Sunday, May 22, 2022

रूस-यूक्रेन युद्ध में हम यानि भारत के नागरिक

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जिस युद्ध का हम हिस्सा नहीं हैं उसमें हमारे किसी नागरिक की मौत एक राजनीतिक खबर की तरह आनी चाहिए। लेकिन, यह खबर भारत के एक परिवार के सदस्य की मौत की तरह आई मानो वह एक दुर्भाग्य का शिकार हो गया हो। यह हमारी राजनीतिक चेतना पर एक बड़े सवाल की तरह है जिसके कारणों की तह में जरूर जाना चाहिए। यूक्रेन में पढ़ रहे भारत के एक छात्र नवीन अपने घर नहीं लौट सके। जब वे भोजन के लिए बाहर निकले, तो रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध के शिकार हो गये। वे बहुत से छात्रों की तरह ही यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई करने गये थे। उनका इस हो रहे युद्ध से कोई लेना देना नहीं था। उनका रूस और यूक्रेन के बीच के राजनीतिक और सामरिक विवाद, नाटो का हस्तक्षेप और रूस की रणनीति आदि किसी भी बात लेना देना नहीं था। वे काफी अच्छे अंकों के साथ पास हुए थे और उनका एडमिशन भारत के किसी मेडिकल कालेज में हो जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यहां प्राइवेट कालेज में जाने की हैसियत नहीं बनी, इसलिए वे यूक्रेन चले गये। नवीन को डाक्टर बनना था। वे वहां डाक्टर बनने गये थे। लेकिन, दो देशों के युद्ध के शिकार हो गये। उन्हें विश्व राजनीति में हस्तक्षेप करने की राजनीति में नहीं उतरना था। लेकिन वे इसके शिकार बने। भारत के बहुत से छात्र अभी भी मौत के इस साये के बीच लौट आने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।

नवीन जिस देश के नागरिक हैं उस देश की जरूर इस युद्ध में एक भूमिका बनती है। भारत विश्व राजनीति का सक्रिय हिस्सा है। वह तय कर रहा है कि कब रूस का पक्ष लेना है, कब यूक्रेन का और कब किसी का पक्ष नहीं लेना है। हम इसकी खबरें संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण, वोट आदि की प्रक्रिया में देख सकते हैं। जब मैं देश कह रहा हूं तो यह मैं अपने देश भारत के बारे में कह रहा हूं। लेकिन, भारत की उपस्थिति तो सरकार के तौर पर नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों और समूहों के माध्यम से ही होती है। यह दूतावासों और विदेश मंत्रालय के माध्यम से प्रतिनिधित्व पाता है। यह भारत की घरेलू जरूरतों और उसके मुताबिक विदेश नीति के साथ साथ क्षेत्रीय और सामरिक पक्ष भी इसके साथ जुड़े होते हैं। इसमें राजनीतिक झुकाव की भी बड़ी भूमिका होती है।

नवीन भारत के नागरिक होते हुए जब विदेश पढ़ने जा रहे थे तब उन्हें इन राजनीतिक अंतर्संबंधों के बारे में पता रहा होगा, कहना मुश्किल है। पढ़ाई के संदर्भ में पासपोर्ट और दूतावास, कालेज की स्थिति, खर्च आदि से ही अधिक लेना-देना रहा होगा। वहां रहते हुए धीरे-धीरे वे जरूर यूक्रेन के इतिहास से रूबरू हुए होंगे, जो कभी विशाल घास का मैदान हुआ करता था, और उसी के साथ साथ खेती से जुड़ा समाज करवट बदलते हुए एक नई भौगोलिक संरचना में ढल रहा था। कभी सोवियत रूस, फिर पोलैण्ड, जर्मनी और फिर रूस के साथ यह देश कई राजनीति बदलावों से गुजरा। यहां कई तरह की राजनीतिक धाराएं पैदा हुईं। कई राजनीतिक हस्तियां हुईं जिनका नाम यूक्रेन से जुड़ा हुआ है। खासकर, ख्रुश्चेव और ब्रेझनेव, जिन्होंने सोवियत रूस की आधारभूमि को खत्म कर देने का काम किया। लेकिन, विश्व राजनीति में साम्राज्यवादी ध्रुवीकरण में एक अहम भूमिका अदा की। भारत का इन बनती बिगड़ती राजनीति के साथ गहरा रिश्ता रहा है।

1991 में रूस से अलग होकर यूक्रेन एक आजाद देश बन गया। रूस से अलग होने से पहले तक यूक्रेन के हिस्से में रूस के कुल बजट का बड़ा हिस्सा हस्तांतरित होता रहा था। हथियारों का उत्पादन इसमें सर्वोपरि था। औद्योगिक उत्पादन में भी यह काफी आगे था। यह भी कह सकते हैं कि इसकी बदौलत ही यूक्रेन ने रूस से अलग होना बेहतर समझा। उस समय तक रूस की आर्थिक बदहाली चरम पर थी। यह रूस के लिए अच्छा नहीं था। लेकिन, अमेरिका के लिए जरूर अच्छा था। वह मध्य एशिया में सक्रिय तौर पर उतर चुका था।

1990 के बाद यूक्रेन रूस और अमेरिका के बीच आ गया था। जैसे-जैसे अमेरिका अफगानिस्तान से होते हुए इराक, लीबिया और पूरे मध्य एशिया में नियंत्रणकारी भूमिका में आता गया, वह पूर्वी यूरोप के देशों में सीधे उतरने के लिए बेचैन होने लगा। इससे वह चीन और रूस की मोर्चेबंदी कर उन्हें उनकी सीमाओं तक समेट देने की रणनीति पर काम कर रहा था। उसने जिस तरह मध्य एशिया में निहायत धर्मांध प्रतिक्रियावादी समूहों को आगे बढ़ाया उसी तरह का काम यूक्रेन जैसे देशों में किया। वहां उसने दक्षिणपंथी ताकतों को बढ़ावा दिया, जिन्हें नव-नाजीवाद कहते हैं। रूस ने महान रूस की पुरानी धारणा को पैदा किया और यूक्रेन को तोड़ने में सफल रहा। अमेरिका नाटो के माध्यम से अपनी सीधी उपस्थिति बनाने के लिए बेचैन हो गया। नाटो की उपस्थिति का अर्थ यूरोप की उपस्थिति भी है। निश्चित ही इस बात ने यूक्रेन में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाजी जर्मनी की याद दिला दी होगी। शायद, यही कारण है कि रूस वहां दूसरे विश्वयुद्ध को लेकर रूस के खिलाफ लाये जाने वाले प्रस्ताव का विरोध कर रहा था। यह एक ऐसा बिंदु है जहां से रूस और यूक्रेन में रह रहे बहुत सारे लोगों के लिए भी असहजता पैदा कर रहा था। यह एक ऐसा ध्रुवीकरण है जो रूस के खिलाफ 1917-1919 तक और फिर दूसरे विश्वयुद्ध में दिखाई दिया था। हस्तक्षेप का रास्ता पोलैण्ड, यूक्रेन होते हुए ही जाता है।

रूस और अमेरिका के बीच यूक्रेन की स्थिति एक ऐसे युद्ध का माहौल बनाती है जिसका भौगोलिक फैलाव यूरोप और अमेरिका तक है। चीन और दक्षिण एशियाई देशों ने इससे खुद को बाहर रखा हुआ है। मध्य एशिया की भी भूमिका इसमें नहीं दिखती है। लेकिन, भारत के लिए स्थिति निश्चित ही नाजुक है। भारत हथियारों के लिए रूस पर अधिक निर्भर है तो अर्थव्यवस्था के लिए अमेरिका पर। क्षेत्रीय सामरिक हालात में भी भारत की निर्भरता अमेरिका पर है। लेकिन, अमेरिका एक स्वतंत्र देश की तरह व्यवहार करने की बजाय नाटो का सहारा अधिक ले रहा है।

इस हालात में भारत की भूमिका निश्चय ही जटिल है। लेकिन, यूक्रेन में भारत के नागरिकों के प्रति भूमिका निर्वाह करने में क्यों कठिनाई आई? समझ से परे है। विश्व-राजनीति में तेजी से हो रहे बदलाव और यूक्रेन की उठापटक वाली राजनीति के बीच गहरे हो रहे रिश्ते 2014 से ही साफ हो चले थे। युद्ध की आशंकायें हकीकत में बदलने की ओर बढ़ चली थीं। ऐसे में भारत से यूक्रेन पढ़ने जा रहे छात्रों को सचेत करने, उनकी स्थिति के प्रति सतर्क रहने की जरूरत थी। निश्चित ही इसमें मुख्य जिम्मेदारी सरकार का नेतृत्व करने वाले समूहों पर ही निर्भर है। एक शब्द में कहें तो इसकी जिम्मेदारी भारतीय विदेश मंत्रालय पर है। युद्ध में अक्सर ही मानवीय सकंट पैदा होते हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसमें हस्तक्षेप करता है। खासकर, 1990 के बाद से मध्य एशिया में लगातार चल रहे युद्धों की वजह से भारतवासी इस तरह के संकटों का सामना कर रहे हैं। मजदूरों, कर्मचारियों और अब छात्रों का संकट में फंस जाना सचमुच दुखदायी है और उससे भी अधिक भारतीय राजनय और विदेश मंत्रालय की स्थिति और भी पीड़ादायक है।

जयंत कुमार (जयंत आर्थिक और सामाजिक मामलों के जानकार हैं।)

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