Tuesday, December 7, 2021

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विफल मोदी, फिर भी विपक्ष असफल क्यों

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यह सतह पर दिखने वाला खुला तथ्य है कि भारत की केंद्रीय सत्ता एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूम रही है, वह व्यक्ति नरेंद्र मोदी हैं। संसदीय लोकतंत्र का एक आधार स्तंभ कैबिनेट व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, कैबिनेट मंत्री कार्यपालक अधिकारी ( सीईओ) बन चुके हैं। स्वतंत्र व्यक्तित्व और अस्तित्व रखने वाले अधिकांश मंत्री मंत्रिमंडल से बाहर किए जा चुके हैं, जो बचे हैं, उनमें मुंह खोलने की हिम्मत नहीं है। करीब सभी पर्यवेक्षक इससे सहमत हैं कि नौकरशाही प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय ( पीएमओ) का जी-हजूरी करने वाली संस्था बनकर रह गई है, सभी नौकरशाहों को उसी दिशा में सोचना और चलना है, जो प्रधानमंत्री का इशारा है, नहीं तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

मंत्रिमंडल और नौकरशाही दोनों स्तरों पर वैकल्पिक विचारों और बहस के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह गई है। मोदी और अमित शाह एक दूसरे के पर्याय और पूरक हैं, सच कहें तो अमित शाह मोदी के विस्तारित हाथ हैं। सिर्फ दो शक्तियां हैं, जो मोदी नियंत्रित और संचालित कर सकती हैं और कर रही हैं वे हैं- आरएसएस और मोदी के कुछ कार्पोरेट मित्र। ये दोनों शक्तियां संसदीय जनतंत्र के बाहर की शक्तियां हैं। यही स्थिति कमोवेश पार्टी के स्तर पर भी है। थोड़ा-बहुत यूपी में योगी आदित्यनाथ उर्फ अजय सिंह बिष्ट अपनी स्वतंत्रता का परिचय देते हुए दिख रहे हैं, शेष सभी नतमस्तक हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारत में वर्तमान केंद्रीय सत्ता का मतबल एक व्यक्ति मोदी की सत्ता है।

नरेंद्र मोदी के 7 वर्षों के कार्यकाल के संबंध में सतह पर दिखने वाला खुला तथ्य यह है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में मोदी सरकार के छलांग लगाने और कुछ कार्पोरेट घरानों की संपत्ति में बेहतहाशा वृद्धि की छोड़ दिया जाए तो नरेंद्र मोदी की सरकार सभी मोर्चों पर पूरी तरह विफल साबित हुई। जिन दो मोर्चों पर सफलता दिख रही है, वह भी एक राष्ट्र के रूप में भारत के लिए किसी विपदा से कम नहीं है। हिंदू राष्ट्र मतलब लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं का कमोवेश खात्मा और लोकतंत्र को पंचवर्षीय चुनावी राजनीति तक सीमित कर देना और ऐन-केन तरीके से धार्मिक ध्रुवीकरण करके हिंदुओं के बहुमत का वोट हासिल कर लेना। इसका दूसरा खतरनाक निहितार्थ है, भारत की करीब 30 करोड़ से अधिक मुस्लिम आबादी को पूरी तरह अलग-थलग कर देना और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बना देना।

एक राष्ट्र एवं समाज के रूप में यह कितना खतरनाक है और होगा इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। मोदी सरकार की दूसरी सफलता कुछ कार्पोरेट घरानों ( अडानी-अंबानी) की संपत्ति में कई गुना वृद्धि। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय पूंजीवाद पूरी तरह क्रोनी कैपिटिलिज्म में बदल चुका है, जहां एक वर्ग के रूप में पूरे पूंजीपति वर्ग की जगह कुछ पूंजीपतियों के हितों के लिए नीतियां बनाई और बिगाड़ी जा रही हैं और क्रियान्वित की जा रही हैं और वे पूंजीपति ( कार्पोरेट घराने) बदले में सत्ता में बने रहने में नरेंद्र मोदी की हर तरह ( विशेषकर अकूत धन और मीडिया) से मदद कर रहे हैं। क्रोनी कैपिटलिज्म व्यापक जन के आर्थिक हितों को तो छोड़िए, किसी देश के पूंजीवादी विकास के लिए भी बहुत घातक होता है। यानी जो दो सफलाएं भी दिख रही हैं, वे गहरे स्तर पर देश और समाज के लिए घातक हैं।

आजादी के बाद वैश्विक स्तर पर भारत की एकमात्र बड़ी सफलता संसदीय जनतंत्र का उत्तरोत्तर विकास और विस्तार (आपातकाल के अल्पकालिक समय को छोड़कर)। जिसके चलते भारत की एक वैश्विक प्रतिष्ठा थी और भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में रेखांकित किया जाता था। जिसमें संवैधानिक शासन ( कानून का राज), संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता ( चुनाव आयोग, संसदीय प्रक्रिया, कैबिनेट व्यवस्था, संसदीय समितियां, सीबीआई, ईडी और अन्य संस्थाओं की स्वायत्तता शामिल थी ), स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया भी शामिल थी। इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक दायरे में जनसंघर्षों-जनांदोलनों के लिए आजादी भी समाहित थी। नरेंद्र मोदी के शासन के पिछले सात वर्षों में भारत की यह उपलब्धि भी करीब खो चुकी है। लोकतांत्रिक शासन पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्थाओं की नजर में भारत उन देशों के पायदान में शामिल हो चुका है, जहां लोकतंत्र चुनाव तक सीमित होकर रह गया है, जिसे चुनी तानाशाही नाम दिया गया है और चुनावी पारदर्शिता भी संदेहास्पद हो चुकी है, क्योंकि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री कार्यालय के विस्तारित अंग के रूप कार्य करता दिख रहा है। अभी हाल में नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने उन्हें परोक्ष तरीके से ही सही लोकतंत्र का पाठ पढ़ाया।

पिछले तीन दशकों में भारत की दूसरी उपलब्धि जीडीपी के संदर्भ में तीव्र आर्थिक विकास रहा है, इस तीव्र आर्थिक विकास ने दुनिया में भारत को एक देश के रूप में आर्थिक हैसियत प्रदान की और दुनिया के देश भारत की ओर देखने लगे। भारत की अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अंतराराष्ट्रीय मंचों पर हैसितयत बढ़ी और भारत को आर्थिक तौर पर उभरते शक्तिशाली देश के रूप में देखा जाने लगा। देश के स्तर पर भी जीडीपी में विकास का फायदा रिसकर ही सही और आम जनता को भी कुछ मिला। करोड़ों की संख्या में लोग गरीबी रेखा से ऊपर गए और रोजगार का एक हद तक विस्तार हुआ, लेकिन मोदी के सत्ता संभालते ही आर्थिक विकास पर भी ग्रहण लग गया। मूर्खतापूर्ण नोटबंदी और आपाधापी में लागू की गई जीएसटी ने चंद कार्पोरेटे घरानों को जो भी फायदा पहुंचाया हो, अनौपचारिक एवं असंगठित क्षेत्र के बड़े हिस्से को अर्थव्यवस्था से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

अर्थव्यवस्था से बाहर होने वालों में रोजगार शुदा लोगों के साथ बड़े पैमाने पर छोटे कारोबारी और व्यापारी भी शामिल थे। बेरोजगारी ने 45 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया। यह सब कुछ कोरोना-काल से पहले हो चुका था। कोरोना काल से पहले ही लगातार आठ तिमाही से अर्थव्यवस्था गिर रही थी। कोरोना काल ने तो अर्थव्यवस्था रसातल में ही पहुंचा दी। इसमें मोदी सरकार द्वारा आपाधापी में किए गए लॉकडाउन की बड़ी भूमिका थी, जिसने मजदूरों के पलायन के ऐसे दृश्य दिखाए, जिससे भारत-पाकिस्तान बंटवारे की याद आ गई। कोरोना काल में मोदी सरकार की अमानवीयता और बदइंतजामी ने दुनिया भर के लोगों की रूह को कंपा देने वाली तस्वीरों को देखने के लिए विवश किया और भारत की बड़े पैमाने पर बदनामी हुई।

विदेश नीति के मामले में भी मोदी सरकार पूरी तरह असफल रही, सरकार चाहे लाख छिपाए चीन भारत के कहे जाने वाले एक हिस्से पर नए सिरे से कब्जा कर लिया। भारत के पड़ासी देशों से भारत की तुलना में चीन के संबंध ज्यादा प्रगाढ़ हो चुके हैं। अंतराराष्टीय स्तर पर भारत की हैसियत की कमतरी का अंदाज नरेंद्र मोदी को भी लग चुका होगा, हाल की अमेरिका यात्रा ने उनको उनकी हैसियत बता दी और यह भी बता दिया कि उनकी वैश्विक हैसियत एक तेजी से आर्थिक तौर पर उभरते लोकतांत्रिक देश के नाते थी, न कि उनके व्यक्तिगत हैसियत के चलते। देश की आर्थिक-राजनीतिक हैसियत गिरेगी तो, प्रधानमंत्री की हैसियत बरकार नहीं रह सकती है।

देश के स्तर पर प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में काफी गिरावट आई है। हाल के इंडिया टुडे सर्वे के अनुसार प्रधानमंत्री के रूप में वे सिर्फ 24 प्रतिशत लोगों की पहली ( अगस्त 2021) पसंद रह गए हैं, जबकि अगस्त 2020 में वे 66 प्रतिशत लोगों की प्रधानमंत्री के रूप में पहली पसंद थे। इसका साफ निहितार्थ है कि जिन सकारात्मक आशाओं-आकांक्षाओं के साथ लोगों ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया था, उसमें वे खरे साबित नहीं हुए हैं। यहां यह रेखांकित कर लेना जरूरी है कि 2014 में भी मोदी के नाम सिर्फ नकारात्मक कारणों ( हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण आदि) से वोट नहीं मिले थे, बहुत सारे लोगों को उनसे सकारात्मक प्रगति और विकास की उम्मीदें भी थीं। देश के बौद्धिक वर्ग के एक हिस्से ने भी नरेंद्र मोदी को सकारात्मक उम्मीदों के साथ परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन दिया था। वे लोग भी निराश हुए हैं।

जब सारे तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के खाते में पिछले सात वर्षों में विफलता ही विफलता है, तो प्रश्न यह उठता है कि मोदी की सत्ता को विपक्ष मजबूत चुनौती क्यों नहीं दे पा रहा है? इसमें विपक्ष की कौन सी कमजोरियां आड़े आर रही हैं और विपक्ष उसका कैसे मुकाबला कर सकता है? संसदीय लोकतांत्रिक राजनीति में विपक्ष का पहला मतलब उन राजनीतिक दलों से होता है, जो चुनावी राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी करते हैं, दूसरा मतलब जनता के जनसंघर्षों एवं जनांदोलनों से होता है। जहां तक विपक्ष के रूप में जनता के जनसंघर्षों एवं जनांदोलनों से है, उस अर्थ में भाजपा को निरंतर मजबूत चुनौती मिल रही है।

मोदी सरकार की चुप्पी और परोक्ष सहमति के चलते सुप्रीमकोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट रद्द करने के खिलाफ दलित-बहुजनों ने 2 अप्रैल 2018 को आरएसएस-भाजपा को एक निर्णायक चुनौती सड़कों पर उतर कर दी, जिसमें करीब 13 दलित नौजवान शहीद हुए, भाजपा को पीछे हटकर संविधान में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के आदेश को रद्द करना पड़ा। उसके बाद सीए और एनआरसी के खिलाफ देश में व्यापक जन-गोलबंदी हुई, जिसमें बड़े पैमाने पर मुस्लिम महिलाओं ने हिस्सेदारी की। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पिछले 11 महीनों से किसान संघर्षरत हैं। पंजाब और हरियाणा में यह आंदोलन जनांदोलन की शक्ल ले चुका है, देश के अन्य हिस्सों में इसका धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है। किसानों का संघर्ष अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर कॉर्पोरेट कब्जे को रोकने, राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा, भारतीय संघ को बचाने, लोकतंत्र को पुनः प्राप्त करने और भारत की एकता की रक्षा के लिए एक राष्ट्रीय जनांदोलन का केंद्र बन चुका है और जन विपक्ष की भूमिका निभा रहा है।

जहां एक जनसंघर्षों और जनांदोलनों के रूप भारतीय जन विभिन्न रूपों में केंद्र की मोदी सरकार को निरंतर चुनौती दे रहे हैं, लेकिन संसदीय जनतंत्र में राजनीतिक दल सत्ता संघर्ष में वास्तविक सत्ता के विकल्प होते हैं और देश का वर्तमान एवं भविष्य तय करते हैं। इन अर्थों में कुछ प्रदेशों को छोड़ दें तो, राजनीतिक विपक्ष एक हद तक पंगु सा दिख रहा है, विशेषकर कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और खुद को बहुजनों का प्रतिनिधि कहने वाली राजनीतिक पार्टियां। अगर नरेंद्र मोदी सरकार को निर्णायक चुनौती देने वाले दलों पर विचार करें, तो केरल और तमिलनाडु अंग्रिम पंक्ति में हैं, जहां से भाजपा-नरेंद्र को मोदी को वैचारिक, राजनीतिक और सांगठिनक तीनों स्तरों पर चुनौती मिल रही है और यहां विपक्ष के पास ऐसी शीर्ष नेतृत्वकारी शख्सियत भी हैं, जो नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर क्षेत्रीय स्तर पर चुनौती दे रहे हैं।

बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने भी नरेंद्र मोदी-अमितशाह की जोड़ी को निर्णायक शिकस्त दी। बंगाल ममता बनर्जी की चुनौती राजनीतिक ज्यादा तमिलनाडु एवं केरल की तुलना में वैचारिक कम है। लेकिन जननेता के रूप में ममता बनर्जी ने आरएएस-भाजपा एवं मोदी-शाह की जोड़ी को सामने से डटकर चुनौती दी और आरएसएस-भाजपा एवं मोदी-शाह के साथ कार्पोरेटे मीडिया, कार्पोरेट के अकूत धन और केंद्रीय एजेंसियों का भी मुकाबला किया, जिसमें एक हद तक चुनाव आयोग भी शामिल था। ममता की जीत इस तथ्य की ताकीद करती है कि एक ताकवर और जनता से जुड़ा नेतृत्व मोदी को चुनौती दे सकता है।

विपक्षी पार्टियों में सबसे बदतर स्थिति राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस और उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों के रूप में बसपा और सपा की है और वामपंथी पार्टियों की है। हिंदी पट्टी-गाय पट्टी का हृदय स्थल उत्तर प्रदेश कमोवेश राजनीतिक तौर पर विपक्ष विहीन सा है। मोदी से भी ज्यादा आक्रामक तौर पर संविधान और लोकतंत्र की धज्जियां उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ उड़ा रहे हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के सभी रूपों को कुचल रहे हैं और खुले तौर पर जाति विशेष की राजनीति कर रहे हैं, लेकिन सपा और बसपा पूरी चरह चुप्पी साधे हुए हैं, न ही सड़क पर और न ही विधान सभा में भाजपा का मुकाबला कर रहे हैं, एक तरह से इन पार्टियों ने उत्तर प्रदेश की जनता को योगी के रहमो-करम पर छोड़ दिया है। न ही वे उत्तर प्रदेश में बुरी तरह प्रताड़ित किए जा रहे मुसलमानों के साथ खड़े हैं और न ही निर्णायक तौर पर दलित-बहुजनों के एजेंडे के साथ।

सपा और बसपा दोनों नरम हिंदुत्व और तथाकथित अपरकॉस्ट को खुश करने की होड़ में लगे हैं। वे यह मानकर चल रहे हैं कि मुसलमानों और दलित-बहुजन का योगी से प्रताड़ित समूह उन्हीं के पास आएगा। लोग आजीज आकर खुद-ब-खुद बिना कुछ किए उन्हें सत्ता सौंप देंगे, उन्हें कोई संघर्ष करने और जनता के सुख-दुख में निर्णायक तौर खड़े होने की जरूरत नहीं है। इन दोनों पार्टियों के पास न विचार है, न एजेंडा और न शीर्ष नेताओं में संघर्ष का कोई माद्दा दिखाई दे रहा है। बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल एक हद तक वामपंथी पार्टियों के साथ मिलकर विपक्ष की भूमिका निभा रहा है।

कांग्रेस देशव्यापी स्तर पर और हिंदू पट्टी के मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ में मुख्य विपक्षी दल है। झारखंड और बिहार में उसकी एक हद तक मजबूत उपस्थिति है। पंजाब में सारे उतार-चढ़ावों के बावजूद भी वह एक ताकतवर दल है, महाराष्ट्र में भी उसका पंरपरागत मजबूत आधार है, कर्नाटक में वही मुख्य विपक्षी दल है। सुदूर दक्षिण के केरल में वह एक ताकतवर पार्टी है और तमिलनाडु में भी उसकी प्रभावी उपस्थिति है, तेलंगाना में वह मुख्य विपक्षी पार्टी है, उड़ीसा में भी परंपरागत तौर पर उसका एक हद तक जनाधार रहा है। यह सच है कि कांग्रेस भौगोलिक विस्तार के अर्थों में निरंतर सिकुड़ रही है और रिक्त स्थान भाजपा या क्षेत्रीय दल ले रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद आज कांग्रेस केंद्रीय शक्ति बनने की संभावना रखती है, जिसके इर्द-गिर्द गोलबंद होकर नरेंद्र मोदी विरोधी राजनीतिक शक्तियां उन्हें केंद्रीय सत्ता से बेदखल कर सकती हैं। नरेंद्र मोदी की आंधी के दौर में भी कांग्रेस ने अपने अपने 20 प्रतिशत वोट बैंक को बरकार रखा। 2014 और 2019 दोनों लोकसभा चुनावों में उसे करीब कुल 20 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। लेकिन कांग्रेस वैचारिक तौर पर, राजनीतिक पर तौर, एजेंडे के मामले में और सांगठनिक तौर पर कांग्रेस उहापोह और अस्त-व्यस्त स्थिति में है।

पहली बात यह कि वह तय नहीं कर पा रही है कि आरएसएस-भाजपा के आक्रामक हिंदू राष्ट्रवाद का जवाब कैसे देना है, जहां कांग्रेस के नेता राहुल गांधी आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे के खिलाफ खुले संघर्ष का ऐलान करते हुए दिखते हैं, दूसरी ओर शीर्ष स्तर पर विराजमान पुराने नेता नरम हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद की वकालत करते हुए दिख रहे हैं और अपने दबाव में कई बार राहुल गांधी को भी ले लेते हैं, वे भी खुद को अपरकॉस्ट हिंदू दिखाने की होड़ में शामिल होकर जनेऊ तक दिखाने लगते हैं। दूसरी बात यह कि आर्थिक नीतियों के संदर्भ में कांग्रेस किसी स्पष्ट कार्यक्रम और रूपरेखा के साथ सामने नहीं आ रही है। यह सच है कि कांग्रेस नवउदारवादी नीतियों की अगुवा रही है, लेकिन विकास का थोड़ा लाभ जनता के बड़े हिस्से को भी मिले इसके लिए वह कदम उठाती रही है। मनरेगा और खाद्य सुरक्षा का अधिकार जैसे कदम इसके प्रमाण थे।

कांग्रेस क्रोनी कैपिटलिज्म से भी खुद को दूर रखे हुए थीऔर उसके बाद आर्थिक विकास का एक रोडमैप था, जो किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत सनक से संचालित नहीं हो रहा था, लेकिन आज की स्थिति और भविष्य के लिए कांग्रेस की देश के आर्थिक विकास के लिए क्या योजना एवं रूप-रेखा है और आर्थिक विकास का लाभ चंद कार्पोरेट घरानों की जगह जनता के बड़े हिस्से को मिले और विकास रोजगारपरक हो, इस संदर्भ उसकी क्या रणनीति है, इसे ठोस तरीके से प्रस्तुत नहीं कर रही है। 2019 के चुनावों के दौरान राहुल न्याय योजना लेकर आए, जो एक हद तक जनपक्षधर आर्थिक वितरण की योजना थी, लेकिन चुनाव के बाद लगता है, उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, उस पर अब कोई चर्चा नहीं हो रही है।

कोई चाहे या न चाहे भारतीय राजनीति में वोटों की लामबंदी सामाजिक समूहों के आधार पर होती है। कांग्रेस यह निर्णायक तरीके से तय नहीं कर पा रही है कि वह किस सामाजिक समूह को आधार बनाए। अपरकॉस्ट, मुस्लिम और दलित कांग्रेस के कोर वोट बैंक रहे हैं। भाजपा ने अपरकॉस्ट वोट को पूरी तरह से अपने साथ कर लिया है और वह इस समुदाय के भौतिक हितों और वैचारिक रूझानों की अच्छी तरह से पूर्ति कर रही है, फिलहाल दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नहीं दिख रही है कि यह समुदाय कांग्रेस के साथ बड़े पैमाने पर आएगा, लेकिन कांग्रेस की दूसरी पंक्ति ( गांधी परिवार के बाद) अधिकांश नेता अभी इसी समुदाय के हैं और उन्हें लगता है कि थोड़ा नरम हिंदुत्व का परिचय देकर वे अपरकॉस्ट को अपनी ओर कर सकते हैं, उनकी जातिगत पृष्ठभूमि के चलते अधिकांश की खुद की वैचारिकी भी इसी के अनुकूल है। यही वजह है कि कांग्रेस नेताओं, विशेषकर अभिजात्य वर्गीय अपरकॉस्ट नेताओं को भाजपा में जाने में थोड़ी भी हिचक नहीं होती है।

अपरकॉस्ट के साथ कमोवेश पिछड़े वर्गों के एक बड़े हिस्से का हिंदूकरण करके भाजपा ने उन्हें अपने साथ कर लिया है। ऐसी स्थिति में दलित, मुस्लिम और आदिवासी सामाजिक समूह ही किसी वैकल्पिक राजनीति के मुख्य आधार बन सकते हैं,जिसमें पिछड़े का एक हिस्सा शामिल हो सकता है और उदारवादी अपरकॉस्ट की एक पतली परत साथ आ सकती है, लेकिन कांग्रेस अभी इस संदर्भ में दुविधा में है, राज्यसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे ( दलित) को कांग्रेस का नेता बनाकर, पंजाब में दलित समुदाय से मुख्यमंत्री बनाकर और हाल में जिग्नेश मेवानी को कांग्रेस पार्टी में शामिल कर कांग्रेस ने यह संकेत दिया है कि वह दलितों को अपना एक मुख्य आधार बनाना चाहती है और उन्हें शीर्ष स्तर पर नेतृत्व भी सौंपना चाहती है, पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में पिछड़े समुदाय के भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने पिछड़ों को भी अपने साथ लाने की कोशिश की। लेकिन मुसलानों के प्रति कांग्रेस का रूख अभी साफ नहीं है, वह खुलकर उनके साथ खड़े होने से बच रही है। अन्य पार्टियों की तरह उसे भी लग रहा है कि आखिर मुसलमान जाएंगे तो कहां, जाएंगे? किस सामाजिक-धार्मिक समूह को निर्णायक तरीके से अपने साथ करना है, इस संदर्भ में कांग्रेस अपनी दुविधा त्याग नहीं पा रही है। इसमें उसकी परंपरागत सांगठनिक संरचना भी रोड़ा बन रही है।

कांग्रेस की चौथी समस्या सांगठनिक है, उसका मुकाबला नीचे से ऊपर तक संगठित भाजपा से है और उसे आरएसएस एवं उसके आनुषांगिक संगठनों का पूरा समर्थन प्राप्त है, जबकि कांग्रेस सांगठनिक तौर पर पूरी तरह बिखरी हुई है। निचले स्तर पर उसके पास समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली नहीं है और न ही जनता से गहरे स्तर पर जुड़े नेता हैं। पार्टी में शीर्ष स्तर पर भी बिखराव है। स्थिति यह है कि लंबे समय से कांग्रेस के पास पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं है। राहुल गांधी पार्टी के शीर्ष नेता की तरह व्यवहार कर रहे हैं, लेकिन औपचारिक तौर पर संगठन की जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं, कई राज्यों में पार्टी संगठन नेतृत्व विहीन है या अस्थाई व्यवस्था कायम है। भाजपा जैसी संगठित पार्टी को निर्णायक चुनौती शीर्ष से लेकर नीचे तक बिखरा हुआ संगठन नहीं दे सकता है। इसके लिए नीचे से ऊपर तक संगठित संगठन चाहिए

कांग्रेस की पांचवीं समस्या व्यापक जनांदोलन खड़ा कर पाने में उसकी नाकामयाबी है। कोरोना की पहली लहर के दौरान बड़े पैमाने के पलायन के दौरान भी कांग्रेस लोगों के बीच नहीं दिखी। कोविड की दूसरी लहर में जब लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे, तब भी कांग्रेस की लोगों के बीच उपस्थिति नगण्य थी। राहुल गांधी भले ही नरेंद्र मोदी की नीतियों के खिलाफ तीखे बयान देते हों, लेकिन वे सड़क पर उतर कर और कार्यकर्ताओं-नेताओं को लामबंद कर कोई बड़ा जनांदोलन नहीं खड़ा कर पा रहे हैं, यहां तक कि किसी बड़े जनांदोलन की पहलकदमी के लिए आगे बढ़ते हुए भी नहीं दिखते हैं। राहुल गांधी जननेता कम बौद्धिक बुद्धिजीवी की छवि में ज्यादा कैद हैं।

इसके साथ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व मोदी विरोधी राजनीतिक पार्टियों को भी छतरी के नीचे लाने की कोई कारगर पहलकदमी करते हुए नहीं दिखाई दे रहा है, जबकि विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के चलते उसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है।

अगर कांग्रेस अपनी वैचारिक, राजनीतिक और सांगठनिक समस्याओं का समाधान नहीं कर पाती है और सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में कारगर पहलकदमी नहीं लेती है, तो पूरी तरह विफल मोदी को भी विकल्पहीन बनाकर आरएसएस और कार्पोरेट मीडिया प्रस्तुत करती रहेगी और भारतीय समाज और लोकतंत्र का संकट गहरा होता जाएगा और फासीवादी ताकतें और मजबूत होती जाएंगी।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

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