Sun. Dec 8th, 2019

क्या यह भाजपा के जनसंघ युग में लौटने की शुरुआत है?

1 min read
पीएम मोदी और अमित शाह।

क्या यह भाजपा के जनसंघ युग में लौटने की शुरुआत है? फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी। जनसंघ को 1977 से पहले कभी भी नौ फीसदी से अधिक वोट नहीं मिले थे। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था। पुनः 1980 में जनसंघ ने भाजपा के रूप में नव अवतार लिया। 1984 के आमचुनाव में भाजपा को लोकसभा की सिर्फ दो सीटें ही मिली और उसके सबसे बड़े नेता अटलबिहारी वाजपेयी की ग्वालियर में स्व. माधवराव सिंधिया के समक्ष बहुत बुरी और शर्मनाक पराजय हुई थी। लेकिन, 1986 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक गलती ने मृतप्रायः भाजपा को संजीवनी दे दी।

राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में मुस्लिम तुष्टीकरण करने के बाद हिन्दू तुष्टीकरण करने के लिये बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि के ताले खुलवा दिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इसे तुरंत लपक लिया और अपनी ही एक इकाई या शाखा विश्व हिंदू परिषद को ‘रामजन्म भूमि मुक्ति आंदोलन’ में संलग्न कर दिया। भाजपा ने भी राम मंदिर निर्माण को अपने एजेंडे में शामिल कर लिया। जब वीपी सिंह ने मंडल कमीशन के आधार पर पिछड़ों को 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया तो संघ परिवार और भाजपा ने उसे ‘मंडल विरुद्ध कमंडल’ का संग्राम बना दिया।

देश दुनिया की अहम खबरें अब सीधे आप के स्मार्टफोन पर Janchowk Android App

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकालने का फैसला किया। उन्हें बिहार के समस्तीपुर में लालूप्रसाद यादव की सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद 1990 में देश भर में साम्प्रदायिक दंगे कराये गये (साम्प्रदायिक दंगे हमेशा कराये जाते हैं, स्वतः होते नहीं हैं। इसे भीष्म साहनी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ में बहुत अच्छी तरह दर्शाया गया है)। इन दंगों और राम मंदिर निर्माण आंदोलन के परिणामस्वरूप हिन्दू वोटरों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हो गया, जिसका लाभ उसे 1989 के आमचुनाव तथा 1991 के आमचुनाव में भी मिला और वह मुख्य विपक्षी दल बन गया।

नरसिंहाराव की कांग्रेसी सरकार की अकर्मण्यता, भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं के उत्तेजक भाषणों और मस्जिद गिराने के सुनियोजित षड्यंत्र तथा उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह द्वारा झूठा हलफनामा देकर सुप्रीम कोर्ट के साथ की गई धोखाधड़ी के परिणाम स्वरूप बाबरी मस्जिद ढहा दी गयी, जिसे हिंदुत्व की विजय के रूप में प्रचारित किया गया। यह कहा गया कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस 450 साल पहले हुए अपमान का बदला था और यह हिन्दू अस्मिता की पुनर्स्थापना है।

इसके बाद पुनः देश भर में साम्प्रदायिक दंगे कराये गये जिसमें मुस्लिम अल्पसंख्यकों का भारी जान-माल का नुकसान हुआ। प्रतिक्रिया स्वरूप पेशेवर मुस्लिम अपराधियों ने मुम्बई में सीरियल बम ब्लास्ट कराये, जिसमें भी सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए। लेकिन इन सभी घटनाक्रमों से संघ और भाजपा को अतिशय फायदा हुआ और 1998 में अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गयी, जिसका मुख्य और सर्वाधिक प्रभावशाली घटक भाजपा ही थी।

इस समय तक लोकसभा में भाजपा की सदस्य संख्या 182 तक पहुंच गयी थी, लेकिन 2001 में गुजरात के नरसंहार ने भाजपा की छवि पर कालिख पोत दी। इसके परिणामस्वरूप 2004 के आम चुनाव में भाजपा की पराजय हुई और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार अस्तित्व में आई। डॉ. मनमोहनसिंह के नेतृत्व में इस सरकार ने कई लोककल्याणकारी कदम उठाये। 1991 में आरम्भ हुई मुक्त आर्थिक नीति-विनिवेशीकरण, मुक्त अर्थव्यवस्था और आर्थिक उदारीकरण को गति प्रदान की गई। इस सरकार ने 2005 में सूचना का अधिकार कानून लागू किया, मनरेगा तथा शिक्षा का अधिकार कानून लाया गया। इन सभी जनकल्याणकारी कार्यों के कारण डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में ही 2009 में यूपीए पुनः सत्ता में आई।

लेकिन यूपीए-2, यूपीए-1 की तरह साफ-सुथरी सरकार नहीं दे पाया। यूपीए-2 के दौरान कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, 2G घोटाला और कोल स्कैम ने सरकार की छवि को अत्यधिक दागदार बना दिया। उसी दौरान यूपीए-2 शासनकाल के अंतिम चरण यानी 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्होंने तब तक खुद को विकास पुरुष के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था, एक धूमकेतु की तरह भारतीय राजनीति के धरातल पर प्रकट हुए। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के आमचुनाव में पहली बार भाजपा 282 लोकसभा सीटों पर विजयी हुई और उसे अकेले पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ तथा 31 फीसदी वोट भी प्राप्त हुए। परिणामस्वरूप नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार गठित हुई जो कहने को तो एनडीए की सरकार थी, लेकिन वास्तव में वह भाजपा की ही सरकार थी और बाकी के सहयोगी दल सिर्फ नुमाईश के रूप में ही थे।

नरेंद्र मोदी की यह सरकार अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने के अलावा कई मोर्चों पर असफल रही थी। यद्यपि इस सरकार ने भी कुछ अच्छे फैसले लिये, लेकिन अधिकांश फैसले चुनिंदा कारपोरेट के पक्ष में ही लिये गये। 8 नवम्बर 2016 को नोटबन्दी के तुगलकी फैसले ने इस सरकार की रही सही साख को भी मिट्टी में मिला दिया और इसके बाद जीएसटी के गलत एवं दोषपूर्ण क्रियान्वयन ने सबसे तेज गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था को न सिर्फ ब्रेक लगा दिया बल्कि वह क्रमशः रिवर्स गियर में जाने लगी। फ्रांस से 36 लड़ाकू जहाजों की खरीदी में अपने कार्पोरेट मित्र अनिल अंबानी को लाभ पहुँचाने के आरोपों ने नरेंद्र मोदी की छवि को भी धूमिल कर दिया तथा उनके व्यक्तित्व का जादू भी जनमानस पर से उतरने लगा था कि 2019 के आमचुनाव से ठीक पहले ‘पुलवामा’ हो गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीआरपी के 44 जवानों की शहादत को अपना मुख्य चुनावी एजेंडा बना कर मतदाताओं के समक्ष प्रस्तुत किया। इस जघन्य आतंकवादी एवं फिदायीन हमले का बदला लेने के लिये सर्जिकल स्ट्राइक की तरह पीओके स्थित ‘बालाकोट’ के आतंकवादी ट्रेंनिग कैम्पों पर एयर स्ट्राइक की गई। इसके बाद पूरे चुनाव अभियान में इस साहसिक एवं शौर्य पूर्ण सैन्य कार्रवाई को ‘सैन्य एवं उग्र राष्ट्रवाद’ का स्वरूप देकर अपने पक्ष में खूब भुनाया गया। विपक्ष में सर्वमान्य नेतृत्व के अभाव, रणनीति विहीन चुनाव प्रचार तथा सबसे बढ़कर सम्पूर्ण मीडिया और कारपोरेट जगत के पूर्ण समर्थन एवं असीमित प्रचार साधनों के बल पर तथा राष्ट्रवाद की लहर पर सवार होकर नरेंद्र मोदी 2014 से भी बड़ी सफलता के साथ पुनः सत्ता के सिंहासन पर बैठ गए। 2019 के आम चुनाव में भाजपा को 303 सीटें मिलीं और उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ कर 37 फीसदी हो गया।

2019 के आम चुनाव से पूर्व उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और हिन्दू वोटों के सम्पूर्ण ध्रुवीकरण ने (जिसमें उच्च वर्णीय हिंदुओं के अलावा पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग तथा दलितों के भी बहुत बड़े हिस्से ने भाजपा का समर्थन किया था) भाजपा को अपार सफलता दिलाई थी। लेकिन गुजरात, जो कि नरेंद्र मोदी और उनके मुख्य रणनीतिकार अमित शाह का गृह प्रदेश है, के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुश्किल से ही जीत हासिल हो पाई थी तथा पंजाब और गोवा में तो पराजय ही हो गयी थी। कर्नाटक में भाजपा यद्यपि सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी, लेकिन कांग्रेस और जेडीएस के चुनाव बाद हुए गठबंधन ने उसे सत्ता से बेदखल कर दिया था।

इसके बाद हिन्दी पट्टी के तीन प्रमुख राज्यों – राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में नरेंद्र मोदी के धुंआधार प्रचार और चुनावी रैलियों के बावजूद भाजपा को पराजय ही मिली। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा को 15 वर्ष बाद सत्ता से बाहर होकर विपक्ष की भूमिका निर्वाह करनी पड़ रही है। राजस्थान में मतदाता हर पांच साल में सरकार बदल देते हैं। वहां इसी की पुनरावृत्ति हुई जबकि अमित शाह ने राजस्थान में भाजपा को वापस सत्ता में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। असम और त्रिपुरा में अवश्य भाजपा को सफलता मिली थी लेकिन वह तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में वही कहानी दोहरा नहीं पाई।

अभी हाल के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने 30 वर्ष पुराने सहयोगी शिवसेना और कुछ छोटी पार्टियों के साथ मिलकर चुनावी समर में उतरी थी। महाराष्ट्र में वह ‘अबकी बार 200 पार’ के नारे के साथ मैदान में उतरी थी, वहीं दूसरी ओर हरियाणा में 90 में से 78 सीट जीतने का दावा किया गया था।

हरियाणा में वह किसी तरह 40 के आंकड़े तक पहुँच गयी और अपनी विरोधी क्षेत्रीय पार्टी जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के साथ मिल कर सरकार बनाने में सफल हो गयी। लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा की 30 वर्ष पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना ने उसे तगड़ा झटका दे दिया। महाराष्ट्र में भाजपा को 105 तथा शिवसेना को 56 सीटें मिली थीं और दोनों मिलकर सुविधा जनक तरीके से सरकार बनाने की स्थिति में थीं। लेकिन शिवसेना ने भाजपा के सामने 50-50 का फार्मूला रख दिया और ढाई वर्ष के लिये शिवसेना को मुख्यमंत्री पद देने की मांग रख दी। परिणामस्वरूप महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन टूट गया जो हिंदुत्व की मजबूत डोर के साथ बंधा हुआ था।

इसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति में अभूतपूर्व ड्रामा हुआ और अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद शिवसेना के सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में कांग्रेस-एनसीपी-शिवसेना के एक नये गठबंधन ‘महा विकास अघाड़ी’ की सरकार बनने जा रही है। महाराष्ट्र के इस राजनीतिक ड्रामे को उसके अंजाम तक पहुँचाने में एनसीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार की रणनीति और राजनीतिक कौशल को ही पूरा श्रेय जाता है। शरद पवार ने पुनः एक बार यह सिद्ध कर दिया कि महाराष्ट्र की राजनीति में उनके जोड़ का कोई अन्य नेता नहीं है।

इन सारे घटनाक्रमों के बाद अब हम नीचे दिये गए मानचित्र पर आते हैं। 2017 में जहां कुछ तटीय राज्यों को छोड़कर भाजपा का भगवा पूरे देश में लहरा रहा था वहीं 2019 में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, गोवा,कर्नाटक तथा पूर्वांचल के असम एवं त्रिपुरा तक सिमट गया है। पूर्वांचल के अन्य राज्यों में भाजपा मुख्य सत्ताधारी पार्टी नहीं है तथा वहां वह सत्ता की छोटी भागीदार ही है। झारखंड में नवम्बर-दिसम्बर में ही विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और वहां भी भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलना सम्भव दिखाई नहीं दे रहा है। बिहार में भी नीतीश कुमार के साथ सबकुछ ठीक नहीं है।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि भाजपा को जिस शिखर तक पहुंचना था, वह वहां तक पहुँच चुकी है। अब शिखर से उतार का समय है। धीरे-धीरे देश की जनता भाजपा की विघटनवादी राजनीति को समझने लगी है। अभी भाजपा का एकाएक पराभव तो सम्भव नहीं है, क्योंकि देश की जनता के समक्ष कोई मजबूत विपक्षी दल और सर्वमान्य नेता नहीं है। राहुल गांधी ने मेहनत तो बहुत की, लेकिन उन्हें न तो विपक्ष ने अपना नेता स्वीकार किया और न जनता ने।

इसलिये अब विपक्ष के सभी मध्यमार्गी दलों को एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना कर सामूहिक नेतृत्व के आधार पर भाजपा का मुकाबला करना चाहिये और जहां भी सम्भव हो वामपंथी दलों का सहयोग भी प्राप्त करना चाहिये। विपक्ष यदि शरद पवार जैसे किसी कुशल नेता और योग्य रणनीतिकार के नेतृत्व में संसद से लेकर सड़क तक एक संयुक्त मोर्चा बना कर संघर्ष करे तो वह भाजपा को 2024 के आमचुनाव में पराजित कर सकता है। शरद पवार 80 वर्ष के बुजुर्ग नेता हैं, लेकिन उन्होंने यह बता दिया है कि वे आज भी ऊर्जावान हैं।

(प्रवीण मल्होत्रा रिटायर्ड सरकारी अफसर हैं।)

Donate to Janchowk
प्रिय पाठक, जनचौक चलता रहे और आपको इसी तरह से खबरें मिलती रहें। इसके लिए आप से आर्थिक मदद की दरकार है। नीचे दी गयी प्रक्रिया के जरिये 100, 200 और 500 से लेकर इच्छा मुताबिक कोई भी राशि देकर इस काम को आप कर सकते हैं-संपादक।

Donate Now

Leave a Reply