पेसा कानून के 26 वर्ष: टूटे वायदे, खोखले दावे

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भारत की संसद में 15 दिसंबर 1996 को पंचायत उपबंध ( अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार ) अधिनियम (पेसा) पारित किया गया। भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इसे 24 दिसंबर 1996 को लागू कर दिया गया ।  पांचवीं अनुसूची के 10 राज्यों हिमाचल प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, तेलंगाना और मध्यप्रदेश में पेसा कानून को जमीनी स्तर पर कितना लागू किया गया, ग्राम सभा को कितनी स्वायत्तता दी गई, आदिवासी संगठनों को कानून में आज भी क्या कमियां नजर आती हैं? उसको लेकर आदिवासी संगठनों द्वारा कांस्टीट्यूशन क्लब, दिल्ली में 19 दिसंबर 2022 को एक राष्ट्रीय सम्मेलन किया गया।

सम्मेलन में पांचवीं अनुसूची के सभी राज्यों के आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। सम्मेलन में ‘पेसा कानून के 25 वर्ष: पांचवीं अनुसूची के राज्यों में क्रियान्वयन की समीक्षा’ नामक 450 पेज की पुस्तक का लोकार्पण किया गया।

सम्मेलन के दौरान लगभग सभी वक्ताओं ने कहा कि पेसा कानून के नियम बनाते समय आदिवासी संगठनों को विश्वास में नहीं लिया गया है। पेसा कानून के प्रावधानों को किसी भी राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं किया गया है अर्थात ग्राम सभाओं को सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाएं और कार्यक्रम बनाने और क्रियान्वयन करने, गरीबी उन्मूलन के अधीन हिताधिकारियों के रूप में व्यक्तियों की पहचान या उनके चयन करने का अधिकार अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। अनुसूचित क्षेत्रों में लघु जल निकायों, गौण खनिजों के खनन पट्टा प्राप्त करने, मद्य निषेध प्रवर्तित करने या किसी मादक द्रव्य के विक्रय या विनियमित करने, गौण उपज का स्वामित्व प्राप्त करने, ग्राम बाजारों का प्रबंध करने, अनुसूचित जनजातियों को धन उधार देने पर नियंत्रण रखने जैसे तमाम प्रावधानों को आज तक लागू नहीं किया गया है।

पेसा कानून का क्रियान्वयन जल, जंगल जमीन से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित होना चाहिए था। जन आंदोलनों ने भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, पुनर्विस्थापन , पर्यावरण, भूमि कानूनों में संशोधन, कर्ज मुक्ति, अवैध खनन बड़े बांधों आदि का मुद्दा लगातार उठाया है।

आजादी के बाद लगभग 6 करोड़ आदिवासियों के विस्थापन के बावजूद उन्हें पेसा कानून के तहत दिए गए अधिकार सौंपने के लिए सरकार जमीनी स्तर पर तैयार दिखलाई नहीं देती।

यह बात अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग के उपाध्यक्ष रहे डॉ ब्रह्मदेव शर्मा ने समझ ली थी। इसीलिए उन्होंने वनाधिकार कानून और पेसा कानून जैसे कानूनों को बनाते समय आदिवासियों को एक नारा दिया था  दिल्ली वालों सुन लो आज, हमारे गांव में हमारा राज!

गांधीजी ने भारत को सात लाख गांव के गणराज्यों के संघ के तौर पर देखा था लेकिन आजादी के बाद पूरी व्यवस्था केंद्रित होती चली गई। वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की आर्थिक नीति में 1991 के बाद केंद्रीकरण चरम पर पहुंचा दिया। पेसा के माध्यम से विकेंद्रीकरण का प्रयास अब तक सफल होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। पेसा कानून को दरकिनार कर बड़ी-बड़ी योजनाएं केंद्रीय स्तर पर स्वीकृत कर आदिवासियों पर थोपी जा रही हैं तथा  उन्हें चुनौती देने वालों को माओवादी बताकर, फर्जी मुकदमे लाद कर जेल में डाला जा रहा है। पेसा कानून को लागू कराने में राष्ट्रपति और राज्यपाल की अहम भूमिका का उल्लेख है लेकिन जमीनी स्थिति यह है कि भारत की राष्ट्रपति जिस उड़ीसा राज्य से आती है, वहां पर भी अभी तक पेसा की नियमावली नहीं बनाई गई है। संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा तीन के अनुसार राज्यपाल को एक वार्षिक रिपोर्ट भारत के राष्ट्रपति को अनुसूचित क्षेत्रों में प्रचलित मामलों की स्थिति के मामले में भेजनी चाहिए तथा इस रिपोर्ट को जनजातीय सलाहकार परिषद की सलाह से भेजा जाना चाहिए। लेकिन 10 राज्यों में गत 26 वर्षों से ऐसी रिपोर्टें न तो राष्ट्रपति को भेजी है, न ही राष्ट्रपति ने वार्षिक रिपोर्टों को बुलवाने में कोई रुचि दिखलाई है।

25 वर्षों में पेसा कानून के क्रियान्वयन की पड़ताल करने वाली किताब में आदिवासी संगठनों की ओर से 75 सिफारिशें लिखी गई हैं।

सम्मेलन में पेसा कानून लागू कराने की मांग को लेकर राष्ट्रपति और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपने, सभी 10 राज्यों में सम्मेलन करने, दिल्ली में रैली निकालने तथा 26 जनवरी 2023 को पांचवीं अनुसूची के राज्यों में ग्राम सभाएं आयोजित कर पेशा कानून के प्रावधानों को लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित करने का निर्णय लिया गया है।

आदिवासी संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पेसा कानून की जानकारी देश के हर आदिवासी तक पहुंचाने की है। संसद द्वारा पारित कानून को लागू कराने तथा जिन राज्यों में नियमावली में कमियां रह गई हैं, उन्हें दूर करने और पेसा कानून को लागू करने के लिए ग्राम सभाओं को सक्षम बनाने और संगठित करने की है।

पेसा कानून के क्रियान्वयन में 26 वर्षों का अनुभव यही बतलाता है कि केवल कानून बनवाने से बात नहीं बनती, कानून को लागू कराने के लिए नागरिकों में जागरूकता पैदा करना तथा कानून को लागू कराने के लिए ताकतवर संगठन का होना आवश्यक है अन्यथा राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में कानून कागज तक ही सीमित रह जाना तय है।

(डॉ. सुनीलम पूर्व विधायक और किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष हैं।)

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