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Categories: बीच बहस

उच्चतर न्यायालयों में जारी है भाई-भतीजावाद का बोलबाला! इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों की प्रस्तावित सूची पर भी उठे सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट के कॉलेजियम ने पिछले दिनों 31 नामों को मंजूरी दे दी है, जिसके बाद एक बार फिर सिफारिशों में भाई भतीजावाद के साथ जातिवाद के भी आरोप लग रहे हैं। इसमें  कम से कम 6 वकीलों के नाम भेजे गये हैं, जो 44-45 वर्ष आयु वर्ग के हैं। अगर 48 साल की बात की जाये तो नामों की संख्या कुल लगभग नौ हो जाएगी। वकीलों की अगर मानी जाए तो 45 से 48 साल के बीच के जिन वकीलों के नाम की सिफारिश सरकार मान लेती है उनका हाईकोर्ट में तो चीफ जस्टिस बनना तय होता ही है, वे उच्चतम न्यायालय तक के चीफ जस्टिस भी बन सकते हैं। यानि यदि इन्हें हाईकोर्ट में नियुक्ति मिलती है और सब कुछ मनोनुकूल होता है तो लगभग 15-20 वर्षों बाद इनमें से कई विभिन्न हाईकोर्टों के चीफ जस्टिस बन सकते हैं।

कॉलेजियम की सिफारिशों के खिलाफ प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस के यहाँ कई शिकायतें भेजी गयीं हैं जिनमें आरोप है कि बहुसंख्यक नाम माननीय वर्तमान/पूर्व न्यायाधीशों के परिजन और रिश्तेदारों के हैं या किसी न कसी प्रकार ये उनसे जुड़े हुए हैं। यहां यह भी ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि कुछ नामों को न्यायपालिका में उच्चतम कुर्सी को लक्षित करके भेजा गया है यानी भविष्य के चीफ जस्टिस के रूप में भेजा गया है। वर्तमान सूची में ऐसा ही एक नाम पूर्व सीजेआई के पुत्र का है।

वर्तमान सूची में एक भी ऐसा नाम नहीं है जिसने इस तरह की आपराधिक अपील की हो या न्यायालयों के समक्ष बहस की हो। एक नाम एक महिला का है जो एक पूर्व जज की पुत्रवधू हैं और जो ग़ाज़ियाबाद नजारत घोटाले में आरोपी हैं। वह कभी भी उच्च न्यायालय में नहीं दिखीं। इसी प्रकार कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने स्वतंत्र रूप से किसी मामले में बहस ही नहीं की है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 160 न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या है, जबकि रिक्त पदों की संख्या 57 है। सिफारिश किए गए 31 नामों में इलाहाबाद के 25 अधिवक्ता शामिल हैं जबकि बाकी अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में वकालत करते हैं।

पिछले साल उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम में तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एके  सीकरी और चीफ जस्टिस…एस ए बोबडे ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उम्मीदवारों के नामों पर विचार करते हुए कुछ अनुशंसित उम्मीदवारों की “पेशेवर आय” के बारे में अनिवार्य मानदंड में ढील दी। नये मापदंड के अनुसार उम्मीदवारों की निर्धारित न्यूनतम आय सीमा के लिए मानक प्रति वर्ष 7 लाख रुपये से कम नहीं होना चाहिए।
कॉलेजियम की छूट केवल उन मामलों में उचित होगी, जहां ऐसी सिफारिशें एससी/ एसटी / ओबीसी की श्रेणियों से संबंधित हैं या अदालतों के समक्ष स्थायी / पैनल वकील के रूप में सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं।

ऐसा नहीं है कि कॉलेजियम की सिफ़ारिश में भेजे गये सभी नामों का अनुमोदन उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम और सरकार पूरी तरह कर दे। कई नाम उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम में कट जाते हैं तो कुछ नामों को सरकार मंजूर नहीं करती। पिछले दिनों कुछ और नामों को सरकार ने पुनर्विचार के लिए वापस भेजा है उनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के एडवोकेट रामानंद पांडेय, विवेक रत्न अग्रवाल, रमेंदर प्रताप सिंह और आलोक कुमार भी हैं।

मई 2018 में राजस्थान हाईकोर्ट के कॉलेजियम ने जज के पद पर नियुक्ति के लिए 9 वकीलों के नामों की सिफ़ारिश की थी। एक साल बाद 24 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने इनमें से दो नामों महेंद्र गोयल और फ़रज़ंद अली के नाम मंजूर किए और बाकी को या तो खारिज कर दिया या उन पर फैसला स्थगित रखा। 4 नवंबर 2019 को केंद्र सरकार ने महेंद्र गोयल की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की मगर फ़रज़ंद अली के नाम को ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब अली के नाम पर भी पुनर्विचार करने के लिए कहा गया है।

उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने हाईकोर्ट जजों के पद पर बहाली के लिए जिन एक दर्जन नामों की सिफ़ारिश की थी उन्हें नरेंद्र मोदी सरकार ने यह कहकर लौटा दिया है कि वह उन नामों पर ‘पुनर्विचार’ करे। सरकार ने ये नाम धीरे-धीरे वापस किए। कहा जाता है कि ऐसा करते हुए सरकार ने कुछ नामों को वापस करते हुए ‘निरर्थक’ कारण बताए, तो बाकी के लिए कोई कारण नहीं बताया।

आठ हाईकोर्टों में नियुक्ति के लिए ये नाम भेजे गये थे, जो एक साथ एक फाइल में वापस नहीं भेजे गए बल्कि कुछ-कुछ समय बाद अलग-अलग भेजे गए। सरकार चाहती है कि कॉलेजियम उन पर पुनर्विचार करे। जो नाम वापस भेजे गए उनकी सिफ़ारिश इलाहाबाद, जम्मू-कश्मीर, पंजाब व हरियाणा, राजस्थान, मद्रास, केरल और कर्नाटक हाईकोर्ट में जजों के पदों पर नियुक्ति के लिए की गई थी। इन आठों हाईकोर्टों में जजों के कई पद खाली पड़े हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में 57 जजों के, जम्मू-कश्मीर में 5, पंजाब व हरियाणा में 29, राजस्थान में 25, मद्रास में 21, केरल में 10 और कर्नाटक हाईकोर्ट में 16 जजों के पद खाली हैं।

इस बीच, मुंबई के एक वकील मैथ्यूज जे नेदुमपारा की रिसर्च में यह बात सामने आई है कि उच्चतम न्यायालय में 33 फीसदी जज और हाईकोर्ट के 50 फीसदी जज ऐसे हैं, जिनके परिवार के सदस्य पहले ही न्यायपालिका में उच्च पदों पर रह चुके हैं। दरअसल, नेदुमपारा वही वकील हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन एक्ट को चुनौती देते हुए याचिका लगाई है। उन्होंने अपनी यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवैधानिक पीठ को सौंपी है।

नेदुमपारा के मुताबिक, यह व्यवस्था कॉलेजियम सिस्टम की वजह से पैदा हुई है, जिसमें जज ही दूसरे जजों को नियुक्त करते थे। नेदुमपारा के अनुसार उच्चतम न्यायालय के 1990 के कुछ फैसलों से कॉलेजियम सिस्टम बना, जिससे उच्च न्यायिक संस्थानों में नियुक्तियां मनमर्जी से होने लगीं, जहां उच्चतम न्यायालय , हाईकोर्ट के पूर्व और सिटिंग जज, गवर्नर, मुख्यमंत्रियों, कानून मंत्री, बड़े वकील और रसूखदार लोगों के पाल्यों के साथ हित में काम किया जाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक उच्चतम न्यायालय में मौजूदा समय में 32 जज हैं। इनमें से 6 जज पूर्व जजों के बेटे हैं। रिपोर्ट में 13 हाईकोर्ट के 88 जजों की नियुक्तियों की जानकारी है, जो या तो किसी वकील, जज या न्यायपालिका से ही जुड़े किसी व्यक्ति के परिवार वाले हैं। नेदुमपारा का दावा है कि उनकी जानकारी का स्रोत सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट और 13 हाईकोर्ट के सितंबर-अक्टूबर 2014 तक के डेटा पर आधारित हैं। उन्होंने कहा कि बाकी हाईकोर्ट्स का तुलनात्मक डेटा मौजूद ही नहीं था। कॉलेजियम सिस्टम गुप्त तरीके से काम करता है, जहां उच्च न्याय पालिकाओं में खाली पदों का नोटिफिकेशन ही नहीं निकलता, न ही इनका एडवर्टाइजमेंट होता है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की तरफ से पेश हुए वकील दुष्यंत दवे ने कॉलेजियम सिस्टम पर हमला करते हुए कहा था कि इसमें मेरिट को नजरअंदाज किया जाता है और ऐसे जज नियुक्त होते हैं, जो ऊंचे और बड़े लोगों को राहत देते हैं और आम आदमियों के मामलों में नाकाम होते हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on June 15, 2020 2:20 pm

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