Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

यौन उत्पीड़न के मामलों में जजों के लिए क्या संविधान से इतर है कोई व्यवस्था?

यौन शोषण के आरोप जब उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों या अधीनस्थ न्यायालय पर लगते हैं तो जांच की सामान्य प्रक्रिया अपनाने के बजाय  न्यायालयों के लिए पीड़िता को न्याय दिलाने से ज्यादा बड़ा मुद्दा आरोपितों को किसी भी कीमत पर बचाना हो गया है। चाहे तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला हो या जस्टिस गांगुली या जस्टिस स्वतंत्र कुमार पर अपने लॉ इंटर्न के साथ यौन उत्पीड़न की शिकायत हो। सभी मामलों में येन केन प्रकारेण आरोपों को फाइलों में दफ़न कर दिया गया। यही हाल उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों का भी है।

अभी हाल में ही उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ जिला न्यायाधीश की याचिका पर शुक्रवार को नोटिस जारी किया और 2018 में एक महिला न्यायिक अधिकारी द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के कारण चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही पर रोक लगा दी। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए टिप्पणी की कि न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायत दर्ज करना एक ‘प्रवृत्ति’ बन गया है और यह एक अपमानजनक व्यवहार है।

जिला जज की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर बालासुब्रमणियम ने कहा कि जिस न्यायाधीश पर कथित आरोप लगाए गए थे, उन्होंने वास्तव में 32 साल की बेदाग सेवा की और उनको उच्च न्यायालय में जज नियुक्त करने के बारे में विचार हो रहा था। उन्होंने कहा, “जो हुआ वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। अचानक 2018 में यह शिकायत सामने आई। वह इस साल सेवानिवृत्त होने के लिए तैयार हैं और उन्हें शर्मिंदगी से गुजरना पड़ रहा है।”

इस पर, सीजेआई एसए बोबडे ने टिप्पणी की, “यह हमारे सिस्टम में अब इस तरह की एक नियमित घटना है। जब कुछ होने की कगार पर होता है, तो सभी चीजें शुरू हो जाती हैं। लोग याद करते हैं कि वह कितना बुरा व्यक्ति है? क्या करें? यह अब एक चलन बन गया है। अब एक अभ्यास बन गया है।” जिला जज के खिलाफ आंतरिक शिकायत समिति के समक्ष मार्च 2018 में यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की गई थी।

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एके गांगुली पर एक छात्रा ने आरोप लगाया था कि इंटर्नशिप के दौरान जस्टिस गांगुली ने उसका यौन शोषण किया है। इस मामले की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय ने एक समिति गठित की थी। इस तीन सदस्यीय समिति ने अपनी जांच में पाया था कि जस्टिस गांगुली पर लगे आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं। इसी के चलते जस्टिस गांगुली को पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था, लेकिन इतना कुछ होने के बाद अब जस्टिस गांगुली के खिलाफ न तो कोई एफआईआर दर्ज है, न कोई जांच चल रही है और न ही इस संबंध में कहीं कोई मामला लंबित है।

उच्चतम न्यायालय के एक अन्य पूर्व न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार पर भी एक छात्रा ने यौन शोषण के आरोप लगाए थे। मीडिया में इसकी ख़बरें आते ही जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर दी। इसमें उन्होंने मीडिया पर मानहानि का दावा करते हुए यह भी मांग की कि इस संबंध में मीडिया को कुछ भी प्रकाशित करने से प्रतिबंधित कर दिया जाए। न्यायालय ने उनकी इस याचिका पर अंतरिम फैसला देते हुए जस्टिस स्वतंत्र कुमार की फोटो और उन पर लगे आरोपों का विवरण प्रकाशित करने से मीडिया को प्रतिबंधित कर दिया। जस्टिस स्वतंत्र कुमार ने जिन आधारों और जिन कारणों से मीडिया को प्रतिबंधित करने की मांग की थी वे इस तरह के मामलों के अन्य आरोपियों पर भी लागू होते हैं।

जस्टिस स्वतंत्र कुमार का मामला अभी लंबित है, लेकिन जस्टिस गांगुली के खिलाफ तो अब कोई मामला भी नहीं है। इस बात का खुलासा तब हुआ जब केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने सुब्रमण्यम स्वामी के एक पत्र के जवाब में यह जानकारी दी।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज जस्टिस एसके गंगेले पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाकर इस्तीफा देने वाली महिला एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज ने फिर से बहाली की मांग की है। इससे पहले साल 2019 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि महिला जज की बहाली संभव नहीं है। मध्य प्रदेश के जस्टिस गंगेले पर आरोप लगाने के चलते साल 2014 में महिला जज का तबादला ग्वालियर से सीधी कर दिया गया था। हालांकि बेटी की 12वीं की परीक्षा के चलते महिला जज नई पोस्टिंग को नहीं स्वीकार कर पाई थीं, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

महिला जज के आरोपों की जांच के लिए साल 2015 में एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया था। इसमें सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आर भानुमती, बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस मंजुला चेल्लूर और सीनियर एडवोकेट केके वेणुगोपाल को शामिल किया गया था। इस कमेटी ने महिला जज के तबादले को प्रशासनिक फैसले की बजाय दंडात्मक कार्रवाई बताया था। साथ ही कहा था कि यह कानून के मुताबिक नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कलीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्‍पीड़न के गंभीर आरोपों पर तीन जजों की आंतरिक जांच समिति ने चीफ जस्टिस के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत खारिज करके उन्‍हें क्‍लीन चिट दे दी है। जस्टिस एसए बोबडे इस पैनल के अध्यक्ष थे, जबकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बनर्जी दो अन्य सदस्य थे। तीन सदस्यों की इस समिति को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं मिला।

सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी ने सीजेआई पर यौन शोषण के आरोप लगाए थे। महिला ने हलफनामे की कॉपी सुप्रीम कोर्ट के 22 न्यायाधीशों को भेजी थी। महिला ने अपने हलफनामे में कथित छेड़छाड़ की घटनाओं का जिक्र किया था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व महिला कर्मचारी 26 अप्रैल को पहली बार इनहाउस जांच समिति के सामने पेश हुई थी। दूसरे सबसे सीनियर जज जस्टिस एसए बोबडे के नेतृत्व में तीन जजों की समिति ने बंद कमरे में उसका पक्ष सुना था। आरोप लगाने वाली महिला ने जांच समिति के समक्ष फिर से पेश होने से इनकार कर दिया था और वकील की मौजूदगी की मंजूरी नहीं मिलने समेत कई मुद्दों पर आपत्ति उठाई। महिला ने प्रक्रिया में सहभागी नहीं होने का विकल्प चुना। वह समिति के समक्ष तीन दिन पेश हुई थी।

यौन उत्पीडन के अपराध के संबंध में भारतीय दंड संहिता में दो धाराओं को रखा गया है। धारा 375 और धारा 376 धारा 375 भारतीय दंड संहिता की धारा बलात्कार की परिभाषा के संबंध में है। यह धारा बलात्कार की स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत करती है। बलात्कार ऐसा अपराध है, जिसमें संभोग के साथ स्त्री की सहमति पर प्रश्न होता है। संभोग की भी अपनी परिभाषा इस धारा के अंतर्गत दी गई है। सन् 2013 में इस धारा के अंतर्गत क्रांतिकारी संशोधन किए गए हैं। दंड संहिता के अंदर संभोग की परिभाषा को स्त्री के पक्ष में अत्यंत विस्तृत कर दिया गया है।

यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर न्यायपालिका  के न्यायाधीशों के मामले में कानून व्यवस्था से लेकर न्याय की परिभाषाएं तक बिलकुल अलग रही हैं। प्रतिदिन दर्ज होने वाले यौन शोषण के हज़ारों मामलों से इतर यदि सिर्फ चर्चित हस्तियों पर लगे ऐसे आरोपों से भी इन न्यायाधीशों के मामले की तुलना की जाए तो भी यह अंतर स्पष्ट है।

मशहूर पत्रकार तरुण तेजपाल, धर्मगुरु आसाराम बापू और विख्यात पर्यावरणविद् आरके पचौरी, यूपी के पूर्व खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति आदि पर भी हाल में ऐसे आरोप लग चुके हैं, लेकिन इन लोगों के मामलों में न्यायालय द्वारा वैसा कुछ भी नहीं किया गया जैसा न्यायपालिका के न्यायाधीशों के मामले में हुआ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on September 8, 2020 9:45 am

Share