ओबीसी उप-वर्गीकरण का काम पूरा नहीं, अब पैनल का 14वां विस्तार

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पांच साल से अधिक समय बीत गया लेकिन ओबीसी उप-वर्गीकरण पैनल अन्य पिछड़ा वर्ग के उप-वर्गीकरण का काम पूरा नहीं कर सका है। दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी के अधीन आयोग, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग के उप-वर्गीकरण का काम सौंपा गया है, को राष्ट्रपति द्वारा 14वां विस्तार दे दिया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत अक्टूबर 2017 में राष्ट्रपति द्वारा आयोग का गठन किया गया था।केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा पिछले सप्ताह जारी एक गजट अधिसूचना के अनुसार, आयोग 31 जुलाई, 2023 तक अपनी रिपोर्ट पेश करेगा।

भारत के ओबीसी को श्रेणियों में बनाने वाले लगभग 3,000 जाति समूहों को स्लॉट करने के लिए इस आयोग को पहले 12 सप्ताह का समय दिया गया था। इसके बाद आयोग को यह सिफारिश करनी होगी कि ओबीसी के लिए 27% आरक्षण को इन उप-श्रेणियों के बीच न्यायपूर्ण तरीके से कैसे वितरित किया जा सकता है।

इससे पहले, सरकार ने सूचना और डेटा इकट्ठा करने के लिए और समय मांगा। इसके बाद कोविड-19 महामारी के कारण इस आयोग की रफ्तार धीमी पड़ गई। आयोग के सदस्यों द्वारा बताए गए समय कि दिसंबर में उनकी रिपोर्ट “अंतिम चरण में” थी और जनवरी में प्रस्तुत की जाएगी इसके बाद छह महीने का नया विस्तार आता है।

वर्ष 2018 में, आयोग द्वारा तैयार एक परामर्श पत्र में पाया गया था कि केंद्रीय स्तर पर ओबीसी के लिए आरक्षित नौकरियों और शैक्षिक पदों में से 97% सभी ओबीसी उप-जातियों के एक चौथाई से भी कम लोगों के पास गए हैं। इसके अलावा, 938 ओबीसी उप-जातियों जो कि कुल संख्या का 37% हैं का आरक्षित सीटों पर कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है। आरक्षण से लाभान्वित होने वाली उप-जातियां यादव, कुर्मी, जाट, सैनी, थेवर, एझावा और वोक्कालिगा हैं।

समिति का गठन अक्टूबर 2017 में ओबीसी आरक्षण के लाभार्थियों का अध्ययन करने के लिए किया गया था।  चिंता इस बात की थी कि इनमें से अधिकांश लाभ कुछ ओबीसी उप-जातियों को जा रहे थे, जबकि कई छूट गए थे। एक प्रारंभिक रिपोर्ट से पता चला है कि आरक्षण से लाभ का एक चौथाई हिस्सा 10 विशेष ओबीसी समूहों को जा रहा था, जबकि 983 उप-जातियों को लगभग कोई लाभ नहीं मिला।

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27% आरक्षण के प्रभाव का अध्ययन करने वाली समिति का कार्यकाल इसलिए बढ़ाया जा रहा  है क्योंकि मौजूदा केंद्रीय सूची में दोहराव, अस्पष्टता, विसंगतियां और वर्तनी या प्रतिलेखन की कई त्रुटियां हैं।

सरकार का दावा रहा है कि टाइपिंग में गड़बड़ी और दूसरी गड़बड़ियों के कारण कई मामलों में दोहरी गिनती हुई है। जिसके परिणामस्वरूप, ओबीसी की केंद्रीय सूची में 2,633 प्रविष्टियां थीं।  जबकि सरकार के एक अधिकारी के अनुसार वास्तविक संख्या 1,200 से 1,300 के बीच है। ये सूचियां ब्रिटिश काल के दौरान बनाई गई थीं ।

(जे पी सिंह वरिष्ठ पत्रकार एवं कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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