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गांधी स्मृति श्रृंखला(भाग-3):कपूर आयोग ने ठहराया था सावरकर को गांधी की हत्या का मुख्य साजिशकर्ता

भिलारे गुरूजी को जानना क्यों जरूरी है ?

‘‘ पंचगणी में महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में आने की सभी को अनुमति मिली थी। उस दिन, उनके सहयोगी ऊषा मेहता, प्यारेलाल, अरूणा आसफ अली और अन्य प्रार्थना में उपस्थित थे। हाथ में खंजर लिए गोडसे गांधीजी की तरफ भागा और कहा कि उसके कुछ सवाल हैं। मैंने उसे रोका, उसका हाथ मरोड़ा और उसका चाकू छीना।

आज़ादी के लिए लड़े स्वतंत्राता सेनानी की मौत की ख़बर अक्सर संमिश्र भावनाओं को जन्म देती है।

लोगों के एक हिस्से के लिए- जिनकी तादाद तेजी से घट रही है – यह अतीत को याद करने का ऐसा अवसर होता है जब आदर्शवाद हवाओं में था और मानवता की मुक्ति के लिए अपने आप को कुर्बान करना गौरव की बात समझी जाती थी, जबकि लोगों के शेष हिस्से के लिए – जो अपने प्राचीन अतीत के वैभव के गल्प पर मस्त है, उसके लिए ऐसी ख़बरें कोई मायने नहीं रखतीं।

भिखु दाजी भिलारे /जन्म 26 नवम्बर 1919/ जिनका 98 साल की उम्र में निधन हुआ, वह इस मायने में अपवाद रहे। न केवल जीवन के तमाम क्षेत्रों से जुड़े लोग और अलग-अलग राजनीतिक धाराओं से सम्बद्ध लोग हजारों की तादाद में उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए बल्कि मुख्यधारा के मीडिया ने भी इसकी ख़बर पाठकों को दी। यह मुमकिन है कि अपनी युवावस्था में राष्ट्र सेवा दल से सम्बद्ध रहे भिलारे गुरूजी- जैसा कि लोग उन्हें प्रेम और आदर से सम्बोधित करते थे – जो 1942 के झंझावाती दिनों में क्रांतिकारी नाना पाटील की अगुआई में सतारा जिले में बनी समानान्तर सरकार में सक्रिय थे और जिन्होंने विधायक के तौर पर जवाली विधानसभा की 18 साल तक नुमाइन्दगी की – लगातार सामाजिक-राजनीतिक कामों में सक्रिय रहे।

तयशुदा बात है कि अधिकतर लोग उनकी जिन्दगी के उस साहसिक कार्य के बारे में नहीं जानते होंगे – जब उन्होंने मुल्क के इतिहास में एक नाजुक वक्त़ में गांधीजी की जान बचायी थी, जब आज़ादी करीब थी और तेजी से बदलते घटनाक्रम में गांधीजी अहम भूमिका निभा रहे थे। यह 1944 का साल था जब गांधी पुणे के नजदीक हिल स्टेशन पंचगणी /मई 1944/ पहुंचे थे, जब वहां 15-20 नौजवानों का एक दस्ता चार्टर्ड बस में पहुंचा। इन नौजवानों ने उनके खिलाफ उनके आवास के सामने विरोध-प्रदर्शन किया। मगर जब गांधी ने उन्हें वार्ता के लिए बुलाया वह नहीं आए, उसी वक्त यह हमला हुआ था।

अदालत में सामने नाथूराम और पीछे सावरकर।

गांधी के प्रपौत्र/परपोता तुषार गांधी अपनी किताब ‘लेट अस किल गांधी’ में इस घटना का जिक्र करते हैं। वह बताते हैं कि किस तरह प्रार्थना सभा में नेहरू शर्ट, पैजामा और जैकेट पहने नाथूराम गोडसे, हाथ में खंजर लिए गांधीजी की तरफ लपका था।

‘भिलारे गुरूजी और मणिशंकर पुरोहित ने गोडसे को कब्जे में किया। गोडसे के साथ जो दो युवा थे, वह वहां से भाग गए।’’.

‘‘जुलाई 1944 में आगा खान पैलेस की कैद से रिहा होने के बाद गांधी को मलेरिया हुआ और उन्हें आराम करने की सलाह डॉक्टर ने दी।

वह पंचगणी पहुंचे, जो पुणे के नज़दीक एक पहाड़ी इलाका है, जहां वह दिलखुश बंगलो में रुके। लगभग 18 से 20 नौजवानों का एक समूह पंचगणी पहुंचा और वहां उसने दिन भर उनके खिलाफ-प्रदर्शन किया।’’

‘‘ जब गांधीजी को प्रदर्शन के बारे में बताया गया तब उन्होंने उस समूह के नेता नाथूराम विनायक गोडसे से सम्पर्क किया और उसे बातचीत के लिए बुलाया। नाथूराम ने न्यौता ठुकरा दिया और प्रदर्शन जारी रखा। ’’

वह समूचा प्रसंग भिलारे गुरूजी की याददाश्त में गोया अंकित हुआ था, जिसके बारे में उन्होंने कई स्थानों पर बोला था और लिखा भी था।

प्रस्तुत घटना ने रातों रात भिलारे गुरूजी को ‘युवकों का आइकन ’ बना दिया जिसका जिक्र वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी एनडी पाटील के संस्मरणों में भी मिलता है जिन्होंने ‘शेतकरी और कामगार पार्टी अर्थात किसान और मजदूर पार्टी की अगुआई की। 90 साल की उम्र पार कर चुके पाटील ने एक अग्रणी दैनिक को बताया था:

‘‘ गुरूजी ने जिस तरह गांधीजी को गोडसे के हमले से बचाया था वह ख़बर तुरंत सातारा जिले में फैली। मैं उस वक्त़ 15 साल का था। हम कई छात्र गुरूजी से मिलने साइकिल पर पहुंचे। वह हमारे लिए एक आइकन/हीरो बने थे। उन्होंने ताउम्र सादगीभरा जीवन बिताया और गांधीवादी उसूलों का पालन किया।’’

वैसे यह मुल्क में बदलते सियासी माहौल का परिणाम है या लोगों में छा रही थकान का प्रतीक है कि जबकि मीडिया ने भिलारे गुरूजी और उनके बाद के जीवन पर अवश्य रोशनी डाली, मगर उसने इस मसले की चर्चा नहीं की कि किस तरह हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों ने महात्मा गांधी को मारने की कोशिश 1944 में भी की थी, जिसमें उनका भावी हत्यारा मुख्य अभियुक्त था।

बहुत कम लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि हिन्दुत्व अतिवादी गांधीजी से कितनी नफरत करते थे, जो इस बात से भी स्पष्ट होता है कि नाथूराम गोडसे की आखिरी कोशिश के पहले पांच बार उन्होंने गांधी को मारने की कोशिश की थी। और उन्हें मारने का पहला सुनियोजित प्रयास पुणे में हुआ था, जब अस्पृश्यता के सवाल को गांधी ने उठाया था और इसे कांग्रेस के कार्यक्रम के तौर पर अपनाने पर जोर दिया था। उनकी इस मुहिम को ‘हरिजन यात्रा’ के तौर पर सम्बोधित किया जा रहा था।

बम विस्फोट के जरिए गांधीजी को मारने का पहला प्रयास / 25 जून 1934/

दरअसल 25 जून 1934 को पुणे के कार्पोरेशन के सभागार में वह भाषण देने जा रहे थे। उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी उनके साथ थीं। इसे संयोग कहा जा सकता है कि गांधी और कस्तूरबा जिस कार में थे, उसी किस्म की एक अन्य कार भी इसमें थी। इत्तफाक से गांधी जिस कार में जा रहे थे, उसमें कोई खराबी आ गयी और उसे पहुंचने में विलम्ब हुआ।

पहली कार आडिटोरियम पहुंची और स्वागत समिति के सदस्य यह मानते हुए कि गांधीजी पहुंच गए हैं, तुरंत उनकी अगवानी के लिए दौड़े तब एक बम कार पर फेंका गया, इस धमाके में नगरपालिका का प्रमुख अधिकारी और कुछ अन्य कर्मचारी घायल हुए। हमलावर भाग निकला और फिर इस मामले की जांच और गिरफ्तारी का कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है।

महात्मा के तत्कालीन सेक्रेटरी प्यारेलाल अपनी किताब ‘महात्मा गांधी: द लास्ट फेस में इस बात का उल्लेख करते हैं कि बम को गांधी विरोधी हिन्दू अतिवादियों ने फेंका था। उन्होंने लिखा था कि ‘‘इस बार उनकी कोशिश बहुत सुनियोजित थी और उसे उन्होंने बेहद प्रवीणता के साथ अंजाम दिया था ।’’ कहने का तात्पर्य था कि इसके पहले की उनकी कोशिशें ठीक से नियोजित नहीं थीं और उनमें समन्वय का अभाव था। प्यारेलाल ने यह भी लिखा है, ‘‘इन लोगों ने गांधी, नेहरू और अन्य कांग्रेसी नेताओं की तस्वीरों को अपने जूतों में रखा था। गांधी के फोटोग्राफ को निशाना बना कर वह गोली चलाने का अभ्यास करते थे, यही वह लोग थे जिन्होंने 1948 में महात्मा की हत्या की जब वह दंगा पीड़ित दिल्ली में अमन कायम करने की कोशिश में थे।’’

हमले के बाद भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि ‘यह दुखद है कि यह तब हुआ जब मैं हरिजनोद्धार के लिए काम कर रहा हूं। शहादत पाने की मेरी कोई ख्वाहिश नहीं है लेकिन अगर उसे होना हो तो मैं उसके लिए तैयार हूं।.. हमलावर वहां से भाग निकला था और मामले की जांच या गिरफ्तारियों का कोई रिकार्ड उपलब्ध नहीं है। महात्मा को मारने की यह ऐसी कोशिश थी, जो दस्तावेजों में दर्ज है।

गांधी का शव।

जैसे कि ऊपर चर्चा की जा चुकी है महात्मा गांधी को मारने की दूसरी कोशिश में उनका भविष्य का हत्यारा नाथूराम गोडसे भी शामिल था। लोगों के हृदयपरिवर्तन में यकीन रखने वाले गांधी ने गोडसे से कहा कि वह उनके साथ आठ दिन रहे ताकि वह उसकी बातों को समझ सकें अलबत्ता गोडसे ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। मालूम हो कि पुणे से पंचगणी रवाना होने के पहले गोडसे ने अपने पत्रकार दोस्तों के सामने डींग हाकी थी कि गांधी को लेकर कोई महत्वपूर्ण ख़बर जल्द ही उन्हें पंचगणी से मिलेगी। जोगलेकर, जो गोडसे द्वारा सम्पादित एवं प्रकाशित अख़बार ‘अग्रणी’ से जुड़े थे, उन्होंने इस बात की ताईद की। ए डेविड, जो पुणे से निकलने वाले अख़बार ‘पुणे हेराल्ड’ के सम्पादक थे उन्होंने कपूर आयोग के सामने गवाही देते हुए कहा कि महात्मा को मारने की कोशिश उस दिन पंचगणी में हुई थी।

सितम्बर 1944 में जब जिन्ना के साथ गांधी की वार्ता शुरू हुई तब उन्हें मारने की तीसरी कोशिश हुई।

उन दिनों महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना के साथ वार्ता की तैयारी में जुटे थे। हिन्दू महासभा इसके विरोध में थी और नथूराम गोडसे और एलजी थत्ते इसके खिलाफ खुल कर अभियान चला रहे थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वह किसी भी सूरत में गांधी को रोकेंगे। जब वार्ता के सिलसिले में सेवाग्राम आश्रम से निकलकर गांधी मुंबई जा रहे थे, तब नथूराम और थत्ते की अगुआई में अतिवादी हिन्दू युवकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, उनके साथ बंगाल के कुछ युवक भी थे। उनका कहना था कि गांधीजी को जिन्ना के साथ वार्ता नहीं चलानी चाहिए।

उस वक्त भी नाथूराम के कब्जे से एक खंजर बरामद हुआ था। इस हमले के बारे में डॉ. सुशीला नायर ने कपूर जांच आयोग के सामने गवाही दी थी / जो गांधी हत्या के लगभग दो दशक बाद बना था/ और बताया था कि नथूराम और उसके साथियों को आश्रमवासियों ने बन्दी बना लिया था जब वह महात्मा जी की तरफ हमले की मुद्रा में आगे बढ़ रहा था और उससे खंजर भी बरामद हुआ था। कपूर आयोग के सामने जो पुलिस रिपोर्ट पेश की गयी वह भी बताती है कि समूह के एक सदस्य की जेब से एक जांबिया / एक टेढ़ा चाकू/ बरामद हुआ था, जिस समूह में गोडसे, एल जी थत्ते आदि शामिल थे।

गांधी की हत्या की चौथी कोशिश जून 1946 में हुई जब वह जिस ट्रेन में पुणे की यात्रा कर रहे थे, उसमें तोड़फोड़ करने की कोशिश की गयी।

‘पुणे के रास्ते में गांधीजी को ले जाने वाली ट्रेन – जिसे गांधी स्पेशल कहा जा  रहा था – नेरूल और कर्जत स्टेशनों के बीच दुर्घटना का शिकार हुई। इंजन ड्राइवर का कहना था कि रेलवे के ट्रैक पर बड़े बोल्डर/बड़े पत्थर रखे गए थे जिसमें साफ इरादा था कि ट्रेन को पटरी से उतारा जाए। ट्रेन उन बोल्डरों से टकरायी अलबत्ता ड्राइवर की सावधानी से बड़ी दुर्घटना होते होते बची क्योंकि उसने पहले ही ट्रेन को धीमा किया था। पुणे पुलिस का दावा था कि लुटेरों ने मालगाड़ी को लूटने के इरादे से रास्ते में इन बड़े पत्थरों को रखा था।  गौरतलब था कि उस दिन उस रूट पर कोई मालगाड़ी चलने वाली नहीं थी, सिर्फ गांधी तथा उनके सहयोगियों को ले जाने वाली वह स्पेशल ट्रेन ही थी। पुलिस ने अपनी तरफ से तोड़फोड़ की सम्भावना से इन्कार नहीं किया था और चूंकि उस रूट पर उस वक्त गांधी स्पेशल ही जा रही थी इसलिए यही माना जा सकता है कि वही ट्रेन निशाने पर थी।

30 जून को पुणे की अपनी प्रार्थना सभा में महात्मा गांधी ने कहा,

‘‘ ईश्वर की कृपा से मैं मौत के मुंह से सात बार बच चुका हूं। मैंने किसी को चोट नहीं पहुंचायी और मैं किसी को अपना दुश्मन नहीं मानता, मैं समझ नहीं पाता कि आखिर मुझे मारने की इतनी सारी कोशिशें क्यों चली हैं। कल मुझे मारने की कोशिश असफल हुई। मैं इतना जल्दी नहीं मरूंगा, मेरा मकसद है 125 साल तक जिया जाए।’/ वही,  पेज 90, ।

सावरकर की फोटो पर माल्यार्पण करते मोदी।

गांधीजी को मारने की पांचवी कोशिश में (20 जनवरी 1948) लगभग वही समूह शामिल था जिसने अन्ततः 30 जनवरी को उनकी हत्या की। इसमें शामिल था मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, दिगम्बर बड़गे, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे। योजना बनी थी कि महात्मा गांधी और हुसैन शहीद सुरहावर्दी पर हमला किया जाए। इस असफल प्रयास में मदनलाल पाहवा ने बिड़ला भवन स्थित मंच के पीछे की दीवार पर कपड़े में लपेट कर बम रखा था, जहां उन दिनों गांधी रूके थे। बम का धमाका हुआ, मगर कोई दुर्घटना नहीं हुई, और पाहवा पकड़ा गया। समूह में शामिल अन्य लोग जिन्हें बाद के कोलाहल में गांधी पर गोलियां चलानी थी, वे अचानक डर गए और उन्होंने कुछ नहीं किया। उस रात मदनलाल पाहवा – जिसे पुलिस ने दबोच लिया था – उस होटल में पुलिस को लेकर गया जहां सभी आतंकी रूके थे। पुलिस ने होटल से एक पत्र तथा कुछ कपड़े बरामद किए, जिसमें हत्या के प्रयास में महाराष्ट्र के लोगों की संलिप्तता साफ उजागर हो रही थी। हालांकि नथूराम गोडसे और आप्टे के गिरोह द्वारा महात्मा को मारने के इसके पहले कई प्रयास हुए थे, और होटल से बरामद कपड़ों पर एनवीजी /नथूराम विनायक गोडसे/ लिखा था, इसके बावजूद पुलिस ने इन सबूतों पर ठीक से काम नहीं किया।

इस आतंकी गिरोह के सदस्य अपने घरों को लौट आए। गोडसे और आप्टे, बम्बई के रास्ते पुणे लौटने के बाद भी महात्मा को मारने के अपने इरादे पर सक्रिय रहे। वह वहां से ग्वालियर के लिए रवाना हुए, जहां उन्होंने डा परचुरे और दंडवते की मदद से बेरेटा आटोमेटिक पिस्तौल और ग्यारह गोलियों का इन्तज़ाम किया और 29 जनवरी को वह दिल्ली पहुंचे तथा स्टेशन के रिटायरिंग रूम में रूके।

गांधी को मारने की छठीं और आखरी कोशिश 30 जनवरी को शाम पांच बज कर 17 मिनट पर हुई जब नाथुराम गोडसे ने उन्हें सामने से आकर तीन गोलियां मारीं। हिन्दु महासभा और उसके अनुयायियों ने मिठाइयां बांट कर महात्मा की हत्या की ‘खुशियां मनायीं। 31 जनवरी 1948 को दस लाख से अधिक लोग दिल्ली में इकटठा हुए ताकि राष्टपिता के अंतिम दर्शन किए जाएं। उनकी हत्या में शामिल सभी पकड़े गए, उन पर मुकदमा चला और उन्हें सज़ा हुई। नाथुराम गोडसे एवं नारायण आप्टे को सज़ा ए मौत दी गयी, (15 नवम्बर 1949) जबकि अन्य को उमर कैद की सज़ा हुई।

बहुत कम लोग जानते हैं देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू तथा गांधी के पुत्रों ने गोडसे एवं आप्टे को मिली सज़ा-ए-मौत का विरोध किया था। उनका तर्क था कि फांसी की सज़ा को लेकर गांधी का सख्त विरोध था लिहाजा ऐसी कोई भी सज़ा उनके उसूलों के खिलाफ होगी। दूसरी अहम बात यह थी कि चाहे गोडसे हों या आप्टे हों या उनके आतंकी मोडयूल में शामिल बाकी लोग, यह सभी बुनियादी तौर पर प्यादे या अंजामकर्ता कहें जाएंगे, जबकि घटना के असली मास्टरमाइंड या असली प्लानर पहुंच से बाहर ही रहे हैं। इस हत्या के लगभग दो दशक बाद बने जीवन लाल कपूर आयोग की रिपोर्ट इसी बात की बखूबी ताईद करती है।

अगर हम इन छह कोशिशों पर नज़र डालें जिसमें बम फेंकने से लेकर ट्रेन को ही बेपटरी करने की योजनाएं दिखती हैं तब हम देख सकते हैं कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए आमादा ताकतें कितनी हिंसक तैयारियों में कितने पहले से मुब्तिला थीं। भले ही इस हत्या को किसी युवक के गुस्से के तौर पर प्रोजेक्ट करने में हिन्दुत्व की जमातों का सफलता मिली है, मगर हक़ीकत यही थी कि वह गांधी को निशाना बना कर अपने इरादों की बुलन्दी के बारे में ऐलान कर रहे थे कि किसी भी सूरत में वह हिन्दू राष्ट्र के अपने सपने को साकार करके रहेंगे।

इस बात को गहराई से समझने के बाद ही हम तीस्ता सीतलवाड़ की इस बात से सहमत हो सकते हैं जिसका जिक्र वह अपने द्वारा सम्पादित किताब की प्रस्तावना में करती हैं कि गांधी की हत्या महज आज़ाद हिन्दोस्तां की पहली आतंकी कार्रवाई नहीं थी बल्कि वह

‘युद्ध का ऐलान था और अपने इरादे का बयान था। वे ताकतें, जिन्होंने …. इस हत्या का षड्यंत्र रचा, इस कार्रवाई के जरिए उन्होंने भारत के हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के प्रति अपनी लम्बी प्रतिबद्धता का ऐलान किया और यह भी बताया कि किस तरह हिन्दुत्ववादी संगठन धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक भारतीय राज्य के विचार के साथ और उन सभी के साथ जो इन सिद्धांतों की हिमायत करते हैं, निरन्तर युद्धरत रहेंगे। यह देखना अभी बाकी है कि अभी वह किस हद तक जाने के लिए तैयार हैं। गांधी तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ा राष्ट्रीय आन्दोलन जिन बातों की नुमाइन्दगी करता था उन सभी की समाप्ति का भी हत्या के माध्यम से संकेत दिया जा रहा था। स्पष्ट है कि ऐसी जमातों के लिए आदर्श राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर नागरिकता की समानता और गैर भेदभावपूर्ण जनतांत्रिक प्रशासन यह बातें हमेशा ही नागवार गुजरती रही हैं।

ध्यान रहे कि इस पूरी साजिश में सावरकर की भूमिका पर बाद में विधिवत रौशनी पड़ी। गांधी हत्या को लेकर चले मुकदमे में उन्हें सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया था।

कपूर आयोग की रिपोर्ट का एक हिस्सा।

मालूम हो कि गांधी हत्या के सोलह साल बाद पुणे में हत्या में शामिल लोगों की रिहाई की खुशी मनाने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। 12 नवम्बर 1964 को आयोजित इस कार्यक्रम में शामिल कुछ वक्ताओं ने कहा कि उन्हें इस हत्या की पहले से जानकारी थी। अख़बार में इस ख़बर के प्रकाशित होने पर जबरदस्त हंगामा मचा और फिर 29 सांसदों के आग्रह तथा जनमत के दबाव के मद्देनज़र तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री गुलजारीलाल नन्दा ने सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक कमीशन आफ एन्क्वायरी एक्ट के तहत कमीशन गठित किया।

कपूर आयोग ने हत्या में सावरकर की भूमिका पर नए सिरे से निगाह डाली। आयोग के सामने सावरकर के दो सहयोगी अप्पा कासार – उनका बाडीगार्ड और गजानन विष्णु दामले, उनके सेक्रेटरी भी पेश हुए, जो मूल मुकदमे में बुलाए नहीं गए थे। कासार ने कपूर आयोग को बताया कि किस तरह हत्या के चन्द रोज पहले आतंकी गोडसे एवं दामले सावरकर से आकर मिले थे। विदाई के वक्त सावरकर ने उन्हें एक तरह से आशीर्वाद देते हुए कहा था कि ‘यशस्वी होउन या’ अर्थात कामयाब होकर लौटो। दामले ने बताया कि गोडसे और आप्टे को सावरकर के यहां जनवरी मध्य में देखा था। न्यायमूर्ति कपूर का निष्कर्ष था ‘‘ इन तमाम तथ्यों के मद्देनजर यही बात प्रमाणित होती है कि सावरकर एवं उनके समूह ने ही गांधी हत्या को अंजाम दिया।

जारी..

(“गांधी स्मृति श्रृंखला” के तहत दी जा रही यह तीसरी कड़ी लेखक सुभाष गाताडे की किताब “गांधी स्मृति-कितनी दूर, कितनी पास” से ली गयी है।)

This post was last modified on October 3, 2019 9:35 pm

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