बीच बहस

मैलफंक्शन होता तो हुजूर! वीवीपैट से कभी बीजेपी के अलावा दूसरे दलों के वोट की भी पर्चियां निकलतीं

यह फिर हुआ कि ई.वी.एम. में आप तृणमूल कांग्रेस या वाम-कांग्रेस गठबंधन के लिये बटन दबा रहे हैं और वी.वी.पैट भाजपा के पक्ष में वोट दर्ज कर रहा है। 27 मार्च को पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान हुआ, एक समय नक्सल प्रभावित रहे जंगलमहल क्षेत्र की 30 विधानसभा सीटों के लिये। 

मेदिनीपुर के भगवानपुर विधानसभा क्षेत्र के बूथ नम्बर 205 और 205 ए पर वोटर्स को धमकाने का मामला सामने आया, कुछ बूथों पर मतदाताओं के पहचान-पत्र छीने जाने, केन्द्रीय बलों द्वारा उन्हें बी.जे.पी. के हक में वोट करने के लिये मजबूर करने की भी। तथाकथित मुख्यधारा के चैनलों-अखबारों को छोड़ दीजिये, वह तो गोदी है। उसकी परवाह सरकार को भी नहीं है। गोदी नहीं होता तो सरकार उसे लेकर चिन्तित होती, जैसे न्यूज वेबसाइटों, यू-ट्यूब चैनलों को लेकर है और गोदी मीडिया के अपने तनखैय्यों को बुलाकर उन पर शिकंजा कसने, उन जैसे पत्रकारों की कलर कोडिंग करने जैसी तरकीबों पर राय-मशविरा कर रही है।

तो आप वेबसाइटों, यू-ट्यूब चैनलों पर जाइये और भाजपा के चुनावी हथकंडों का पूरा मुजाहिरा कर लीजिये। भरी पड़ी हैं वहां ऐसी खबरें। पी.टी.आई. ने बताया कि माजना में एक पोलिंग बूथ पर किसी भी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने पर वी.वी.पैट में वोट भाजपा को जाते देख उत्तेजित लोगों ने वहां भारी हंगामा किया और सड़क जाम कर दिया। जबकि न्यूज पोर्टल ‘फर्स्ट पोस्ट’ के अनुसार वोटरों ने कांठी उत्तर और दक्षिण में भी कुछ बूथों पर ई.वी.एम. में किसी भी प्रत्याशी को वोट देने पर वी.वी.पैट में वोट बी.जे.पी. के पक्ष में दर्ज दिखने की शिकायत की।

ऐसा छात्र संघ के चुनावों में हुआ है, स्थानीय निकायों में हुआ है, विधानसभाओं में, लोकसभा चुनाव में हुआ है, उपचुनावों में हुआ है। महाराष्ट्र में बुल्ढाणा जिला परिषद के उपचुनाव में फरवरी 2017 में एक निर्दलीय प्रत्याशी आशा अरुण जोरे ने शिकायत की कि एक बूथ पर ई.वी.एम. में उनके चुनाव चिन्ह का बटन दबाने पर वोट भाजपा के पक्ष में दर्ज हो रहा था। बाद में जिला कलेक्ट्रेट ने मशीन की तकनीकी जांच के बाद तब की देवेन्द्र फडनबीस सरकार को प्रेषित अपनी रिपोर्ट में इस आरोप को सही पाया। मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा के चुनावों में ऐसा कई जगह हुआ। समाजवादी पार्टी, बसपा, कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी पार्टियों ने ई.वी.एम. टैम्परिंग के भारी आरोप लगाये। इन चुनावों के करीब छह महीने बाद नवम्बर 2017 में स्थानीय निकाय के चुनावों में मेरठ के एक अल्पसंख्यक बहुल इलाके के एक बूथ पर कोई भी बटन दबाने पर वोट बी.जे.पी. को जाने को लेकर लगभग पूरा दिन हंगामा बरपा रहा। इसका एक वीडियो भी वायरल हो गया, लेकिन तब मेरठ जोन के प्रखंड आयुक्त प्रभात कुमार ने इसे कुछ तकनीकी खराबी का नतीजा बताया था और नगर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट ने कहा था कि खराब ई.वी.एम. को तत्काल बदल दिया गया। इन्हीं चुनावों में आगरा में गौतम नगर के बूथ नम्बर 69 में भी मतदाताओं ने ई.वी.एम. में कोई भी बटन दबाने पर बी.जे.पी. प्रत्याशी के नाम वोट की पर्ची निकलने की शिकायत की।

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो कांग्रेस के ब्रजेश कलप्पा ने 12 मई 2018 को ट्वीट किया कि बेंगलूरु में आर.एम.वी. 2 स्टेज में उनके माता-पिता एक अपार्टमेंट में रहते हैं। उसके सामने ही 5 पोलिंग बूथ में दूसरे में ई.वी.एम. में कोई भी बटन दबाने पर वोट कमल निशान/भाजपा को जा रहे थे। इसी के साथ उत्तर प्रदेश में हुये उपचुनावों में कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में भी ऐसी शिकायतें सामने आयीं। सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने नूरपुर में 140 ई.वी.एम. में टैम्परिंग का आरोप लगाया।

अप्रैल-मई 2019 में लोकसभा के चुनाव हो रहे थे। पहले चरण में 11 अप्रैल को 91 संसदीय सीटों में 25 सीटें आंध्र प्रदेश की थी और 175 सदस्यों वाली विधानसभा के भी चुनाव साथ-साथ। मुख्यमंत्री एन.चन्द्रबाबू नायडू ने ई.वी.एम. में गड़बड़ी का आरोप लगाया था और कम से कम 150 विधानसभा सीटों के लिये फिर से मतदान कराने की मांग की। और 19 मई तक सात चरणों में हुये संसदीय चुनावों में तो खासकर हिन्दी पट्टी से बटन किसी और पार्टी का दबाने और वी.वी.पैट में पर्ची भाजपा की गिरने की तमाम खबरें चक्कर काटती रहीं। आरोप चन्द्रबाबू ने लगाया, सपा नेता अखिलेश यादव ने लगाया, बसपा की मायावती ने लगाया, राजद ने, कांग्रेस ने लगाया। मजे की बात यह कि न तो कहीं, किसी चुनाव में बी.जे.पी. और उसके किसी सहयोगी दल के उम्मीदवार के लिये ई.वी.एम. का बटन दबाने पर वी.वी.पैट में किसी और पार्टी के प्रत्याशी के नाम की पर्ची गिरने की कोई खबर आयी, न ऐसा कोई वीडियो वायरल हुआ और न ही भाजपा और उसके साथियों ने ई.वी.एम. मैनीपुलेशन का कभी कोई आरोप लगाया।

क्या तब भी इसे मैलफंक्शन कहेंगे, मैनीपुलेशन नहीं।

सवाल, जाहिर है कि उस मुख्य चुनाव आयुक्त से है, जिसने पदभार ग्रहण करने के कुछ ही दिन बाद दोनों का फर्क बताया था। दिसम्बर 2018 में पी.टी.आई. से बातचीत में उन्होंने कहा था, ‘‘टैम्परिंग और मैलफंक्शन दो अलग-अलग बातें हैं। टैम्परिंग में दुर्भावना, गलत इरादा निहित होता है, पर मैलफंक्शन हो सकता है।’’

दिल्ली और मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में चुनावों में कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों की जीत और भाजपा की सरकार नहीं बन पाने को ई.वी.एम. मैनीपुलेशन के आरोपों के खिलाफ सबसे धारदार दलील बी.जे.पी. और उसके साथी ही बनाते रहे हैं। यह लगभग ऐसे है, जैसे बसों, रेलों, मेलों-ठेलों और भीड़भाड़ वाली किसी जगह पर पॉकेटमारी की घटनाओं पर आप पूरी मासूमियत से, पलट कर पूछने लग जायें कि आखिर दो-चार लोगों की पॉकेट ही क्यों काट ली गयी, सबकी क्यों नहीं और आप यह तक न सोचें कि सबकी पॉकेट काट कर तो पॉकेटमार अपने धंधे को ही असंभव बना देगा। लेकिन पी.टी.आई के साथ उसी इंटरव्यू में सी.ई.सी. ने भी कहा था, ‘‘2014 के लोकसभा चुनावों में एक नतीजा आया। कुछ ही समय बाद दिल्ली के असेम्बली इलेक्शन हुये और नतीजा बिल्कुल दूसरा आया। अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम और थोड़ा पहले हुये उप-चुनावों के भी परिणाम एकदम अलग रहे। तो नतीजा ‘एक्स’ हो तो ठीक, ‘वाई’ हो तो ई.वी.एम. फॉल्टी है।’’

यह दलील भावनात्मक थी, तकनीकी तर्क उन्होंने सितम्बर 2019 में मुम्बई विधानसभा चुनावों के वक्त दिया था — चुनावी तैयारियों की समीक्षा के बाद संवाददाताओं से बातचीत करते हुए। उन्होंने कहा था कि ‘आपकी घड़ी, आपके स्कूटर, आपकी कार और किसी भी अन्य मशीन की तरह ई.वी.एम. में भी खराबी आ सकती है। लेकिन दूसरी अन्य मशीनों से ई.वी.एम. इस मायने में अलग है कि यह स्टैंड-अलोन मशीन है और इसमें टैम्परिंग नहीं की जा सकती।’ यह दावा इस तथ्य के बावजूद था कि सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ अक्टूबर 2013 में ही ई.वी.एम. मशीनों को चरणबद्ध तरीके से वी.वी.पैट से जोड़ने का निर्देश दे चुकी थी और दिसम्बर 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में प्रत्येक मतदान केन्द्र में वी.वी.पैट लगाने के फैसले के बाद पहली बार ई.वी.एम. की मतगणना और वी.वी.पैट की पर्चियों का मिलान भी शुरु किया जा चुका था। लेकिन हर विधानसभा क्षेत्र के ‘रैन्डमली सेलेक्टेड’ एक मतदान केन्द्र में। वी.वी.पैट और ई.वी.एम. के अधिकाधिक वोटों का मिलान करने में आयोग की कभी कोई दिलचस्पी रही नहीं, बल्कि वह तो इसे बचता ही रहा।

हद तो यह हुई कि पिछले लोकसभा चुनावों से ठीक पहले सभी लोकसभा क्षेत्रों में ई.वी.एम. की कम से कम 50 प्रतिशत मतगणना का वी.वी.पैट की पर्चियों से मिलान करने की 21 विपक्षी दलों की याचिका पर सुनवाई के दौरान आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर कह दिया कि उसने भारतीय सांख्यिकी संस्थान से एक अध्ययन करवाया है और सेम्पल साईज के निर्धारण में विशेषज्ञता प्राप्त आई.एस.आई. ने जो रिपोर्ट दी है, उसके अनुसार चुनाव में प्रयुक्त 10.35 लाख ई.वी.एम. में से 479 की मतगणना का वी.वी.पैट पर्चियों से मिलान एवं सत्यापन, चुनाव-प्रक्रिया की लगभग शत-प्रतिशत विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिये पर्याप्त होगा। यह झूठ था। सच यह है कि आयोग ने आई.एस.आई,.बेंगलूरु से ऐसा अध्ययन कराने का औपचारिक तौर पर कभी कोई आग्रह नहीं किया। जाहिर है, आई.एस.आई., बेंगलूरु या उसके दिल्ली केन्द्र ने कभी इसके लिये किसी अध्ययन दल का गठन भी नहीं किया।

किया केवल यह गया कि बिना किसी सांस्थानिक औपचारिकता के, दिल्ली केन्द्र के प्रमुख अभय जी.भट्ट, चेन्नई मैथमेटिकल इंस्टीच्यूट के एक निदेशक और भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के एक उप निदेशक की समिति बना दी गयी और उसी की रिपोर्ट को आई.एस.आई. की रिपोर्ट बता दिया गया। आयोग ने ऐसा क्यों किया या कोई भी चुनाव संपन्न होने के एक साल बाद तक वी.वी.पैट की पर्चियां सुरक्षित रखने के खुद अपने ही चुनाव संचालन संबंधी नियम 94 के प्रावधानों के विपरीत, लोकसभा चुनावों के केवल चार महीने बाद सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखकर लोकसभा चुनावों की वी.वी.पैट पर्चियां ‘डिस्पोज’ कर देने का निर्देश क्यों दिया, यह सवाल उतना ही मासूम है, जैसे कोई पूछ बैठे कि हाथरस बलात्कार कांड की पीड़िता का शव रात के अंधेरे में क्यों जला दिया गया। दिल्ली चुनाव आयोग के एक पी.आर.ओ. ने पिछले साल फरवरी में एक न्यूज पोर्टल को एक आर.टी.आई आवेदन पर बताया था कि आयोग के निर्देश के बाद सितम्बर 2019 में ही वी.वी.पैट की प्रिन्टेड पर्चियां नष्ट कर दी गयीं।

समझ के बाहर यह है कि अगर ई.वी.एम. और वी.वी.पैट की पर्चियों के मिलान और भविष्य में भी इसकी संभावना से गुरेज इस कदर है तो वी.वी.पैट लगाने पर अवाम का हजारों करोड़ रुपया जाया क्यों किया गया। कहीं वी.वी.पैट की व्यवस्था का असली हेतु वही तो नहीं, जिसका इशारा पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने अभी पिछले महीने कुछ ट्वीट्स में किया है। उन्होंने कहा है कि वी.वी.पैट में उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह डालने के लिये उन्हें एक सिम्बल लोडिंग यूनिट और एक लैपटॉप से जोड़ा जाता है। आप जब ई.वी.एम. के बैलट यूनिट पर ब्लू बटन दबाकर अपना वोट डालते हैं, तब पहले वी.वी.पैट में आपका वोट प्रिंट होता है, फिर वहीं से आपका वोट ई.वी.एम. के कन्ट्रोलिंग यूनिट में पहुंच कर स्टोर होता है। इस तरह वी.वी.पैट की व्यवस्था के बाद ई.वी.एम. कतई एक स्टैन्ड-अलोन मशीन नहीं है और इसे मैनीपुलेट किया जा सकता है।

और ई.वी.एम. की स्वतंत्र जांच के तो आयेग इस हद तक खिलाफ है कि उसने अपने बहुप्रचारित हैकाथॉन में इन मशीनों को हैक करने की चुनौती देते हुए तकनीकज्ञों को ई.वी.एम. मुहैया कराना तो दूर, उन्हें मशीन छूने देने तक पर रोक लगा दी। चुनाव आयोग ने 2017 में एक आर.टी.आई. आवेदन पर माना था कि छत्तीसगढ़, गुजरात और मध्यप्रदेश के चुनावों के दौरान ई.वी.एम. चोरी और लूट की कम से कम 70 घटनाएं सामने आयीं हैं और आयोग के डिप्टी कमिश्नर सुदीप जैन ने बाद में इकॉनामिक टाइम्स से बातचीत में कहा कि ‘लेकिन ऐसे किसी भी तरह से एक बार चुनाव प्रणाली से निकल गया ई.वी.एम. दोबारा कतई प्रणाली में शामिल नहीं किया जाता है, लिहाजा टैम्पर्ड ई.वी..एम. के इस्तेमाल और इससे चुनाव नतीजों के प्रभावित होने का रत्ती भर भी कोई सवाल ही नहीं उठता। लेकिन आयोग ने अपने ही डिप्टी कमिश्नर की इस दलील पर रत्ती भर भी ऐतबार नहीं किया।

एतबार किया होता तो हैकाथॉन में  तकनीकज्ञों को ई.वी.एम. मुहैया करा दी जातीं और बाद में उन मशीनों को हमेशा के लिये चुनाव प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता। लेकिन शायद वे जानते होंगे कि अगर ई.वी.एम. टेक्नोलॉजिस्टों को मिल गया तो वे रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिये उनका सोर्स कोड जान लेंगे और फिर उन्हें मैनीपुलेट कर चुनाव नतीजों को बदल दिया जा सकेगा। दस-ग्यारह साल पहले हैदराबाद के एक प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ हरि प्रसाद ने तो चोरी की मशीन रखने के अभियोग में गिरफ्तार तक कर लिया गया था। उन्होंने नीदरलैंड्स और अमरीका के कुछ जाने-माने विशेषज्ञों की अपनी टीम के साथ इसकी जांच की घोषणा तो की ही थी, इसके लिये किसी तरह वास्तविक ई.वी.एम. मशीन भी हासिल कर ली थी।

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on March 31, 2021 5:51 pm

Share