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अगर जसवंत सिंह की चली होती तो कश्मीर मसला शायद हल हो गया होता!

अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार में अलग-अलग समय में वित्त, विदेश और रक्षा जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुके जसवंत सिंह भारतीय जनता पार्टी के उन चंद नेताओं में से थे, जो ‘हिंदू-मुस्लिम’ और ‘भारत-पाकिस्तान’ जैसे सवालों पर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अलग हटकर अपना नजरिया रखते थे और उसी के अनुरूप काम करते थे। हालांकि इसके लिए उन्हें पार्टी से निष्कासन भी झेलना पड़ा लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपना नजरिया कभी नहीं बदला।

बहुत कम लोग जानते हैं कि वाजपेयी सरकार के समय कश्मीर मसले का हल निकालने और पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य बनाने के मकसद से दो मर्तबा जो बड़ी पहल हुई थी, उसके पीछे जसवंत सिंह के ही प्रयास थे। उनके प्रयासों को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी की भी सहमति हासिल थी। यह अलग बात है कि दोनों ही प्रयास अलग-अलग कारणों से सफल नहीं हो सके।

इसमें कोई दो मत नहीं कि छह साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग सारे काम भाजपा और संघ के एजेंडे के अनुरूप ही किए थे। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि उन्होंने अपनी पार्टी और संघ की लाइन से हटकर एक स्टेट्समैन के रूप में भारत-पाकिस्तान रिश्तों में सुधार और कश्मीर मसले के समाधान की दिशा में ईमानदार कोशिश की थी और इस कोशिश में उनके साथ विदेश मंत्री के तौर पर जसवंत सिंह ने भी सक्रिय भूमिका निभाई थी।

वाजपेयी और जसवंत सिंह दोनों ने ही कश्मीर और पाकिस्तान के मामले में अपनी पार्टी और संघ की परंपरागत सोच को अपने ऊपर कतई हावी नहीं होने दिया। दोनों नेताओं के प्रयासों से ही 19 फरवरी 1999 को नई दिल्ली-लाहौर के बीच सीधी बस सेवा ‘सदा-ए-सरहद’ शुरू हुई थी, जो एक साल पहले जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा कर उसे दो हिस्सों में विभाजित कर दिए जाने के बाद बंद की जा चुकी है। बस सेवा शुरू होने के मौके पर वाजपेयी और जसवंत सिंह खुद बस लेकर लाहौर गए थे। दिल्ली-लाहौर के बीच बस सेवा एक छोटी और प्रतीकात्मक लेकिन ईमानदार पहल थी, जिसका दोनों तरफ के आम लोगों के बीच व्यापक तौर पर स्वागत हुआ था। हालांकि पाकिस्तान की ओर से इसका कोई सकारात्मक प्रतिसाद नहीं मिल पाया। वहां के सैन्य प्रतिष्ठान की ओर से भारत को धोखा ही मिला। पहले करगिल में सैन्य घुसपैठ और फिर संसद भवन पर आतंकवादी हमले के रूप में।

जिस समय यह बस सेवा शुरू हुई थी उस समय वहां नवाज शरीफ की निर्वाचित सरकार थी। वहां के सैन्य नेतृत्व को राजनीतिक नेतृत्व की यह पहलकदमी पसंद नहीं आई थी, जिसका परिणाम करगिल की लड़ाई के रूप में सामने आया था। हालांकि करगिल की पहाड़ियों में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ हमारी सरकार और सेना के खुफिया तंत्र की काहिली से ही हो सकी थी। हमें पहली बार पाकिस्तान से अपनी ही जमीन पर लड़ाई लड़नी पड़ी। लगभग दो महीने तक चले सशस्त्र संघर्ष के बाद आखिरकार पाकिस्तानी सेना को पीछे हटना पड़ा।

इसके बावजूद वाजपेयी और जसवंत सिंह ने उम्मीद नहीं छोड़ा। करगिल की लड़ाई के थोड़े ही समय बाद पाकिस्तान में निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट हो गया। सत्ता के सूत्र सेना ने संभाल लिए और सेनाध्यक्ष जनरल परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति हो गए। कुछ तो अंतरराष्ट्रीय दबाव और कुछ पाकिस्तान के घरेलू हालात के चलते मुशर्रफ ने भी भारत के साथ रिश्ते सुधारने की इच्छा दिखाई। वाजपेयी सरकार ने उनकी तरफ भी दोस्ती का हाथ बढ़ाया। सभी मुद्दों पर एकमुश्त बातचीत के लिए राष्ट्रपति मुशर्रफ को भारत आमंत्रित किया गया।

विदेश मंत्री के तौर पर जसवंत सिंह के प्रयासों से हुई इस पहलकदमी के तहत ‘कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत’ पर आधारित बहुत ही उदार नजरिए के साथ वाजपेयी ने राष्ट्रपति मुशर्रफ के साथ आगरा में शिखर बैठक की। साल 2001 की 15 और 16 जुलाई को हुई इस बैठक में वे पाकिस्तानी राष्ट्रपति के साथ कश्मीर मसले के समाधान के काफी करीब पहुंच गए थे। दोनों देशों के बीच एक व्यापक समझौते का खाका तैयार हो चुका था। यह बातचीत पहले तो वाजपेयी और मुशर्रफ के बीच हुई थी और बाद में इसमें दोनों देशों के विदेश मंत्री भी शामिल हुए थे।

समझौते का मसौदा और दोनों नेताओं के बीच संयुक्त बयान भी लगभग तैयार हो चुका था। तीसरे दिन यानी 17 जुलाई को समझौते पर हस्ताक्षर होने थे, जिसके लिए आगरा के होटल जेपी पैलेस में सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। वे कुर्सियां भी तैयार थीं, जिन पर बैठकर वाजपेयी और मुशर्रफ समझौते पर दस्तख़त करने वाले थे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी उस ऐतिहासिक घटना को कवर करने के लिए आगरा में जुटा हुआ था।

तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी इस मौके पर आगरा में ही मौजूद थे। उन्हें समझौते का मसौदा रास नहीं आ रहा था। इस सिलसिले में उनकी मसौदे को तैयार करने में भारत की ओर से अहम भूमिका निभाने वाले जसवंत सिंह के साथ कहा-सुनी भी हुई थी। आडवाणी के एतराजों पर जसवंत सिंह ने गुस्से में यहां तक कह दिया था कि आप मेरी नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि जसवंत सिंह जो कुछ कर रहे थे उसे वाजपेयी की पूरी सहमति हासिल थी। उसी दौरान समझौते के मसौदे की भनक आरएसएस के तत्कालीन नेतृत्व को भी लग चुकी थी और उसे भी यह समझौता मंजूर नहीं था। आडवाणी उन दिनों भाजपा में संघ के सर्वाधिक विश्वस्त और लाडले हुआ करते थे। सुषमा स्वराज उस समय वाजपेयी सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री थी। उन्हें आडवाणी की बेहद करीबी और विश्वस्त माना जाता था।

आडवाणी ने जब देखा कि उनकी असहमति को प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं, तो उन्होंने खुद सार्वजनिक तौर पर कुछ न बोलते हुए सुषमा स्वराज को मोर्चे पर लगाया। सुषमा स्वराज ने दिल्ली से ही उस समझौते के मसौदे को पलीता लगाने वाला एक बयान जारी कर दिया। उनके बयान से दोनों देशों के राजनयिक हलकों में हलचल मच गई। राष्ट्रपति मुशर्रफ भी बिदक गए। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों और राजनयिकों ने मिलकर बात संभालने की कोशिश की और रात में ही दो-तीन वाक्यों के हेरफेर के साथ समझौते का नया मसौदा तैयार किया गया। लेकिन अगले दिन सुबह वाजपेयी पर सीधे संघ की ओर से पीछे हटने का दबाव आया और आखिरकार वह समझौता नहीं हो सका। मुशर्रफ अपनी पूर्व निर्धारित अजमेर यात्रा रद्द कर आगरा से ही इस्लामाबाद के लिए रवाना हो गए।

भ्रूण हत्या की गति को प्राप्त हुए समझौते की मुख्य बात यह थी कि भारत और पाकिस्तान दोनों को कश्मीर के दोनों हिस्सों का कस्टोडियन और नियंत्रण रेखा को ही वास्तविक सीमा रेखा मानते हुए ऐसे कदमों पर सहमति जताई गई थी, जिनसे कि सीमा धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती चली जाए और दोनों तरफ के लोगों की सुगमता पूर्वक इधर से उधर आवाजाही हो सके। कहा जा सकता है कि अगर वाजपेयी और जसवंत सिंह का वह प्रयास संघ और आडवाणी द्वारा सुषमा स्वराज के जरिए किए गए भीतरघात का शिकार नहीं होता तो संभवतया कश्मीर मसला लगभग हल हो चुका होता और पाकिस्तान पोषित आतंकवाद से भी हमें बहुत हद तक निजात मिल गई होती।

जसवंत सिंह चूंकि संघ पृष्ठभूमि के नहीं थे, लेकिन वाजपेयी के बेहद विश्वासपात्र थे। यही बात संघ नेतृत्व को और संघ से जुड़ाव रखने वाले भाजपा नेताओं को रास नहीं आती थी। जसवंत सिंह भी इस बात को जानते थे लेकिन उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं की। पाकिस्तान से समझौता वार्ता यद्यपि खटाई में पड़ चुकी थी, जो संघ के लिए राहत की बात थी लेकिन इस समझौता वार्ता में अहम भूमिका निभाने के लिए संघ ने जसवंत सिंह को माफ नहीं किया।

दरअसल, जसवंत सिंह दस साल तक सेना में अपनी सेवाएं दे चुकने के बाद 1977 में अपने मित्र और राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरो सिंह शेखावत के कहने पर राजनीति में आए थे। वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में से एक थे लेकिन इसके बावजूद संघ से उनके रिश्ते कभी सहज नहीं रहे। यही वजह रही कि जब 2009 में पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्नाह पर लिखी उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई तो उस पुस्तक की विषय वस्तु संघ नेतृत्व को रास नहीं आई। संघ के दबाव में भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व ने जसवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया।

चूंकि उस समय तक वाजपेयी अपनी बीमारी के चलते राजनीति से पूरी तरह कट चुके थे और उनकी याददाश्त भी खो चुकी थी और भैरो सिंह शेखावत ने भी उप राष्ट्रपति पद से निवृत्त होने के थोड़े समय बाद ही बिस्तर पकड़ लिया था, लिहाजा जसवंत सिंह का बचाव करने वाला पार्टी में कोई नहीं था। हालांकि एक साल बाद ही 2010 में उनकी भाजपा में वापसी भी हो गई थी, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जब पार्टी ने उन्हें टिकट देने से इंकार कर दिया तो वे निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतर पड़े। पार्टी ने उन्हें फिर निष्कासित कर दिया। वे चुनाव हार गए और थोड़े दिन बाद अपने घर में गिर पड़ने की वजह से उनके सिर में गहरी चोट आई और वे कोमा में चले गए। लगभग छह वर्ष तक जीवन से वंचित रहने के बाद अंतत: 27 सितंबर को मौत ने उन्हें स्वीकार कर लिया।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on September 28, 2020 11:40 am

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