Sunday, October 17, 2021

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‘कोरोना चुड़ैल’ और ‘कोरोनासुर’ के बहाने अपनी नाकामी को छुपाने और विज्ञान विरोधी मान्यताओं को स्थापित करने में जुटी है सरकार

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पिछले वर्ष यानि 2019 में देशवासियों के सामने से एक खबर होकर गुजरी जिस पर हर बुद्धिजीवी ने अपना सिर पीटा था। ख़बर थी- बीएचयू में भूत विद्या और तंत्र-मंत्र का सर्टिफिकेट कोर्स कराया जाएगा।  

वहीं साल 2017 में एक दूसरी ख़बर मध्यप्रदेश से आई थी, जहां तत्कालीन शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश के तमाम अस्पतालों में ज्योतिष ओपीडी खोलने का निर्देश दिया था। 

वर्ष 2017 की ही एक ख़बर गुजरात से थी जहाँ गुजरात के शिक्षा मंत्री भूपेंद्र सिंह चुडास्मा एवं सामाजिक न्याय मंत्री आत्माराम पवार ने तांत्रिक सम्मेलन में भाग लिया और तांत्रिकों को दैवीय शक्तियों का उपासक बताकर उनकी हौसला अफजाई की।  

यानि एक तरफ देश की सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली को बर्बाद किया जा रहा था दूसरी ओर देश के अवाम को जाहिल, अंधविश्वासी, अवैज्ञानिक अतार्किक बनाया जा रहा था। ताकि वो सरकार से बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग न करे। और आज आलम ये है कि कोविड-19 महामारी के समय अस्पतालों में वेंटिलेटर, एन-95 मास्क पीपीई किट तक नहीं हैं। नतीजा यह है कि लगातार कई जगह से स्वास्थ्यकर्मियों के कोविड-19 संक्रमित होने की खबरें आ रही हैं।

‘कोरोनासुर के दहन’ से लेकर ‘कोरोनासुर-मर्दिनी’ तक

भारत के हाथों होगा कोरोनासुर का वध, जनता कर्फ्यू से होगा कोरोनासुर पर प्रहार जैसे हेडलाइन आजकल टीवी न्यूज चैनलों की स्क्रीन पर चलाए जा रहे हैं।

‘आज तक’ न्यूज चैनल के ज्योतिष कार्यक्रम ‘ASTRO तक’ में ‘जानिए कैसे कोरोना का संहार माँ शीतला’ में कोरोना को राक्षस बताकर पेश किया जा रहा है। जिससे बचने का उपाय शीतला माता की शरण में जाकर उनका पूजा पाठ करना चाहिए ऐसा बताया जा रहा है।

कोविड-19 महामारी को ‘कोरोनासुर’ बताकर, सरकार के मंत्री और हिंन्दी भाषी मीडिया (हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक मीडिया कहना बेहतर होगा) लगातार हिंदू मिथकों और मान्यताओं को स्थापित करने के एजेंडे में लगा हुआ है। आखिर कोरोना को असुर बताने के पीछे और क्या एजेंडा हो सकता है। कोविड-19 बीमारी छुआ-छूत से फैलने वाली बीमारी है। इस बीमारी को असुर बताकर असुर जनजातियों को भी अछूत और संक्रामक साबित किया जा रहा है।  

जबकि ये साबित हो चुका है कि असुर इस देश की एक आदिम जनजाति और मूल निवासी है जिसे ईरान से आए आक्रमणकारी आर्यों द्वारा धूर्तता पूर्वक पराजित करके इस देश की धन-संपदा से निर्वासित कर दिया गया।

इस समय देश में चैत्रीय नवरात्रि भी चल रहा है और ये सर्वविदित है कि दुर्गा को आगे करके धूर्त देवताओं ने असुर राजा की हत्या करवाई और उनके राज्य पर कब्जा कर लिया। दुर्गा देवी को महिषासुर मर्दिनी बताता आया मीडिया अब उन्हें कोरोना महामारी के संदर्भ से जोड़कर कोरोनासुर मर्दिनी बता रहा है। 

होली पर कोविड-19 वायरस को ‘कोरोनासुर’ बताकर होलिका दहन की तर्ज पर कोरोनासुर दहन किया गया। उसकी विशालकाय मूर्ति बनायी गयी। वर्ली मुंबई के अलावा काशी वाराणसी में भी कोरोनासुर को जलाया गया।  

बता दें कि मुंबई के वर्ली में 9 मार्च 2020 को कोरोनासुर का विशाल पुतला बनाकर जलाया गया। मानसिकता देखिए कि पुतले को नीले रंग से रंगा गया। नीले रंग की मूर्ति बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर की बनाई जाती है। इसके अलावा देश की सबसे बड़ी बहुजन समाज की पार्टी बसपा के झंडे का रंग भी नीला है।    

सरकार के मंत्रियों ने एजेंडाबद्ध तरीके से कोविड-19 को ‘कोरोनासुर’ में रूढ़ करने के लिए सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलाया। इसी क्रम में केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कोरोना वायरस को कोरोनासुर बताते हुए उसके दहन की सार्वजनिक अपील की थी।  

इस समय नवरात्रि चल रही है और तमाम धार्मिक चैनलों पर भी कोरोना को कोरोनासुर और दुर्गा को कोरोनासुर-मर्दिनी बताकर पेश किया जा रहा है।

कोविड -19 को धर्म पर हमला करने वाला कोरोनासुर बताकर पेश किया जा रहा

“जब जब होई धर्म कै हानि, बाढ़ै असुर अधम अभिमानी”

कोरोना को धर्म पर हमला करने वाला राक्षस ‘कोरोनासुर’ बताकर पेश किया जा रहा है। इस दुष्प्रचार के लिए वॉट्सअप, यूट्यूब, टिकटॉक जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। 

ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि देश दुनिया में धर्म की हानि होने के चलते ही कोरोनासुर नामक असुर का अभ्युदय हुआ है जो इतना ताकतवर असुर है कि पूरी दुनिया को अपने कब्जे में ले रखा है।  

रामायण में राक्षसों द्वारा यज्ञादि धर्म कार्य करने से रोकने का जिक्र आता है। उसी तर्ज पर नवरात्रि में व्यवधान को कई जगह ‘भक्ति में आड़े आया ‘कोरोनासुर’ और कोरोनासुर द्वारा धर्म कार्य में डाला गया व्यवधान बताकर पेश किया जा रहा है।

https://www.navpradesh.com/chhattisgarh/corona-india-chaitra-navratra-potter-in-woe/amp/#aoh=15855341215501&referrer=https%3A%2F%2Fw ww.google.com&amp_tf=From%20%251%24s

‘लक्ष्मण रेखा’ के बहाने प्रधानमंत्री मोदी ने मनुवादी एजेंडे को आगे बढ़ाया 

24 मार्च को अपने ऑल इंडिया लॉक डाउन वाले संबोधन में नरेंद्र मोदी ने ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लेख किया। ‘लक्ष्मण रेखा’ मनुवादी शब्दावली का शब्द है। जो लैंगिक गैर-बराबरी को बढ़ावा देते हुए स्त्री अस्मिता को घर की चारदीवारी के भीतर चूल्हा-चौका में रिड्यूस कर देता है। प्रधानमंत्री द्वारा लक्ष्मण रेखा शब्दावली के प्रयोग के बाद ये शब्द इन दिनों मीडिया में बहुतायत से इस्तेमाल होने लगा है। 

लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले सुनील लहरी के हवाले से नवभारत टाइम्स ने हेडलाइन बनाया- ‘ सतयुग में लक्ष्मण रेखा पार करने से बढ़ी मुसीबत, आप मत क्रास करें कोरोना लाइन’।

जबकि लल्लनटॉप मोदी के लक्ष्मण रेखा वाले बयान की खोज-खबर लेते हुए आखिर में कहता है- कोरोनासुर से देश को बचाना है तो ‘लक्ष्मण रेखा’ पार मत कीजिए।

इसके अलावा हिंदुस्तान की 29 मॉर्च के अंक में रामायण का किरदार निभाने वाली दीपिका से बातचीत वाली एक न्यूज की हेडलाइन है- “ कोरोना के राक्षस से बचने को न लाँघे घर की लक्ष्मण रेखा।”

इसके अलावा ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ शब्द भी नेगेटिव और वर्णवादी छुआछूत प्रथा के नजदीक लगता है। सोशल डिस्टेंसिंग शब्द की जगह ‘फिजिकल डिस्टेंसिंग’ शब्द ज़्यादा बेहतर होता।

मनुवाद पहले भी जनजाति, आदिवासी व दलित अस्मिताओं को बीमारियों, पशुओं में रिड्यूस करता आया है

कई एनिमेशन वीडियो में फर्जी कहानियों द्वारा कोरोना को असुर और चुड़ैल बताकर पेश किया जा रहा है। इसे देखने वाले छोटे-छोटे बच्चों की वैज्ञानिक चेतना का विकास बाधिता अपितु वो बच्चे जादू-टोना, भूत प्रेत चुड़ैल आदि में विश्वास करने लगेंगे और अपने जीवन की तमाम छोटी-बड़ी परेशानियों के लिए आजीवन ओझा सोखा और तांत्रिकों के पास जाने के लिए बाध्य होंगे।

(कोरोना को चुड़ैल बताकर पेश करता वीडियो)

एक समय इस देश पर राज करने वाले नाग जनजातियों को विषधारी नागों में रिड्यूस कर दिया गया। और फिर बासुकी नाग, शेषनाग को आर्य देवताओं का दास बनाकर सकारात्मक दिखाया गया और तक्षक नाग और कालिया नाग जिन्होंने आर्य देवताओं के समाने चुनौती पेश की उनकी नकारात्मक छवि बनाकर पेश किया गया। लेकिन दोनों ही स्थिति में यानि आर्यों का प्रभुत्व व दासता स्वीकार करने तथा उनकी दासता न स्वीकार करके उन्हें चुनौती देने दोनों ही शक्लों में उन्हें विषधारी जीव बनाकर महाभारत, रामायण तथा दूसरे पौराणिक ग्रंथों के जरिए समाज में रूढ़ कर दिया गया। गलत लोगों के लिए ‘नागनाथ’ जैसे रूपकों को गढ़ने के पीछे भी यही मकसद था। आज भी तमाम मनुवादी सोच से पीड़ित कलाकारों और निर्देशकों द्वारा सीरियल और फिल्मों में आदिवासी हनुमान को पूँछ वाले बंदर, जामवंत को रीछ भालू में रिड्यूस करके दिखाया जाता है।

इसी तरह चोर-चमार, चमार-सियार अहीर-गँवार, जैसे जातियों के अपराधिक या हिंसक जानवरों के रूपक गढ़े गए। ‘घटवार की तरह टकटकी लगाए’, ‘गिद्ध दृष्टि’ जैसे मुहावरे भी मृत जानवरों को खाकर अपना पेट भरने वाली जातियों को हीनतर साबित करने के संदर्भ में ही गढ़े गए हैं। 

होलिका को बुरा बताकर जहां जलाने का उत्सव मनाया जाता है वहीं दूसरी असुर नेत्रियाँ पूतना, शाकिनी डाकिनी को नवजात बच्चा मारने वाली राक्षसियां बताकर आज भी ओझा-सोखा दुकान चला रहे हैं। इस देश में पहले भी तमाम महामारियों को स्त्रियों में रूढ़ कर दिया जाता रहा है। फिर हैजा जैसी महामारी को भी राक्षस स्त्रियों (हैजा माई) में रूढ़ कर करना हो या फिर चेचक को देवी बनाकर पेश करना रहा हो 

कोविड-19 महामारी के समय रामानंद सागर निर्देशित रामायण का प्रसारण

आरएसएस और भाजपा के हार्डकोर सदस्य़ों द्वारा रामायण के पुनर्प्रसारण की मांग के दो दिन बाद ही सरकार द्वारा रामायण का प्रसारण शुरु कर दिया गया। रामायण में असुरों से युद्ध के कई प्रसंग आते हैं। फिर वो देवासुर संग्राम में दशरथ कैकेयी का भाग लेने का प्रसंग हो, राम-लक्ष्मण द्वारा ताड़का और मारीच असुर नायकों की हत्या करने का प्रसंग हो, खर-दूषण की हत्या का प्रसंग हो या फिर हनुमान द्वारा कालनेमि को मारने की घटना हो। और आखिर में राम लक्ष्मण द्वारा लंका में चढ़ाई करके राक्षसी संस्कृति वाले रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद अहिरावण समेत तमाम असुरों को लंका नगरी में आग लगाकर मारने का प्रसंग।   

एक ऐसे समय में जब ‘विज्ञान ड्युटी पर है धर्म छुट्टी पर है’ जैसे वैज्ञानिक चेतना वाले भावबोध समाज के लोगों में जोर पकड़ रहा था, लोग कोविड-19 से बचने के लिए धर्म के बजाय विज्ञान और चिकित्साशास्त्र की शरण में जा रहे थे। 1987 में अपने प्रसारण के बाद उत्तर भारतीय समाज के मानस को उन्मादित और सांप्रदायिक बनाकर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसा लोकतंत्र विरोधी कृत्य और सांप्रदायिक दंगे को जन्म देने वाले रामायण सीरियल और कोविड-19 को ‘कोरोनासुर’ में बदलकर हिंदू समाज में फिर से जनजाति, आदिवासी, दलित विरोधी भावनाओं को उभारा जा रहा है।

वाराणसी के लोगों को प्रेस कान्फ्रेंस से संबोधित करते समय एक व्यक्ति के सवाल का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं- साथियों हम लोग इस बात पर विश्वास करने वाले लोग हैं जो ये मानते हैं कि हर मनुष्य ईश्वर का ही अंश है। व्यक्ति मात्र में ईश्वर का वास है। यही हमारा संस्कार है। यही हमारी संस्कृति है। कोरोना वायरस न हमारी संस्कृति को मिटा सकता है न हमारे संस्कार को ख़त्म कर सकता है।   

और जी न्यूज़ कह रहा है- ‘मोदी मंत्र समझो, व्रत से मरेगा कोरोना’।

(सुशील मानव जनचौक के विशेष संवाददाता हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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