Monday, October 25, 2021

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नारदा मामला बना मोदी सरकार के गले की हड्डी

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नारदा स्टिंग ऑपरेशन में दो मंत्रियों एक विधायक और एक पूर्व मेयर की गिरफ्तारी की गई है। यह एक साधारण सा अपराधिक मामला है जिसमें अधिकतम सात साल की सजा है। पर इसमें सियासत का तड़का इस कदर डाला गया है कि यह केंद्र सरकार के गले की हड्डी बन गया है, न निगलते बन रहा है और न ही उगलते बन रहा है। यह पहला मौका है जब जमानत के एक मामले की सुनवाई के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट में पांच जजों की एक लार्जर बेंच का गठन किया गया है। इसकी सुनवाई 24 मई से शुरू होगी। यह मामला यही नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा।

इस मामले में राज्य के दो मंत्री सुब्रत मुखर्जी एवं फिरहाद हकीम और पूर्व मंत्री मदन मित्रा एवं पूर्व मेयर शोभन चटर्जी को सीबीआई ने 17 मई को गिरफ्तार किया था। अब यह बात दीगर है कि गिरफ्तारी का अंदाज कुछ ऐसा था जैसे सीबीआई केंद्रीय वाहिनी को साथ ले कर सुल्ताना डाकू को गिरफ्तार करने जा रही हो। इसी दिन सिटी सेशन कोर्ट के स्पेशल जज की कोर्ट में उनकी जमानत याचिका पर वर्चुअल सुनवाई हुई। इसमें जज ने अपने आदेश में क्या लिखा है आइए इस पर गौर करते हैं।

सीबीआई कोर्ट के स्पेशल जज अनुपम मुखर्जी ने 17 मार्च को अपने आदेश में कहा है कि सीबीआई की तरफ से वर्चुअल सुनवाई के लिए अपील की गई और बचाव पक्ष भी इससे सहमत हो गया। सीबीआई की तरफ से चारों अभियुक्तों को 31 मई तक के लिए न्यायिक हिरासत में देने की अपील की गई है। इसमें कहा गया है कि सुब्रत मुखर्जी फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, शोभन चटर्जी और एस एम एच मिर्जा के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। इस मामले में अन्य अभियुक्तों के खिलाफ जांच जारी है। सभी दस्तावेजों को देखा और इनके मुताबिक जांच पूरी हो गई है। गिरफ्तार अभियुक्तों को हिरासत में देने के लिए सीबीआई की तरफ से कोई अपील नहीं की गई है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन पर गौर करते हुए न्यायिक हिरासत में देने के लिए की गई सिर्फ एक अपील ही अभियुक्तों को हिरासत में रखे जाने का आधार नहीं बन सकती है। लिहाजा अभियुक्तों को जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश दिया जाता है। यहां गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने गौतम नौलखा के मामले में कहा था कि कोविड के इस दौर में जहां तक हो जमानत दी जाए।

इस बाबत जिक्र किए जाने पर हाई कोर्ट की एडवोकेट प्रियंका अग्रवाल कानून की व्याख्या करते हुए कहती हैं कि बंगाल में किसी भी मामले में जांच पूरी करने के बाद अगर चार्जशीट दाखिल की जाती है तो मजिस्ट्रेट उसे संज्ञान में लेता है। इसके बाद जांच एजेंसी की कोई भूमिका नहीं रह जाती है। फिर अदालत वारंट जारी करती है और अभियुक्तों के हाजिर होने के बाद उन्हें जमानत देने या नहीं देने का फैसला करती है। यहां भी अदालत ने इसी पद्धति का पालन करते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश आदि में चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद अभियुक्त अंतरिम जमानत लेकर ही अदालत में हाजिर होते हैं।

प्रियंका अग्रवाल।

इस चार्जशीट में एक नाम एस एम एच मिर्जा भी है। इसके तह में जाते ही इस खेल के पीछे छुपे राजनीतिक चेहरे का नकाब उतर जाता है। इसमें कहा गया है कि मिर्जा जमानत पर हैं। यानी उनके जमानत पर रहते हुए ही इस मामले की जांच पूरी की गई और चार्जशीट दाखिल की गई। तो फिर इन चारों के मामले में जांच पूरी करके चार्जशीट दाखिल करने के बाद न्यायिक हिरासत में रखे जाने की अपील का औचित्य क्या है। इस अपराध में भागीदारी तो सभी की बराबर की है और कहीं नहीं कहा गया है इन चारों की भूमिका इस मामले में ज्यादा गंभीर रही है। इसके अलावा मिर्जा को भी तो इसी कोर्ट से जमानत मिली थी। तब फिर सीबीआई ने इसे रद्द करने के लिए हाईकोर्ट में अपील क्यों नहीं दायर की थी। उस समय तो जांच भी अधूरी ही रह गई थी। क्या इससे यह नहीं लगता है कि बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली शर्मनाक पराजय की रंजिश के कारण ही यह कार्रवाई की जा रही है। वैसे यहां याद दिला दें कि भाजपा ने शोभन चटर्जी को कोलकाता का कोऑर्डिनेटर बनाया था, लेकिन अब उन्होंने भाजपा से नाता तोड़ लिया है।

स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकार मैथ्यू सैमुअल का सवाल है कि इस मामले में अभियुक्त मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी को क्यों छोड़ दिया गया। यहां याद दिला दें कि मुकुल राय 2017 में ही भाजपा में शामिल हो गए थे और शुभेंदु अधिकारी राज्य विधानसभा में विरोधी दल भाजपा के नेता चुने गए हैं। इस चार्जशीट में कहा गया है कि अन्य अभियुक्तों के खिलाफ जांच जारी है। यह दलील भी बेहद दिलचस्प है। मैथ्यू सैमुअल के मुताबिक मामला तो एक ही है, सभी ने उनसे पैसे लिए थे। अब यह बात दीगर है कि रकम अलग-अलग थी। इस मामले में मिर्जा को इस लिए गिरफ्तार किया गया था क्योंकि मुकुल राय ने मैथ्यू सैमुअल से कहा था कि वह मिर्जा को पैसे दे दे। तो फिर क्या मुकुल राय के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं बनता है, पर बकौल सीबीआई उनके खिलाफ जांच अभी जारी है।

कल्याण बनर्जी।

इसके बाद तुरत-फुरत का दौर शुरू होता है। सीबीआई की तरफ से इन चारों नेताओं को मिली जमानत के खिलाफ कलकत्ता  हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस के डिविजन बेंच में शाम 5:30 बजे इसे मेंशन किया जाता है और रात को सुनवाई होने के बाद उन्हें मिली जमानत पर स्टे लगा दिया जाता है। इस मामले में अभियुक्तों को कुछ कहने का मौका ही नहीं मिलता है। एडवोकेट कल्याण बनर्जी कहते हैं कि यह एक अभूतपूर्व फैसला है। कहते हैं कि क्या फर्क आता अगर उन्हें सुनने के बाद फैसला सुनाया जाता। हाई कोर्ट तो तब भी जमानत रद्द करने का फैसला सुना सकता था। दोनों मंत्रियों, एक विधायक और एक पूर्व मेयर के फरार होने की कोई संभावना तो नहीं थी। तुरत फुरत का दूसरा दौर है इन चारों नेताओं की गिरफ्तारी के लिए राज्यपाल का सात मई को अनुमति देना ,जबकि दस मई को नई सरकार का शपथ लेना तय था। इसके अलावा राज्यपाल ने अपने इस फैसले को गोपनीय क्यों रखा, तत्कालीन स्पीकर से इसे शेयर क्यों नहीं किया। इसका एक दूसरा पहलू भी देखिए। इसी मामले में तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसद भी अभियुक्त हैं। उनके खिलाफ मामला चलाने के लिए लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से अनुमति मांगी गई थी, पर कोई फैसला नहीं हो पाया। अब यह लोकसभा के मौजूदा स्पीकर ओम बिरला के पास लंबित है।जाहिर है कि ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब लोकसभा के दो अध्यक्ष इस बाबत कोई फैसला नहीं ले पाए तो राज्यपाल की इतनी जल्दी क्या पड़ी थी। उन्होंने नए स्पीकर का चुनाव होने से पहले ही अनुमति दे दी। क्या इससे यह नहीं लगता कि यह पूरा प्रकरण ही एक राजनीतिक खेल था और राज्यपाल इसमें भागीदार हो गए।

अब सवाल उठता है कि आखिर एक साधारण सा जमानत का मामला हाईकोर्ट के इतिहास में ,शायद पहली बार, लार्जर बेंच में क्यों गया है। जस्टिस अरिजीत बनर्जी ने सुनवाई के दौरान सॉलीसीटर जनरल से सवाल किया था कि आप मुझे इस बात पर संतुष्ट कीजिए कि कोविड-19 के इस दौर में उन्हें जेल में रखा जाना क्यों जरूरी है। इसके साथ ही कहा था कि हमें लगा था कि दबाव डालकर जमानत का फैसला लिया गया है। पर उनका यह भ्रम दूर हो गया क्योंकि उन्होंने जमानत दिए जाने के पक्ष में अपना फैसला सुनाया है।  एक्टिंग चीफ जस्टिस राजेश बिंदल ने अपने फैसले में कहा है कि जमानत नहीं दी जाए। उनका सवाल था कि मुख्यमंत्री क्यों सीबीआई के कार्यालय में गईं और धरने पर बैठ गईं। जब मामला अदालत में हो उस समय उनका यह कदम उठाना क्या मुनासिब है। एक्टिंग चीफ जस्टिस का सवाल है कि कानून मंत्री मलय घटक सिटी सेशन कोर्ट में क्यों बने रहे थे।

जाहिर है कि अब इस मामले में मुख्यमंत्री की संवैधानिक भूमिका पर भी बहस होगी। ऐसे में राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका पर भी सवाल उठेगा। इसीलिए लार्जर बेंच का गठन किया गया है जिसमें एक्टिंग चीफ जस्टिस सहित पांच जज होंगे। और जब बात चल ही पड़ी है तो फिर बहुत दूर तलक जाएगी, यानी सुप्रीम कोर्ट तक।

(कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह की रिपोर्ट।)

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