने से बाज नहीं आ रही है। पुलिस ने महिलाओं से कम्बल छीन लिये और रात में धरना स्थल के आसपास की बिजली भी काट दी जाती है। उत्तरप्रदेश पुलिस ने अभी तक इन महिलाओं के विरुद्ध बल प्रयोग तो नहीं किया है लेकिन कई आपराधिक धाराओं में उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर ली है। यह एक प्रकार से बदले की ही कार्रवाई है। क्योंकि महिलाओं का आंदोलन और धरना पूरी तरह से शांतिपूर्ण है और उन्होंने कानून-व्यवस्था को भी कोई हानि नहीं पहुँचाई है।

ऐसी स्थिति में आशा की अंतिम किरण सुप्रीम कोर्ट ही थी, लेकिन उसने भी कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है। दूसरी ओर केंद्र सरकार आंदोलनकारियों से कोई संवाद या चर्चा नहीं करना चाहती है। गृह मंत्री अमित शाह ने लखनऊ तथा अन्य स्थानों पर स्पष्टरूप से यह कहा है कि कोई कुछ भी कर ले यह कानून वापस नहीं होगा और इसपर अमल होकर रहेगा। इससे यह साफ हो जाता है कि उन्हें लोकतांत्रिक प्रणाली से चुने जाने के बावजूद आपसी बातचीत और संवाद में कोई विश्वास नहीं है और वे अपनी अलोकतांत्रिक छवि के अनुरूप लोकसभा में प्राप्त बहुमत के बल पर सिर्फ मनमानी करना चाहते हैं।

सरकार के प्रतिनिधि बार-बार यह कह रहे हैं कि ‘फिलहाल’ नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स (NRC) नहीं लाया जा रहा है। वे कभी यह नहीं कहते हैं कि एनआरसी लाया ही नहीं जाएगा। इसलिये आंदोलनकारी और अन्य नागरिक भी CAA को NRC से जोड़कर ही देख रहे हैं, जो कि गलत भी नहीं है। केंद्र सरकार अप्रैल माह से नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR) की प्रक्रिया भी आरम्भ करने जा रही है, जिसमें यद्यपि कोई दस्तावेज नहीं लिये जाएंगे लेकिन कई असुविधाजनक सवाल पूछे जाएंगे जिनका कोई औचित्य नहीं है।

अतः नागरिक सुप्रीम कोर्ट की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। आंदोलनकारी और नागरिकता संशोधन कानून तथा नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स के विरोधी नागरिक यह चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट उनके साथ न्याय करे। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ सरकार के अनुरूप फैसला ही न करे बल्कि उसका फैसला न्यायपूर्ण दिखना भी चाहिये।

कुल मिलाकर केंद्र सरकार की नागरिकता सम्बन्धी सारी कवायत अपना वोट बैंक मजबूर करने तथा देश की खराब होती आर्थिक स्थिति एवं बढ़ती हुई बेरोजगारी से जनता का ध्यान हटाने के लिये ही की जा रही कार्रवाई ही प्रतीत होती है।

(लेखक प्रवीण मल्होत्रा सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो कर आजकल लेखन और सामाजिक कामों में संलग्न हैं।)

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