Thursday, December 1, 2022

सांप्रदायिकता और आभिजात्यता में फंसी है हिंदी

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रोते-धोते हिंदी दिवस गुजर गया। लोगों ने जमकर अंग्रेजी को गलियां दी और इसके दबदबे का रोना रोया। वैसे, भाषाएं उस अर्थ में मरती नहीं हैं जिस अर्थ में प्राणी मरते हैं। वे गायब जरूर हो जाती हैं। लेकिन अपना निशान छोड़ जाती हैं, कहीं शब्दों में तो कहीं ध्वनियों में। भाषाओें को गायब होते देखा जा सकता है। हमारे पहले की पीढ़ी कैथी नामक एक लोकप्रिय भाषा को गायब होते देख चुकी है। देश की कई बोलियां गायब हो रही हैं। नई अर्थव्यवस्था में भाषाओं का लुप्त होना तेज हो गया है क्योंकि विस्थापन निश्चत है और एकरूपता इसकी जरूरी शर्त है। कोई भी भाषा परिवेश बंधी होती है और इसके मुहावरे स्थानीय संस्कृति से निकलते हैं। विस्थापन और नया परिवेश भाषा को गायब करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हम अक्सर यह गलती करते हैं कि भाषा के विकास को सत्ता से जोड़ देते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि शासन भाषाओं को निगलता है। हिंदी या भारत में अभी बोली जाने वाली तमाम भाषाओं की खासियत यह है कि उनका इतिहास सत्ता से जुड़ा हुआ नहीं है। इनमें ज्यादातर के विकास में भक्ति काल की रचनाशीलता और आजादी के संग्राम का योगदान है। वह संस्कृत, फारसी या अंग्रेजी की तरह किसी तरह की राजनीतिक या धार्मिक सत्ता से जुड़ी हुई नहीं रही है। सिर्फ सत्ता से जुड़ी रह कर कोई भाषा जीवित नहीं रह सकती है। अंग्रेजों के आते ही फारसी का देश-निकाला हो गया। धर्म की सत्ता से जुड़ी तो संस्कृत मंत्रों और पोथियों में कैद हो गई। यह आम लोगों की वाणी होने के बदले देववाणी हो गई। इसे सत्ता के सहारे जिंदा करने का कार्यक्रम भी काफी समय से चल रहा है।

आजादी के आंदोलन के समय कुछ बड़े जमींदारों ने संस्कृत को जिंदा करने के लिए संस्कृत कालेज और विश्वविद्यालय आदि खुलवाए थे। मुझे याद आता है कि अस्सी के दशक के पहले हिस्से में बिहार में संस्कृत कालेजों की बाढ़ आ गई थी क्योंकि जगन्नाथ मिश्र की सरकार उन्हें अनुदान दे रही थी। वैसे, उन्होंने अरबी और फारसी को भी ऐसी मदद दी थी। चार दशक के बाद भी आम जीवन में संस्कृत का उपयोग गायत्री मंत्र जैसे कुछ मंत्रों के उच्चारण से ज्यादा नहीं बढ़ा है। भाजपा सरकारों ने भी इस भाषा को जीवन देने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। अब तो दूरदर्शन में संस्कृत में खबरें भी नियमित रूप से आने लगी हैं। लेकिन इससे इसकी लोकप्रियता बढ़ी हो, ऐसा नहीं लगता।

भाजपा या आरएसएस का संस्कृत की वकालत करना वोटों से ज्यादा बड़ी राजनीति है। वह श्रेष्ठता की राजनीति से जुड़ी है। इस राजनीति का मूल आधार है समाज की धार्मिक सत्ता को बचाने की जिद। उनकी नजर में संस्कृत हिंदू ज्ञान का भंडार है और श्रेष्ठ है, इसलिए उसे बचाया जाए।
भाजपा के एक सांसद ने अपने एक भाषण का सारांश ट्वीट किया है, ‘‘आगे तकनीक डिजिटल नहीं व्यॉस कमांड की होगी, जिसमें लिखने से ज़्यादा वर्तनी का महत्व होगा। इसी लिए हिंदी व संस्कृत पर ज़ोर दीजिए। अंग्रेज़ी व हिंदी के स्वर की तुलना कर लीजिए मन से ‘मूर्खता’ का आवरण हट जाएगा।’’ वह यह कहना नहीं भूले हैं कि नरेंद्र मोदी विदेश के कार्यक्रमों में भी हिंदी का उपयोग करते हैं। उन्हें तो यह मालूम होना ही चाहिए कि दुनिया के ज्यादातर देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी मातृभाषा में ही बोलते हैं।
इंटरनेट पर यह झूठा दावा पहले से मौजूद है कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ भाषा बताया है। इसे उस समय के शिक्षा मंत्री निशंक ने आईआईटी, मुंबई के एक कार्यक्रम में देाहरा भी दिया था। लेकिन इन दावेदारों को निराशा होगी कि अमेरका के किसी वैज्ञानिक ने कोरियाई भाषा को सबसे वैज्ञानिक बता दिया है।

अगर पुरानेपन के हिसाब से देखा जाए तो तमिल और कन्नड़ दुनिया की प्राचीनतम भाषाएं हैं। जहाँ तक ज्ञान के भंडार के हिसाब से देखा जाए तो हर भाषा में ज्ञान संचित है। असल में, ज्ञान के बारे में हमारी दृष्टि संकुचित है। हम उच्च वर्ग से जुड़े ज्ञान को श्रेष्ठ मानने के आदी हो गए हैं। इसलिए हमें स्थानीय भाषाओं और बोलियों में संचित साहित्य और ज्ञान नजर नहीं आता है।
जिस तरह संस्कृत के सहारे राजनीति की गई है, उसी तरह की राजनीति अन्य भाषाओं के जरिए हो रही है। हिंदी को लेकर भी वही राजनीति हुई है। हिंदी-हिंदी कर हमने गैर-हिंदी भाषियों को डराया है। गैर-हिंदी क्षेत्रों के राजनेताओं ने इसका फायदा भी खूब उठाया। हिंदी थोपने के खिलाफ खूब आंदोलन हुए। लेकिन अपनी भाषा को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने क्या किया? हिंदी विरोधी आंदोलन से उनकी भाषा या साहित्य का कोई विकास हुआ हो या कोई बड़ी सांस्कृतिक चेतना पैदा हुई हो, ऐसा मुझे नजर नहीं आता। द्रविड़ आंदेालन के विकास में भाषा ने बड़ा योगदान किया, लेकिन गौर से देखा जाए तो इसका इस सांस्कृतिक चेतना का मूल स्रोत सामाजिक था और यह ब्राह्मणवाद के विरोध में उपजी। वैसे भी, हिंदी की जगह अंग्रेजी को मानने से उनकी भाषा को नुकसान ही हुआ है क्योंकि उनका उच्च वर्ग अंग्रेजी को ही पसंद करता है।

मराठी का ही हाल देखिए। उसे अस्मिता से जोड़ कर शिव सेना ने अपनी राजनीति जमा ली। दक्षिण और उत्तर की भाषा बोलने वालों के विरोध में भाषाई अस्मिता जगा कर उन्होंने अपनी राजनीति जमा ली। लेकिन महाराष्ट्र में मराठी की क्या हालत है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मराठी माध्यम के स्कूल लगातार बंद हो रहे हैं। महाराष्ट्र का उच्च वर्ग मराठी को तेजी से छोड़ रहा है। मराठी फिल्में और नाटक भी संकट में हैं। देश के किसी हिस्से में जायेंगे तो आपको यही रोना सुनाई देगा कि हमारी भाषा संकट में है। वे यही कहेंगे कि अंग्रेजी के कारण वह मर रही है।

यह समझना दिलचस्प है कि इस विरोध के बावजूद अंग्रेजी आगे बढ़ रही है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि वह सिर्फ इसलिए आगे नहीं बढ़ रही है कि सत्ता चलाने वालों की भाषा है। असली बात यह है कि वह व्यापार और तकनीक की भाषा भी है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम यह पता लगाना नहीं चाहते कि भाषा के रूप में अंग्रेजी इतना संपन्न कैसे हो गई? क्या यह सिर्फ साम्राज्यवाद के कारण ही संभव हुआ है ? कई इतिहासकार बताते हैं कि टेक्नोलॉजी से भाषा के प्रसार का बड़ा संबंध है। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने बताया है कि किस तरह प्राचीन आदिवासी समाजों में खेती की उन्नत तकनीक से जुड़े समूहों की भाषा कम उन्नत तकनीक वाले समूहों ने अपना ली। अंग्रेजी के विस्तार में पुनर्जागरण और लोकतंत्र ने भी बड़ा योगदान किया है। अंग्रेजी भाषा की तरक्की में चर्च का योगदान सिर्फ सहायक का ही रहा है। अंग्रेजी ने स्काटिश और दूसरी भाषाओें को निगल लिया, लेकिन इसने अपना दरवाजा बंद नहीं किया। वह दुनिया भर से शब्दों का भंडार ले आई। इस बात से इंकार करना कि अंग्रेजी एक समृद्ध भाषा है, सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा।

आजाद भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया ही ऐसे राजनीतिज्ञ रहे हैं जिन्होंने भाषा को संकीर्ण राजनीति से अलग करने की कोशिश की। उन्होंने अंग्रेजी के साम्राज्यवादी स्वरूप के खिलाफ लड़ाई लड़ी और भारतीय भाषाओं को ताकत देने की कोशिश की। यही वजह है कि उनके विचार के प्रभाव में कई उत्कृष्ट साहित्यकार पैदा हुए। कन्नड़ में अगर अनंतमूर्ति थे तो हिंदी में रघुवीर सहाय। वह मानते थे कि भाषा को स्थापित करना विशुद्ध राजनीतिक संकल्प का मामला है।

डॉ. लोहिया अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषाओें को स्थापित करना चाहते थे। वह सिर्फ हिंदी को स्थापित करने की बात नहीं करते थे। हिंदी के सेवकों ने अपनी आत्ममुग्धता में इसका बहुत नुकसान किया है। महात्मा गांधी ने एक बहुभाषी मुल्क में अंग्रेजी की जगह लेने के लिए किसी एक भाषा को तैयार करने की कोशिश की थी। वह हिंदुस्तानी को विकसित करना चाहते थे, इससे हिंदी-उर्दू का भेद तो मिट ही जाता। सच्चाई यही है कि अंग्रेजों ने हिंदुस्तानी को उर्दू और हिंदी में बांटने का काम किया। इसके लिए उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज में लोग बहाल किए। हिंदुओं के लिए हिंदी और मुसलमानों के लिए उर्दू विकसित किया गया। इसलिए इसमें अचरज की कोई बात नहीं कि अंग्रेज-समर्थक हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक संगठन, मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने उर्दू और हिंदी पर खूब झगड़े किए। इसमें दोनों भाषाओं की सूरत भी बदल दी। उर्दू फारसी तथा हिंदी संस्कृत के नजदीक चली गई। इस तरह दोनों तरफ के सांप्रदायिक तत्वों ने गांधी जी को फेल कर दिया। वे लोग हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुसलमानों की भाषा बनाने पर तुले हुए थे ।

भारत सरकार की शब्दावली देख कर साफ नजर आता है कि किस तरह संस्कृत के शब्दों को ठूंस कर उसे इतना बनावटी बना दिया गया कि आम लोग कभी भी इसे अपना नहीं पाए। इसके साथ ही हिंदी का नेतृत्व करने वालों ने हिंदी पट्टी की बोलियों के साथ अन्याय किया। इसी से जुड़ा अन्याय है कि विश्व स्तर के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु को आंचलिक कह कर पुकारा गया। कालेज और विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग में फैले जातिवाद की चर्चा करना बुरा लगता है, लेकिन इस सच को स्वीकारे बगैर हम हिंदी को बचा नहीं सकते। हिंदी तो इतना आभिजात्य है कि शैलेंद्र जैसे गीतकारों को साहित्य में कोई दर्जा नहीं मिला और अनेक टुटपुंजिये लेखक कवि का पट्टा लगा कर सम्मानित होते रहते हैं।

हिंदी वालों को देश की भाषा बनने का अहंकार छोड़ कर इसे उदार और लोकतांत्रिक बनाने पर जोर देना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि मजहबी और राजनीतिक सत्ता के बावजूद पाकिस्तान में लोग उर्दू को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। यह वहां के किसी क्षेत्र की भाषा नहीं रही है। सभी भाषाओं के लोग उसके खिलाफ हैं। बांग्लादेश में इसे तो पूर्व पाकिस्तान के जमाने में ही नकार दिया गया था। हमने देखा कि कुछ साल पहले फाइल पर हिंदी में नोटिंग संबंधी केंद्र सरकार के सर्कुलर का दक्षिण के राज्यों में किस तरह विरोध हुआ। अंत में, सरकार को पीछे हटना पड़ा।

लोगों को यह भी देखना चाहिए कि गरीब लोगों और औरतों ने ही हिंदी को जिंदा रखा हुआ है। विविधता और लोकतंत्र के अभाव ने इसे देश की अन्य भाषाओं का दुश्मन बना दिया है। हिंदी को इससे मुक्त कराना है। हिंदी को आभिजात्यता, सांप्रदायिकता और जातिवाद से मुक्त कराना है। आरएसएस का हिंदीवाद इन्हीं बुराइयों से भरा है। यह हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान के नारे से प्रेरित है। इसके खिलाफ हमें ‘गांधी लोहिया की अभिलाषा, चले देश में देसी भाषा’ के नारे को जिन्दा करना होगा। हिंदी को उपभोक्तावाद के हमले से बचाना होगा। देश की दूसरी भाषाएं बचेंगी तभी हिंदी बचेगी।
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)


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