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यूपी सरकार पुलिस से करा रही है संप्रदायिक हिंसा

सीएए (नागरिकता संशोधन कानून), एनसीआर (नेशनल सिटिजन रजिस्टर) और एनपीआर (नेश्नल पोपुलेशन रजिस्टर) के ज़रिये जिस तरह बीजेपी सरकार संविधान के खिलाफ़ जाकर नागरिकों को हिंदू-मुसलमान के दायरे में बांधना चाहती है, उसके खि़लाफ देश भर में आंदोलन-विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत सरकार और ख़ासकर उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार संविधान-कानून को ताख पर रख कर अल्पसंख्यकों के दमन पर उतारू है।

इरादा ये है कि सरकारी मनमानियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाला कोई भी बक्शा नहीं जाएगा। सत्ता के इस रवैये के खिलाफ़ बहुत से लोग, संगठन संघर्ष कर रहे हैं। बीती 26 दिसंबर को ‘‘हम भारत के लोग’’ नेशनल एक्शन अगेंस्ट सिटिज़नशिप अमेंडमेंड मंच ने दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कान्फ्रेंस कर अपनी फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट पेश की। मंच की इस मुहिम में 70 से अधिक संस्थाएं शामिल हैं।

जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने कहा कि हम ये प्रेस कान्फ्रेंस लखनऊ में करना चाहते थे। हमारे मीडिया और आंदोलन के हर समझदार साथी ने कहा, ‘‘अगर तुम सचमुच चाहते हो प्रेस कान्फ्रेंस हो जाए तो लखनऊ मत आओ। दिल्ली में कर लो। यहां प्रेस वार्ता नहीं हो सकती है। या तो तुम्हें स्टेशन से उठा लेंगे। या उस साइट पर डिटेन कर लेंगे। या मीडिया को नहीं आने देंगे। या ख़बर बाहर नहीं जाएगी।’’

कारवां-ए-महोब्बत मिशन चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व आईएएस हर्ष मंदर ने सीएए आंदोलन को लेकर देश और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी में उत्तर प्रदेश सरकार-प्रशासन द्वारा सभी स्थापित कानूनों को ताख पर रख कर की गई बर्बरता के बारे में बात की। एपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वूमेन एसोसिएशन) की सेक्रेटरी कविता कृष्णन ने 25 दिसंबर के मेरठ के दौरे के बाद वहां के हालात बयान किए। यूनाइटेड अगेंस्ट हेट कैंपेन के नदीम खान ने उत्तर प्रदेश में जो कुछ हो रहा है उसकी जानकारी दी।

हर्ष मंदर ने कहा कि आज हम अपने गणतंत्र के इतिहास के एक अहम मोड़ पर हैं। सीएए, एनपीए, एनआरसी का मकसद भारत के सेक्यूलर चरित्र को ख़त्म करना है। 100 साल पहले एक लड़ाई शुरू हुई थी, जब गांधी जी देश में लौटे थे।

उन्होंने जो आंदोलतन किए थे, उनके केंद्र में एक यही विचार था कि हर विचारधारा और हर धर्म के सभी लोग भारत देश के समान नागरिक हैं। इसके खि़लाफ़ 100 साल पहले संघ की विचारधारा आई, जिसके मुताबिक भारत एक हिंदू राष्ट्र होगा। मुस्लिम और इसाई दूसरे दर्जे के नागरिक होंगे। इसी विचार पर मुस्लिम लीग ने कहा कि भारत में दो देश हैं। हिंदू-हिंदुस्तान और मुस्लिम पाकिस्तान। और नतीजतन बंटवारा हुआ बहुत ख़ून बहा।

सेक्यूलर संविधान को खत्म करने की कोशिश
गांधी जी के नेतृत्व में जो आज़ादी का आंदोलन हुआ और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की देखरेख में जो संविधान बना था उसकी आत्मा थी कि भारत के सभी नागरिक समान हैं। आज जो सरकार सत्ता में है, उनको लगता है कि अब उनका वक़्त आ गया है कि वो अब भारत को अपनी विचारधारा के मुताबिक बदल दें।

वो भारत के सेक्यूलर संविधान को खत्म करने की निर्णयात्मक कोशिश कर रहे हैं। इसमें एनआरसी और सीएए क्रिटिकल एलीमेंटस हैं। इसके मुताबिक पहली बार धर्म के आधार पर भारत के नागरिकों के अलग हक़ अलग रास्ते होंगे। एक मज़हब का एक रास्ता और दूसरे मजहब का दूसरा रास्ता। ये भारत के संविधान का अंत है।

मुसलमान देश में बराबर के हिस्सेदार
मैं कई जगह घूम रहा हूं। जो नौजवान सड़क पर निकले हैं देश भर में उनके साथ और बहुत सारे लोग हैं। पहली बार मुझे ये महसूस हो रहा है कि गांधी जी की हत्या के बाद उस नफ़रत के खिलाफ़ जो लड़ाई है, वो हमारे नौजवानों ने शुरू की है। हर जगह हिंदू-मुस्लिम एकता। ‘‘हिंदू-मुस्लिम-सिक्ख-इसाई हम सब हैं भाई-भाई।’’ इस तरह के नारे, हिंदुस्तान से मोहब्बत, एक महोब्बत पर आधारित एक देश होगा।

हम उसे नफ़रत के आधार पर बांटने की इजाज़त किसी को नहीं देंगे। इस देश के मुसलमानों से ये पूछने का हक़ किसी को नहीं है कि वो अपने देश के प्रति अपनी मोहब्बत और वफ़ादारी साबित करें। इस देश में उनकी बराबर की शहादत रही है और वो बराबर के हिस्सेदार हैं। एक संघर्ष शुरू हो चुका है- हिंदुस्तान की आत्मा के लिए, संविधान के लिए, देश में प्यार-बराबरी के लिए। हम सब इसके गवाह हैं।

कपड़े देखकर पता नहीं चलता पीएम जी
इस सरकार का एक स्टैंडर्ड रवैया है। उसके तीन पहलू हैं। जो हम देश भर में देख रहे हैं। पर सबसे ज़्यादा उत्तर प्रदेश में। सबसे पहले ये मुद्दे को सांप्रदायिक बनाते हैं। हिंदू-मुसलमान में बांट देते हैं। इसीलिए उन्होंने जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी पर हमले किए, लेकिन जब और 50 विश्वविद्यालयों से बच्चे निकले और उन्होंने कहा कि ये आप नहीं कर सकते हैं। उस रात जब जामिया के बच्चे जेलों में थे, मैंने देखा कि दिल्ली में अपने आप इतनी भीड़ इकट्ठी हुई और पूरी रात डटी रही।

लोग कह रहे थे, ‘‘तब तक घर नहीं जाएंगे जब तक इन बच्चों को छोड़ा नहीं जाता।’’ ये एक अदभुत टर्निंग प्वाइंट है। बंगलौर में एक लाख लोग सड़कों पर निकल पड़े। शांति से विरोध करने के लिए। ये सारे देश में हुआ। तो सांप्रदायिक तो नहीं हो पाए हालात। जैसे कि पीएम ने कहा, कपड़े देख कर पता चल रहा है कि विरोध कौन कर रहा है।

इनका दूसरा तरीक़ा है झूठ बोलना। 70 सालों में ऐसा शायद हुआ हो कि प्रधानमंत्री जनता के बीच झूठ बोले कि हमने एनआरसी की बात की ही नहीं, जबकि गृह मंत्री ने संसद के भीतर और बाहर कई बार एनआरसी के बारे बोला है। पहले सीएए आएगा फिर एनआरसी। अब दो दिन पहले एनआरपी लेकर आ गए हैं।

अटल ने बोया था अलगाव का बीज
2003 में सीएए (सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट) में अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कानून बनाया था, उसमें साफ है कि आप भारत के नागरिक नहीं हो सकते अगर आपके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक नहीं होगा। नेश्नल एनपीआर एक्ट के रूल में भी बदलाव लाया गया था। इसके मुताबिक एनआरपी बनाया जाएगा, जिससे घुसपैठियों को चिन्हित किया जाएगा और उनका नाम एनआरसी में नहीं होगा।

ये अपने आप में ग़लत है, क्योंकि सैंसस के द्वारा जो भी जानकारी मिलती है वो गोपनीय होती है। इसका गैरकानूनी ढंग से इस्तेमाल किया जाएगा। राट्रीय स्तर पर एनआरसी असम से भी बदतर होगा, क्योंकि असम में सब लोगों को दस्तावेज़ जमा करने को कहा गया था। पर यहां पर देश भर में एनपीआर के आधार पर ग़ैरकानूनी रूप से भारत आने वाले को अफसरों द्वारा चिन्हित किया जाएगा, इसमें अल्पसंख्यकों को आसानी से निशाना बनाया जा सकता है।

उत्तर प्रदेश में जो किया जा रहा है वो मतभेद को क्रूर ढंग से दबाने की कोशिश हो रही है। ऐसी स्थित है कि मुख्यमंत्री खुद पुलिस को कह रहा है कि उसको खुली छूट है, आंदोलन को दबाने की। जो भी बोलता है उसकी आवाज़ बंद करने की। इतने बड़े पैमाने पर पुलिस बर्बरता हो रही है। ये ख़तरनाक और डरावना है।

छात्र आतंकवादी नहीं हैं योगी जी
हर्ष मंदर ने कहा कि कुछ हिंसा आंदोलनकारियों द्वारा भी हुई है, जितनी हिंसा होती है, उसके अनुरूप ही कार्रवाई होनी चाहिए। पर यहां ऐसा नहीं हो रहा है। एएमयू (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी) में 15 तारीख़ की रात को बहुत बर्बरता की गई। हम 17 को वहां पहुंचे, तब तक 21 हज़ार छात्रों को घर जाने का आदेश दे दिया गया था। दूर-दराज़ से आए छात्र जैसेकि नार्थ ईस्ट और कश्मीर से आए छात्रों के लिए बहुत मुश्किल था अचानक घर जाना। उनसे हॉस्टल 24 घंटे से कम समय में खाली करवाया गया।

यूनिवर्सिटी का रजिस्ट्रार यूपी काडर का पुलिस अफसर है। उन्होंने हमसे बंदूक के घोड़े पर सवार पुलिस अफसर की तरह बात की। रजिस्ट्रार ने पुष्टि की कि पुलिस ने छात्रों के खिलाफ़ स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल किया। मंदर बताते हैं कि वे डिस्ट्रिक मैजिस्ट्रेट रहे हैं। पर उन्होंने आज तक नहीं सुना कि लॉ एंड ऑर्डर को बहाल करने के लिए कभी स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल हुआ है। ये ज़्यादातर आतंकवादियों के खिलाफ़ इस्तेमाल होता है ना कि आंदोलनकारी छात्रों के खिलाफ़।

अगर छात्रों में गुस्सा और असंतोष बढ़ रहा है, कुछ छात्र पत्थरबाजी करते हैं तो ऐसी हालत से निपटने के लिए एक प्रोटोकॉल है, जिसके तहत पहले फैकल्टी को छात्रों के साथ बात करने के लिए कहा जाता है, ताकि छात्रों को शांत किया जा सके। अगर पुलिस को भी बुलाया जाता है तो उसके लिए अलग-अलग चरण है। पहले लाठी का इस्तेमाल करना फिर आंसू गैस का। वहां ऐसा कुछ नहीं किया गया। आरएएफ (रैपिड एक्शन फोर्स) यूनिवर्सिटी में दनदनाते हुए आई और छात्रों को पीटने लगी। 

उन्होंनें हमला करना, स्कूटर जलाना शुरू कर दिया। यहां तक कि फोर्स के लोग जय श्री राम के नारे भी लगा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि कोई ‘‘लिंच मॉब’’ आ गया है। आज उत्तर प्रदेश को वहां के नेतृत्व ने वहां पहुंचा दिया है जहां अधिकतर शांतिपूर्ण हो रहे आंदोलनों को दबाने के लिए हिंसात्मक तरीके़ अपनाए जा रहे हैं।

ग़रीब-मज़लूमों की लाश पर तानाशाही का ताज
25 दिसंबर की मेरठ फैक्ट फाइंडिंग टीम का हिस्सा रही कविता कृष्णन ने मेरठ हिंसा के ज़मीनी हालात बताते हुए कहा कि यहां 20 दिसंबर को पुलिस द्वारा की गई हिंसा में छह लोगों की मौत हुई है। इसमें से चार के परिवार से हम मिल पाए। जो मारे गए हैं वो बेहद ग़रीब घरों से थे। मज़दूर परिवारों में अकेले कमाने वाले थे। इनमें से ज़्यादातर लोग किसी आंदोलन-प्रदर्शन में शामिल नहीं थे। वो अपने काम पर जा रहे थे या नमाज़ पढ़ने जा रहे थे या वहां से लौट रहे थे। उनकी एकमात्र चिंता ये थी कि कैसे हम सुरक्षित अपने घर पहुंचे।

जिनकी मृत्यु हुई है, पुलिस ने उनके खि़लाफ ज़बरदस्त झूठे केस लगाए हैं। उनमें से एक ई-रिक्शा चालक थे। रोज़ वो निकलते थे, रिक्शा चलाकर घर लौटते थे। उस दिन जब तनाव हुआ तो वो हापुड़ गैराज में अपना रिक्शा रखकर घर आने की कोशिश कर रहे थे। तब उनको गोली मारी गई। ज़्यादातर चोटें सिर पर, छाती पर लगी हैं। एक परिवार ने तस्वीरें दिखाई जिनमें पीठ पर घाव था, कंधे से गोली बाहर निकली थी। यानि पीछे से गोली चलाई गई।

रिक्शा चालक के बारे में पुलिस कह रही है कि ये मास्टर माइंड थे। उन्होंने दिल्ली से लोगों को बुलाकर वहां पर दंगे फैलाने को अंजाम दिया था। आसिफ नाम का ये नौजवान रिक्शा चालक 20 साल का था। आसिफ के पड़ोसियों ने बताया कि वो कोई मास्टर मांइड नहीं था। ये दिल्ली नहीं गया अभी। बचपन में कभी गए थे जब उनके पिता दिल्ली-शाहदरा में चाय बेचते थे, इसलिए इसके कागज़ात दिल्ली के बने हुए हैं। यहां वो कई वर्षों से रह रहे हैं। हम रोज़ उनको रिक्शा चलाते देखते थे।

कब तक सच छुपाओगे?
आखि़र उस दिन क्या हुआ था? दिन शुक्रवार था। जुमे की नमाज़ थी। बहुत से लोग नमाज़ पढ़ने गए थे। सबका कहना था कि उस दिन मस्जिद के इमाम ने नमाज से पहले करीब आधा घंटे बात की। लोगों को ये समझाने के लिए कि ध्यान से रहिए। किसी भीड़ में मत निकलिए। भावनाओं में बहकर कोई ग़लत कदम मत उठाइए। नमाज़ियों को रोक कर रखा काफ़ी देर। फिर छोटे-छोटे समूहों में बाहर निकाला ताकि बड़ी भीड़ में कोई जल्दी से न निकले। कविता कहती हैं कि समाज की अपनी तरफ से पूरी कोशिशें रही हालात संभालने की।

मस्जिद के बाहर कुछ लोग शांतिपूर्ण तरीके से काला रिबन बांट रहे थे। पुलिस ने वहां आकर काला रिबन छीन कर फेंक दिया। कपड़ों का थान फेंक दिया और किसी लड़के के साथ झड़प करके उसे थप्पड़ मारा। तब उस लड़के ने नारे लगाए और कुछ और लोगों ने भी उसका साथ दिया। इसके बाद कुछ अफरा-तफरी मची। फिर भी मस्जिद के पास से लोग शांत होकर चले गए। उसके बाद दूसरी जगहों पर गोलियां चलाई गई हैं। इस तरह से कि जैसे गलियों के अंदर दौड़ा-दौड़ा कर गोलियां चलाई हैं। इसीलिए पुलिस का ये कहना कि क्रास फायर में लोग मारे गए हैं। इसका कोई सबूत हमें नहीं मिला। पुलिस वालों के गंभीर चोटों के सबूत भी हमें बिल्कुल नहीं मिले।

अभी जो हालात मेरठ में हैं वो ये हैं कि जितनी मौतें हुई हैं, उनमें से दो मामलों में पुलिस ने बॉडी को घर नहीं लाने दिया। घर वाले बीवी-बच्चे, रिश्तेदार चेहरा भी नहीं देख पाए। कहीं और दफ़्ना दिया गया। कुछ मामलों में जहां बॉडी को घर लाने दिया, वहां जल्दी-जल्दी उसी रात को दफ़्ना दिया गया। रिश्तेदार बार-बार ये कह रहे थे कि हमें सूरत तक देखना नसीब नहीं हुआ।

मेरठ में आतंक का माहौल है। सभी मुस्लिम समाज के लोगों ने बताया कि वो सो नहीं रहे हैं। रात भर जाग कर पहरा देते हैं।

हिंदू तो दुश्मन नहीं दिखते, हुकूमत को क्या हो गया!
कविता कृषणन बताती हैं कि अलीम, जिनकी मौत हुई है, उनके पिता हबीब ने जो बात कही उसे सुन कर मुझे गहरी शर्म महसूस हुई। हबीब ज़ोर-ज़ोर से सिसक-सिसक कर रो रहे थे। वो सीधे दो शब्द बोल नहीं पा रहे थे। बार-बार कह रहे थे, ‘‘हिंदुओं की गोद में तो हम खेल-खेल कर बड़े हुए। हिंदुओं के साथ तो हमारी इतनी अच्छी दोस्ती है। अभी भी हिंदुओं की आंखों में मुझे वैसा कुछ तो नज़र नहीं आता। तो ये हुकूमत ऐसी क्यों हो गई है? मैं समझ नहीं पा रहा कि उन्होंने मेरे बेटे के साथ ऐसा क्यों किया?’’

कविता कृष्णन ने मीडिया के लोगों से कहा कि ये ध्यान देने की बात है। आपकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है इसे कवर करने में। कृपया पूरी तस्वीर पेश कीजिए। सीएए, एनपीए, एनआरसी क्या है। जो हो रहा है वो क्यों हो रहा है। लोगों को पूरा सच बताईए।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ये सत्ता क्या करना चाहती है? जिसने पुलिस को खुला छोड़ दिया है देश के अल्पसंख्यकों पर। ये बहुत क्रूर है। आप वो भाषा बताएं जो लोगों से बोली जाती है। जामिया के छात्रों से बोली गई। ऐसे लोग एनपीआर के ज़रिए तय करेंगे कि कौन संदिग्ध नागरिक है और कौन नहीं?

ये सरकार जो अल्पसंख्यकों-मुसलमानों के लिए पहले से ही ज़हर से भरी हुई है, इसमें लोकल समूहों को कितना मौक़ा मिलेगा ये कहने को कि हमको लगता है कि फलाना बंग्लादेशी है। ये सारे लोग संदिग्ध हैं। सबसे कहा जाएगा कि आप अपने पड़ौसियों को संदिग्ध कह दोंगे तो आप बच जाओगे। ये भ्रष्टाचार के लिए कितनी जगह बनाएगा ये सोचिये। पैसा आप दोगे तो संदिग्ध कहलाने से बच जाओगे।

आज उत्तर प्रदेश के हालात ये हैं कि पैसा दोगे तो एनकाउंटर से बच जाओगे। तो आप सोच लीजिए कि क्या एनपीआर-एनआरसी करने की ताकत हमें इस सरकार को देनी चाहिये? इतिहास हम सबसे सवाल करेगा

मेरी अपील है कि ये सब कवर करने में कृपया पूरी तस्वीर दिखाएं। मीडिया से मेरी हाथ जोड़ कर विनम्र अपील है कि छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़कर मत दिखाइए। कोई एक नारा, कोई एक पिक्चर कहीं से ताकि सरकार को क्लीन चिट दी जा सके। ये मत करिए, क्योंकि हम अगर इस पूरी चीज़ को देखते हैं तो बहुत ख़तरनाक समय है ये। इतिहास हम सबसे सवाल करेगा कि आपने इस समय क्या किया। इसको याद रखें। रात को सोने से पहले सोचिए कि आपके बच्चे आप से क्या सवाल करेंगे।
जारी है…

(वीना जनचौक की दिल्ली स्टेट हेड हैं।)

This post was last modified on December 30, 2019 10:35 pm

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