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सुप्रीम कोर्ट में भूमि अधिग्रहण मामला: ईमानदार दिखना भी चाहिए योर ऑनर!

एक और सामजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा के मामले में एक के बाद एक 5 जज ने बिना कारण बताये अपने को सुनवाई से अलग कर लिया था लेकिन उच्चतम न्यायालय में भूमि अधि‍ग्रहण की धारा 24(2) की व्याख्या का ऐसा मामला आया है जिसमें संविधान पीठ की अध्यक्षता करने वाले जस्टिस अरुण मिश्रा को सुनवाई से अलग करने के मामले में याचियों के विरोध के बावजूद जस्टिस मिश्रा सुनवाई से अलग होना नहीं चाहते ।जस्टिस मिश्रा उस फैसले को लिखने वाले भी हैं, जिसकी सत्यता को संविधान पीठ परखेगी और ऐसे में पक्षपात का तत्व आ सकता है।

उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने जस्टिस अरुण मिश्रा को भूमि अधि‍ग्रहण में उचि‍त मुआवजा एवं पारदर्शि‍ता का अधि‍कार, सुधार तथा पुनर्वास अधिनि‍यम, 2013 की धारा 24(2) की व्याख्या संबंधित मामलों की सुनवाई से रोकने के लिए याचिका पर आदेश सुरक्षित रख लिया है ।पीठ ने कहा कि वह 23 अक्टूबर को आदेश सुनाएगी।

भूमि अधिग्रहण कानून 2014 के अंतर्गत प्रावधान है कि निजी पूँजीपति अगर अधिग्रहीत भूमि का घोषित उद्देश्य अनुसार उपयोग न करे तो एक निश्चित समय के बाद वह उसके पूर्व मालिकों को वापस की जा सकती है। इस प्रावधान को उच्चतम न्यायालय  ने वैधानिक भी माना है और कुछ मामलों में कोर्ट में जाने पर जमीन वापस भी हुई।

याचिकाकर्ताओं की और से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कहा कि एक विशेष दृष्टिकोण रखने के लिए एक न्यायाधीश के पक्षपात ने पूर्वाग्रह की उचित आशंका को जन्म दिया, जो पुनरावृत्ति के लिए पर्याप्त है। अयोग्यता पर वास्तविक पूर्वाग्रह के आधार पर तर्क नहीं किया जाता है, यह पूर्वाग्रह की उचित आशंका पर किया जाता है। दीवान ने कहा कि संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायाधीश जस्टिस अरुण मिश्रा उस फैसले को लिखने वाले भी हैं, जिसकी सत्यता को परखा जा रहा है और ऐसे में पक्षपात का तत्व आ सकता है।

जस्टिस अरुण मिश्रा ने इसे खारिज करने से इनकार कर दिया और कहा कि यह अनुरोध से पीठ के खिलाफ साज़िश है। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि आप अपनी पसंद की बेंच चाहते हैं, आपके फॉर्मूले से जो आपका पक्ष ले सके। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नष्ट कर देगा। यह बेंच का शिकार(बेंच हंटिंग) करने से कुछ कम नहीं है। यह न्यायपालिका पर नियंत्रण करना है। यह एक गंभीर मुद्दा है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पूर्वाग्रहित पूर्वाग्रह को पुनरावृत्ति का कोई मामला बनाने के लिए प्रदर्शित किया जाना चाहिए। किसी मामले के संभावित परिणाम की मात्र सशक्त अभिव्यक्ति अपर्याप्त है। “अतिरिक्त न्यायिक पूर्वाग्रह” के अमेरिकी सिद्धांत का हवाला देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस तथ्य को कि न्यायिक कार्यवाही के संदर्भ के बाहर के स्रोतों से एक न्यायाधीश पर राय ली गई है, यह पूर्वाग्रह के रूप में पर्याप्त नहीं है।

दरअसल अखिल भारतीय किसान संघ ने 14 अक्टूबर को एक पत्र लिखा था, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई से अनुरोध किया कि जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली नवगठित संविधान पीठ भूमि अधि‍ग्रहण में उचि‍त मुआवजा एवं पारदर्शि‍ता का अधि‍कार, सुधार तथा पुनर्वास अधिनि‍यम, 2013 की धारा 24(2) की व्याख्या के बारे में मामलों की सुनवाई नहीं कर सकती। जस्टिस मिश्रा पीठ ने पहले ही 2018 के फैसले में 2014 के फैसले की सटीकता पर संदेह जताकर मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त किए थे। इसे एक कारण के रूप में उद्धृत करते हुए इस सिद्धांत के साथ कि न्याय न केवल किया जाना चाहिए बल्कि न्याय होते हुए भी दिखना चाहिए। किसान संघ ने प्रार्थना की है कि जस्टिस अरुण मिश्रा को मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए।

संविधान पीठ के सामने आए पांच मुद्दों में से एक को जस्टिस मदन लोकुर ने आगे बढ़ाया था, जो 2014 के फैसले का हिस्सा थे। जस्टिस लोकुर ने कहा था कि वह 2018 के फैसले से सहमत नहीं थे। जस्टिस मिश्रा ने उन्हें इस सुनवाई से हटाए जाने की मांग पर कहा कि हम सभी कभी न कभी मुद्दे से जुड़े रहे हैं। मुझे बताइए, कौन इसका हिस्सा नहीं रहा है? तो क्या हम सभी मुद्दे पर सुनवाई करने के लिए अयोग्य हो गए? हम सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि विधि सम्बधित सवाल क्या है? यह सम्पत्ति का सवाल नहीं रहा। यह एक वैधानिक मुद्दा है। हम इस पर सुनवाई करना चाहते हैं या नहीं चाहते, यह सवाल नहीं है।क्या यह अदालत अपमान नहीं है?

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यामयूर्ति इन्दिरा बनर्जी, न्यायमूर्ति विनीत सरन, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट्ट शामिल हैं। जस्टिस मिश्र वह फैसला सुनाने वाली पीठ के सदस्य थे जिसने कहा था कि सरकारी एजेंसियों द्वारा किया गया भूमि अधिग्रहण भू स्वामी द्वारा मुआवजे की राशि स्वीकार करने में पांच साल तक का विलंब होने के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।

12 अक्टूबर को, सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचित किया था कि जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस इंदिरा बनर्जी, जस्टिस विनीत सरन, जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस रवींद्र भट्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ 15 अक्टूबर से भूमि अधिग्रहण अधिनियम से जुड़े पांच मामलों की सुनवाई शुरू करेगी। धारा 24 (2) के अनुसार, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के अनुसार शुरू की गई अधिग्रहण की कार्यवाही समाप्त हो जाएगी, अगर पांच साल के भीतर भूमि मालिकों को मुआवजा नहीं दिया गया है।

दीवान ने कहा कि एक जज को पूर्वाग्रह की आशंका को देखते हुए सुनवाई से हट जाना चाहिए। अन्यथा जनता का भरोसा उठ जाएगा और इसलिए वह संस्थान की ईमानदारी को बरकरार रखने के लिए जज को हटाने का निवेदन कर रहे हैं। दीवान और अन्य वकीलों ने कहा कि जस्टिस मिश्रा को इस केस से खुद को अलग कर लेना चाहिए, क्योंकि पिछले साल सुनाए गए फैसले का वह हिस्सा थे। उस फैसले में उन्होंने अपने मन की बात कही थी।वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि न केवल न्याय की बात की, बल्कि ऐसा किया जा रहा है, जिसे देखते हुए न्यायमूर्ति मिश्रा ने टिप्पणी की कि यहां कई मुद्दे हैं, आप समझते हैं और मैं समझता हूं कि क्या दांव पर है।

श्याम दीवान ने कहा कि इस बात का कोई सवाल ही नहीं है कि चीफ जस्टिस को एक विशेष बेंच बनाने के लिए मजबूर किया जा सकता है, या यह कि आप लॉर्डशिप किसी भी बेंच-शॉपिंग को अनुमति देंगे । यहां किसी को भी सोशल मीडिया पर कही गई बातों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। एक संस्था के रूप में हमें मजबूत होना चाहिए और हमें उस बकवास को नहीं सुनना चाहिए,  हमें केवल हमारे सिद्धांतों और सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होना चाहिए। जब किसी न्यायाधीश को सुनवाई से हटने के लिए प्रार्थना किया जय तो उस न्यायाधीश को इससे आहत नहीं होना चाहिए। दीवान ने जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा इंदौर विकास प्राधिकरण के फरवरी, 2018 के फैसले के मद्देनजर इस मामले में पूर्वाग्रह और पक्षपात की आशंका जताई है।

दीवान ने कहा कि स्वतंत्रता के लिए उचित धारणा का विषय होना चाहिए। किसी भी बेंच-हंटिंग का कोई इरादा नहीं है, लेकिन हम पूर्वाग्रह की आशंका से चिंतित हैं। यह परीक्षण पूर्वाग्रह का नहीं है, लेकिन यह कि यदि हितधारक किसी भी पूर्वाग्रह से बचते हैं।यदि आप लॉर्डशिप पहले ही इस मुद्दे पर अपना अंतिम निर्णय दे चुके हैं , तो आपको  आदर्श रूप से इस पीठ में नहीं होना चाहिए। आपके निर्णय का यह पीठ परिक्षण करने वाली है, कानून के प्रश्न तैयार किए गए हैं। आपकी उपस्थिति अधिवक्ताओं और वादियों को इस मामले को पेश करने में अवरोध बनेगी।

दीवान ने कहा कि कुछ सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया है और इन मानकों का पालन किया जाना है। यहाँ बेंच-हंटिंग जैसा कुछ भी नहीं है।  दीवान ने कहा कि पक्षपात की उचित आशंका के कारण  ही किसी न्यायाधीश को किसी पीठ से हटने का अनुरोध किया जाता है । दीवान ने कहा कि जब एक बेंच गठित की जाती है, तो यह अपेक्षा की जाती है कि बेंच के सदस्य किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हों । अन्यथा, न्यायाधीशों को  स्वयं सुनवाई से अपने को अलग कर लेना चाहिए , इसके लिए प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि वादी इसका आग्रह करें।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार भी हैं।)

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