Thursday, October 28, 2021

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व्यवस्था और मुस्लिम समुदाय के बीच अविश्वास की बढ़ती खाई का नतीजा है इंदौर और मुरादाबाद के हमले

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इंदौर के बाद अब मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल इलाके में कोरोना के मरीज़ को चेक करने गए डाक्टरों पर हमले की घटना सामने आयी है। कोई ऐसा नाशुकरा ही होगा जो इस घटना की निंदा नहीं करेगा। लेकिन ठंडे दिमाग़ से सोचिए क्या किसी मरीज़ के हमदर्द इलाज करने आए किसी चिकित्सक पर हमला करेंगे? उसे गालियाँ देंगे? और उस पर ईंट-पत्थर बरसाएंगे? जाहिल से जाहिल इंसान भी ऐसा नहीं करेगा। बावजूद इसके अगर ऐसा हो रहा है तो इसका मतलब है कि उसके पीछे कोई बेहद गंभीर कारण है।

क्या कभी उन कारणों की तलाश करने की कोशिश की गयी? दरअसल जिस तरह से सत्ता से लेकर मीडिया और बहुसंख्यकों से लेकर आम जन में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत और घृणा का अभियान चलाया जा रहा है उससे मुस्लिम तबके में पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्वास की खाईं गहरी होती जा रही है। और यह अविश्वास ही है जो इन हमलों के रूपों में सामने आ रहा है। इसके लिए प्राथमिक तौर पर वह समुदाय नहीं बल्कि यह व्यवस्था ज़िम्मेदार है जिसने उन्हें इन स्थितियों में ले जाकर खड़ा कर दिया है।

कोरोना को मुस्लिम कोरोना साबित करने के लिए सरकार और उसकी मशीनरियों ने एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया। उसमें तबलीगी जमात के मरकज़ को देश में कोरोना प्रोड्यूसिंग सेंटर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश उसका सबसे मज़बूत सबूत है। पूरे मामले को इस स्तर तक खींचा गया जैसे देश में कोरोना विस्तार के लिए एकमात्र वही ज़िम्मेदार है। पहले यह आरोप तबलीगियों तक सीमित था बाद में उस पूरे मुस्लिम समुदाय तक विस्तारित कर दिया गया। जमात के आयोजकों को दोष से बरी नहीं किया जा सकता है। लेकिन उससे पहले और उससे ज़्यादा बाहर से आए लोगों को वीज़ा और कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति देने वाली सरकार ज़िम्मेदार है।

बावजूद इसके अगर पूरे मामले को इस रूप में पेश किया जा रहा है कि बाहर से आए 1000 के आस-पास तबलीगियों ने ही सब गुड़गोबर कर दिया। और तीन महीनों के भीतर बाहर से आए 15 लाख लोग बिल्कुल चंगा थे तो इससे बड़ा झूठ कोई दूसरा नहीं हो सकता है। यह कुछ 15 लाख बनाम 1000 का मामला है। जिसमें एक हज़ार को दोषी ठहरा दिया गया और 15 लाख को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। और हमें नहीं भूलना चाहिए कि इन पंद्रह लाख में कनिका कपूर भी शामिल थीं और मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य मंत्री का बेटा भी। और इसी तरह से कितने कनिका और स्वास्थ्य मंत्री के बेटे इसको फैलाने में लगे हुए थे।

उसी दौरान और उसके बाद मरकज़ जैसे एक नहीं सैकड़ों धार्मिक आयोजन हिंदुओं के हुए लेकिन वह कभी मुद्दा नहीं बनाया गया। इन आयोजनों में शामिल लोगों को इस तरह से उनके गंतव्यों तक पहुंचाया गया कि किसी को कानों-कान ख़बर तक नहीं हुई। आज से तीन दिन पहले सहारनपुर के राधास्वामी सत्संग आश्रम से 800 श्रद्धालुओं को निकाला गया। लेकिन वहाँ मीडिया नहीं पहुँचा। बनारस में फँसे तक़रीबन 2000 से ज़्यादा दक्षिण भारत के हिंदू श्रद्धालुओं को रात के अंधेरे में बसों से निकाला गया। उनके वीडियो सोशल मीडिया पर आए लेकिन किसी भी मुख्यधारा के मीडिया ने उसे मुद्दा नहीं बनाया।

वैष्णो देवी से लेकर श्री श्री के आश्रमों में फँसे सैकड़ों हिंदुओं की तमाम कहानियाँ सोशल मीडिया में तैर रही हैं। हरिद्वार से 1800 गुजरातियों को रातों रात निकाला गया और बस मुहैया कराने वाले उत्तराखंड के ट्रांसपोर्ट विभाग के मुखिया यानी ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर तक को उसकी ख़बर नहीं लगी। और दो दिन पहले लाकडाउन के बीच कर्नाटक के कलबुर्गी में रथयात्रा कार्यक्रम में जुटे हज़ारों हिंदुओं के जमावड़े की क्या कोई तस्वीर मुख्यधारा के मीडिया में दिखी?

लिहाज़ा आप गुजराती हैं तो वीआपी हैं। आप हिंदू श्रद्धालु हैं तो विशेषाधिकार प्राप्त हैं। लेकिन आप मज़दूर हैं तो पुलिस की लाठी खाने के लिए बने हुए हैं। और अगर ज़्यादा बवाल काटे तो फिर आप को भी मुसलमानों की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाएगा। यह व्यवस्था का नया ब्राह्मणवाद है।

समाज के स्तर पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ जिस गिरे दर्जे का व्यवहार किया गया है उसकी कोई इतिहास में दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी। यह सब कुछ उन मध्यवर्गीय सोसाइटियों और कालोनियों में हुआ है जो आधुनिक सभ्यता के किसी सर्टिफिकेट वितरण समारोह में सबसे आगे खड़े मिलेंगे। किसी कालोनी में सब्ज़ी बेचने वाले से उसका नाम पूछा गया और मुस्लिम होने पर उसे रोक दिया गया। तो कहीं यही काम सड़कों पर फल बेचने वालों के साथ हुआ। और घृणा से भरे इन अभियानों का सबसे क्रूर और जाहिलियत भरा चेहरा उस समय सामने आया

जब आईटी सेल ने मुस्लिम तबके पर सामानों और नोटों में थूक लगाकर कोरोना फैलाने का आरोप लगाया। जबकि जाँच करने पर इस तरह की सारी घटनाएं झूठी निकलीं या फिर अफ़वाह साबित हुईं। लेकिन सच न होने के बावजूद ये सारी चीजें अपना काम कर रही थीं। एक तरफ़ आम हिंदुओं में मुस्लिम तबके के प्रति नफ़रत को और बढ़ा रही थीं दूसरी तरफ़ मुस्लिमों में व्यवस्था और लोगों के प्रति अविश्वास की खाई को और चौड़ा कर रही थीं। इस तरह से अविश्वास का दायरा बढ़ता जा रहा था। इसी बीच बवाना में हुई वह घटना इस अविश्वास को और बढ़ाने वाली साबित हुई है जिसमें अपना मेडिकल चेक अप कराने और साथ में सर्टिफिकेट होने के बावजूद लोगों ने एक युवक को लिंच कर मारा डाला था।

पूरा देश जब कोरोना से लड़ रहा है और शासन से लेकर जनता तक की प्राथमिकता कोरोना होना चाहिए था तब इस दौर में भी सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलनों के कर्ताधर्ता पुलिस और प्रशासन के निशाने पर हैं। जगह-जगह उनकी गिरफ़्तारियाँ हो रही हैं। जामिया से लेकर जाफराबाद तक में दर्जनों युवकों को पकड़ा गया है। यहाँ तक कि गर्भवती महिलाओं तक को नहीं बख्शा गया।

अब इन स्थितियों में मुसलमान आख़िर करे तो क्या करे? शासन और व्यवस्था ने बँटवारे और अविश्वास के इस दायरे को अस्पतालों तक पहुँचा दिया। अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में यह बाक़ायदा हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग बने वार्डों के तौर पर सामने आया। यह कोई स्थानीय अस्पताल प्रशासन का फ़ैसला नहीं था बल्कि सब कुछ सरकार के निर्देश और इशारे पर हुआ। उसके बाद विश्वास करने के लिए अब मुसलमानों के पास आखिर बचता क्या है? या तो कोई यह कहना चाहता है कि इन सभी चीजों की मुस्लिम समुदाय अनदेखी करे और अपना सिर ज़मीन में गाड़ दे। सच तो यही है मौजूदा समय में भारतीय मुस्लिम समुदाय ने हर उत्पीड़न सहने और बर्दाश्त करने का जैसे संकल्प लिया हो। उसको लगता है कि समय के साथ यह दौर भी गुजर जाएगा। लेकिन सरकार और उसके कारकून शायद उसके धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं।

इन सारी स्थितियों में मुस्लिम समुदाय के बीच इस तरह की अफ़वाहें कि अस्पताल में ले जाकर इलाज की जगह मुसलमानों को मार दिया जा रहा है। सत्ता, प्रशासन और मीडिया से लेकर आईटी सेल द्वारा चलाया गया मुस्लिम विरोधी अभियान उन आशंकाओं को और बल दे देता है। ऐसे में ज़रूरत है उनके बीच विश्वास पैदा करने की। यह बताने की कि शासन और प्रशासन इस तरह का कोई भेदभाव नहीं करता। साथ ही घृणा और प्रचार में लगे ऐसे लोगों के खिलाफ जो सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की साज़िश में लिप्त हैं, क़ानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई उसका अभिन्न हिस्सा हो जाता है।

क्या कोई बताना चाहेगा कि एनआरसी और सीएए के दौरान हिंसा बीजेपी शासित राज्यों में ही क्यों हुई? और इस दौरान भी डाक्टरों पर हमलों की घटनाएँ भी उन्हीं सूबों में क्यों हो रही हैं जहां बीजेपी सत्ता में है। वरना इसका क्या जवाब है कि केरल में मुस्लिमों की आबादी किसी भी दूसरे राज्य से ज़्यादा है। यहाँ तक़रीबन 25 फ़ीसदी मुस्लिम हैं। और कोरोना के मामले में न केवल यह सबसे पहला प्रभावित राज्य है बल्कि एक दौर में संख्या के लिहाज़ से भी अगली क़तार में था। लेकिन शासन और सत्ता की सूझबूझ और समय रहते हस्तक्षेप ने सूबे को कोरोना मुक्त कर दिया और अब देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना से लड़ाई का मॉडल बन गया। यहाँ क्यों नहीं डाक्टरों पर पत्थर फेंके जाने की घटनाएं हुईं?

अभी तत्काल इस अविश्वास को तो नहीं ख़त्म किया जा सकता है। लेकिन अगर प्रशासन अपने रवैये में बदलाव लाए और सरकारें संवैधानिक रूप से ज़रूरी हर वो कदम उठाए जो किसी घृणा और नफ़रत फैलाने वाले शख़्स के ख़िलाफ़ बनता है। साथ ही मुस्लिम क्षेत्रों में जाने से पहले वहाँ के स्थानीय सामाजिक और धार्मिक प्रमुखों को भरोसे में लेकर हस्तक्षेप करें तो इस तरह की अप्रिय घटनाओं से बचा जा सकता है। इसलिए इस टूटे भरोसे को पाटने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी सत्ता और उसकी मशीनरियों की है। और वे इस ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती हैं।

अंत में एक बात की तरफ़ गौर किए बग़ैर यह लेख समाप्त करना ठीक नहीं होगा। ऐसा नहीं कि हमले केवल मुस्लिम इलाक़ों में या फिर मुस्लिम तबकों द्वारा ही किया जा रहा है। बागपत के पास के एक गाँव में लॉकडाउन कराने गए पुलिसकर्मियों पर हिंदू बहुल गाँव के लोगों ने पंचायत मुखिया के नेतृत्व में संगठित रूप से हमला बोल दिया था। पुलिसकर्मियों की लहूलुहान तस्वीरें मीडिया में आयी थीं लेकिन मुख्यधारा के मीडिया ने उसको उस स्तर का मुद्दा नहीं बनाया। इसी तरह से सफ़दरजंग अस्पताल में दो महिला डॉक्टरों के साथ बदतमीज़ी का मामला कोर्ट तक गया। 

इसके साथ ही विभिन्न इलाक़ों में रहने वाले चिकित्सकों और नर्सों को अपने पड़ोसियों द्वारा हर तरह के अपमान और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और इसकी आये दिन ख़बरें भी बन रही हैं। लेकिन उन्हें मुद्दा बनाने की ज़रूरत नहीं समझी जाती है क्योंकि वह एजेंडे से बाहर है और उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलने जा रहा है। उलटे उसके मुद्दा बनने पर तबलीगी जमात के मामले की धार कमजोर पड़ सकती है! लिहाज़ा उसे छुपाने की हद तक इग्नोर किया जाता है। और यही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस तरह की दिक़्क़तों का सामना कोरोना वारियर्स को करना पड़ रहा है।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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