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माननीयों को नहीं दिखीं सुप्रीमकोर्ट रजिस्ट्री की मनमानियां

उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 08 जुलाई 2019 को यह बड़ा फैसला किया था कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में गड़बड़ी की जांच अब सीबीआई के अफसर करेंगे। बिना किसी पीठ के निर्देश के मुकदमों की मनमाने ढंग से लिस्टिंग की कई जजों और पीठों की ओर से मिली शिकायतों के बाद चीफ जस्टिस ने ये फैसला किया था। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता का मानना है कि उच्चतम न्यायालय  के साथ समस्या यह है कि यह एक मुख्य न्यायाधीश केंद्रित अदालत है और मुख्यत: सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा संचालित है। इस पृष्ठभूमि में उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका को 100 रुपये जुर्माने के साथ खारिज कर दिया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा पिक एंड चूज नीति अपनाने और लिस्टिंग में प्रभावशाली वकीलों को वरीयता देने का आरोप लगाया गया था।

पिक एंड चूज नीति अपनाए बिना सूचीबद्ध करने वाले मामलों में उच्चतम न्यायालय की रजिस्ट्री को निष्पक्षता और समान व्यवहार के निर्देश देने की मांग करने वाली इस याचिका पर जस्टिस अरुण मिश्रा जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने सोमवार को फैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ता वकील रीपक कंसल पर 100 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। पीठ ने अर्णब गोस्वामी के मामले को अधिमान्य प्राथमिकता का एक उदाहरण बताने पर याचिकाकर्ता पर नाराजगी व्यक्त की थी। पीठ ने कहा था कि आप वन नेशन वन राशन कार्ड पर अपनी याचिका की तुलना अर्णब गोस्वामी से कैसे कर सकते हैं? क्या आग्रह था? आप क्यों बकवास बातें कह रहे हैं?

जस्टिस अरुण मिश्रा ने जोर देकर कहा था कि रजिस्ट्री हमारे अधीनस्थ नहीं है। वे बहुत हद तक उच्चतम न्यायालय का हिस्सा हैं। याचिकाकर्ता पर गैरजिम्मेदाराना आरोपों लगाने की बात कहने के बाद पीठ ने मामले में आदेश सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने रीपक कंसल द्वारा लगाए गए आरोपों पर 19 जून को गंभीर आपत्ति जताई थी।

वकील रीपक कंसल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कहा गया था कि पिक एंड चूज नीति अपनाए बिना सूचीबद्ध करने वाले मामलों में शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री को निष्पक्षता और समान व्यवहार के निर्देश दिए जाएं। रजिस्ट्री को ईको-सिस्टम में वादियों से भेदभाव करने और अपमानित करने से रोकने के लिए न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है। कंसल ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के अनुभाग अधिकारी और / या रजिस्ट्री नियमित रूप से कुछ कानून फर्मों और प्रभावशाली वकीलों को सर्वश्रेष्ठ रूप से ज्ञात कारणों से वरीयता देते हैं। यह भेदभाव है और इस न्यायालय में न्याय पाने के समान अवसर के खिलाफ है।

याचिकाकर्ता ने कहा था कि रजिस्ट्री के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए कोई शिकायत निवारण तंत्र नहीं है। इसके अलावा, कई उदाहरण भी सामने आए, जिसमें याचिकाकर्ता को फिर से अदालत की फीस जमा करने के लिए मजबूर किया गया था, भले ही यह पहले जमा की गई हो। याचिकाकर्ता-वकील ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी की याचिका को तत्काल सूचीबद्ध करने के लिए अपनी दलीलें दी जिसे 8.07 बजे दायर किया गया था और अगले दिन एक घंटे के भीतर सूचीबद्ध किया गया था जैसा कि सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट की पूरक सूची में घोषित किया गया था।

याचिका में कहा गया था कि रजिस्ट्री के पास तत्काल सुनवाई या पत्र आदि के लिए आवेदन दाखिल करने संबंधी कोई प्रक्रिया नहीं है जो राष्ट्र लॉक डाउन के दौरान मामलों की तत्काल लिस्टिंग के लिए आवश्यक है। याचिका में कहा गया है कि रजिस्ट्री अक्सर याचिकाओं में अनावश्यक दोष निकालती है। याचिकाकर्ता ने प्रार्थना की थी कि रजिस्ट्री और उसके अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे सामान्य वकीलों के मामलों में अनावश्यक दोष न देखें और अतिरिक्त अदालत शुल्क और अन्य शुल्कों को वापस करें, सूची को मंजूरी देने और बेंच हंटिंग में शामिल होने के लिए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करें। साथ ही न्यायालय के विशिष्ट निर्देशों के बिना किसी मामले को टैग / डी-टैग ना करें।

गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 08 जुलाई 2019 को यह बड़ा फैसला किया था कि सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में गड़बड़ी की जांच अब सीबीआई के अफसर करेंगे। चीफ जस्टिस दफ्तर से जारी आदेश के मुताबिक सीबीआई के एसएसपी, एसपी और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी डेप्यूटेशन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में एडिशनल रजिस्ट्रार, डिप्टी रजिस्ट्रार और ब्रांच अफसर के पद पर तैनात किए जाएंगे।

तत्कालीन चीफ जस्टिस गोगोई के कार्यकाल में रजिस्ट्री या कोर्ट स्टाफ की कारगुजारियां उजागर हुई थीं। बिना किसी पीठ के निर्देश के मुकदमों की मनमाने ढंग से लिस्टिंग की कई जजों और पीठों  की ओर से मिली शिकायतों के बाद चीफ जस्टिस ने ये फैसला किया है। दरअसल, वकील, उद्योगपति और कोर्ट स्टाफ के बीच साठ गांठ से मुकदमों की मनमानी लिस्टिंग और आदेश टाइप करने में गड़बड़ी की बार-बार शिकायतें मिल रही थीं। इन शिकायतों पर संज्ञान लेते हुए जस्टिस रंजन गोगोई ने यह फैसला किया था।

इस समस्या  को हल करने के लिए जस्टिस गुप्ता ने कहा कि उन्होंने पहले लिखित में सुझाव दिया था कि एक समिति का गठन किया जाना चाहिए जिसमें कॉलेजियम के बाहर पांच वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल हों, जिनका सबसे लंबा कार्यकाल हो। इस समिति का दीर्घकालिक कार्यकाल होना चाहिए और इसे निर्णय लेने देना चाहिए कि रजिस्ट्री को कैसे कार्य करना चाहिए, किन मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, किस मामले को चिह्नित किया जाना चाहिए । जाहिर है चीफ जस्टिस रोस्टर के मास्टर होंगे, लेकिन रोस्टर तय होने के बाद इसे कैसे क्रियान्वित करना चाहिए उसका फैसला समिति को करने देना चाहिए। इसे न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के साथ रैंडम कंप्यूटरीकृत आधार पर काम करना चाहिए। यह एक पारदर्शी प्रणाली होनी चाहिए, लेकिन जितना संभव हो उतना कम मानव हस्तक्षेप के साथ होना चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 6, 2020 11:35 pm

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