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Sunday, September 26, 2021

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सवर्ण आयोग: अतीत के वर्चस्व की कायमी का नया शिगूफा

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सोशल मीडिया पर हिमाचल प्रदेश में 2 अगस्त को सवर्ण आयोग गठित करने के लिए एक रैली के आयोजन की खबर को खूब साझा किया जा रहा था तो हम तक भी यह खबर पहुंची। अभी खबर पढ़ कर आगे बढ़े थे कि अख़बार की एक कतरन भी किसी ने साझा की कि हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग को स्कूलों में मध्याहन भोजन में दलित बच्चों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए एक कमेटी का गठन करना पड़ा। इसी खबर की तरह और भी कई खबरें जहन के दर्द को ताज़ा कर गईं। मसलन आगरा के पास एक गांव में सवर्ण जाति के लोगों ने एक दलित महिला के शव को चिता से उतार लिया कहते हुए कि दलित को सवर्णों के श्मशान में कैसे जलाया जा सकता है या फिर उत्तर प्रदेश के महोबा के नथूपूरा गाँव में अनुसूचित जाति की महिला प्रधान का कुर्सी पर बैठना सवर्ण समुदाय को बर्दाश्त नहीं हुआ और उसे कुर्सी से उतार दिया।

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में काफी प्रचार चल रहा है कि भारत में सवर्णों को अपने हक़ों के लिए संगठित होना पड़ेगा। दलितों के आरक्षण ने देश को खोखला कर दिया है और सवर्णों के हक़ पीछे छूट गए हैं आदि, आदि। कितनी वाजिब है सवर्ण आयोग की मांग या फिर असल मकसद क्या है इस मांग और आंदोलन का। इस मांग को उठाने वाले लोगों का तर्क रहता है कि जब देश में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के लिए आयोग है तो सवर्णों के लिए आयोग क्यों न बने। अब यह समझना बहुत जरुरी है कि दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के लिए आयोग क्यों बने। दरअसल दलितों और आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक तौर पर समाज में भेदभाव होते रहे हैं। इस भेदभाव का मुख्य आधार उनकी जाति है। यहाँ हम इस चर्चा में नहीं जा रहे हैं कि जाति का आधार हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था है जिसे मनु महाराज की कठोर दण्ड संहिता ने न केवल सख्ती से लागू करवाया बल्कि समाज के जीवन का साँचा बना दिया। सदियों तक यह क्रूर व्यवस्था बिना बदलाव के शोषण करती रही।

परिणामस्वरुप यह समुदाय सामाजिक तौर पर तो पिछड़े ही परन्तु साथ ही उनके लिए इस दुर्दशा से बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए और उनके पास अपनी बेड़ियां तोड़ने के कोई हथियार नहीं थे। मसलन उन्हें भूमि का अधिकार नहीं था तो जमीन जो उत्पादन का महत्वपूर्ण साधन थी से महरूम रह गए। उन्हें उनके हिस्से के संसाधनों से दूर रखा गया। उनके पास केवल श्रम था उस पर भी उनका हक़ नहीं था। पैदा होते ही तय हो जाता था कि पूरे जीवन वह अपने श्रम का उपयोग कैसे करेंगे। मुक्ति और लड़ाई का जो बड़ा हथियार हो सकता था उस शिक्षा से भी कोसों दूर रखा गया। शिक्षा हासिल करना तो दूर की बात है अगर प्रयास भी किया तो दण्ड के भागीदार होंगे। अगर अपने प्रयासों से शिक्षा हासिल भी कर ली तो द्रोण जैसे गुरु ने एकलव्य का अंगूठा ही छीन लिया ताकि शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद वह उसका उपयोग ही न कर पाए। एकलव्य का केवल अंगूठा नहीं कटा बल्कि उसके पूरे समुदाय के लिए शिक्षा के रास्ते खुलने से पहले ही बंद हो गए।

शिक्षा तो छोड़िये नीति अनीति की परिभाषा तो केवल धर्मग्रंथों में थी और दलितों और आदिवासियों के लिए यह वर्जित थे। इन्हें पढ़ना तो दूर बल्कि कहीं गलती से (अपनी नहीं दूसरों की) भी अगर श्लोक का स्वर कान में पड़ गया तो मनु जी के आदेशानुसार गर्म शीशा केवल कान से होता हुआ दिमाग ही नहीं जलाता पर पीढ़ियों तक हौसला और हिम्मत भी जला देता। विद्वान और ग्रंथों के ज्ञाता होने पर शम्बूक को सराहना नहीं बल्कि आदर्श राम राज्य में आदर्श राजा द्वारा धर्म की रक्षा के लिए मृत्यु दण्ड दिया जाना खुली घोषणा थी कि कोई दलित अपनी बेड़ियां हिलाने भर की भी कोशिश नहीं करेगा।

किसी दूसरे देश के नागरिक को यह काल्पनिक लग सकता है परन्तु भारत में तो हर गांव, मोहल्ले, खेत खलिहान, शहर, हर सामाजिक रीति रिवाज, हर पर्व, जीवन के हर पक्ष में इसके विशालकाय, चट्टान से भी मज़बूत और जिन्दा सबूत मिलते हैं। सदियों हमें इसमें कुछ भी अचरज नहीं लगा। आज़ादी के बाद देश के नागरिक नई आशाएं लेकर नए भारत का निर्माण कर रहे थे। इन समुदायों की आँखों में भी समानता और सम्मान के साथ जीने और मरने के सपने थे। जिन्हें साकार करने के लिए संविधान में कुछ रंग अलग से इनके लिए रखे गए। जरूरत भी थी। सदियों से काली स्याह जिंदगियों में रौशनी लानी है तो उनके हिस्से में कुछ जुगनू अलग से रखने पड़ेंगे। संविधान ने भी सामाजिक और शैक्षणिक तौर से पिछड़ी जातियों के लिए कुछ विशेष प्रावधान किये। और यह कोई कृपा नहीं है बल्कि अतीत के पापों का बैकलॉग है। जिन्हें शोषण और दमनकारी जाति व्यवस्था से पीछे रखा, आगे आने के रास्ते बंद किए उनको बराबरी पर लाये बिना समाज का समावेशी विकास संभव ही नहीं।  इसलिए मकसद था केवल उनको उनका जायज हिस्सा दिया जाये जिससे वह सदियों से महरूम रहे हैं। 

मसलन प्राथमिकता से ज़मीन का हक़, संसाधनों और शिक्षा में भागीदारी और रोजगार के साधनों में उनका जायज हिस्सा। इसके अलावा सदियों से चली आ रही सामाजिक भेदभाव और हिंसा से रक्षा के लिए पुख्ता प्रावधान किये गए। हालाँकि समानता के अधिकार में यह सब आ जाते हैं परन्तु फिर भी विशेष प्रावधान करने पड़े क्योंकि हमारे संविधान निर्माता समानता और समावेशी होने में फर्क समझते थे। सामाजिक बराबरी के रास्ते की इस जरुरत को चिन्हित करते हुए संविधान की धारा 341 और 342 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को परिभाषित किया गया है। इसी मकसद से दलितों और आदिवासियों के लिए एक आयोग का गठन किया गया।

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजाति और एंग्लो इंडियन समुदायों के शोषण के खिलाफ उनके सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा के लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338 में एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान किया गया था, जिसके तहत 18 नवंबर 1950 को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए एक अधिकारी (आयुक्त) की नियुक्ति की गई। आयुक्त के तहत विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालय भी स्थापित किये गए लेकिन इस बीच SC/ST के प्रतिनिधियों के द्वारा संसद के अंदर और बाहर मांग उठने लगी कि केवल एक आयुक्त के स्थान पर बहु सदस्यीय आयोग की स्थापना की जाये ताकि इन वंचित समुदायों के लोगों के द्वारा झेली जा रही बहुआयामी और विराट समस्याओं का हल प्रभावी ढंग से किया जा सके।

इन भावनाओं के अनुसार भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 21 जुलाई 1978 को एक प्रस्ताव के जरिये अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए अध्यक्ष सहित पांच सदस्यीय आयोग का गठन किया जिसमें संविधान की धारा 338 द्वारा नियुक्त अधिकारी भी शामिल था। इस तरह संविधान द्वारा नियुक्त अधिकारी और आयोग साथ साथ काम करते रहे। परन्तु इससे काम और अधिकार क्षेत्र को लेकर कई जटिलताएं पैदा हुईं, इनको दूर करने के लिए और दोनों संस्थाओं का काम चिन्हित करने के लिए भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय ने एक प्रस्ताव के जरिये अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन किया। वर्ष 1990 में संविधान के 65वें संसोधन के जरिये अनुच्छेद 332 में बदलाव करते हुए सरकार के प्रस्ताव द्वारा गठित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के राष्ट्रीय आयोग और संवैधानिक व्यवस्था राष्ट्रीय आयुक्त को मिलाकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक संस्था का दर्जा दिया गया। यह कानून 12 मार्च 1992 को लागू किया गया।

वर्ष 2003 में संविधान के 89 वें संसोधन से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों  के लिए अलग अलग राष्ट्रीय आयोग गठित किये गए। यह पूरी प्रक्रिया है जिससे यह आयोग बनाये गए जिनकी चालक शक्ति थी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की स्थिति और उनको समाज में बराबरी का हक़ दिलाना। हालाँकि इन सब प्रयासों के वावजूद दलितों और आदिवासियों की स्थिति में कोई बहुत बड़े परिवर्तन नहीं हुए हैं। प्रतिवर्ष उनके खिलाफ कई तरह की हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं। क्राइम इन इण्डिया 2019 की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ अपराधों में कुल मिलाकर 7.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 

इस पृष्ठभूमि में आकलन करना होगा कि सवर्ण आयोग की मांग के क्या आधार हैं। सवर्ण आयोग का मक़सद क्या होगा। सवर्णों के खिलाफ तो कोई जातीय हिंसा या भेदभाव होता नहीं है, न ही उनकी जाति की वजह से संसाधनों और शिक्षा से उन्हें महरूम किया जाता है। फिर सवर्ण आयोग क्यों? यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके बहुत से समर्थकों को भ्रमित किया जाता है विशेष तौर पर आरक्षण के नाम पर। वैसे इस पूरे आंदोलन का एक मक़सद आरक्षण पर हमला बोलना है। यह सही है कि सरकार की नीतियों के चलते देश में बेरोजगारी अपने चरम पर है। नौजवान चाहे वह किसी भी जाति के हों नौकरी के लिए दर बदर भटक रहे हैं परन्तु सवर्ण आयोग बनने से इसमें क्या बदलाव आएगा ? जब नौकरी की समस्या सबकी है तो हल केवल सवर्णों के लिए क्यों खोजा जाए। झूठ का प्रचार जो होता है कि सवर्ण अपनी जाति के कारण नौकरी नहीं पाते और दलित/आदिवासी आसानी ने आरक्षण के कारण नौकरी पाते हैं, वही असल जड़ है। इस झूठ को बेनक़ाब करने के लिए ज्यादा तर्क की जरुरत नहीं होती बल्कि किसी भी सरकारी विभाग में कर्मचारियों के जाति वार आंकड़े स्थिति साफ़ कर देते हैं। 

वैसे आरक्षण लागू कहाँ हो रहा है। केन्द्र सरकार के छह मंत्रालयों और विभागों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों में से 60 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त हैं। ये मंत्रालय हैं -गृह, रक्षा, रेलवे, डाक विभाग, शहरी और आवास तथा परमाणु ऊर्जा। कार्मिक और लोक शिकायतों पर राज्यसभा की एक समिति द्वारा 4 मार्च, 2020 को संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, इन मंत्रालयों में आरक्षित श्रेणी के लगभग 25,000 पद रिक्त हैं। सदन समिति ने कहा कि अनुसूचित जाति श्रेणी में 13,968 पदों में से 7,782 पद रिक्त हैं। ऑक्सफैम द्वारा प्रकाशित भारतीय मीडिया के एक अध्ययन के अनुसार, सभी हिंदी टेलीविजन चैनलों में नेतृत्व के पद उच्च जाति के लोगों के पास थे। निजीकरण के बाद तो आरक्षण का प्रश्न ही बेमानी हो जाता है। 

मतलब इन तबकों के लिए उनकी आबादी में हिस्से के अनुसार रखे पदों पर भी उनकी भर्ती नहीं हो रही है। वैसे सवर्णों के लिए आरक्षण की मांग का समर्थन भी किया जा सकता है, ताकि उनको आबादी के उनके हिस्से के अनुसार नौकरियां मिल सकें बशर्ते वह इसके बाहर नौकरी न मांगें। दरअसल असल समस्या है नवउदारवाद की आर्थिक नीतियां जिसके चलते समाज में असमान विकास हो रहा है और अब तो निजी क्षेत्र में भी रोजगार उत्पन्न नहीं हो रहा। इन नीतियों के फलस्वरूप सरकारी क्षेत्र ख़त्म होते जा रहे हैं। मजे की बात है इस पर सवर्ण आयोग के हिमायती जानबूझ कर नहीं बोलते। गलती से इस तरफ कोई इशारा नहीं करते क्योंकि यह तो उनके ही रहनुमाओं के खिलाफ जाता है।

सवर्ण आयोग के तथाकथित आंदोलनकारी दलील देते हैं कि जाति और जातीय उत्पीड़न तो बीते समय की बात है। दिमाग में जाति रखने वाले लोगों के द्वारा यह प्रचार जानबूझ कर किया जाता है। जब जाति की समस्या ही नहीं तो यह सब प्रावधान क्यों। सच्चाई इससे बिल्कुल विपरीत है। नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) और मैरीलैण्ड विश्वविद्यालय द्वारा किये गये भारत मानव विकास सर्वेक्षण के अध्ययन से अनुसूचित जातियों की वर्तमान स्थिति को समझा जा सकता है। इस अध्ययन में लगभग 27 प्रतिशत परिवारों ने स्वीकार किया कि वे अस्पृश्यता की प्रथाओं में लिप्त हैं।

जब ब्राह्मणों (प्रभुत्वशाली जाति) से पूछा गया, तो 52 प्रतिशत ने स्वयं माना कि वे एक दलित को अपने रसोई के बर्तन इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे, जो अस्पृश्यता की एक सामान्य प्रथा है। अब यह सवाल तो पूछा ही जाएगा न कि सवर्ण जातियों में से कितनों ने इस तरह के अनुभव का सामना किया है जो वो विशेष आयोग की मांग कर रहे हैं। एक दलित बच्चे को जब स्कूल में अलग जगह मध्याहन भोजन परोसा जाता है या पानी पीने तक के लिए अलग बर्तन दिया जाता है तो उसके दिमाग पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है।  कक्षा में भी उसका दिमाग उसे यही बताता है कि वह दूसरों से कम है, उनके बराबर हो ही नहीं सकता – तो पढ़ाई में बराबर कैसे होगा। फिर आप गाइये योग्यता का अलाप। वो बात अलग है कि जब लाखों रुपये देकर निजी शिक्षण संस्थानों में धनी परिवारों के बच्चे प्रवेश लेते हैं तो योग्यता के सुर लगाने वालों के गले ख़राब हो जाते।

इस पूरे आंदोलन का मक़सद केवल समाज में जातीय वैमनस्य बढ़ाना, नफरत फैलाना, समाज में बराबरी के लिए जो कुछ हमने हासिल किया है उसे पलटना ही नहीं है परन्तु असल मकसद है अपने वर्चस्व और अहंकारी सत्ता को आक्रामकता से पुनर्स्थापित करना। कायम करना उस मनुवादी सत्ता को, जिसको संविधान के समतामूलक मूल्यों के लगो होने और जनवादी आंदोलन की धार से कुछ कमजोर किया है। इस तरह का प्रचार करने वाले ज्यादातर लोग एक समझ से होते हैं। उनके सघन प्रचार से बहुत से सामान्य लोग भी उनके सुर में सुर मिलाने लगते हैं। सामान्य क्यों क्योंकि पहले किस्म के लोग सामान्य नहीं हैं। इसका पता करने के लिए कोई बड़े अध्ययन की आवश्यकता नहीं है। सोशल मीडिया पर उनकी टाइम लाइन पर जाईये और पता चल जायेगा कि उनके विचार की उत्पत्ति की कोख एक ही है।

कुछ शब्द तो उन्होंने हमेशा प्रयोग किये ही होते हैं मसलन मीमते, भीमटे, मुल्ले आदि। इनकी एक और विशेषता है कि इनको आदमी से पहले उसका धर्म दिखता है, हालाँकि उसमें भी यह काफी सेलेक्टिव होते हैं।  जैसे कोई भी गुनाह करने वाला इनको मुसलमान या दलित ही दिखता है। बाकी कोई बड़े से बड़ा गुनाह भी कर दे परन्तु उनके धर्म से हो तो कभी उफ़ तक नहीं निकलेगी उसका उदाहरण तो दूर की बात है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता है हमेशा नफरत का व्यापार। वर्षों से नफरत की खेती की पैदावार से सहेजे हुए शब्दों से बाकियों की तो रूह कांप जाये। इसलिए है यह विशेष क्योंकि आम इंसान न तो इतनी नफरत करता और फैलाता है और न ही इतना धार्मिक कट्टर होता है। धर्म उसके लिए किसी को पहचानने या प्यार करने में बाधा नहीं बनता। क्या अब भी बताना पड़ेगा कि यह लोग कौन हैं। और यह प्रचार तीखा हुआ है पिछले समय क्योंकि समय समय पर उनके मुखिया स्वयं मोहन भागवत जी सार्वजानिक मंचों से आरक्षण की समीक्षा की बात कर सीधा सन्देश देते रहते हैं कि जो व्हाट्सप्प पर सन्देश आया है उसे तेजी से फैलाइये। 

और यह प्रचार यकायक नहीं बढ़ा है इसके लिए ज़मीन तैयार की गई है। जब से भाजपा सरकार के पास सत्ता आई है इस तरह का प्रचार प्रबल हो उठा है।  हो भी क्यों न मनु को दोबारा औपचारिक तौर स्थापित करने की चाहत और उसे दिलो दिमाग में रखने वाले लोग जब सत्ता में हों तो यह होना स्वाभाविक है। हालाँकि इन्होंने आधिकारिक तौर पर भी संविधान को पीछे धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन लोकतंत्र में कुछ तो बंदिशें इन पर भी है हीं। इसलिए वातावरण निर्माण के लिए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय महासभा जैसे संगठनों के आंदोलन ही मददगार होते हैं इनके।

यह लोग सीधे तौर पर चुनौती पेश पर रहे हैं सवर्ण आंदोलन की ढाल बनाकर। इनकी राजनीति हमारे सामने है हमारे देश की रूह विविधता ही इनके निशाने पर है तो जाहिर है इस विविधता के कैनवास पर सबसे हाशिये पर खड़े लोग ही पहला शिकार होंगे। यह हमारे सामने बनावटी दुश्मन व खतरे भी पैदा करते हैं। जिनको लगता है कि देश के इंद्रधनुष से यह लोग केवल एक धर्म का रंग हटाना चाहते है वह गंभीर गलतफहमी है। इनका अंतिम लक्ष्य है एक तथाकथित श्रेष्ठ सत्ता कायम करना। जिसमें अन्य धर्मों को छोड़ दीजिये, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं का भी कोई स्थान नहीं, समानता तो दूर की बात है। यह लोग समता, समानता और मानवता के लिए चुनौती हैं। भारत की जनता ने केवल अंग्रेजों को ही नहीं हराया बल्कि धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक संविधान जो सबको बराबरी का हक़ देता है, अपना कर मनुवादी सोच को भी हराया था। वर्तमान में भी इनके लिए समाज में कोई जगह नहीं है। 

(डॉ. विक्रम सिंह आल इंडिया एग्रिकल्चर वर्कर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।)

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