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संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों में नहीं है संविधान रक्षा की ‘रीढ़’!

आज पूरे देश की जनता के मन में यही सवाल है कि क्या न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के साथ मिल कर राग दरबारी गा रही है और आम आदमी या गरीब आदमी को न्याय मिलना दिन प्रति दिन और मुश्किल होता जा रहा है। क्या संविधान और कानून के शासन का विधायिका और कार्यपालिका द्वारा खुलेआम मखौल उड़ाया जाता रहेगा और न्यायपालिका इस पर मूक दर्शक जैसा व्यवहार करती रहेगी ? उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज ज‌स्ट‌िस कुरियन जोसेफ ने कहा कि संवैधानिक संस्थानों की विश्वसनीयता कम हो गई है, क्योंकि इन पदों पर बैठे व्यक्तियों के पास संविधान की रक्षा के लिए “रीढ़” नहीं है।

ज‌स्ट‌िस कुरियन जोसेफ ने लाइव लॉ की ओर से आयोजित न्यायालय और संवैधानिक मूल्य विषयक वेब‌िनार में कहा है कि न्यायाधीशों को संविधान की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया है, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं। हम कभी-कभी विफल हो जाते हैं क्योंकि हम संवैधानिक स्तर पर वस्तुनिष्ठ के बजाय व्यक्ति निष्ठ हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि अदालत हमेशा बहुमत विरोधी रही है, क्योंकि अदालत का पहला कर्तव्य संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है। एक जज की नियुक्ति संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठावान रहने के लिए की जाती है। उन्हें अपनी व्यक्तिगत निष्ठा को अलग करना होगा और इस प्रकार वे बहुमत विरोधी बन पाएंगे।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संवैधानिक मूल्य, बहुमत की राय के समान नहीं हैं।सामाजिक मूल्य संवैधानिक मूल्यों से अलग हैं। सामाजिक मूल्य बहुमत की राय के साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन अदालतें कभी इससे प्रभावित नहीं होतीं, क्योंकि उनका कर्तव्य संविधान को बरकरार रखना है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री केवल संविधान का पालन करने की शपथ लेते हैं, वे इसे बरकरार नहीं रखते हैं। यह न्यायालय है, जिसने इसे बरकरार रखा है, और इसके प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा रखी है।

वेब‌िनार में ज‌स्ट‌िस कुरियन जोसेफ के अलावा, सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा और दिनेश द्विवेदी भी मौजूद थे। संचालन एडवोकेट अवनी बंसल ने किया। बंसल ने जस्टिस जोसेफ से “संवैधानिक मूल्यों” के अर्थ के बारे में पूछकर वेबिनार की शुरुआत की और पूछा कि, क्या सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मूल्यों के सिद्धांतों को समान रूप से लागू किया है?

ज‌स्ट‌िस जोसेफ ने यह कहते हुए जवाब दिया कि संवैधानिक नैतिकता शब्द का उपयोग पहले सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया था, बल्‍कि डॉ बीआर अंबेडकर ने पहली बार इसका इस्तेमाल किया था। यह शब्द पिछले कुछ वर्षों में दिए गए फैसलों के कारण प्रचलन में है, जिनमें इनका उपयोग किया गया है, जैसे कि पुत्तुस्वामी और सबरीमाला मामले में।

उन्होंने कहा कि हमारे पवित्र मूल्यों को कौन सुरक्षित रखता है? यह अभिभावक का कर्तव्य है और हमारा अभिभावक उच्चतम न्यायालय है। हमारा कर्तव्य संविधान का पालन करना है।

जस्टिस जोसेफ ने भारत में प्रचलित धर्मनिरपेक्षता की विशेषता को विस्तार से बताया। हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता की क्या विशेषता है? भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। इसका कोई राज्य धर्म नहीं है, हालांकि यह सभी धर्मों को स्वीकार करता है। यह हमारे धर्मनिरपेक्षता की सुंदरता है। अनुच्छेद 25 विशेष रूप से धर्म की स्वतंत्रता नहीं कहता है, यह ‘अंतरात्मा’ कहता है। यह हमारे देश के लिए अद्वितीय है। हम अमल कर सकते हैं, आस्‍था का प्रदर्शन कर सकते हैं और प्रचार कर सकते हैं। धार्मिक सहिष्णुता और स्वीकार्यता भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है। यह किसी की भिक्षा नहीं है।

‌जस्टिस जोसेफ ने इस सवाल के जवाब में कि क्या भारत ने अपने प्रमुख संवैधानिक मूल्यों को महसूस किया है, कहा कि न्यायाधीशों की ओर से आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है, जिन्हें देश के नागरिकों के हितों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए अभिभावक के रूप में नामित किया गया है। संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण के लिए संस्थानों के महत्व पर ज‌स्ट‌िस जोसेफ ने कहा कि विश्वसनीय संस्थानों की आवश्यकता है और उन्हें वही लोग संरक्षित कर सकते हैं, जो न्यायालयों में बैठते हैं। लेकिन, मुद्दा बहुमत विरोधी स्वरों के अभाव का है।

जिस समय आप बहुमत विरोधी सुनाई पड़ते हैं, आपको हंगामाखेज के रूप में ब्रांड कर ‌दिया जाता है। हमें ऐसे जजों की आवश्यकता है, जिनके पास संवैधानिक आवाज रखने के लिए रीढ़ हो। ज‌स्ट‌िस जोसेफ ने कहा कि संवैधानिक संस्थानों की विश्वसनीयता कम हो गई है, क्योंकि इन पदों पर बैठे व्यक्तियों के पास संविधान की रक्षा के लिए “रीढ़” नहीं है। ज‌स्ट‌िस जोसेफ ने कहा कि यदि आपके पास उचित सिस्टम और उचित प्रै‌क्टिस है, तो कोई भी न‌िरंकुश सरकार, किसी भी बहुमत का शोर एक संवैधानिक संस्था को छू नहीं सकता है।

वेब‌िनार में सीनियर एडवोकेट दिनेश द्विवेदी ने कहा कि अयोध्या मामले में बहुसंख्यकवाद विरोधी भावना की रक्षा करने में सुप्रीम कोर्ट विफल रहा। दिनेश द्व‌िवेदी ने कहा कि आम तौर पर उच्चतम न्यायालय ने संविधान और बहुसंख्यकवाद विरोधी भावना की रक्षा की है। मेरा स्पष्ट विचार है कि एकमात्र समय जब उच्चतम न्यायालय  बहुंसख्यकवाद विरोधी भावना की रक्षा करने में विफल रहा, वह तब था, जब उच्चतम न्यायालय ने बाबरी मस्जिद मामले में अनुच्छेद 142 की शक्ति का प्रयोग किया और बहुसंख्यक ‌हिंदू के पक्ष में फैसला दिया। मैं मानता हूं, यह वो जगह थी, जहां वे विफल रहे। मुझे निश्चित रूप से लगता है कि उच्चतम न्यायालय  बहुसंख्यकवाद के आगे घुटने टेकर संविधान को विफल कर दिया।

दिनेश द्व‌िवेदी ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता और मूल्य ट‌िमटिमाते सितारे नहीं, जो ऊपर आकाश में मौजूद हैं। उन्हें स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है। संविधान एक जैव‌िक वस्तु है, हमें यह भरोसा करना चाहिए कि इसके प्रत्येक भाग को क्रियाशील बनाया जाना चाहिए। संविधान में संविधान की सर्वोच्चता का उल्लेख है।द्विवेदी ने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक मूल्यों का उल्‍लेख संविधान की प्रस्तावना में ही किया गया है। संवैधानिक मूल्यों का स्रोत हमारे संविधान में निहित है। सभी अवधारणाओं का उल्लेख प्रस्तावना में किया गया है जैसे कि स्वतंत्रता, बंधुत्व, गरिमा आदि। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता। सभी अधिकारों के समान मूल्य हैं। उन्होंने कहा कि सामाजिक नैतिकता संवैधानिक नैतिकता से बड़ी नहीं है।

दिनेश द्व‌िवेदी ने एक निरंकुश सरकार के खतरों पर टिप्पणी की, तथा निरंकुश और अराजक सरकारों के बीच उचित संतुलन खोजने की आवश्यकता पर जोर दिया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 11, 2020 10:22 am

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