बीच बहस

कानून व्यवस्था के दुर्ग में शराबबंदी की सेंधमारी

फरीदाबाद बाय पास रोड, खेड़ी पुल पर बसी भारत कालोनी में पूर्ण शराबबंदी वाले राज्य बिहार के मजदूर सैकड़ों की संख्या में रहते हैं- 6×8 फुट के कमरों में चार-पांच तक, सम्मिलित किराया अमूमन 2000 रुपये। इन्हीं में से एक 23-24 साल की आयु का प्रभाकर (बदला नाम) अपने गृह शहर सिवान निवासी पेंट करने वालों की टोली के साथ मेरे घर पर करीब 40 दिन काम करता रहा। बातों में पता चला कि वह कोरोना लॉकडाउन के दौरान अपने गाँव में रह गया था और उत्तर प्रदेश में पड़ने वाले पड़ोसी शहर देवरिया से शराब लाते हुए पकड़े जाने पर 6 माह जेल भी काट आया था। “वोटर तो हम लालू के हैं लेकिन हमने इस बार वोट नीतीश को दिया था।” क्यों? क्योंकि शराबबंदी तो नीतीश ही करेंगे।

बिहार के गाँव-गाँव में शराब पहुँच रही है। प्रभाकर के अनुसार, उसके ही गाँव के कितने ही नौजवान मोटर साइकिल से रोज देवरिया की शराब दुकानों या ईंट-भट्ठों जैसे जाने पहचाने ठिकानों से देशी शराब लाकर प्रति खेप 1500-2000 रुपये तक बचा लेते हैं। जिस दिन प्रभाकर पकड़ा गया, वह एक साथी के साथ पांचवीं खेप ला रहा था। जाहिर है, जब इतनी कमाई हो तो वह अपना वोट नीतीश को क्यों नहीं देगा।

बिहार के एसपी (प्रोहिबिशन) राकेश कुमार सिन्हा की 6 जनवरी की चिट्ठी वायरल हो रही है जो उन्होंने राज्य के हर जिला एसपी को संबोधित की है। इसमें कहा गया है कि बिहार राज्य के हर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में शराब पूर्ण धड़ल्ले से बिक रही है, जिसमें सम्बंधित अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों (यानी सत्ताधारियों) की मिलीभगत है। सिन्हा ने यहाँ तक भी सुझाव दिया कि एक्साइज विभाग के साथ तैनात पुलिसकर्मियों की चल-अचल संपत्ति की तुरंत जांच होनी चाहिए और आशंका जतायी कि ऐसा हो तो सरकारी व्यवस्था हिल जायेगी। जांच तो खैर क्या ही होनी थी, इस पत्र के 13 दिन बाद 19 जनवरी को नीतीश सरकार ने सिन्हा का तबादला कर दिया। उनके बाद आये अफसर ने उनकी उपरोक्त चिट्ठी भी रद्द कर वापस ले ली।

गत एक वर्ष में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में कितने ही शराब घोटाले सामने आये हैं। इनमें, एक्साइज पालिसी की बन्दर-बाँट पर मीडिया में आयी रपटों या अकाल मौतों पर होने वाले शोर-शराबे के बीच शराब के बड़े पैमाने पर अवैध उत्पादन में लाइसेंस शुदा शराब कारखानों की संदिग्ध भूमिका भी उजागर हुयी। यह भी कोई अबूझ पहेली नहीं कि यह शराब जाती कहाँ है? मुख्यतः गुजरात और बिहार। क्योंकि इन दो राज्यों में पूर्ण शराबबंदी के चलते तस्करी से पहुँचाने वाली शराब की हर बूंद कई गुना कीमती बन जाती है। करीब दस वर्ष पूर्व नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व वाले गुजरात में अवैध शराब का कारोबार 30 हजार करोड़ का आँका गया था। नीतीश का आज का बिहार भी इससे पीछे नहीं होगा।

पटना में पिछले दिनों इंडिगो एयरलाइन्स के लोकप्रिय स्टेशन मैनेजर रूपेश कुमार की बेख़ौफ़ माफिया द्वारा हत्या को लेकर नीतीश कुमार पर, जो स्वयं गृह मंत्रालय सम्हालते हैं, काफी दबाव आ गया था। ऐसे मौकों पर नीतीश लोगों को लालू के ‘जंगल राज’ की याद दिला कर बच निकलना चाहते हैं। लेकिन, समझना होगा, बिहार में नीतीश के राजनीतिक नेतृत्व में नशाबंदी एक ऐसे माफिया तंत्र को जन्म देने में सक्षम हो रहा है जो लालू के ‘जंगल राज’ की स्मृति को फीका कर देगा।

ऐतिहासिक कारणों से, गुजरात की तरह बिहार में बहुमुखी आर्थिक गतिविधियाँ नहीं पनप सकी हैं जो युवा को सम्मानजनक रोजगार के बहुतेरे विकल्प देती हों। लिहाजा, गुजरात में शराबबंदी की धारा आपराधिक परिदृश्य पर प्रकट रहते हुए भी सामाजिक परिदृश्य पर गौण बनी रह सकती है। लेकिन बिहार, जो नदियों में प्रलयंकारी बाढ़ों के सामने अपने टूटते बांधों के लिए भी जाना जाता है, कहीं अवैध शराब की इस बढ़ती सेंधमारी के आगे अपनी ढहती कानून-व्यवस्था के लिए न मशहूर होने लगे।

(विकास नारायण राय हैदराबाद स्थित पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

This post was last modified on January 23, 2021 12:24 am

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