Monday, December 6, 2021

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जेल के अंधेरों के लिए भी ज़रूरी हैं रोशनी की चंद किरणें

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Janchowk Official Journalists in Delhi

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कई फीट ऊंची दीवारों के पीछे, सूरज की किरणों से भी महरूम कर दिये गये बन्दियों की नज़रें दौड़ती हैं उन शहरों, गलियों और अपने घरों की ओर जिनसे उनका जीवन जुड़ा है। लेकिन शाम होते-होते ये थकी, उदास नज़रें जेल के विशाल गेट पर आकर सूनी हो जाती हैं। पिछले एक साल से ये हजा़रों आंखें सुबह की रोशनी में चमकती हैं कि शायद आज मिलाई की इजाजत मिल जाये, लेकिन शाम होते-होते मद्धम पड़ जाती हैं। जेल की जो तन्हाईयां कभी मिलाई की पर्ची के आते ही गुलजा़र हो जाती थीं, इन दिनों वहां खौफनाक खामोशी है। धीरे-धीरे बाहर का डर भीतर समाता चला जा रहा है।

नन्हा राजा मां से बिस्कुट, टाफी और खिलौनों की ज़िद करता है जो कि उसकी नानी लाकर देती थी मिलाई पर। मारिया की दवाईयां खत्म हो गयी हैं और उसके गर्दन का दर्द बढ़ता जा रहा है। जेल में दवाएं मिलती नहीं, परिजन बेबस हैं घर से निकल सकते नहीं। नदीम चाचा टूटे चश्मे को किसी तरह जोड़ कर सालभर से इस आस में पहने हुए हैं कि जल्द ही मिलाई खुलेगी और बेटी नया चश्मा और ज़रूरत का खर्च भी दे जायेगी। काली का अवसाद अपनी नई नवेली पत्नी की याद में बढ़ता जा रहा है। लाखों लोग हैं जेलों के भीतर जो पिछले एक साल से परिजनों से मिलाई न हो पाने, समय पर खर्च के लिए पैसा न मिल पाने के कारण कई भीषण दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। लेकिन इसी देश के नागरिक, इन बन्दियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

लाकडाउन के इस समय में जब हम सब बाहरी दुनिया में कई प्रकार की दिक्कतों का सामना कर रहे हैं तो ऐसे समय में जेल जहां कि पहले ही अभाव और दुश्वारियों का बोलबाला होता है, वहां इन दिनों क्या मंजर होगा कोई नहीं जानता। सिद्धान्त रूप में जेलों को सुधारगृह भी कहा जाता है लेकिन जिस तरह का सामन्ती, तनावग्रस्त, दमघोंटू, गन्दगी और बीमारियों वाला वातावरण जेलों में होता है, उसमें नकारात्मकता विकसित होने के भरपूर अवसर होते हैं। साफ पानी, स्वच्छ हवा, विषाणु और कीटाणु रहित परिवेश, और पौष्टिक भोजन आदि जेल के जीवन से कोसों दूर होते हैं। देश की ज्यादातर जेलों की अन्धेरी कोठरियां, अण्डा सेल और बैरकें किसी भी वायरस को फैलने का माकूल अवसर देती हैं। यही कारण है कि महामारी की दूसरी लहर में जेलों में कोरोना संक्रमण तीव्र हुआ है।

क्योंकि इस दौर में भी भारत की ज्यादातर जेलें कैदियों से खचाखच भर दी गयी हैं, बल्कि पिछले कुछ सालों में बन्दियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गयी है। जो नियम पूरी दुनिया में संक्रमण को रोकने के लिए उपयोगी माने जा रहे हैं वे जेलों पर लागू नहीं किये गये हैं, जिसके कारण हजारों कैदियों की जान खतरे में है। 2019 की जेल बन्दी रिपोर्ट के अनुसार देश की जेलों में कुल क्षमता से 18.5 प्रतिशत कैदी अधिक हैं। कुल कैदियों में से 69.05 विचाराधीन कैदी थे। जेलों में क्षमता से 118.05 प्रतिशत कैदी अधिक रखे गये हैं। इन आंकड़ों में पश्चिम बंगाल की जेलों के आंकड़े नहीं हैं। देश की कई जेलों में क्षमता से दोगुने कैदी रखे गये हैं।

सीएचआरसी (कामनवेल्थ हयूमन राइट्स इनिशिएटिव) बताता है कि इस वक्त 5 लाख कैदी जेलों में हैं और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की जेलों में कैदियों की संख्या सीमा से दुगनी है। संगठन की प्रमुख मधुरिमा धानुका का मानना है कि कोरोना की पहली लहर में 18 हजार से अधिक कैदियों और जेल कर्मचारियों को संक्रमण हुआ था। इनके अनुसार 27मई 2020 से 14 दिसम्बर 2020 तक पूरे देश में 18157 कैदियों और जेल कर्मचारियों को कोविड का संक्रमण हुआ। इस आंकड़े के अनुसार केवल उत्तर प्रदेश की जेलों में पिछले साल लगभग 7000 कोविड के मामले आये। महाराष्ट्र की जेलों में 2752 और असम की जेलों में 2496 कोविड के मामले सामने आये।

इस दौरान 17 लोगों की मौतें हुईं, ये मीडिया में रिपोर्ट हुए आंकड़े हैं, वास्तव में यह आंकड़ा कहीं ज्यादा हो सकता है। इसी संगठन की अमृता पाल कहती हैं सरकार ने न तो दूसरी लहर के विषय में सोचा और न ही उसने न्यायिक क्षेत्र को इस सन्दर्भ में सूचित किया। वास्तव में हमारे समाज का नजरिया कैदियों के प्रति नकारात्मक है। यह मान लिया जाता है कि उनको देखभाल की जरूरत नहीं है। जेलों में संक्रमण की बढ़ती स्थिति को देखते हुए 8 मई को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जिन बन्दियों को पूर्व में 90 दिन की पैरोल दी गयी थी उनको फिर पैरोल पर रिहा कर दिया जाय ताकि संक्रमण को नियन्त्रित किया जा सके।

जेल बन्दियों के प्रति हमारे समाज में विभिन्न प्रकार की किस्सागोई बना दी जाती है। पुलिस, अदालतें, वकील और मीडिया सभी इसका हिस्सा होते हैं जिससे कि समाज को प्रभावित कर दिया जाता है। एक बन्दी के तौर पर मैंने इन सबको महसूस किया है और झेला भी है। यदि एक बार पुलिस केस बना दिया गया तो फिर आप मुकदमे का फैसला होने से पहले ही अपराधी घोषित हो जाते हैं। सालों-साल चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया इन्सान को कहीं का नहीं छोड़ती है। पिछले साल से न्यायालयों में जरूरी मुकदमों की सुनवाई नहीं हो रही है। समय पर सुनवाई नहीं होने का खामियाजा जेलबन्दियों और उनके परिजनों को भुगतना पड़ रहा है। फैसले और ज़मानत के इंतज़ार में कितने ही मुजरिम अनावश्यक जेल में रहने को मजबूर हैं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने भारत में पीक पेंडेंसी पर नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्राइंड का डेटा साझा किया है जिसके अनुसार 24 मई तक भारत में मामलों की कुल संख्या 32.45 मिलियन है। 9.045 लाख सिविल मामले हैं और 23.39 मिलियन आपराधिक मामले हैं। उन मामलों में 32 प्रतिशत मामले एक वर्ष पुराने हैं। 28 प्रतिशत मामले एक से तीन साल तक लंबित मामलों की श्रेणी में आते हैं। 15 प्रतिशत मामले तीन से पांच साल की पेंडेंसी की श्रेणी में आते हैं। फिर 15.28 प्रतिशत मामले उन वर्गों के हैं जो पांच से दस साल पुराने हैं। 7.1 प्रतिशत मामले 10 से 20 साल की अवधि के लिए लंबित हैं। कितने ही उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं कि सालों जेल का यंत्रणामय जीवन बिताने के बाद जब किसी बन्दी को सभी आरोपों से बरी कर दिया जाता है तो उसके पूरे जीवन को झूठे केसों में फंसा कर बरबाद करने वालों के खिलाफ न्यायालय मौन रहते हैं।

जेल बन्दियों के बारे में आज संवेदनशील और प्रगतिशील नजरिये से सोचा जाना चाहिए। लगभग एक वर्ष से जेल बन्दियों को अदालतों में पेशी, वकीलों, परिजनों, दोस्तों की मुलाकात से जिस तरह महरूम कर दिया गया है, यह उनके मानवाधिकारों का हनन है। लेकिन इस विषय को प्रमुखता से नहीं उठाया जा रहा है। इन दिनों जेल बन्दी जिन शारीरिक व मानसिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं उसको व्यक्त करने और उसका समाधान करने के अधिकार से उन्हें वंचित कर दिया गया है। डर और भय के माहौल में रहने को मजबूर किये गये जेल बन्दी पहले से ही तनावग्रस्त होते हैं। ऐसे में जब बाहरी दुनिया की महामारी की खबरें उनको मिल रही होंगी और तो उनका मानसिक तनाव कितना गुना बढ़ जाता होगा यह अनुमान लगाना अब मुश्किल नहीं लगता है। क्योंकि आज समाज में हर दूसरा इन्सान किसी न किसी वजह से तनाव में है और इस विषय पर आज खुल कर बात हो रही है। इसलिए जेल बंदियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी विचार किए जाने की सख्त ज़रूरत है।

जेल बन्दियों के लिए मुलाकात या मिलाई एक सुहानी बयार के माफिक होती है, मिलाई का दिन उल्लास और खुशी का होता है, जब उनको प्यार करने वाले, उनके अपने उनसे मिलने के लिए आते हैं। जब किसी कैदी की मिलाई आती है तो केवल खाने-पीने का सामान ही आपस में साझा नहीं होता है बल्कि अपनों की बातें भी आपस में बांटी जाती हैं। मिलाई उनके तनाव को दूर करने में दवा से भी ज्यादा कारगर होती है और बन्दियों को जेल के कठिन जीवन को झेलने की ताकत देती है। यदि जेल बन्दी एक-दूसरे का दर्द महसूस करते हुए जेल के यन्त्रणामयी जीवन में भी जीने की वजह न खोज लें तो यह स्थिति और भी ज्यादा भयानक हो सकती है। तन्हाई और अण्डा सेल में रखे गये कैदियों के पास तो अपने सुख-दुःख साझा करने का यह अवसर भी नहीं होता है।

सरकार कहती है कि बन्दियों को परिजनों से फोन पर बातें करने की सुविधा दी गयी है। पहली बात तो यह है कि हमारे देश की जेलों में आधुनिक सुवधिाओं का सख्त अभाव है उस पर भ्रष्टाचार में डूबे जेल प्रशासन के कारिंदे गरीब कैदियों को तो इन्सान ही नहीं समझते। तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि कितने कैदी फोन से अपने परिजनों से बात कर पा रहे होंगे? दूसरी बात यह कि महीने में एक या दो दिन, कुछ मिनट फोन से बात कर लेने से न तो उनको मानसिक सकून मिल सकता है और न ही उनकी रोजमर्रा की जरूरी चीज़ों और जरूरी खर्चों की पूर्ति हो सकती है।

जेल बन्दियों के परिजनों की मनः स्थिति भी इस दौर में कम भयानक नहीं है। जबकि मौत का खतरा चारों और मंडरा रहा है और अधिकांश जेलों में न तो अस्पताल की सुविधा है और न ही डाक्टर की। कुछ मामूली दवाइयों और कम्पाउडर के भरोसे बड़ी से बड़ी जेलें संचालित की जाती हैं। आज जब देश के अधिकांश सरकारी-प्राइवेट अस्पतालों की सच्चाई उघड़कर दुनिया के सामने आ गयी है। ऐेसे समय पर यदि कोई बन्दी गम्भीर बीमार हो जाता हो तो उसके लिए अस्पताल और बेड की उपलब्धता हो पा रही होगी? क्या बन्दियों के सही ईलाज के वास्तव में प्रयास किये जा रहे होंगे? एक या दो प्रतिशत बंदियों के परिजन अदालत के माध्यम से यह सुविधा दिलवाने में सक्षम हुए भी हो सकते हैं, लेकिन 98 प्रतिशत बंदियों को तो भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया है?

9 मई की पीटीआई की खबर के अनुसार मुंबई हाई कोर्ट ने आर्थर रोड जेल में कोविड को फैलने से रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार को उचित नीतिगत फैसले लेने का निर्देश दिया है। आर्थर रोड जेल में कम से कम 77 कैदी और 26 कर्मी इस हफ्ते कोरोना से संक्रमित पाये गये। न्यायमूर्ति भारती डांगरे जब कैदी अली अकबर श्राफ की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थीं तब उन्होंने यह वक्तव्य दिया कि “हालत गंभीर हैं और ऐसी आकस्मिक स्थिति में राज्य सरकार तथा नीति निर्माताओं को फैसला लेना चाहिए। जेल में क्षमता से अधिक बंदी न हों जिससे कि संक्रमण को बढ़ावा मिले। अधिकारियों को यह याद रखना चाहिए कि कैदियों के पास भी सुरक्षित और स्वस्थ माहौल में रहने का अधिकार होता है।” लेकिन क्या हमारी सरकारें कैदियों के इन अधिकारों के प्रति ज़रा भी ध्यान देती हैं? क्या देश की अन्य जेलों में कितने बन्दी संक्रमित हुए, कितनों की मौत हुई, ये आंकड़े कभी दर्ज हो पाएंगे?

 पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अपराध की प्रकृति, जेल की सजा और अपराध की गंभीरता के आधार पर पैरोल और जमानत पर लगभग 68 हजार से अधिक कैदियों को रिहा किया गया था, यही बात इस वर्ष भी कही गयी है। भले ही यह निर्णय कुछ हद तक सही रहा है, लेकिन अधिक उम्र और बीमारी के कारण जेल के वातावरण में जिन बन्दियों को संक्रमण का अधिक खतरा है, क्या न्यायालय को इस प्रकृति को ध्यान में नहीं रखना चाहिए था? यहां पर यह कहना इसलिए जरूरी है कि महाराष्ट्र, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्र-उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व के राज्यों, पश्चिम बंगाल और दिल्ली आदि अधिकांश राज्यों में बहुत बड़ी संख्या में राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को यूएपीए और राजद्रोह के झूठे आरोपों में जेल में बन्द किया गया है। इनमें से बहुत से बन्दी बुजुर्ग और विभिन्न प्रकार की बीमारियों से ग्रसित कार्यकर्ता हैं। चूंकि राजद्रोह की सजा तो आजीवन कारावास है। तो क्या इसलिए ये बन्दी पैरोल और जमानत के हकदार नहीं माने जायेंगे? क्या इनके सारे अधिकारों को सिर्फ इसलिए ताक पर रख दिया जायेगा कि इन्होंने शासक वर्ग के विचार और नीतियों के विरूद्ध आवाज़ उठाई और इनके ऊपर यूएपीए की संगीन धाराएं लगाई गयी हैं, ये कहां का न्याय है?

जिन बंदियों को सिर्फ राजनीतिक असहमति के कारण विभिन्न प्रकार के फर्जी दस्तावेज बनाकर जेलों में कैद किया गया है क्या आज उनके पक्ष में बोला नहीं जाना चाहिए ? क्या सरकार के कहने भर से उन्हें देशद्रोही मान लिया जाना चाहिए? क्या हम भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव आदि क्रान्तिकारी शहीदों को भूल सकते हैं, जिनको अंग्रेजो़ं की खिलाफत करने पर यही राजद्रोह की धाराएं लगाई गयी थीं? क्या हम वास्तव में जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए वाले लोकतन्त्र में रह रहे हैं? आज हम इस विषय पर बात करने से कैसे बच सकते हैं? क्या अपने जल-जंगल के लुटेरों, देश को लूटने वाले पूंजीपतियों और उनके दलालों के बारे में चुप लगानी चाहिए? क्या हमें आदिवासियों के हक में खड़े होने वाले 84 साल के फादर स्टैन स्वामी की पैरवी नहीं करनी चाहिए?

कश्मीरी अवाम के साथ होने वाली ज्यादतियों पर हम आंख मूंद लें? दलितों, वंचितों की आवाज़ उठाने वाले, भीमा कोरेगांव केस में बन्द किये 83 साल के कवि वरवर राव जिनको कोविड संक्रमण होने के बाद तब सशर्त महज 6 महीने की जमानत दी गयी, जबकि वे अपना होशोहवाश खोने लगे थे के स्वास्थ्य के अधिकार पर बात ना करें। सुधा भारद्वाज, शोमासेन, गौतम नवलखा और आनन्द तेलतुम्बड़े, जीएन साईंबाबा, हैनी बाबू, प्रशांत राही, वर्नन गोंसालविस जैसे न जाने कितने ही मानवाधिकार कार्यकर्ता, शिक्षक, वकील, लेखक, पत्रकार, नौजवान, महिलाएं जेलों के भीड़ भरे माहौल में ठूंस दिये गये हैं। इनमें से कितने ही या तो कोराना से संक्रमित हो गये हैं या कि इसकी सम्भावना बनी हुई है। इन हालातों में भी इन्हें जमानत के हक से वंचित किया जाना क्या बन्दियों के मानवाधिकारों का हनन नहीं है?

क्या हम जेल बन्दियों के अधिकारों को जानते-समझते हुए भी खामोश रहें? हम चुप लगाये जायें कि असहमति को व्यक्त करने पर कोई न कोई मुकदमा लगाकर जेल भेज दिया जायेगा? हम इसलिए न बोलें कि कि हमें ‘पिंजरा तोड़’ की जुझारू लड़कियों की तरह बदनाम करके जेलों में ठूंस दिया जायेगा? सीएए, एनआरसी कानून का विरोध करने पर जिन महिलाओं, छात्रों, नौजवानों को कैद किया गया है उनके बारे में न सोचें? उत्तरप्रदेश के चैराहों पर पोस्टर लगा दिये जाने कि बाद पुलिस-प्रशासन ने जिनको सरे राह बदनाम करने की कोशिश की है क्या उनके नागरिक सम्मान के अधिकार पर बहस न करें? क्या हाथरस केस की पड़ताल के लिए जा रहे पत्रकार सादिक कप्पन को जिन स्थितियों में जेल में रखा गया था उसकी पड़ताल नहीं की जानी चाहिए?

न्यायालय की धीमी कानूनी प्रक्रिया के कारण झारखण्ड, छत्तीसगढ़, आसाम, उत्तरप्रदेश, जम्मूकश्मीर आदि राज्यों में गरीबों, मुस्लिमों और आदिवासियों को केस पर केस लगाकर सालों साल जेल में मरने की हद तक रखा जा रहा है। गरीबी, अभाव और पुलिस के डर से कितने ही परिवार पैरवी नहीं कर पाते हैं और जेल की चारदीवारी के पीछे कब युवा बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रख देते हैं उनको खुद भी पता नहीं लग पाता। क्या आज इस विषय पर गंभीर विमर्श की ज़रूरत नहीं है?

जेल बंदियों की मिलाई पर जब पूरी तरह रोक लगी हुई है, इन परिस्थितियों में उनकी जो बुनियादी ज़रूरतें हैं इस पर ध्यान दिया जाना आज फौरी ज़रूरत है। न्यायालय द्वारा इस संदर्भ में दिशानिर्देश जारी करने चाहिए। चूँकि न्यायालय और जेल प्रशासन के लिय बंदियों के होने या ना होने का विशेष महत्व नहीं होता है। इसलिए जेल बंदियों के हालात दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं। एक या दो बंदियों के लिए नहीं, बल्कि उन सभी राजनितिक बंदियों के न्यायिक अधिकारों के लिए आज आवाज़ उठाने की ज़रूरत है जो कि राजनीतिक असहमति के कारण यूएपीए की धाराओं और अन्य झूठे मुकदमों में जेलों के भीतर हैं। जेल बन्दी की परिजन होने का जो दर्द और पीड़ा मेरे भीतर खदबदा रही है, वही दर्द मैं आप सबसे साझा करना चाहती हूँ। मेरे जैसे कई परिजन देश भर की जेलों में बंद अपने लोगों के लिए चिंतित हैं। अत: मेरा सभी इन्साफ पसंद लोगों से आग्रह है कि जेल बंदियों के अधिकारों पर खुलकर चर्चा हो और उनकी रिहाई के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएँ। 

अँधा कुंआ बन गईं जेलों को रोशनी की ज़रूरत है। जेलों बंदियों के स्वास्थ्य स्थितियों पर गौर करके सभी बंदियों का समुचित इलाज हो, इसके लिए जेल प्रशासन की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। उनके साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार को समस्या के बतौर चिन्हित किया जाना चाहिए। राजनीतिक बंदियों को भी पैरोल, जमानत मिलने का अधिकार होना चाहिए। जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि आम लोगों के लिए जेलें और जेल बंदी अजूबा ना हों। यह तभी संभव है जबकि इस दिशा में सचेत प्रयास किए जाएँ।

(चन्द्रकला सामजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। और आजकल देहरादून में रहती हैं।)

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