Monday, August 8, 2022

फांसी से दम घुटने से हुई महंत नरेंद्र गिरि की मौत! विसरा रिपोर्ट न आने से संशय बरकरार

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उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिशा निर्देश के बाद बिना विसरा रिपोर्ट प्राप्त किये पुलिस वाले चार्जशीट और फाइनल रिपोर्ट (एफआर) नहीं लगा सकेंगे । डीजीपी ने वर्ष 2013 में ही विभागीय परिपत्र जारी करके यूपी पुलिस को गाइडलाइंस जारी की हैं, जिसमें कहा गया है कि अगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण निश्चित न होने के कारण विसरा सुरक्षित किया गया हो तो उसे तुरंत विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा जाए। परीक्षण का परिणाम प्राथमिकता के आधार पर अभियुक्त की गिरफ्तारी के 60 दिन के अंदर भेजे जाने के लिए प्रयोगशाला को लिखा जाए।लेकिन यह दिशानिर्देश सीबीआई पर लागू नहीं है,क्योंकि सीबीआई ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की मृत्यु मामले में बिना विसरा रिपोर्ट के चार्जशीट दाखिल कर दी है।

गौरतलब है कि जाँच एजेंसी छानबीन कर चार्जशीट दाखिल कर सकती है और चार्जशीट में विसरा रिपोर्ट आना बाकी लिख देती है, लेकिन विसरा रिपोर्ट आने के बाद ही चार्ज पर बहस होती है। विसरा रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि मौत से पहले जहर या कोई नशीला पदार्थ तो नहीं दिया गया था। सीआरपीसी की धारा-293 के तहत एक्सपर्ट व्यू एडमिशिबल एविडेंस होता है यानी विसरा रिपोर्ट एक्सपर्ट व्यू होती है और यह मान्य साक्ष्य है।

महंत नरेंद्र गिरि की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण फांसी के कारण दम घुटने को बताया गया है और गले में रस्सी के निशान भी पाए गये हैं।बाएं तरफ कान के नीचे रस्सी के निशान नहीं हैं। शारीर पर मृत्यु पूर्व किसी प्रकार के संघर्ष के निशान नहीं हैं। वाह्य चोटों के निशान नहीं हैं। फेफड़ा खून से भरा था। पेट में आंशिक पचा यानि अधपचा खाना था। शाकाहारी खाने के पचने में चार से 6 घंटे लगते हैं ,इसलिए उनकी मौत खाने से लगभग दो घंटे के भीतर हुई होगी।

मोदी ज्युरिशप्रुडेंस के अनुसार यहाँ तक तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट एक सामान्य फांसी की ओर इशारा करती है पर पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने 8 जारों में विसरा प्रिजर्व कर रखा है और विसरा जाँच की सिफारिश की है जो फांसी को रहस्यमय बना रही है। दरअसल महंत नरेंद्र गिरि के सुसाईड नोट 14पन्नों का है और उन्हें अपना दस्तखत करने में 3 से 4 मिनट लगते थे ,फिर उनके घुटने ठीक नहीं थे ऐसे में वे पलंग पर स्टूल रखकर कैसे फांसी के फंदे पर चढ़े होंगे इसमें भी संदेह है। चार्जशीट में इसका विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए विसरा जाँच जरुरी हो जाती है कि कहीं नशा देकर तो महंत नरेंद्र गिरिको फांसी पर लटकाया गया और वे शिथिल तन्द्रा के कारण कोई विरोध नहीं कर सके। उनका जो वीडियो मिला है जिसमे वे आत्महत्या की बात कर रहे हैं वो भी सामान्य नहीं है। जानकारों का कहना है जैसे उनसे जबरदस्ती बोलवाया जा रहा है।

महंत नरेंद्र गिरि के फांसी स्थल की फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट में पंखे के ऊपर चुल्ले से बंधे रस्सी और पलंग की दूरी 6 फुट एक इंच और नरेंद्र गिरी की लम्बाई 5फुट 7 इंच(170सेमी) लिखी गयी है। जो फांसी लगाने के लिए पर्याप्त बताई गयी है और कहा गया है कि पलंग पर बिछे गद्दे पर स्टूल पर चढ़कर पंखे के चुल्ले से फांसी लगाना सम्भव है। दरवाजा खोलने के बारे में जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि दरवाजा बलपूर्वक खोला गया। रिपोर्ट में यह नहीं लिखा कि स्टूल कितना बड़ा था क्योंकि जो फुटेज वायरल हुई उसमें पलंग पर स्टूल नहीं दिख रहा था। जाँच में यह भी निष्कर्ष दिया गया है कि चुल्ला और फांसी की रस्सी में महंत नरेंद्र गिरि के 85 किलो के वजन को सहने की शक्ति थी।   

क्या है विसरा

मौत की वजह स्पष्ट न होने पर आमाशय में अधपके भोजन का रस, फेफड़े, छोटी-बड़ी आंत और किडनी का कुछ हिस्सा जांच के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है, जिसे जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा जाता है। दरअसल जब भी संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के साथ-साथ कई बार विसरा की जांच की जाती है।

आत्महत्या के सामान्य मामलों में आमतौर पर विसरा जांच की जरुरत नहीं होती, लेकिन डेड बॉडी देखने के बाद अगर मौत संदिग्ध लगे यानी जहर या किसी प्रकार का नशा देने की आशंका हो तो विसरा की जांच की जाती है।

चार्जशीट में विसंगतियां हैं और लूपहोल्स छोड़ दिए गये हैं।

-यदि पुलिस वरिष्ठ अधिकारियों के साथ शाम 5:30 बजे के आसपास आई थी, घटना स्थल का निरीक्षण किया था, सुसाइड नोट पाया था, और मुखबिर से मुलाकात की थी, तो प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई थी तत्काल, आश्चर्यजनक रूप से पंचनामा के समय या उससे पहले, प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की जा सकी, क्या पूरी खानी पकाकर पहली सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी।

-प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से पहले पुलिस ने मृतक द्वारा कथित रूप से लिखा एक सुसाइड नोट भी उस कमरे से बरामद किया है जहां वह मृत पाया गया था, जिसके अवलोकन में कहा गया है कि मृतक को हरिद्वार से सूचना मिली है कि आवेदक ने कुछ तस्वीरों को मॉर्फ किया हो सकता है। एक लड़की के साथ मृतक की और वह इसे सार्वजनिक डोमेन में जारी करने जा रहा था और यही कारण है कि मृतक आत्महत्या कर रहा है, हालांकि जांच के दौरान सीबीआई या पुलिस ने न तो ऐसी कोई तस्वीर या कोई अन्य सामग्री बरामद की है न ही इनके अस्तित्व का कोई ठोस प्रमाण दिया है।

-सीबीआई ने सुसाइड नोट और वीडियो की सत्यता की पुष्टि आज तक नहीं लगाया गया है क्योंकि सीएफएसएल रिपोर्ट अभी भी लंबित है और केवल उन गवाहों के बयानों पर निर्भर है, जिन्होंने कहा है कि कथित आत्महत्या- नोट मृतक द्वारा लिखा गया है।

-कथित सुसाइड नोट में कई विसंगतियां हैं क्योंकि कई जगहों पर तारीखें और नाम काट दिए गए हैं और ओवरराइटिंग की गई है और हस्ताक्षर के मृतक भी हर पन्ने पर अलग हैं जिससे लगता है सुसाइड नोट की तारीख में हेराफेरी कर फर्जीवाड़ा किया गया है।

-सीबीआई ने कथित वीडियो (आपत्तिजनक/अश्लील/मृतक की किसी लड़की के साथ) की उपस्थिति के बारे में मृतक को जानकारी देने वाले व्यक्तियों के बारे में ठीक से जांच नहीं की है। इस बात की जांच नहीं हो पाई है कि उस व्यक्ति की मंशा क्या थी और वह आवेदक के साथ इस तरह के वीडियो की मौजूदगी के बारे में मृतक को नियमित रूप से क्यों बता रहा था।

-जांच के दौरान सीबीआई ने एक हाशिम अली का भी बयान दर्ज किया है, जिसने बाघंबरी मठ में सीसीटीवी लगाने का काम किया है और सीसीटीवी कैमरों की सेवा और मरम्मत का काम करता था, जिसने अपने बयान में कहा है कि 12सितम्बर 2021 को मृतक ने उसे बुलाया और बाघंबरी मठ के सीसीटीवी फुटेज को हटाने के लिए कहा है। हालांकि, सीबीआई ने कारणों की जांच नहीं की या यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि मृतक ने मठ के सीसीटीवी फुटेज क्यों डिलीट किए।

-गुरचरण सिंह बनाम पंजाब राज्य एआईआर 2017 एससी 74 में उच्चतम  न्यायालय ने कहा है कि उकसाने के लिए, आत्महत्या कारित करने में सहायता या उकसाने के लिए अभियुक्त की मंशा और भागीदारी अनिवार्य है; आत्महत्या को कारित कराने के आरोपी के इरादे में निहित आपराधिक कृत्यों या चूकों की दूरदर्शिता आईपीसी की धारा 306 के दंडात्मक जनादेश को आकर्षित करने के लिए अनिवार्य अपराध के साथ-साथ कम हो जाएगी। इस प्रकार आईपीसी की धारा 306 आत्महत्या के लिए निरंतर उकसाने को अपराधी बनाती है। जबकि नरेंद्र गिरी मामले में निरंतर उकसाने का कोई साक्ष्य नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में नरेंद्र गिरी को आत्महत्या के लिए उकसाने के सम्बन्ध में हरिद्वार से गिरफ्तार उनके सुश्री आनंद गिरी की जमानत याचिका लंबित है जिसमें सीबीआई जवाब दाखिल करने से भाग रही है।पहले तीन हफ्ते और अब दो हफ्ते का और समय सीबीआई को जवाब दाखिल करने के लिए कोर्ट ने दिया है।अब जनवरी में जमानत प्रार्थना पत्र की सुनवाई होगी।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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