Friday, April 19, 2024

अजेयता का मिथक: 2024 में मोदी की वापसी होगी या 2004 की होगी पुनरावृत्ति?

2024 की शुरूआत में भारत एक प्रचंड बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। सभी जनतंत्र प्रेमी, इन्साफ पसंद और अमन के चाहने वालों के सामने यही बड़ा सवाल मुंह बाए खड़ा है कि 2024 के संसदीय चुनावों में- जो मई माह के अंत तक संपन्न होगा तथा नयी सरकार बन जाएगी (अगर उन्हें पहले नहीं कराया गया तो)- का नतीजा क्या होगा?

क्या वह सत्ता के विभिन्न इदारों पर भाजपा की जकड़ को ढीला कर देगा, क्या वह जनतंत्र की विभिन्न संस्थाओं को निष्प्रभावी करने की या उनका हथियारीकरण करने की सोची समझी रणनीति को बाधित कर देगा, क्या वह धर्म के नाम पर उन्मादी तक हो चुकी जनता में इस एहसास को फिर जगा देगा कि 21वीं सदी में धर्म और राजनीति का घोल किस तरह खतरनाक है या वह भारतीय जनतंत्र की अधिकाधिक ढलान की तरफ जारी यात्रा को और त्वरान्वित कर देगा, भारत के चुनावी अधिनायकतंत्र ( electoral autocracy) की तरफ बढ़ने की उसकी यात्रा आगे ही चलती रहेगी

क्या मोदीशाही अंततः विगत सत्तर साल से अधिक समय पर जारी लोकशाही पर, संविधान आधारित ताने बाने पर अंतिम प्रहार करने में कामयाब होगी?

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निःस्सन्देह एक अच्छा खासा तबका इसे ही नियति मान कर चल रहा है। उन्हें यह कहने में भी आज कुछ गुरेज नहीं कि 2024 का फैसला तो हो चुका है, ऐलान होना बाकी है। वह मान रहे हैं कि मोदी के विजय रथ को रोका नहीं जा सकता।

पत्रकारिता के क्षेत्र में मौजूद पेशेवर लेखकों से लेकर ऐसे लोगों तक जो यहीं रह कर वस्तुनिष्ठ और स्वतंत्र पत्रकारिता करने का दावा करते हैं, उन्होंने इसमें अपने सुर मिला लिए हैं। फिलवक्त़ हम यहां भक्तों की बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह सुर तेज हो चला है कि ‘मोदी के विजयरथ को अब रोका नहीं जा सकता।

प्रशांत किशोर जैसे लोग यह कहने में भी संकोच नहीं कर रहे हैं कि ‘मोदी से अधिक कट्टर व्यक्ति उनका स्थान ग्रहण करेगा। कहने का तात्पर्य यह कि इस चुनाव में भाजपा की जीत तो तय है।

2024 के इर्दगिर्द चले कुछ ओपिनियन पोल्स में भी- जो एक तरह से जनमत के रूझान का आकलन करने के लिए बताए गए हैं- वह भी इसी बात को दोहराते दिख रहे हैं।

गौरतलब है कि हुकूमत के ऐसे आलोचकों की कमी नहीं है- जिन्हें विगत कुछ सालों में अपने विचारों के चलते तरह तरह की कठिनाइयों को झेलना पड़ा- उन्हें भी यही होता दिख रहा है।

प्रताप भानु मेहता जैसे बुद्धिजीवी भी यह कहते दिख रहे हैं कि ‘In India the outcome looks more certain. Prime Minister Narendra Modi is, at the moment, most likely to return to office, giving India the advantages of stability and continuity।

वह इस बात को जोड़ना भी नहीं भूलते कि मोदी की तीसरी पाली सुनिश्चित है और इससे भारत को स्थिरता और निरंतरता का लाभ होगा- India the advantages of stability and continuity।

सवाल यह उठता है कि क्या आने वाले चुनाव इन दावों को अंततः पुष्ट करेंगे और जनाब मोदी की तीसरी पारी को सुगम करेंगे या उन्हें एक तरह से भाजपा के दो दशक पहले उस मुक़ाम की याद दिलाएंगे, जब आत्मविश्वास से बेहद लबरेज तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने लोकसभा चुनावों की तारीखों को नियत समय से पहले करने का ऐलान किया था, तो उन्हें यह लगा था कि उनका ‘इंडिया शाइनिंग’ का अभियान भारत की आम जनता को भी लुभाएगा, मगर नतीजा उल्टा निकला था। भाजपा दस साल के लिए सत्ता से बाहर हो गयी थी।

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जितनी बड़ी चुनौती हमारे सामने उपस्थित है, इसके बावजूद देश के अंदर ऐसी समझदार आवाज़ें धीमी नहीं पड़ी हैं, जो दावे के साथ यह कहें कि ‘There’s Nothing ‘Inevitable’ About Narendra Modi’s Return in 2024’/‘आखिर 2024 में नरेंद्र मोदी की वापसी के बारे में कुछ भी अनिवार्य नहीं है’।

हिन्दू के संपादक रहे हरिश खरे इस बात को भी स्पष्ट करते हैं कि जहां मोदी/भाजपा की कोशिश होगी कि इन चुनावों को गांधी परिवार के इर्द गिर्द केन्द्रित रखा जाए वहीं विपक्षी गठबंधन की जिम्मेदारी होगी कि वह मोदी के दस साल के रिकाॅर्ड पर- जो कतई चमकता नहीं दिखता- फोकस करे, अब तक वह इन जिम्मेदारियों से बचते रहे हैं-

“अब तक, मोदी ऐसी आलोचनाओं से बचते रहे हैं। अगर चीज़ें गड़बड़ हुई हैं, अगर वायदे पूरे नहीं हुए हैं, अगर अपराधियों-जालसाजों को नहीं पकड़ा गया है, अगर पहले हमारे नियंत्राण में रहे इलाकों पर चीन का नियंत्रण हुआ है, अगर काला पैसा लौट नहीं पाया है, अगर आज भी आतंकी सैनिक अधिकारियों को निशाना बना रहे हैं, अगर मणिपुर में आज भी तनाव है तो वह किसी अन्य की जिम्मेदारी है।”

वहीं योगेन्द्र यादव जैसे कुछ लोग इस बात से अपनी असहमति प्रगट कर रहे हैं कि “2024 की बाजी में ‘शह और मात’ का फैसला हो चुका है।” उनका मानना है कि ‘अगर विपक्ष के पास रणनीति हो और उस पर अमल करने की राजनीतिक इच्छा-शक्ति और कल्पना-शक्ति हो तो फिर 2024 के लिए ऐसे चुनावी नतीजे की संभावना बरकरार है। जहां तक आज की तारीख का सवाल है, 2024 के लिए मुकाबले का मैदान अब भी खुला हुआ है।

अग्रणी राजनीतिक विश्लेषक आनंद के सहाय- जिनके आलेख प्रमुख अख़बारों, पत्र पत्रिकाओं में लम्बे समय से छपते रहे हैं, वह ‘द वायर’ के अपने अपने ताज़ा लेख में बताते हैं कि “भले ही मुख्यधारा की मीडिया भाजपा की बढ़त दिखाने के लिए जबरदस्त तरीके से सक्रिय दिखे, लेकिन राजनीतिक परिद्रश्य उतना एक तरफा नहीं दिखता। अगर बारीकी से देखें तो भाजपा खेमे के अंतर्विरोध कई मायनों में सीटों के बंटवारे को लेकर उठे मतभेदों से अधिक दिखते हैं।”

वह यह भी लिखते हैं कि “छदम धार्मिकता और सांप्रदायिक भावना से उपजे वातावरण से चुनावी लाभ की उम्मीद कम ही दिखती है”, जिसके पीछे वह दो कारकों का विशेष उल्लेख करते हैं- एक ‘सर्वोच्च नेतृत्व स्तर पर दिखने वाली मनमानी जिसके तहत उनके करीबी दायरे के बाहर के लोगों की राय को तवज्जो नहीं दी जाती’ और हालिया चुनाव के मददेनज़र ‘क्षेत्रीय स्तर के नेतृत्व में उठते असंतोष के स्वर’।

वहीं जानकार लोग इस बात को अच्छी तरह समझ रहे हैं कि हिन्दुत्व वर्चस्वादियों के उभार की परिणति किस तरह सामाजिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए एक अभिशाप में परिणत हुई है। क्रोनी पूंजीवाद/ दरबारी पूंजीवाद के उनके माॅडल के तहत- जहां सत्ताधारी समूहों के करीबी चंद बिजनेस घरानों ने जबरदस्त मुनाफा कमाया है और भारत की अर्थव्यवस्था के चुनिन्दा अहम क्षेत्रों पर उनका नियंत्रण भी हो चुका है।

वह यह भी देख रहे हैं कि ऐसे कदमों के चलते भले ही शेअर मार्केट में समय समय पर उछाल दिखता रहा हो, मगर उसका असर आज जनता की बढ़ती बदहाली में भी नज़र आ रहा है।

अब जबकि हमारे सामने ‘सब का इंडिया’ बनाम मोदी के ‘निहित स्वार्थी तत्वों और धर्मांधता के गठजोड़’ की लड़ाई आसन्न है, तब इस बात की पड़ताल करना बेहद जरूरी होगा कि मुख्यधारा की मीडिया द्वारा निर्मित सत्ताधारी पार्टी की इमेज और हक़ीकत में वाकई कुछ अंतराल है या नहीं।

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यह जानने के लिए किसी विशेषज्ञ के अध्ययन की जरूरत नहीं कि भाजपा/राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 2024 के चुनावी जंग के लिए अपनी तरफ से बहुत पहले से ही तैयार है। दिसम्बर में हुए विधानसभा चुनावों में तीन उत्तरी राज्यों- राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश- के विधानसभा चुनावों में उन्हें मिली सफलता से- जिनमें दो राज्यों में उन्होंने राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस को शिकस्त दी और तीसरे राज्य में वह बीते अठारह साल से अपना शासन बनाए हुए है (बीच में थोड़े समय के लिए कांग्रेस को भी सत्ता मिली थी) उनके आत्मविश्वास की कोई सीमा नहीं है।

इन विधानसभा चुनावों में उन्होंने जिस अलग किस्म के ‘गुजरात माॅडल’ को अपनाया उसने भी उनके मनोबल को बढ़ाया है कि मोदी करिश्मा अभी बना हुआ है। मालूम हो कि गुजरात में भाजपा ने मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि पूरे मंत्रिमंडल को बदल दिया और बिल्कुल नए चेहरों को वह ले आए थे, यही तरीका उन्होंने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ में अपनाया- वहां के स्थापित नेता शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे और रमन सिंह के स्थान पर वह नए नेतृत्व को नियुक्त किए है।

विगत लगभग एक दशक के मोदी काल की यह एक खासियत कही जा सकती है कि इस शासनकाल में नागरिक की स्थापित अवधारणा- जिसके तहत वह एक ‘अधिकार संपन्न व्यक्ति’ के तौर पर उपस्थित होता है और राज्य के बीच के रिश्ते को एक तरह से धूमिल कर दिया है, अब नागरिक एक किस्म का अधिकारविहीन व्यक्ति है जो राज्य का लाभार्थी बन गया है।

वह पुराने दौर के ‘प्रजा’ का स्थान ग्रहण करता जा रहा है- जिसे मोदी की गारंटी मिलनी तय है, जिसे चुनावों के वक्त यह याद भी दिलाया जा सकता है कि वह ‘नमक’ के प्रति वफादार रहे- यह न भूले कि उसने ‘मोदी का नमक खाया है’।

हम भले ही यकीन करें ना करें कि लेकिन आज की तारीख में भाजपा हिन्दुओं की ‘स्वाभाविक पार्टी’ बनती दिख रही है और राममंदिर के उदघाटन के साथ वह इस इमेज को और मजबूत करने में आमादा है। उद्घाटन की तारीख को लेकर चार पीठों के शंकराचार्यों की सलाह को जिस तरह ठुकराया गया और उनके खिलाफ भी मुहिम चलायी गयी, इससे हिन्दुओं के एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर उनके आत्मविश्वास में निश्चित ही बढ़ोत्तरी हो गयी होगी।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में जाति जनगणना का मसला- जिसे बिहार की सरकार द्वारा संपन्न की गयी जनगणना से नयी गति मिली दिखती थी- जिस तरह से प्रभावी नहीं हो सकी- जबकि कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुददे को उठा कर एक नयी हवा बनाने की कोशिश की थी, वह शायद इसी बात की ताईद कर रहा है कि मंडल जातियों का एक हिस्सा भी अब हिन्दुत्व के विचारों से सम्मोहित उठा है।

धर्मनिरपेक्षता का विचार- जिसे आज़ादी के संघर्ष के महान नेताओं ने आगे बढ़ाया- जिसके तहत ‘राज्य और धर्म के अलगाव’ की बात स्पष्टता के साथ की गयी थी, जो स्वाधीन भारत में सर्वधर्म समभाव के तौर पर व्यवहार में आया, उस संकल्पना को गोया भाजपा ने पूरी तरह छोड़ दिया है।

बीच का ऐसा कालखंड था जब वह कांग्रेस पार्टी आदि को छदम धर्मनिरपेक्षतावादी बोलती थी, साथ ही साथ पॉजिटिव सेक्युलरिज्म अर्थात सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को लाने की बात करती थी, जबकि अब उस छलावे की भी जरूरत नहीं रही है।

राम मंदिर उदघाटन के बहाने जिस तरह राज्यसत्ता, राजनीतिक पार्टी अर्थात भाजपा तथा हिन्दू धर्म की हिमायत करने वाले समूचे संघ परिवार एवं उसके तमाम आनुषंगिक संगठनों के बीच तमाम विभाजक रेखाएं धूमिल कर दी गयी हैं या भुला दी गयी हैं, यह इसी बात का परिचायक है।

कहां आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर गांधी, नेहरू आदि द्वारा अपनाया गया रुख- कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का यह काम नहीं है कि वह प्रार्थना स्थलों का निर्माण करे, यहां तक कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद उसके उदघाटन के अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा उसमें शामिल होने के लिए मिले निमंत्रण पर सहानुभूतिपूर्वक विचार और प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा उन्हें बाकायदा पत्र लिख कर इससे किया गया इन्कार, अंततः एक राष्टपति के तौर पर नहीं बल्कि एक नागरिक के तौर पर राजेंद्र प्रसाद उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

कहने का तात्पर्य कि राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बनाए रखने को लेकर चीजें बिल्कुल 180 डिग्री पलट गयी हैं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी खुद राममंदिर के उदघाटन में प्रमुख भूमिका अदा कर रहे हैं।

भाजपा के समर्थकों के लिए, अब यह गोया पूर्वनिश्चित फैसला है कि हिन्दू फर्स्ट एजेण्डा के साथ और बेहतर संगठन और कल्याणकारी कदमों के चलते- जैसे लाड़ली बहना, 80 करोड़ जनता के लिए पांच किलो राशन, मकान बनाने के लिए वित्तीय सहयोग- भाजपा के लिए तीसरी बार जीतना लगभग तय है।

उन्होंने यह भी कयास लगाया होगा कि अयोध्या में राममंदिर के उदघाटन के बहाने चली मुहिम के बलबूते- जिसने एक तरह से धर्म और राजनीति के बीच की रेखाएं भी मिटा दी हैं, और ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं के आधार पर- जिसमें लगभग 95 फीसदी छापे विपक्षी नेताओं पर ही डाले जाते रहे हैं और ऐसे ‘भ्रष्ट नेता’ जब भाजपा के साथ जुड़ जाते हैं तो वह सारे मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। यही अनुभव है, लिहाजा धीरे धीरे उनके खिलाफ आवाजें भी धीमी होती जाएंगी, विपक्षी ताकतों के लिए इतना भी मौका नहीं मिलेगा कि वह ठीक से प्रचार कर सकें।

लेकिन जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं शायद मोदी सरकार को यह एहसास हो रहा है कि उसके द्वारा समय समय पर ऐलान की गयी योजनाओं और उनके अमल में दिखने वाला अंतराल अब लोगों की नज़र में भी आ रहा है और शायद सबकुछ जमीनी स्तर पर ठीक नहीं है।

छत्तीसगढ के चुनाव प्रचार में ही सरकार ने इस बात का संकेत दिया था कि विकास के तमाम दावों के बावजूद जनता के बड़े हिस्से में आर्थिक विवंचना बढ़ रही है और चुनावी वर्ष में यह स्थिति उसके लिए प्रतिकूल होगी, लिहाजा उसकी तरफ से ऐलान किया गया जनवरी 2014 से पांच साल तक 80 करोड़ लोगों को पांच किलो मुफ्त अनाज दिया जाता रहेगा।

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साफ है कि अपने विजय दुंदुभी अभी से बजाने में लगी भाजपा के लिए मुख्यधारा के मीडिया के रूपांतरण से जबरदस्त फायदा हुआ है। आपातकाल के दिनों में मीडिया के आचरण को लेकर यह वाजिब आलोचना की जाती थी कि ‘उन्हें झुकने के लिए कहा गया था और वह रेंगने लगे’।

मगर आज की तारीख में मीडिया ‘रेंगने’ से बहुत परे चला गया है, वह न केवल शासन के चीयरलीडर्स की भूमिका में दिखने में फक्र महसूस करने लगा है बल्कि हुकूमत से असहमति रखने वालों के प्रति बेहद नकारात्मक रवैया रखने में उसे गुरेज नहीं होता। वह ऐसे लोगों को ‘एंटीनेशनल कहने में या अर्बन नक्सल’ के तौर पर सम्बोधित करने में भी गुरेज नहीं करता।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शुमार भारत को- जिसकी आबादी 140 करोड पार करने को है, उसका लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका के बजाय, ‘वाॅचडाॅग ऑफ डेमोक्रेसी’ के रोल के बजाय ‘लैपडाॅग ऑफ डेमोक्रेसी’ में रूपांतरण निश्चित ही उसकी अपनी भूमिका के साथ जबरदस्त खिलवाड़ है।

मीडिया के इस गोदीकरण का ही नतीजा है कि मोदी के तमाम वायदों की, मोदी सरकार द्वारा किए गए तमाम नयी योजनाओं के ऐलान की न कोई समीक्षा होती है, न ही मीडिया में इतना साहस बचा है कि वह ऐलानों एवं हक़ीकत के फर्क को समझे, रेखांकित करे।

अपने एक ताज़ा आलेख में प्रख्यात पत्रकार पी रमण ने जनाब मोदी की तमाम फलैगशिप स्कीम्स और उनकी असफल गारंटियों की असलियत को उजागर करते हुए एक लेख लिखा है, जिसमें वह आकलन करते हैं, कि ‘विगत लगभग दस साल के अपने शासनकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने लगभग 142 योजनाओं की शुरुआत की है, और चूंकि हर दूसरे दिन मोदी की छवि चमकाने के लिए नयी नयी योजनाओं का ऐलान हो रहा है, इसलिए ऐसे तमाम प्रोग्राम्स की कोई समीक्षा या मूल्यांकन भी नहीं हो सका है।

वहीं एक तरफ अपनी योजनाओं के मूल्यांकन के नाम पर मीडिया में खामोशी दूसरी तरफ आसन्न चुनावों को देखते हुए मोदी सरकार ने अपनी इन योजनाओं का ढिंढोरा पीटने के लिए ऐलान किया कि सरकार की तरफ से हर राज्य के ढाई लाख पंचायतों तक को समेटने के लिए विकसित भारत संकल्प यात्रा निकलेगी, जिसमें सरकारी अधिकारी सवार होंगे और मोदी सरकार की योजनाओं का प्रचार होगा।

निश्चित ही सरकार ने यह सोचा नहीं होगा कि इस यात्रा के जरिए मोदी सरकार की ‘उपलब्धियां और योजनाओं’ की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की इस मुहिम को जगह जगह प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।

महाराष्ट के कई जिलों में ही नहीं पंजाब तथा उत्तर भारत के कुछ इलाकों में मोदी सरकार की इस प्रचार गाड़ियों को लोगों ने घेरा और न केवल यह पूछा कि इसे मोदी सरकार क्यों कहा जा रहा है, जबकि यह भारत सरकार का प्रचार है। इतना ही नहीं इन प्रचार वाहनों पर भाजपा का झंडा क्यों फहरा रहा है, जबकि तिरंगा फहराना चाहिए था।

फिर रातों-रात ख़बर आयी कि अब इन प्रचार वाहनों को विकसित भारत संकल्प यात्रा नहीं कहा जाएगा बल्कि ‘मोदी की गारंटी वाहन’ कहा जाएगा। निश्चित तौर पर प्रचार वाहनों के जरिए जो ढिंढोरा पीटा जा रहा था, जिस पर सवाल उठ रहे थे, उस गुस्से का शमन करनेे के लिए यह कदम उठाया गया।

हर खाते में 15 लाख रूपये और 2 करोड़ नौकरियों की बात जनाब मोदी ने 2014 के चुनाव प्रचार में की थी, जब वह अभी प्रधानमंत्री नहीं बने थे, बाद में जब 15 लाख रूपये की बात उठायी गयी तो खुद उनके सहयोगी अमित शाह ने बताया था कि वह एक ‘चुनावी जुमला’ था।

पी रमण अपने उपरोक्त आलेख में स्मार्ट सिटी से लेकर स्किल इंडिया तक, आयुष्मान भारत से लेकर उज्जवला योजना तक मोदी सरकार द्वारा ऐलान की गयी तमाम योजनाओं के दावे तथा उनकी हक़ीकत पर रोशनी डालते हैं।

याद रहे अगस्त 2023 में संसद के पटल पर CAG द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में आयुष्मान भारत और द्वारका एक्स्प्रेसवे योजनाओं में कथित तौर पर हुई अनियमितताओं की बात पेश की गयी थी। बाद में पता चला कि जिन ऑडिटर्स ने इन योजनाओं की जांच की थी, उनका तबादला सितम्बर में किया गया हालांकि सरकार की तरफ से आधिकारिक बयान में यही बताया गया कि यह ‘रूटिन टान्सफर’ थे।

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निश्चित ही यह पहली दफा नहीं है कि उसे अपनी विफलताओं का एहसास हो रहा है।

राममंदिर के भूमिपूजन के वक्त भी यही सवाल उठ रहा था, अगस्त 2020 में भी यही सवाल उठा था कि किस तरह यह एक छोटी रेखा के बगल में बड़ी रेखा खींचने की कवायद है, ताकि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की बढ़ती असफलताएं जैसे- कोविड कुप्रबंधन, बदहाल होती अर्थव्यवस्था और गलवान घाटी प्रसंग- इस परदे के पीछे चले जाएं।

एक ऐसे समय में जब भारत में कोविड संक्रमितों की संख्या में दुनिया के तीन अव्वल देशों में- संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजिल और भारत- शुमार था, जब भारत में तीस हजार से अधिक लोग इससे काल कवलित हो चुके थे, कोविड संक्रमण के फैलाव के डर से समूची दुनिया के अग्रणी धर्मों ने अपने अहम धार्मिक आयोजनों को मुल्तवी कर दिए थे, उस वक्त़ भी भारत सरकार उस आयोजन पर डटी रही थी।

अर्थव्यवस्था की गिरती हालत एवं साथ ही साथ चीन के गालवान घाटी में कथित घुसपैठ तथा अन्य स्थानों पर वैसी ही कोशिशें- तथा जिन्हें लेकर सरकार के अन्दर से ही उठे विरोधाभासी स्वर भी मोदी सरकार की अच्छी किरकिरी कर रहे थे।

वह शायद पहली दफा हो रहा था कि मुख्यधारा की पत्रिकाओं, वेब जर्नल्स में मोदी का जादू किस तरह चुक रहा है, इसकी चर्चा उन दिनों चल पड़ी थी। द प्रिन्ट- जो निश्चित तौर पर किसी वामपंथी संगठन का मुखपत्र नहीं है- उसमें एक विश्लेषक का आलेख इसकी बानगी प्रस्तुत कर रहा था।

‘मन की बात’ – जिसमें जनाब मोदी रेडियो पर अपना मासिक व्याख्यान देते हैं, उसके ताजा संस्करण से चर्चा शुरू करते हुए लेखक ने लिखा था कि किस तरह ‘आम तौर पर आक्रामक मुद्रा में रहने वाले प्रधानमंत्री मोदी बच बच कर चलते दिख रहे थे’.. ‘उन्होंने जो कुछ कहा उससे अधिक सुनाई दे रहा था जो उन्होंने नहीं कहा।’

लेखक के मुताबिक मोदी का सार्वजनिक व्यक्तित्व पांच खंभों पर टिका है- मजबूत और निर्णायक नेता, विकास पुरूष, वैश्विक स्टेट्समैन, एक ऐसा फकीर जिसने दूसरों के लिए कार्य करने के लिए परिवार को दूर रखा और एक हिन्दू हदय सम्राट। लेखक ने बताया था कि रफ्ता-रफ्ता किस तरह पहले चार तत्व अपनी आभा खो रहे हैं। और सिर्फ हिन्दू हदय सम्राट का पहलू अभी उनके साथ है।

वहीं ‘कारगिल विजय दिवस’ पर अपने हमले का रुख महज पाकिस्तान पर केन्द्रित करके कि किस तरह वह विश्वासघाती है आदि और चीन पर मौन बरतते हुए- जबकि वही बात चीन पर भी लागू की जा सकती है- मोदी ने यही संकेत दिया कि आप सवाल न पूछें।

वहीं याद रहे उन दिनों नॉर्दर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल वाई के जोशी के बयान सरकार की असुविधा बढ़ाने के लिए काफी थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि सेना लाइन ऑफ एक्चुअल कन्ट्रोल पर यथास्थिति बहाल करने की कोशिश करेगी’। जबकि हकीकत यही है कि जनाब मोदी ने चीनी आक्रमण की बात को कभी स्वीकारा नहीं है।

क्योंकि उन्हें इस बात का जवाब देना भी सूझ नहीं रहा कि विगत छह सालों में चीन के मुखिया शी से उनकी 16 मुलाकातें और विदेशी राजनय को ‘पर्सनल टच’ देने की उनकी तमाम कवायद की विफलता को कैसे कबूल किया जाए।

वह शायद पहली दफा था कि किसी फौजी कमांडर ने आधिकारिक तौर पर ऐसी बात कही थी जिसके मायने यही निकलते थे कि चीन ने भारतीय क्षेत्र में कब्जा कायम किया है। न्यूज 18 के साथ बातचीत में उन्होंने यह बात कही थी जब उन्हें पूछा गया कि स्थिति पूर्ववत बहाल होने में कितना अधिक वक्त लगेगा?

दरअसल विदेश नीति एक ऐसा इलाका है, जहां मोदी सरकार के बड़े बड़े दावे और जमीनी हक़ीकत के बीच गहरे अंतराल की बात अब अधिकाधिक उजागर हो रही है।

गनीमत है कि जनतंत्र का प्रहरी कहलाने वाला मीडिया इन दिनों अपने ‘भक्ति काल’ में है, इसलिए यह तमाम बातें सामने नहीं आ रही हैं।

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कह सकते हैं कि विदेश नीति ऐसा क्षेत्र है – जिसमें सरकार की पोजिशन्स हमेशा दो पेण्डुलम के बीच झूलती रही है।

एक तरफ जहां पाकिस्तान भारत का ‘स्थायी दुश्मन’ कहा जाता है, लेकिन यह स्थिति पाकिस्तान की सरप्राइज विजिट से प्रधानमंत्री मोदी को रोक नहीं सकी जब न केवल उन्होंने भारत लौटते हुए ही अचानक पाकिस्तान की दिशा में अपना हवाई जहाज मोड़ दिया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से तथा उनकी मां से मुलाकात की थी।  

विदेश नीति के दो छोर के बीच झूलने की बात और स्पष्ट हो सकती है, जब हमास ने इजराइल पर अचानक एक हमला 7 अक्टूबर को किया- जिसमें एक हजार से अधिक इजराइली मारे गए और कुछ इजराइली लोगों को वह अपने साथ बंधक बना कर भी ले गए।

आज़ादी के समय से फिलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय की हिमायत करने की आधिकारिक पोजिशन के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने टिवटर हैण्डल से यह बयान दिया कि ‘इस कठिन घड़ी में हम इजराइल के साथ खड़े हैं।’ बाद में जब प्रधानमंत्राी मोदी के इस बिल्कुल ‘निजी वक्तव्य’ की आलोचना हुई, तब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अपना आधिकारिक बयान जारी किया।

दरअसल बेहद करीबी दोस्ती- जबकि दूसरे पक्ष की तरफ से इतनी गर्मजोशी न प्रगट की जाती हो- और ‘सम्बन्ध सामान्य नहीं हैं’ के औपचारिक दावे के बीच भारत और चीन के रिश्ते विगत एक दशक से लगभग झूलते रहे हैं। विदेश नीति क्या होनी चाहिए, इसके बारे में सबसे अधिक दिग्भ्रम की स्थिति में भारत दिखता है।

विश्लेषकों का कहना है कि अहमदाबाद में मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी द्वारा साथ में झूले पर बैठने से लेकर भारत के सीमावर्ती इलाकों में चीन की रफ्ता रफ्ता चलती रही घुसपैठ यही भारत चीन सम्बन्धों की कड़वी हक़ीकत है।  

अब कुछ वक्त पहले ही चीन के राजनयिकों के एक दल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय का दौरा किया। लाजिम है कि विपक्ष की तरफ से यह सवाल उठाया गया कि एक तरफ जयशंकर चीन के साथ सम्बन्ध सामान्य नहीं है का दावा करते हैं और वहीं दूसरी तरफ चीन के राजनयिक संघ मुख्यालय का दौरा करते हैं, आखिर माजरा क्या है?

दरअसल मोदी सरकार से असहमति रखने वाले लोग एवं समूह ही नहीं बल्कि स्वतंत्र निरीक्षकों को भी इस बात पर गहरा आश्चर्य होता है कि इसके बारे में उपलब्ध तमाम प्रमाणों के बावजूद संसद के पटल पर मोदी द्वारा यह बयान दिया है कि ‘ना कोई घुसा है, न घुसेगा।’

अभी पिछले ही साल गृहमंत्री अमित शाह अरूणाचल प्रदेश के दौरे पर गए थे, जहां यह ख़बर आयी थी कि किस तरह वह अरूणाचल के कई इलाकों को नए नाम दे रहा है, जबकि अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी के संसद के पटल पर दिए गए बयान को दोहरा रहे थे कि ‘भारत के जमीन का एक टुकड़ा भी घुसपैठ का शिकार नहीं है।’ इतना ही नहीं चीन ने अमित शाह के अरूणाचल प्रदेश के सीमावर्ती गांव किबिथो के दौरे का भी उल्लेख किया कि यह कदम ‘‘चीन की क्षेत्रीय एकता का उल्लंघन है।

भारत के मीडिया में भारत द्वारा चीन को दिए गए ‘‘मुंहतोड़ जवाब की हक़ीकत भी पूर्व सेना प्रमुख के वक्तव्य में प्रगट होती है, जिसमें वह रक्षा मंत्री के साथ अपने सम्वाद का उल्लेख करते हैं। उनके मुताबिक जब उन्होंने रक्षा मंत्री से पूछा कि चीन द्वारा की गयी घुसपैठ का क्या करें तो उनका जवाब था कि ‘जो जरूरी है, उसे वह करें’

the political leadership didn’t have the courage to tell the army what should be done to respond to Chinese incursions on the Ladakh border. The defence minister merely told the army chief to “do whatever he felt was necessary”. 

दरअसल इस बात के तमाम प्रमाण आज मौजूद हैं कि चीन को लेकर भारत ने समय समय पर बेहद बुजदिली वाला रवैया अख्तियार किया है। चंद माह पहले भारत-चीन युद्ध में मारे गए सैनिकों के स्मारक के विध्वंस की बात सामने आयी थी तथा उस पर चर्चा भी हुई थी। पता चला कि चीन के कहने पर भारत सरकार ने 1962 युद्ध के सबसे बड़े युद्धवीर मेजर शैतान सिंह की याद में बने स्मारक को ध्वस्त किया और सबसे पहले यह ख़बर भाजपा के क्षेत्रीय सांसद ने ही मीडिया को दी।

विडम्बना ही है अपने आप को शक्तिशाली बताने वाली मोदी सरकार ने इस मसले पर अभी तक कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में यही बताया गया था कि ‘भारतीय सेना को 1962 के युद्ध के सबसे बड़े युद्धवीर कहे गए मेजर शैतान सिंह की याद में बने स्मारक को चीन के कहने पर ध्वस्त करना पड़ा क्योंकि चीन ने यह दावा किया कि भारत और चीन के बीच अब जो नया बफर जोन बना है, उस दायरे में यह स्मारक आता है।

मालमू हो कि कैलाश पर्वत श्रृंखला के एक मार्ग- रेजांग ला के पास हुई लड़ाई में मेजर शैतान सिंह और उनकी टीम के 113 लोगों ने असीम बहादुरी का परिचय दिया था, जबकि उनके सामने हजारों की तादाद में चीनी सेना खड़ी थी, ‘आखरी गोली तक और आखरी व्यक्ति’’ तक यह लड़ाई लड़ी गयी। मेजर शैतान सिंह के लिए बना स्मारक उसी स्थान पर बना था, जहां उनका पार्थिव शरीर मिला था, जहां उनका एक हाथ गोलियों से छलनी किए उनके पेट को थामे हुए था।

निश्चित तौर पर आज नहीं तो कल भारत की जनता को पता चलेगा कि अपने आप को 21वीं सदी की महाशक्ति बनने का दावा करने वाली सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा के तमाम दावे और पड़ोसी चीन के साथ शांति बनाए रखने के नाम पर भारत द्वारा अपनाया गया समझौता परस्ती की हक़ीकत का अंतराल साफ होता जाएगा।

पूर्व सेनाप्रमुख एम एम नरवणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स आफ डेस्टिनी’ – जिसे 15 जनवरी को ही प्रकाशित होना था, उसके जो अंश कहीं प्रकाशित हुए थे, या जनरल नरवणे ने अपने साक्षात्कारों में उसकी चर्चा की थी, वह तमाम बातें जब भी सामने आएंगी, उम्मीद है कि वह इस हकीकत को और स्पष्ट कर सकती हैं।

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आखिर चुनावी समर के लिए तैयार भाजपा के सामने- जो तीसरी दफा ‘हस्तिनापुर’ जीतने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है, जिसके पास धन, धर्म और सरकार की ताकत है और लोकतंत्र जिन संस्थाओं के सहारे सक्रिय रहता है, फिर वह न्यायपालिका हो, या कार्यपालिका में सीएजी, चुनाव आयोग या सीबीआई, ईडी जैसी तमाम संस्थाएं हों- जो एक तरह से सरकार की मनमानी पर अंकुश रखने काम कर सकती हैं, उन्हें जिस तरह हाल के समयों में निष्प्रभावी किया गया है या जिनका हथियारीकरण किया गया है, ताकि केन्द्र में सत्तासीन हुकूमत के विरोधियों को नेस्तनाबूत किया जा सके।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अयोध्या में राममंदिर के उदघाटन के बहाने जो माहौल बनाया गया है, जिसमें केद्र सरकार, भाजपा शासित राज्यों में या भारतीय जनता पार्टी जैसे राजनीतिक दल में या राष्टीय स्वयंसेवक संघ जैसे कथित सांस्कृतिक संगठन तथा उसके तमाम आनुषंगिक संगठनों में और लोकतंत्र का प्रहरी समझे जाने वाले मीडिया में फर्क करना मुश्किल हुआ था और जिस तरह आम लोगों के बड़े हिस्से में उसकी प्रचंड सहभागिता दिखायी दी, उससे यह प्रतीत हो सकता है कि 2024 का चुनाव भाजपा के लिए एक ‘‘वाॅकओवर’’ है अर्थात वह उसे आराम से जीत सकती है।

पिछले साल से विपक्षी गठबंधन बनाने में सक्रिय रहे नीतीश कुमार ने फिर एक बार पाला बदला है और उन्होंने भाजपा के साथ हाथ मिला कर सरकार भी बनायी है।  

निश्चित तौर पर विपक्ष की स्थिति यहुदी पुराणों के ‘डेविड’ की तरह लग सकती है – जिसके पास न खास संसाधन हैं, न लोग हैं, न ही मुख्यधारा का मीडिया है, जो सत्ताधारी पार्टी के चारण की भूमिका में है, विपक्षी गठबंधन में आपसी विवाद भी हैं – और जिसके सामने ‘गोलिएथ’ जॅैसी विशालकाय भाजपा खड़ी है।

इन सबके बावजूद मोदीशाही की अजेयता के मिथक पर यकीन करना क्यों मुश्किल लगता है?

इसकी सबसे बड़ी वजह मोदी और उनके करीबियों को खुद को इस बात का आत्मविश्वास नहीं है कि वह चुनावी मैदान में फतह हासिल कर ही लेंगे। अगर इतना आत्मविश्वास होता तो तय बात है कि राममंदिर के भव्य उदघाटन के दूसरे ही दिन मंडल कार्ड खेलने की मजबूरी उसे नहीं होनी चाहिए थी।

राममंदिर के जरिए वह 400 से अधिक सीटें हासिल कर लेंगे, इसका दावा करने वाली पार्टी उद्घाटन के दूसरे ही दिन कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न पुरस्कार देकर तुरंत अतिपिछड़ों के वोट का जुगाड़ करने में नहीं लगती। जिस कर्पूरी ठाकुर ने ताउम्र संघ भाजपा जैसाी ताकतों के खिलाफ संघर्ष किया, उत्पीड़ितों को आरक्षण प्रदान करने में एक नयी जमीन तोड़ी- जिसका निरंतर विरोध तत्कालीन भारतीय जनसंघ ने किया- उन्हें अचानक पुरस्कार देकर सत्ता पाने की अपनी बदहवास स्थिति को उजागर नहीं करती।

इस सम्बन्ध में अग्रणी पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह चंद अहम बातें कहते हैं, वह सवाल पूछते हैं कि ‘क्या वाकई रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा ने भाजपा को दिग्विजयी बढ़त दिला दी है?’ और उसका जवाब देते हुए कहते हैं:

“उसकी कहें या समूचे संघ परिवार की राम व राम मंदिर की राजनीति से जुड़े तथ्य व चुनावी आंकडे इसका जवाब हां में नहीं देते। ‘वहीं’ राम मंदिर का मुद्दा इतना ही रामबाण होता तो भाजपा को केंद्र में अकेले अपने दम पर बहुमत की सीढ़ियां चढ़ने के लिए 2014 में मोदी के ‘महानायक अवतार’ तक की प्रतीक्षा न करनी पड़ती। तिस पर वह 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में अपनी लगातार दो जीतों को भी राम मंदिर मुद्दे की जीत नहीं बता सकती।

वह उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रामकुमार वर्मा के साथ उनकी बातचीत का भी जिक्र करते हैं।

“डाॅ. वर्मा यह भी याद दिलाते हैं कि 2020 में पांच अगस्त को मोदी द्वारा मंदिर निर्माण लिए भूमिपूजन के वक्त रामलला को साष्टांग दंडवत के बाद 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए तो भी भाजपा की ऐसी ही दिग्विजय के सपने देखे गए थे, लेकिन उसकी पचास से ज्यादा सीटें घट गई थीं। यहां तक कि अयोध्या में भी समाजवादी पार्टी ने उसकी पांच में से दो सीटें छीन ली थीं। बाद में अयोध्या नगर निगम के चुनाव में भाजपा राम मंदिर से सटे अभिरामदास वार्ड में अपना पार्षद नहीं चुनवा पाई। इस हिंदू बहुल वॉर्ड से इस्लाम धर्मावलंबी निर्दलीय प्रत्याशी सुल्तान अंसारी जीत गए थे।”

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मोदी की अगुआई में तीसरी पारी जीतने के यह तमाम हवाई दावे या उनकी अजेयता की तमाम बातों में हम दरअसल तुरता विश्लेषण का अधिक जोर देखते हैं, उनमें न सरकार की उपलब्धि के तमाम दावे और जमीनी स्तर पर की हक़ीकत के अंतराल की बेबाक जांच दिखती है, और न ही चीन को लेकर पेण्डुलम जैसी झूलती नीति।

अगर माोदी सरकार से जनता की व्यापक नाराजगी नहीं होती तो मणिपुर में या उत्तर पूर्व के हिस्सों में- जहां कांग्रेस का आधार काफी सिमटा है- वहां की जनता और खासकर युवा भारत जोड़ो न्याय यात्रा में जगह जगह भारी तादाद में नहीं जुड़ते और न ही चीन सरकार के सामने उसके समझौता परस्ती की बातें, अपनी जमीन चीन को सौपने की बातें- रफ्ता-रफ्ता लोगों के बीच पहुंचती देख कर सरकार परेशान नहीं होती, वह अपने ही पूर्व सेना प्रमुख द्वारा अग्निपथ योजना को लागू करने में सेना की सलाह को नजरअंदाज करने के उनके दावों को प्रस्तुत करती आत्मकथा के प्रकाशन को कुछ तकनीकी कारणों का हवाला देकर देर नहीं कराती।

वैसे मोदी की अजेयता के इन तमाम दावों में एक गहरी कमी की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया है, यह सभी विश्लेषण इतिहास की जानकारी के किसी भी किस्म के बोध से वंचित हैं।

दरअसल मोदी सरकार की तीसरी पारी को सुनिश्चित कहने वाले यह दावे कहीं न कहीं संघ-भाजपा परिवार में विद्यमान इस सोच से ही प्रभावित है, जिसमें यही समझा जा रहा है कि भारत को असली आज़ादी 2014 में ही मिली।

याद रहे 1947 में भारत को मिली आज़ादी के बाद विगत 75 से अधिक वर्षों में स्वाधीन भारत में  लोकतंत्र की यह यात्रा रही है, इसमें दो ऐसे हम मुकाम रहे हैं, जब तत्कालीन हुकूमत की अजेयता के दावे चूर चूर होने में वक्त नहीं लगा था, और दोनों बार ‘अजेय’ कहलाने वाली ताकत को सत्ता की बागडोर फिर संभालने में वक्त़ लगा।

आपातकाल के उदाहरण को लें-

वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और तमाम विपक्षी पार्टी के अग्रणी नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया और अख़बारों पर भी सरकार ने सेन्सरशिप लगा दी।

गौरतलब है कि आपातकाल को लेकर जनता के बीच असंतोष भले ही व्याप्त था, लेकिन सड़कों पर उसका प्रगटीकरण अधिक समय तक चल नहीं सका। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तत्कालीन सुप्रीमो बालासाहब देवरस ने इंदिरा गांधी के नाम पत्राचार शुरू किया और सरकार द्वारा संचालित कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए संघ पर पाबंदी हटाने की गुजारिश की।

उन्होंने यह भी दावा किया कि जयप्रकाश आंदोलन से उनका कोई सम्बध नहीं था।

इंदिरा गांधी ने 1977 में जब चुनावों का ऐलान किया तो उन्हें इस बात पर पूरा यकीन था कि सत्ता में उनकी वापसी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका था।

वर्ष 2003/2004

आज जिस तरह मोदी शाह सत्ता के केन्द्र में हैं, वही हाल 2003/2004 में वाजपेयी/आडवाणी जोड़ी का था, जो वर्ष 2003 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के चुनावों में मिली सफलता के बाद इतने आत्मविश्वास से भर गए कि उन्होंने चुनावों को समय से पहले ही करने का ऐलान किया।

उन्हें यह लग रहा था कि ‘इंडिया शाइनिग’ के उनके दावों को लोग हाथों हाथ लेंगे, लेकिन वह सत्ता से बेदखल कर दिए गए और फिर केन्द्र में वापसी के लिए भाजपा को दस साल का इन्तजार करना पड़ा।

वर्ष 1992-93

दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ, सर्वोच्च न्यायालय के 2019 के फैसले के हिसाब से यह एक ‘आपराधिक कार्य’ था। इस विध्वंस की परिणति समूचे देश के पैमाने पर व्यापक दंगों में हुई। जैसे देश का वातावरण था, यही कयास लगाए जा रहे थे कि उत्तर प्रदेश में कम से कम भाजपा की ही सत्ता में वापसी होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठजोड़ ने भाजपा को मजबूती के साथ शिकस्त दी। नारा उठा था ‘मिले मुलायम कांशीराम – हवा हो गए जय श्रीराम’!

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निष्कर्ष के ऐवज में

चंद माह के भीतर केंद्र में नयी सरकार सत्तासीन होगी।

एक ऐसे समय में जबकि मुख्यधारा का मीडिया सरकार का भोंपू बनने में व्यस्त है और उसकी पूरी कोशिश सरकार को नहीं बल्कि विपक्ष में सभी कमियां ढूंढने की है, ऐसी परिस्थिति में सहज संभावना है कि सोचने समझने वाले लोग निराश हो जाएं या समूची प्रक्रिया से निर्लिप्त हो जाएं।

आज जबकि सरकार, पार्टी और धार्मिक संस्थानों आदि के बीच विभाजन रेखाएं धुंधली की जा रही है, यह ऐन मुमकिन है कि वह सभी आवाज़ेें जो असहमति की हों या जो यथास्थिति को प्रश्नांकित करने का माददा रखती हों, धर्म और राजनीति के इस खतरनाक घोल का विरोध करने का साहस रखती हों- उन पर हावी होने की, उनको दबाने की कोशिश होगी।

ऐसी स्थिति में अमन, इन्साफ, समता चाहने वाली समझदार आवाज़ों के कंधों पर अधिक जिम्मेदारी आ गयी है।

हर वह शख्स, हर वह व्यक्ति- जिसमें स्त्री, पुरूष, ट्रांसजेण्डर- सभी शामिल हों- जो मानवता की बेहतरी में यकीन रखता है और सोचता है कि जिस नए भारत को गढ़ा जा रहा है, उसमें संविधान में निहित बुनियादी सारतत्व को नए सिरे से हासिल किया जा सके, बचाया जा सके, उसे निश्चित ही स्थिति बदलने के लिए संकल्पबद्ध होकर आगे बढ़ना होगा। 

(सुभाष गाताडे वरिष्ठ लेखक और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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