Tuesday, December 7, 2021

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भीड़तंत्र का बढ़ता दायरा और बौनी होती इंसानियत

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हाल ही में उत्तर प्रदेश के हापुड़ स्थित बहादुरगढ़ के गढ़मुक्तेश्वर से एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ जिसमें चोरी के इल्जाम में एक 8 वर्षीय बच्ची के हाथ बांधकर उसे कुछ लोगों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है और उस पर अश्लील टिप्पणी भी की जा रही है। खबर के मुताबिक उसके साथ मारपीट भी की गई। वीडियो में देखा जा सकता है कि रस्सी से बंधे हाथ को एक व्यक्ति ने पकड़ा हुआ है। बच्ची बेहद असहज महसूस कर रही है, अपने दांतों से रस्सी खोलने की कोशिश कर रही है और ना खुलने पर बार-बार हाथ खोल देने की गुजारिश कर रही है।

वह बेहद कष्ट में है लेकिन खुद को कानून से ऊपर समझने वाला भीड़तंत्र तो इस गौरव से फूला नहीं समा रहा कि उसने परमवीर चक्र पाने जैसा काम किया है। यह तो रही वायरल वीडियो की एक तस्वीर, लेकिन एक दूसरी तस्वीर भी है जो बेहद खतरनाक और विचलित करने वाली है और वह यह कि इस कृत्य को देखने के लिए अगल-बगल कई लोग खड़े हैं जो महज तमाशबीन बने हुए हैं । अपने भीतर के इंसानियत को मार चुके वे लोग उल्टे रस्सी पकड़े शख्स को उसके इस काम के लिए उसे प्रोत्साहित करते ही देखे जा सकते हैं।

हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार कर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। तो वहीं उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से भी इंसानियत को शर्मसार के देने वाली एक घटना का वीडियो सामने आया है। काकोरी थाना क्षेत्र स्थित दुबग्गा जागर्स पार्क के पास शुक्रवार सुबह 12 वर्षीय बच्चे को पेड़ से बांधकर पीटने का वीडियो वायरल हो गया। आरोप लगाया गया कि बच्चे ने नकली नोट देकर समान खरीदा। वह पहले भी ऐसा कर चुका है।

पुलिस का कहना है कि वीडियो के आधार पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट(जे जे एक्ट) में केस दर्ज कर मामले की जांच की जा रही है। उधर बच्चा लापता है। जिसकी पुलिस तलाश कर रही है। हिरासत में ली गई महिला दुकानदार शांति का आरोप है कि बच्चे ने 200 रुपये का चूरन वाला नकली नोट देकर 65 रुपये का बिस्कुट, चाकलेट और कुछ अन्य सामान उनके पति रामकिशोर से खरीदा था। वह पीछे खड़ी थी। जिसे उन्होंने पकड़ लिया। नोट देखा तो वह नकली चूरन वाला था। बच्चे को डांटा गया तो आस-पड़ोस के लोग आ गए। उन्होंने पकड़ा और पेड़ से बांध कर वीडियो बना लिया।

वहीं कुछ लोगों को कहना है कि बच्चे को पहले पीटा गया था। फिर वीडियो बनाया गया। बच्चे के मुताबिक उसके माता पिता नहीं हैं और उसकी आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब है। उसने बताया कि वह एक होटल में काम करता है, होटल जाने के क्रम में उसे रास्ते में दो सौ का नोट पड़ा मिला जिसे लेकर वह दुकान में खाने का सामान खरीदने चला गया। उसे क्या पता था कि नोट नकली है। भले ही इस मामले में भी पुलिस ने आरोपियों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया हो लेकिन फिर सवाल वहीं आ जाता है कि आखि़र यह कैसी संस्कृति समाज को जकड़ रही है जहां लोग न केवल भीड़तंत्र का हिस्सा बनते जा रहे हैं बल्कि संवेदनाएं खो कर अमानवीयता की किसी भी हद तक जाते देखे जा सकते हैं।

इन दोनों ही घटनाओं में हम देख सकते हैं कि भीड़ द्वारा बच्चों पर उसी तरह की हिंसा की गई जैसा एक वयस्क के साथ भीड़ हिंसा करती है, जो भीड़तंत्र का एक बेहद खौफ़नाक चेहरा दर्शाता है। यह कहना गलत नहीं कि ऐसी घटनाओं में जो तीसरा पक्ष है उसकी “चुप्पी” उन्मादी भीड़ की हिंसा से ज्यादा खतरनाक साबित हो रही है। एक पक्ष हिंसा करता नज़र आता है, दूसरा पक्ष हिंसा का शिकार होता है और तीसरा पक्ष इन दोनों पक्षों को केवल मूक दर्शक बनकर देखता नजर आता है, जो बेहद तकलीफदेह है। हम देख रहे हैं कि भीड़ द्वारा हिंसा करने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उन्हें न कानून की परवाह है न सजा का डर क्योंकि भीड़तंत्र की मानसिकता इस क़दर दूषित हो चली है कि वे खुद को इस देश के कानून से ऊपर समझ बैठे हैं। कभी लव जिहाद के नाम पर, कभी साम्प्रदायिकता के नाम पर तो कभी समाज का सर्वेसर्वा बनने के नाम पर भीड़तंत्र का आक्रमण बढ़ता ही जा रहा है।

अभी पिछले महीने सितम्बर माह में मध्यप्रदेश के देवास से एक ऐसा वीडियो सामने आया जिसने एक बार फिर यह साबित किया कि भीड़तंत्र का चेहरा कितना खौफ़नाक हो सकता है। अपनी प्रेमिका के साथ देवास पहुंचे उत्तर प्रदेश के एक युवक की कुछ लोगों की भीड़ ने इसलिए पिटाई कर दी क्योंकि उन्हें शक था कि लड़का मुस्लिम है और मामला लव जिहाद का है। इस दौरान पुलिस भी घटनास्थल पर मौजूद थी, लेकिन भीड़ को रोक नहीं पाई। बाद में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।

इस तरह की हो रही तमाम घटनाएं हमें बताती हैं कि किस कदर भीड़तंत्र का दायरा बढ़ता जा रहा है और इंसानियत बौनी होती जा रही है। उन्मादी भीड़ का साहस इतना बढ़ गया है कि उसके निशाने पर बड़े हैं या बच्चे वह कुछ नहीं देखना चाहती। निश्चित तौर पर, खुद से न्याय करने की जो प्रवृत्ति लोगों के अंदर पनपती जा रही है, वह इस बात का घातक सूचक है कि समाज का एक हिस्सा स्वयं को देश के कानून से ऊपर समझने लगा है। उन्मादी भीड़ द्वारा किए जाने वाले कृत्य उस परम तथ्य पर सवालिया निशान लगा रहे हैं जो हमें यह बताता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, समूह में रहना उसकी विशेषता रही है और इसी समूह के भीतर उसे सुरक्षा का एहसास होता है, लेकिन आज के सन्दर्भ में यह तथ्य पलट रहा है, आज हम यह कहते हैं कि व्यक्तियों के समूह से भय पैदा हो रहा है ,

इस समूह के भीतर सुरक्षा का अहसास कम और किसी अप्रिय घटना के घटित होने का डर ज्यादा पैदा होता जा रहा है।
(सरोजिनी बिष्ट स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल लखनऊ में रहती हैं।)

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