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Categories: बीच बहस

पारंपरिक विपक्षी दलों ने खो दी है विरोध की नैतिक ताकत

कांग्रेस की ही पुरानी रणनीतियों को ही आक्रमण बनाना और उसे अमली जामा पहनाने का काम भाजपा कर रही है और इस मामले में उसने कांग्रेस को मीलों पीछे छोड़ दिया है। अब जैसे वास्तविक समस्याओं से लोगों का ध्यान हटाने की रणनीति जो भाजपा आज तेजी से अपना रही है, कांग्रेस भी अपने फायदे के लिए पहले अपनाती रही है।

इधर संघ-भाजपा का एक ही एजेंडा है एक धर्म विशेष के लोगों को अपमानित करना, उन्हें प्रताड़ित करना, उन्हें निरंतर भय और अस्थिरता की मनस्थिति में रखना।इस समय कश्मीर से अनुच्छेद हटाने का मामला हो या राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का। इन दोनों को बुखार चढ़ाया जा रहा है और कोई विरोध में जमकर लोगों के बीच नहीं खड़ा है।

गुजरात के मुख्यमंत्री अनुच्छेद 370 के खिलाफ रैली करते हैं और बड़ोदरा विश्वविद्यालय का प्रशासन छात्रों से कहता है कि वे ‘राष्ट्र निर्माण’ की इस रैली में शामिल हों।यानी विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को यहाँ तक खत्म किया जा रहा है और कांग्रेस का औपचारिक प्रवक्ता तक इस पर मिनमिनाता तक नहीं।कांग्रेस का एक स्थानीय सदस्य जरूर इसकी निंदा करता है।

उधर कांग्रेस अध्यक्ष कहती हैं कि हमारे कार्यकर्ता जमीनी लड़ाई लड़ेंगे। जमीन तो भाजपा को दे रहे हो और लड़ाई जमीनी लड़ोगे!अनुच्छेद 370 पर तो कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा ,भाजपा के समर्थन में है।

उधर भाजपा ने राष्ट्रीयता रजिस्टर का बुखार भी चढ़ा रखा है।हर भाजपा शासित राज्य अब एन आर सी की बात कर रहा है।अब हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी यही कहने लगे हैं और जाहिर है ऊपर के इशारे पर।

इन सब मुद्दों पर जमीनी लड़ाई तो छोड़ो, खुलकर और लगातार बोलने को कोई विपक्षी दल तैयार नहीं है।लोगों के बीच जाने को तैयार नहीं है और जो तैयार हैं, उन्होंने अपने को इतना कमजोर बना लिया है कि उनका विरोध होता है तो भी नजर नहीं आता।अब तो लड़ने की जमीन ही नहीं बची।

कारण यह है कि विपक्षी दलों के पास अपना कोई दर्शन नहीं रहा, इसलिए उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं को सिर्फ़ सत्ता चाहिए।जहाँ सत्ता है,वहां वे है। उसके लिए राजनीति अपनी एक निजी-पारिवारिक दुकान है। दुकानदार तो माल वही रखेगा, बेचेगा, जिसका विज्ञापन आता है और जिसमें उसे तगड़ा कमीशन मिलता है।इसके लिए उन्हें भी क्या दोष दें।कभी- कभी लगता है कि यह लड़ाई लड़ना अब पारंपरिक दलों के वश में नहीं।

इनसे अधिक मजबूती से तो छोटे-छोटे समूह और व्यक्ति निजी खतरे उठाकर लड़ रहे हैं।वे कम से कम विरोध की जोत को तो जलाए हुए हैं।कल कोई यह तो नहीं कहेगा कि सब सत्ता के सामने लेट गए थे।इसलिए इस कमजोर रोशनी का आज के लिए भले कोई खास अर्थ न दीखता हो,कल होगा। और दुनिया में हर सत्ता को स्थाई होने का भ्रम होता है जबकि राजवंश तक स्थाई नहीं रहे तो ये तो हवा में उड़ते नजर आएंगे। समय अधिक लगेगा और बर्बादी और बर्बरताएं बढ़ेंगी। बिना कीमत के कुछ नहीं होता और इन पारंपरिक दलों में कोई नैतिक ताकत नहीं बची, हालांकि इस समय जो सत्ता में हैं, वे सबसे अधिक भ्रष्ट, अनैतिक और दृष्टिहीन हैं।

(यह टिप्पणी वरिष्ठ पत्रकार और लेखक विष्णु नागर के फेसबुक वाल से ली गयी है।)

This post was last modified on September 16, 2019 2:03 pm

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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