Friday, January 21, 2022

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सचमुच में नींव की ईंट थे बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक रामवृक्ष बेनीपुरी

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रामवृक्ष बेनीपुरी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने गद्य-लेखक, शैलीकार, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी, समाज-सेवी, हिंदी प्रेमी, निबंधकार और नाटककार के रूप में अपनी प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी। बेनीपुरी जी एक महान विचारक, चिन्तक, क्रान्तिकारी, साहित्यकार, पत्रकार और संपादक के रूप में सदैव अविस्मणीय हैं। राष्ट्र-निर्माण, समाज-संगठन और मानवता के जयगान को लक्ष्य मानकर बेनीपुरी जी ने ललित निबंध, रेखाचित्र, संस्मरण, रिपोर्ताज, नाटक, उपन्यास, कहानी, बाल साहित्य आदि विविध गद्य-विधाओं में महान रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। इसके साथ-साथ ये राष्ट्रवादी और स्वतंत्रता संग्राम संबंधी कार्यों में सक्रिय रूप से संलग्न रहे। बेनीपुरी जी पत्रकारिता जगत से साहित्य-सृजन के संसार में आए थे। वे छोटी उम्र से ही पत्र-पत्रिकाओं में लिखने लगे थे। आगे चलकर उन्होंने ‘तरुण भारत’, ‘किसान मित्र’, ‘बालक’, ‘युवक’, ‘कैदी’, ‘कर्मवीर’, ‘जनता’, ‘तूफान’, ‘हिमालय’ और ‘नई धारा’ नामक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

पत्र-प‍ात्रिकाओं में लिखकर तथा स्‍वयं सम्‍पादन करके देशवासियों में देशभक्ति की ज्वाला भड़काने के आरोप में इन्‍हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। बेनीपुरी जी की साहित्यिक रचनाओं की संख्या लगभग सौ है, जिनमें से अधिक रचनाएं ‘बेनीपुरी ग्रंथावली’ नाम से प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कृतियों में से ‘गेहूँ और गुलाब’ (निबन्ध और रेखाचित्र), ‘वन्दे वाणी विनायकौ (ललित गद्य), ‘पतितों के देश में (उपन्यास), ‘चिता के फूल’ (कहानी संग्रह), ‘माटी की मूरतें (रेखाचित्र), ‘अंबपाली (नाटक) विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। बेनीपुरी जी बहुमुखी प्रतिभा के साहित्‍य-सेवी थे। उन्‍होंने कहानी, नाटक, उपन्‍यास, रेखाचित्र, यात्रा-विवरण, संस्‍मरण एवं  निबंध आदि गद्य-विधाओं में विपुल साहित्‍य की रचना की। पन्‍द्रह वर्ष की अल्‍पायु से ही इन्‍होंने पत्र-पत्रिकाओं में लिखना प्रारम्‍भ किया था। पत्रकारिता तो उनकी साहित्‍य-सृजन के मूल में थी। बिहार में हिन्‍दी-प्रसार का कार्य इनके निर्देशन में बड़ी सक्रियता से चलता रहा। ‘‍बिहार हिन्‍दी सा‍हित्‍य सम्‍मेलन’ की स्‍थापना में भी इनका विशेष योगदान रहा। इनके क्षरा लिखे गये रेखाचित्र एवं यात्रा-वर्णन हिन्‍दी-साहित्‍य में बेजोड़ है। उनका पूरा साहित्‍य ‘बेनीपुरी ग्रन्‍थावली’ के रूप में कई खण्‍डों में प्रकाशित हो चुका है।

बेनीपुरी जी का जन्म 23 दिसंबर, 1899 को मुजफ्फरपुर जिले (बिहार) के बेनीपुर गाँव के एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उसी के आधार पर उन्होंने अपना उपनाम ‘बेनीपुरी’ रखा था। बचपन में ही माता-पिता के देहावसान हो जाने के कारण आपका पालन पोषण ननिहाल में हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा भी ननिहाल में हुई। मैट्रिक के पश्‍चात् इन्‍होंने अध्‍ययन छोड़ दिया। बाद में हिन्‍दी-साहित्‍य सम्‍मेलन की ‘विशारद’ परीक्षा उत्तीर्ण की। सीतामढ़ी जिले के मुसहरी गांव के राष्ट्रीय विचारों के तत्कालीन अग्रणी स्वातंत्र्य सैनिक श्री महादेव शरण सिंह की पुत्री से रामवृक्ष बेनीपुरी का विवाह हुआ। जब 16 साल की अवस्था में उनका विवाह हुआ तब वह स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे। वह अपने वैवाहिक जीवन से पूर्ण संतुष्ट थे। बेनीपुरी जी ने उन्हें पढ़ाने की कोशिश की। बेनीपुरी जी ने उमारानी के बारे में लिखा है – मेरी देशभक्ति के कारण जितना विष आततायियों ने दिया था उसे रानी ने अकेले ही पी लिया मुझे तो सिर्फ अमृत ही मिला है। “कैदी की पत्नी” उपन्यास में उन्होंने उनके गुणगान एवं महिमा वर्णन कर उसके वास्तविक जीवन की तस्वीर खींची है तथा उसके आदर्शों की ओर जीवन की कठिनाइयों को उभारने की कोशिश की है।

उनका दांपत्य जीवन आर्थिक रुप से दुखी भले हो लेकिन आदर्शों के रूप में वह एक सुखी दांपत्य जीवन माना जाएगा। अभावों और संघर्षमय में जीवन जीते हुए भी अच्छी पत्नी मिलने से वह सब कुछ भूल जाते थे। उनकी पत्नी ने जिंदगी भर भारतीय स्त्री के उनके आदर्शों का निर्वाह किया और हर संकट में अपने पति की सहायता की। यह उनके देशभक्त पिता महादेवशरण सिंह के संस्कारों और व्यक्तित्व का प्रभाव था। “वे बिहार के एक विशिष्ट व्यक्ति थे और बिहार में सबसे पहले आदमी वहीं थे जो सरकारी दमन के शिकार हुये थे। उनके मुकदमे का वर्णन उस समय के सुप्रशिद्ध अंग्रेजी पत्र ‘इडिपेन्डेन्ट’ में छपा करता था।” विवाह के इस सम्बन्ध के परिणाम स्वरूप बाबू महादेवशरण जी के व्यक्तित्व और नेतृत्व में भी बेनीपुरी जी के जीवन को नई दिशा दी।

सन् 1931 ई. में उन्होंने ‘समाजवादी दल’ की स्‍थापना की और सन् 1957 ई. में इस दल के प्रत्‍याशी के रूप में बिहार विधानसभा के सदस्‍य निर्वाचित हुए। बचपन से ही ‘रामचरितमानस’ का पाठ करते रहने के कारण धीरे-धीरे उनकी साहित्यिक रुचि का विकास हुआ।

उनकी भाषा-वाणी प्रभावशाली थी। उनका व्यक्तित्त्व आकर्षक एवं शौर्य की आभा से दीप्त था। वे एक सफल संपादक के रूप में भी याद किये जाते हैं। वे महज राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे बल्कि एक बड़े  देशभक्त थे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आठ वर्ष जेल में बिताये थे। मैट्रिक की परीक्षा पास करने से पहले 1921 ई. में वे महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। अंग्रेजो के साथ आजादी की लड़ाई का पहला ठोस कदम सन 1921 ई. का असहयोग आंदोलन था। इससे प्रभावित होकर देश के युवकों मैं उत्साह की लहर उमड़ पड़ी। यह अंदोलन बिहार में भी विराट रूप ले चुका था। “नागपुर कांग्रेस के बाद महात्मा गांधी 6 फ़रवरी 1921 ई. को बिहार गये और मुजफ्फर पहुंचे। वहां गांधीजी के भाषण से प्रभावित होकर बेनीपुरी जी इस सहयोग में कूद पड़े। गांधीजी के प्रयत्नों से चंपारण में अंग्रेजों का राज खत्म हुआ। बेनीपुरी जी को विश्वास हो गया कि असहयोग का भी फल अच्छा ही आएगा। इसी से भूख-प्यास भूलकर भी गांधी जी के प्रचार कार्य में जुट गए। सन 1922-29 तक का समय बेनीपुरी जी के संघर्ष में जीवन यात्रा का तृतीय प्रस्थान बिंदु है। यहीं से गांधीजी की आंधी में उड़े तो पीछे लौट कर नहीं देखा।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी के रूप में उन्हें 1930 ई. से 1942 ई. तक का समय जेल में ही व्यतीत करना पड़ा। इसी बीच आप पत्रकारिता एवं साहित्य-सर्जना में भी जुड़े रहे। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन को खड़ा करने में आपने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वाधीनता-प्राप्ति के पश्चात् आपने साहित्य-साधना के साथ-साथ देश और समाज के नवनिर्माण कार्य में अपने को जोड़े रखा।

बेनीपुरी जी के फुटकर लेखों से और उनके साथियों के संस्मरणों से ज्ञात होता है कि जीवन के प्रारंभ काल से ही क्रान्तिकारी रचनाओं के कारण बार-बार उन्हें कारावास भोगना पड़ा। सन 1942 में अगस्त क्रांति आंदोलन के कारण उन्हें हजारीबाग जेल में रहना पड़ा। जेलप्रवास में भी वह शान्त नहीं बैठे सकते थे। वे वहाँ जेल में भी भारतीय हृदय में आग भड़काने वाली रचनाएं लिखते थे। जब भी वे जेल से बाहर आते उनके हाथ में दो-चार ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ अवश्य होती थीं, जो आज साहित्य की अमूल्य निधि बन गईं हैं। उनकी अधिकतर रचनाएं कारावास की कृतियाँ हैं।

सन 1930 के कारावास काल के अनुभव के आधार पर पतितों के देश में उपन्यास का सृजन हुआ। इसी प्रकार सन् 1946 में अंग्रेज भारत छोड़ने पर विवश हुए तो सभी राजनैतिक एवं देशभक्त नेताओं को रिहा कर दिया गया। उनमें रामवृक्ष बेनीपुरी जी भी थे। कारागार से मुक्ति की पावन पवन के साथ साहित्य की उत्कृष्ट रचना माटी की मूरतें रेखाचित्र और आम्रपाली उपन्यास की पाण्डुलिपियाँ उनके उत्कृष्ट विचारों को अपने अन्दर समा चुकी थीं। उनकी अनेक रचनाएं जो यश कलगी के समान हैं उनमें जय प्रकाश, नेत्रदान, सीता की माँ, ‘विजेता’, ‘मील के पत्थर’, ‘गेहूँ और गुलाब’ शामिल हैं। ‘शेक्सपीयर के गाँव में’ और ‘नींव की ईंट’; इन लेखों में भी रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने देश प्रेम, साहित्य प्रेम, त्याग की महत्ता, साहित्यकारों के प्रति सम्मान भाव दर्शाया है वह अविस्मरणीय है।

इंगलैंड में शेक्सपियर के प्रति जो आदर भाव उन्हें देखने को मिला वह उन्हें सुखद भी लगा और दु:खद भी। शेक्सपियर के गाँव के मकान को कितना संभाल, रक्षण-सजावट के साथ संभाला गया है। उनकी कृतियों की मूर्तियों बनाकर वहाँ रखी गई है, यह सब देख कर वे प्रसन्न हुए। पर दुखी इस बात से हुए कि हमारे देश में सरकार भूषण, बिहारी, सूरदास, जायसी आदि महान साहित्यकारों के जन्म स्थल की सुरक्षा या उन्हें स्मारक का रूप देने का प्रयास नहीं करती। उनके मन में अपने प्राचीन महान साहित्यकारों के प्रति अति गहन आदर भाव था।

इसी प्रकार ‘नींव की ईंट’ में भाव था कि जो लोग इमारत बनाने में तन-मन कुर्बान करते है, वे अंधकार में विलीन हो जाते हैं। बाहर रहने वाले गुम्बद बनते हैं और स्वर्ण पत्र से सजाये जाते हैं। चोटी पर चढ़ने वाली ईंट कभी नींव की ईंट को याद नहीं करती। जयप्रकाश नारायण, लोहिया और रामवृक्ष बेनीपुरी (अगस्त 1936 , किसान सभा, पटना)। स्‍वतंत्रता के पश्‍चात उन्‍होंने अपनी साधना का पुरस्‍कार नहीं चाहा, बल्कि ख्‍याति एवं पद के पीछे दौड़ने वालों को देखकर वे दु:खी होते थे। वे सचमुच ‘नींव की ईंट’ बनना चाहते थे जिसके ऊपर सारी इमारत टिकी रहती है। भाषा, साहित्‍य, समाज और देश की सेवा समान उत्‍साह से एक साथ करनेवाले बेनीपुरी जी का 7 सितम्‍बर 1968 ई. को निधन हो गया। वे आज भी युवा पीढ़ी के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं।

(शैलेंद्र चौहान साहित्यकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)

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